सोमवार, 6 मई 2024

आज की नव गोरियाँ [ सजल ]

 210/2024

         

समांत    :  इयाँ

पदांत     : अपदांत।

मात्राभार : 26

मात्रा पतन : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


क्यों  मदों  में  चूर हैं  ये आज की नव गोरियाँ।

समझतीं  नर को  नहीं हंकार में भर छोरियाँ।।


रूप का  अभिमान इतना  अप्सरा भी मात है।

चढ़ रही हैं आज उनके भाल पर क्यों त्यौरियाँ।।


चार अक्षर  पढ़   लिए  तो शारदा अवतार बन।

मारती हैं कवि पुरुष को शब्द की शत गोलियां।।


छू   न  जाए  सभ्यता  का  एक पल्लू  देह  से।

मारती  हैं  व्यंग्य   की  मीठी  दुधारी  बोलियाँ।।


भेदभावों   की   खड़ी   दीवार उर के बीच   में।

भर  रही  हैं  माँग में किस नाम की वे   रोलियाँ!!


नाम विमला  शांति कमला रख लिए सुंदर बड़े।

परुषता  मन   में भरी  है  कर  रही बरजोरियाँ।।


'शुभम्'  नारी  योनि का देखा बहुत अपमान ये।

नारियाँ  ही  कर  रही   हैं नारियों की खोरियाँ।।


शुभमस्तु !


06.05.2024●8.45आ०मा०

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नारी बनाम गलती [कुंडलिया]

 209/2024

             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

माने अपनी लेश भर , गलती   कभी न   एक।

देखे  बिना  न  आँख  से,  नारी   वह प्रत्येक।।

नारी  वह    प्रत्येक, ईश   की  अद्भुत   रचना।

आठ  पहर  का  साथ,पुरुष  यह कैसे बचना।।

'शुभम्'  सत्य  यह बात,सदा वह अपनी ताने।

देते    रहो    प्रमाण, आपकी   एक  न    माने।।


                         -2-

नारी   से  कहना   नहीं, गलती  करो अनेक।

दे दें   भले  प्रमाण   भी,   एक  तुम्हारी टेक।।

एक  तुम्हारी  टेक, कभी   मैं  गलत न होती।

लगा  रहे  आरोप , झूठ   कह-कह  कर रोती।।

'शुभम्' न  डालो  हाथ,साँप का बिल है भारी।

करो  मौन  स्वीकार, गलत कब होती   नारी।।


                        -3-

पहले - पहले  पुरुष की,रचित हुई है देह।

बाद विधाता ने  करी, नारी सृष्टि स्व गेह।

नारी  सृष्टि  स्व गेह,भूल क्या ऐसी उनसे।

हुई  सृजन में  दीर्घ, भरी  नारी ठनगन से।।

'शुभम्'  सोचते  ईश,मार  नहले पर दहले।

रच दी  नारी शुभ्र, नहीं  पर  नर  से पहले।।


                         -4-

नारी   है  संसार   में,  प्रभु  की महती  भूल।

कहते   हैं   परमात्मा,   बने पुरुष-अनुकूल।।

बने पुरुष-अनुकूल,झूठ निकला वह  वादा।

कर्म  करे   प्रतिकूल,उलट  ही हुआ इरादा।।

'शुभम्' करें क्या लोग,पुरुष पर पड़ती भारी।

पाल   लिया   क्या  रोग,नहीं फुलवारी नारी।।


                         -5-

करते  हैं  उपहास  क्यों, वृद्ध विधाता  आज।

नहले  पर  दहला  लगा, हटा दिया नर-ताज।।

हटा  दिया  नर -ताज, गलतियों की ये क्यारी।

माने  एक  न  बात,खिल रही घर-घर   नारी।।

'शुभम्' जननि का रूप, कभी पत्नी ला धरते।

खोद  घरों  में   कूप, विधाता  नाटक करते।।


शुभमस्तु !

06.05.2024●7.30आ०मा०

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पहले वाली बात नहीं है [ नवगीत ]

 208/2024

      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पहले वाली

बात नहीं है,

पाँच साल पहले जैसी।


बहने लगीं

हवाएँ उलटी

शीत युद्ध अनिवार चले।

मन में चलीं

कटारी बरछी

पड़ती बीच दरार छले।।


रुख बतलाते

वर्षा होगी

नहीं  प्रबल वैसी-वैसी।


एक दूसरे को

दिखलाना

 चाह रहे दोनों नीचे।

सत्तासन की

शतरंजों में

गोट मुट्ठियों में  भींचे।।


अच्छे ये

आसार नहीं हैं

होनी है ऐसी -तैसी।


समय एक -सा

कभी न रहता

प्यादा   फ़र्जी बन जाता।

चालें अपनी

चले न सीधी

चलते - चलते तन जाता।।


गर्भ समय के

जो पलता है

कर देता हालत ऐसी।


शुभमस्तु !


