बुधवार, 11 दिसंबर 2024

एक कविशाला बनाऊँ आज से [ नवगीत ]

 560/2024

      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सोचता हूँ

एक कविशाला बनाऊँ आज से।


क्यों भटकते

कुछ अटकते हैं उधर,

नोट दे क्रय

कर रहे कविता सुघर,

सोचता हूँ

घोष  कर  दूँ ताज से।


छंद तुक

लय भाव का शिक्षण मिले,

हृदय बगिया में

सुमन   कवि    के   खिलें,

सोचता हूँ

मुक्ति   वाचा - खाज  से।


आधिकारिक

पत्र   सबको  चाहिए,

कर प्रदर्शन

कक्ष   में  लटकाइए,

सोचता हूँ

सबको दिखाएँ नाज से।


शुभमस्तु !


11.12.2024●11.30 आ०मा०

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लिखना आना नहीं जरूरी [ गीत ]

 559/2024

    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लिखना आना नहीं जरूरी

नोटों की ताकत में दम हो।


रंग - बिरंगे    मढ़े   फ्रेम   में

पत्र प्रमाणन के हों  हासिल,

सजे कक्ष जब  देखें  तुलसी

सूरदास  हो   जाएँ  गाफ़िल,

कौन  पूछता  कैसा   लिखते

नोटों से ही  हर  - हर बम हो।


नेपाली    या    देशी   कोई 

अच्छा  है  कविता का धंधा,

 खड़े   अनाड़ी  लगा  कतारें

देने   वाला   भी  बस  अंधा,

कालिदास उतरे  धरती  पर

ठोंक रहे वे अपनी खम हो।


कविता  रोती  नौ - नौ   आँसू

नहीं  शारदा  को   वे    जानें,

कृपा रमा   देवी   की   बरसी

लंबी    - चौड़ी     डींगें   तानें,

'शुभम्' धुरंधर को   क्यों  पूँछें

कोई  नहीं किसी से कम हो।


शुभमस्तु !


10.12.2024●11.45प०मा०

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चिंतन करना देश हित [ दोहा ]

 558/2024

          

         [चिंतन,देर,रेत,राह,चरण]

                  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                   सब में एक

चिंतन कर   ले  ईश का,हे नर मूढ़   अजान।

प्राण   पखेरू  जाएँगे,  उड़  ऊपर ले   मान।।

चिंतन करना  देश हित,जन -जन का कर्तव्य।

नहीं जानता एक भी,शुभद अशुभ भवितव्य।।


करना  हो  शुभ काज जो,करे न पल की देर।

पल-पल से जीवन बना,कब हो क्या  अंधेर।।

जीवन  में  पछता  रहे,  करते  समय  विनष्ट।

सोते  जगते  देर  से,  प्राप्त   करें वे    कष्ट।।


समय  मुष्टिका   में  भरी ,सुरसरिता की  रेत।

कण- कण  जाए  रीत सब,भरे भले बहु  खेत।।

उल्लंघन   मत रेत   का,   करना मानव   मूढ़।

सोच पड़े  यदि  आँख में, अनल यान  आरूढ़।।


राह  वही    उत्तम   सदा, प्राप्त  करे     गंतव्य।

चलना  नहीं  कुराह  में,लक्ष्य न मिलता भव्य।।

पता   न  हो यदि राह का, ज्ञात करें  सद  राह।

वृथा    सदा   भटकाव  है, पथ होता  अवगाह।।


युगल चरण पितु  मात के,संतति को वरदान।

जो   जितनी  सेवा  करे,  उतना  बने   महान।।

मित्र सुदामा- कृष्ण का,  कितना प्रेम   पुनीत।

चरण युगल  धो  मित्र के, करते याद   अतीत।।


                एक में सब 

चरण पड़े जो रेत में,  शुभद  न   लगती  राह।

चिंतन करके  देर तक,  शीतल करते    दाह।।


शुभमस्तु !


10.12.2024●10.45प०मा०

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मत पूछो कौन! [ गीत ]

 557/2024

           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


झूठ का पुलिंदा

मत पूछो कौन !


जो उसको लाया

उसे  ही   सताया

पीता  रहा खून,

मीठे कोयल के बोल

शहद बातों में घोल

खाए बिना मिर्च नून,

नित्य ग्रीवा का फंदा

शोषित क्यों  मौन।


स्वयं  फिरे आजाद

अनुगामी   बरबाद

करे एक नहीं काज,

भला चाहता है कौन

सदा बजा करे फोन

खुजाए जाओ खाज,

छाँट भेजा है चुनिंदा

रेड कारपेटी लॉन।


झूठ बुलाए  न भगवान

काजू पिस्ते के पकवान

बाँट भाषण की खीर,

शयन कनक सजी शैया,

कोई  बाप  नहीं भैया,

मिली  ऐसी   तकदीर,

चले हेकड़ी का  रंदा

एक नहीं  दस भौन।


शुभमस्तु !


