सोमवार, 20 जनवरी 2025

धूल लदी मन पर है भारी [ गीतिका ]

 006/2025

       


सब  कुछ  बदल रहा  क्षण-क्षण में।

प्रभु का  वास  यहाँ   कण-कण में।।


शांति  नहीं   मानव     को    प्यारी,

जुटा  हुआ   पल - पल वह रण में।


कलियों का  विकास    सुमनों    में ,

सुमन  व्यस्त   हैं   रस - वर्षण   में।


धूल   लदी  मन   पर    अति  सारी,

झाड़    रहा   है  मुख    दर्पण   में।


मानव      डूबा      अहंकार      में,

आग  धधकती   मन   के   व्रण में।


जनक -जननि   की   सेवा  कर ले,

लगा न जीवन   अपना   पण   में।


'शुभम्'  सोच  संकीर्ण   अशोभन,

किंचित शांति नहीं  जनगण    में।


शुभमस्तु !


06.01.2025●5.30आ०मा०

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सब कुछ बदल रहा [ सजल ]

 005/2025

            

समांत      : अण

पदांत       : में

मात्राभार   :16

मात्रा पतन : शून्य


सब  कुछ  बदल रहा  क्षण-क्षण में।

प्रभु का  वास  यहाँ   कण-कण में।।


शांति  नहीं   मानव     को    प्यारी।

जुटा  हुआ   पल - पल वह रण में।।


कलियों का   विकास    सुमनों  में ।

सुमन  व्यस्त   हैं   रस - वर्षण   में।।


धूल   लदी  मन   पर    अति  सारी।

झाड़    रहा   है  मुख    दर्पण   में।।


मानव      डूबा      अहंकार      में।

आग  धधकती   मन   के   व्रण में।।


जनक -जननि   की   सेवा  कर ले।

लगा न जीवन   अपना   पण   में।।


'शुभम्'  सोच  संकीर्ण   अशोभन।

किंचित शांति नहीं  जनगण    में।।


शुभमस्तु !


06.01.2025●5.30आ०मा०

                   ●●●

परिवर्तन की सूक्ष्मता [अतुकांतिका]

 004/2025

           

©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तारीखें बदलती हैं

महीने बदलते हैं

वर्ष भी बदल जाते हैं

परंतु आदमी

 कब कितना बदला?


यों तो परिवर्तन

प्रकृति का नियम है,

पर लगता है 

सब वैसा का वैसा ही,

जैसा कल था 

वैसा ही आज भी है।


परिवर्तन की गति है

मंद ही इतनी कि

शनैः - शनैः

सब कुछ बदल रहा है,

कुछ भी जताए

बताए बिना,

ये तो आदमी ही है

जो प्रदर्शन के बिना

दो कदम न चले!


परिवर्तन में

 नित्य नवीनता है

सूर्योदय- सूर्यास्त की तरह

पर अवसर ही किसे है

जो यह अनुभव भी करे।


आओ  हम सब भी

परिवर्तन की

सूक्ष्मता निहारें,

उसके आनंद में

निमग्न हो जाएँ,

यही एक विवेकशील का

यथार्थ धर्म है।


शुभमस्तु !


03.01.2024● 4.30आ०मा०

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आशीष माँ शारदे का [आभार सवैया]

 003/2025

         

छंद विधान:

1.आभार सवैया चार चरण का एक वर्णिक छंद है।

2.इसमें आठ तगण (221×8) के विधान का प्रयोग होता है।

3 इसके चारों चरण समतुकांत होते हैं।


                         -1-

आशीष माँ शारदे का मिला है,

               भला मैं करूँ मैं हरूँ दुःख साभार।

संसार में नाम सालों युगों में,

              रहे काव्य का नाम साभार साकार।।

कोई न ऐसा हो दुःख भारी,

            किसी को कभी नाँहिं कोई न लाचार।।

गंगा सु-धारा बहे नित्य प्यारी,

           सु सींचे सुधा -सी शुभाकार  आगार।।


                         -2-

आभार माता -पिता का सदा हो,

              मिलें सात जन्मों धरूँ रूप साकार।

भारी किए पुण्य ऐसे सु देही,

              नहीं जानता क्या भरा यूप प्राकार।।

आकार देते करें कर्म जो -जो,

             बिना बीज बोए न पौधा सु आकार।

बोए धतूरा धतूरा फलेगा,

              जो बोता मधू आम मीठा फलाभार।।


                          -3-

गंगा नहा ले घटे पाप -बोझा,

                मिले शुद्धता का तुझे पुण्य साकार।

आगे मिलेगी तुझे योनि ऐसी,

                  न होगा बड़ा भार होगा न लाचार।।

राधा मिलेंगीं मिलें संग कान्हा,

                 सखा श्याम जी के जु देंगे समाचार।

धारा वही हो नदी भानु बेटी,

                     बहेगी गहेगी सिखाए सदाचार।।


                          -4-

ज्ञानी न ध्यानी न मानी घनेरा,

                 कहूँ शब्द का एक सादा सदाचार।

पानी न गंगा न शोभी सवेरा,

                 रहूँ गाँव में मैं जु छोटा भयाभार।।

मानूँ न मैं हूँ बड़ा संत साधू,

               रहा खोजता मैं सु शब्दा नयाकार।

खोजी सु भोगी न योगी नवेला,

              निशा या दिनों का न पाता समाचार।।


                         -5-

भूलें हुईं जो क्षमा माँ करें जी,

                दिया ज्ञान का हार मेरे सुखाकार।

कोई मिला मेरु माला जु मोती,

               किया है वही जो कराया  तदाधार।।

मेरा न कोई न आया भरूँ जो,

                 तुम्हारा तुम्हें सौंपता हूँ  तदाकार।

माते तुम्हारी कृपा चाहता हूँ,

                 कृपा चाहता हूँ कृपा की कृपागार।।


शुभमस्तु !


02.01.2025●7.30आ०मा०

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राधा चलीं गैल वीथी [सर्वगामी या अग्र सवैया]

 002/2025

           

छंद विधान:

1.सर्वगामी सवैया में सात तगण [(221×7)+ 22] का प्रयोग होता है।

2.11,12 वर्ण पर यति होता है तथा प्रत्येक चरण में 23 वर्ण होते हैं।

                         -1-

माता -पिता को सताना नहीं,

          जो सताया न कोई ठिकाना रहेगा।

कोई नहीं यों तुम्हें मान देगा,

               न कोई तुम्हारा फसाना  सुनेगा।।

जो भी मिला है वही एक दाता,

               वही एक त्राता न बाना बनेगा।

भूखों मरोगे बिना आसरे के,

                न चूँ चूँ रहेगा न दाना मिलेगा।।


                         -2-

वादा किया तो निभाना पड़ेगा,

                  निभाए बिना चैन से क्यों रहोगे।

कैसे दिखाना तुम्हें झूठ चोला,

                     बिना पंख धारे धरा से उड़ोगे।।

सानी न होगा जहाँ में तुम्हारा,

                चलो आज मानो कहा जो करोगे।

भाषा तुम्हारी सदा साँच हो तो,

                  सदा लक्ष्य पाओ न जीते मरोगे।।


                         -3-

ताना न मारो न माता -पिता को,

                     उसी अंश के एक अंशी बने हो।

दावा जताते उन्हीं पालकों को,

                        तरेरे हुए आँख सीधे तने हो।।

शाखा वही है वही मूल तेरा,

                     गए टूट ज्यों ही रहो क्यों घने हो।

आशा नहीं लेश संतान से जो,

                      पिता और माँ से बने हो ठने हो।।


                         -4-

काबा न काशी बने हो सनासी,

                    उदासी मुनादी खुदा की कराते!

झंडा उठाए वितंडा सजाए,

                    सभी वे विनाशी जुदा जी कराते।।

दावा न वादा बुरा ही इरादा,

                       न मादा अमादा बुरा ही कराते।

आया न कोई सदा को जहाँ में,

                     बने ब्रह्मज्ञानी क़ज़ा ही कराते।।


                         -5-

राधा लजातीं सिहातीं सुहातीं,

                      चलीं गैल वीथी सु वंशी छुपाए।

कान्हा सजा फेंट आते रिझाते,

                       गए धाम छैला दुताली बजाए।।

शोभा कहाँ और कैसी सुहानी,

                  फबी जा रही है बिना ही जताए।

वामा चलीं साथ गोपी अनौखी,

                     पगों में झनाका झमाका सुनाए।।


शुभमस्तु !