05.05.2024●2.30प०मा०

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उसको आँख दिखाना मत [ नवगीत ]

 207/2024

     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सत्तासन की

जननी जनता

उसको आँख दिखाना मत।


तू याचक है

दाता है वह

फैलाए भी जोड़े हाथ।

आजीवन तू

उऋण न होगा

सदा झुकाना उसको माथ।।


तू संतति

वह पूजनीय है

तुझे पालना ही है सत।


भय धमकी

आतंक दिखाकर

कौन यहाँ पर टिक पाया।

शोषण करता

तू उसका ही

जिसकी तुझे मिली छाया।।


आजीवन 

आभारी होकर

कर्म पंथ पर हो जा रत।


अहंकार से

मिट जाते हैं

राजपाट  वैभव   सारे।

न्याय धर्म का

करे अनुसरण

बनते हैं जन-जन प्यारे।।


करनी कथनी

एक जहाँ हो

जनगण की होती सदगत।


शुभमस्तु !


05.05.2024●10.15आ०मा०

रविवार, 5 मई 2024

सच को कोई नहीं जानता [ नवगीत ]

 206/2024

      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सबके ही

कयास अपने हैं

सच को कोई नहीं  जानता।


अलग - अलग

स्वर हर ढपली के

कोई वक्ता है भावी का।

ताला लिए

फिर रहा कोई

उसे खोलने की चाबी का।।


दावों की

आँधी चलती है

कहता मुख से सत्य मानता।


हम ही सत्ता 

के धारक हैं

सिर के ऊपर गुजरा पानी।

कानों से है

बहरा  पूरा

गढ़-गढ़ कहता नई कहानी।।


भूलभुलैया में

है जनता

डोर कुए पर बैठ तानता।


चैनल और

मीडिया वाले

सबके हैं अंदाज़ निराले।

रस ले लेकर

 हैं फ़रमाते 

'सुसमाचार' मसाले वाले।।


पत्रकार टोही

फिरते हैं 

लगती केवल भूँक श्वानता।


शुभमस्तु !


04.05.2024●9.00प०मा०

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भाषा लाल मिर्च है जिनकी [नवगीत ]

 205/2024

     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भाषा लाल 

मिर्च है जिनकी

सुनकर झन्ना जाते कान।


कुंठा चीख 

रही मंचों से

नारी   का  ये  कैसा  मान?

गर्ल फ्रेंड

विधवा कह देते

करना क्या इनको मतदान??


जहाँ नारियाँ

पूजी जातीं

ऐसा अपना देश महान।


हार - जीत सब

अलग बात है

जीभ लभेड़ा क्यों खाए?

खिसियाहट ये

क्या कहती है

बार-बार यों उलझाए।।


सौंप रहे हो

बागडोर क्यों

क्यों ऐसों को बना महान?


जूती समझ 

रहे पाँवों की

नारी  को  जो नेता आज।

रख दोगे क्या

उनके सिर पर

भारत माता का नव ताज।।


चमके 'सुचरित'

'माननीय' के 

सुन लेना सब देकर ध्यान।


शुभमस्तु !


04.05.2024●5.45प०मा०

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किसके भक्त आज के नेता [ नवगीत ]

 204/2024

    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जनता सब कुछ

समझ गई है

किसके भक्त आज के नेता।


अब गलियों में

नहीं जरूरी

कोई  हाथ  जोड़ने  जाए।

मुखचोली धर

रंग - बिरंगी

आँखों-आँखों में शरमाए।।


माननीय के 

साथ मंच से

दोनों हाथ जोड़ वह देता।


कवि कहता है

शरमाना क्या 

पाँच साल ही तो बीते हैं।

जो पहले थे

भूखे याचक

उनके घड़े  अभी रीते हैं।।


समय कहाँ है

बेचारों को 

अब तक धन के अंडे सेता।


सुविधाओं की

त्रिपथगा से 

धन्य -धन्य जन को कर देंगे।

दुखी न होगा

भूखा कोई 

बातों से ही  दुख हर लेंगे।।


मतमंगे से

कहता जनगण

तुम्हें बनाएँगे  हम  जेता?


शुभमस्तु !


04.05.2024●3.30प०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...