10.12.2024●8.45 प०मा०

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मोबाइल से प्रेम [ दोहा ]

 556/2024 

            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चन्द्र रुके सूरज झुके,रुकें जगत के नेम।

रुके न कौशल दास  का, मोबाइल से  प्रेम।।

सब सोएँ वे जागते , मोबाइल के साथ।

ब्लू टूथ  ग्रीवा  में पड़ा,नहीं मुबाइल हाथ।।


खाते पीते राह में, चलने पर अविराम।

मोबाइल चलता रहे,रुकें जगत के काम।।

बात जरूरी जब करें, मोबाइल है व्यस्त।

क्या झख मारें बात की,मन हो जाता त्रस्त।।


सबको   ही   घंटे  मिले,गिने हुए चौबीस।

मोबाइल  को   चाहिए , घंटे  कुल इक्कीस।।

दुर्लभ  प्राणी देश में,   मोबाइल के भक्त।

एक ओर  मोबाल है,उधर जगत अनुरक्त।।


बातें हैं बस  काम  की,एक एक बस एक।

बाकी  लफ़्फ़ाजी  सभी,बकते फिरें अनेक।।

दो  पल भर की बात को,तान रबर- सा तान।

कौशल  दास महंत की,  एक  यही  पहचान।।


सार -  सार  आता  नहीं, मात्र बतंगड़ खेल।

कौशलजी से सीख लो,बिन बोगी की रेल।।

कौशल  कम्बल  एक है,लिपटा ग्रीवा   बीच।

मोबाइल   हैरान   है, लगता  काल नगीच।।


'शुभम्'  धन्य  वे लोग हैं, मोबाइल के  दास।

कौशल   से  दीक्षा   ग्रहण,करें बारहों मास।।


शुभमस्तु !


10.12.2024 ●3.30 प०मा०

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अलग-अलग ढपली बजें [ दोहा गीतिका ]

 554/2024

    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


परनारी    परद्रव्य   पर,  टपक  रही है   लार।

मनुज   बहुत  रहते  यहाँ, निज मन से बीमार।।


'शुभम्'  सकल संसार में,भटक रहे कुछ लोग,

जाना   है किस  ओर को,बंद प्रगति के  द्वार।


अलग - अलग ढपली  बजें, सबकी चारों  ओर,

बहरे    सबके    कान हैं,   नाक चढ़े  नक्कार।


नेताओं   ने   देश   को,   समझा  गृह    उद्योग,

कक्ष   भरे  हैं   नोट   से ,  सोना किलो हजार।


कुर्सी  - कुर्सी    जप  रहे, नेता  आठों    याम,

आते    हैं   हर  रात  में ,सपने  बँगला     चार।


देशभक्ति    के    नाम  पर , लूट  रहे  हैं    देश,

शान    बढ़ाता   मान    की,  उनका कारागार।


'शुभम्'  खूँटियों पर सजा,जिनका चारु चरित्र,

बने   हुए वे   देश के  ,शिला गले का    भार।


शुभमस्तु !


09.12.2024●4.00आ०मा०

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कब से खड़ी [ गीत ]


555/2024

         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कब से खड़ी 

प्रतीक्षा करती

मैं परदे की ओट।


ब्याह किया 

घर में ले आए

भरा  माँग सिंदूर,

कहते हो 

हे प्रियतम तुम हो

किसी स्वर्ग की हूर,

अब वियोग में

क्यों तड़पाते

देकर मन को चोट।


मेरे लाल अधर

मदमाते

करूँ प्रतीक्षा तेज,

दिन को चैन

न नींद नयन में

सूनी -  सूनी सेज,

बतलाओ 

शृंगार किसलिए

मुझमें है क्या खोट!


बिंदिया लाल

भाल की तुमको

बुला रही हे मीत,

नथुनी नाक

सुशोभित मेरी

सहा न जाए शीत,

वक्र भौंह दो

श्याम चिकुर घन

बिखरे  ढँके न कोट।


'शुभम्' सजन

तन-मन की प्यासें

बनी हुईं बरजोर,

पिड़कुलिया

 डाली पर बोले

मुंडगेरी पर मोर,

रहा न जाए

बिना तुम्हारे

अश्रु लिए दृग घोट।


शुभमस्तु !


10.12.2024●8.45 आ०मा०

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[3:40 pm, 10/12/2024] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...