01.01.2025●5.00प०मा०

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बुधवार, 1 जनवरी 2025

मंगलमय नववर्ष हो [ दोहा ]

 001/2025

         


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


श्रीगणेश  नववर्ष  का,   दो   हजार पच्चीस।

विदा  विगत  कल हो गया,दो हजार चौबीस।।

प्रथम दिवस बुध का 'शुभम्',आया वर्ष महान।

आशाएँ    उत्कर्ष   का,  ताना   भोर वितान।।


मेरा     देश   महान  हो,  जगती में हो   नाम।

नए   वर्ष   में   देश  में,  बड़े-बड़े  हों   काम।।

भूखे   को  रोटी   मिले,  प्यासे को सद   नीर।

दुश्मन   छोड़ें   देश   को,  जाग उठे तक़दीर।।


सुमन  खिलें  उत्कर्ष के,फूलें फल धन  धान्य।

मानदंड  हों  उच्च   ही, बने जगत में  मान्य।।

गौ    गंगा   गीता     सभी, गायत्री हैं     धन्य।

मात - पिताका मान  हो, गुरु हों  श्रेष्ठ  अनन्य।।


शिक्षा का   सम्मान हो, शिक्षक का उत्कर्ष।

प्रियता की कविता कहें,कवि सारे सह  हर्ष।।

वैर भाव  जग  से मिटे , बजे शांति का शंख।

युवा   जगत  के शून्य में,उड़ें लगा नव  पंख।।


वृद्धाश्रम इस देश में ,खो  दें  निज अस्तित्व।

वृद्धों का  सम्मान   हो, जागे  नर-  नारीत्व।।

राजनीति  इस  देश  की,हितकारी हो  नित्य।

भला करे नर-नारि  का,चमके शुभ आदित्य।।


नेता   ऐसे    चाहिए,    कर्मठ   सच्चे   धीर।

लूट  देश   घर   में  भरें,  नहीं  चुनें वे   'वीर'।।


शुभमस्तु !

01.01.2025●6.15आरोहणम मार्तण्डस्य।

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आजा यहाँ श्याम वंशी बजा [मंदारमाला सवैया]

 596/2024

   

छंद विधान:

1.मंदारमाला सवैया में  सात तगण [(221×7) + गुरु (2)का विधान है।


                          -1-

ज्ञानेश्वरी वंदना मैं करूँ,

                      काव्य का भारती गूढ़ भंडार हो।

वागेश्वरी मंजु वीणा बजे,

                    भाव की शुद्धता का मुझे सार हो।।

संगीत के संग हों छंद भी,

                        कंठ में भी सुरीली नई धार हो।

गाता रहूँ गीत माँ शारदे,

                       राह पाऊँ सभी मात आचार हो।।


                         -2-

वामा कभी चंचला तो कभी,

                    कोमला कर्कशा क्या कहें बोलिए।

पाषाण भी फूल - सी माधुरी,

                     लाजहीना कभी क्या कहें तोलिए।।

आती लजाती हुई मुस्कराती हुई,

                               बोल  बोलें  कहें    खोलिए।

शृंगार को जो सजाती सदा,

                                  संग  देती  हुई    खोलिए।।


                         -3-

राजा करे घात बोलो किसे ,

                       यों कहें काम तेरा बुरा बोल रे।

देता सजा क्यों बताता नहीं,

               क्यों नहीं क्यों नहीं क्यों नहीं तोल रे।।

राजा वही है भला देश का,

                   जो सु- पाले सदा गंध ही घोल रे।

खेला करे खेल की गोटियाँ,

                   राज के भेद नाहीं न जो खोल रे।।


                         -4-

आजा यहाँ श्याम वंशी बजा,

                          याद तेरी करें गाय भी गोपियाँ।

राधा मिलीं राह में श्याम से,

                        कीर पाले खड़ीं राह में गोपियाँ।।

कान्हा रटें बेल -पौधे सभी,

                        मोर आए सभी चाह में गोपियाँ।

दामा सखा सोचता क्या सखा का भला,

                        झूम आने लगीं राह में गोपियाँ।।


                         -5-

माना यहाँ हो बड़े प्यार में क्यों,

                       पड़े प्यार की रीति भी जानिए।

ठाना करेंगे वही मानते भी नहीं,

                           यार की प्रीति भी मानिए।।

दाना चुगेंगे नहीं खूब रीझो नहीं,

                 बान जो प्यार की यार जी त्यागिए।

चाहा मिला ही किसे जान लो,

                  ज्ञान की बात भी आज ही जानिए।।


शुभमस्तु !

31.12.2024●11.45 प०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...