सोमवार, 20 जनवरी 2025

गंगा कुंभ प्रयाग [ दोहा ]

 013/2025

              

[कुंभ,प्रयाग,त्रिवेणी,संक्रांति,गंगा]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                  सब में एक

मन  पापी   तन  दानवी, कैसा कुंभ - नहान।

मानवता  जिनकी  मरी, रहे  ध्वजा वे   तान।।

कुंभ   नहाए   स्वर्ग   में,  बना रहे   वे   ठौर।

अश्व-लीद जिनके  यहाँ,बिके बनी  सिरमौर।।


जिनके  मन  में  मानवी,भावों का शुभ  गेह।

पग-पग  वहीं  प्रयाग  है, है निस्सार   सुदेह।।

ब्रज हो या कि प्रयाग हो,हो काशी शुभ धाम।

धन्य  वही  उर  मानवी,जिसमें बसते   राम।।


सरस्वती    गंगा  त्रयी, यमुना  तन के   बीच।

इड़ा    सुषुम्ना  पिंगला, सदा त्रिवेणी  सींच।।

देह  त्रिवेणी नित्य  ही, मानव की यह जान।

श्वास- श्वास  में जो बसी,मूढ़ मनुज पहचान।।


मन का सूरज नित्य ही,दिखलाए सुख शांति।

जान  न  पाए  आदमी, यही पुण्य संक्रांति।।

क्षण आए संक्रांति का, बदले काल  दुकाल।

चमके सूर्य प्रकाश ले,झुके तिमिर का  भाल।।


इड़ा   पिंगला   देह में ,  गंगा -यमुना     धार।

मध्य   सुषुम्ना की बहे,अविरत नित्य  प्रसार।।

गंगा सुरसरि   पावनी, पावन तीर्थ    प्रयाग।

करता वही नहान शुभ, जिसके खुलते भाग।।


                    एक में सब

गंगा   कुंभ   प्रयाग  के,  पावन तीनों   नाम।

नर  तन  में  संक्रांति  का, यही त्रिवेणी धाम।।


शुभमस्तु !


15.01.2025●1.15 आ०मा०(रात्रि)


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भूल गए सब रंग [ गीत ]

 012/2025

                


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नोंन तेल लकड़ी

की तिकड़ी

भूल गए सब रंग।


मस्ती के दिन

नहीं लौटते

गुल्ली डंडा खेल।

मित्र  सखाओं की

महफ़िल में

चलती छुक- छुक रेल।।

भूल गए वे

खेल खिलौने

छूट गया वह संग।


दुनियादारी की

चिंता क्या 

कभी न सोची बात।

नहीं जानते थे

क्या तिकड़म

नहीं जानते घात।।

सदा खिलंदड़

रहता तन- मन

खेले नंग -धड़ंग।


जा बस्ती से

दूर कहीं पर

खेले रंग हजार।

इधर - उधर की

बात न कोई

बचपन था उपहार।।

तेरी गुल्ली 

मेरा डंडा

यही एक थी जंग।


शुभमस्तु !


14.01.2025● 5.00आ०मा०

अच्छी लगे रजाई [बाल गीतिका]

 011/2025

         


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अति   की  अच्छी लगे   रजाई।

ऊपर    लेटी    सजे      रजाई।।


शीत   सताए     पूस  - माघ  में,

देती   है     सब     मजे   रजाई।


कौन      चाहता    आना   बाहर,

कैसे       कोई       तजे    रजाई।


सहती     ठंड    तुषार      हवाएँ,

राम   -  राम      ही   जपे  रजाई।


जो       लेटा      बाँहों   में   भीतर,

इधर  - उधर  से      दबे      रजाई।


नहीं      बोझ     भी  लगता  भारी,

जब      ऊपर    से     लदे  रजाई।


कम्बल     में   तो  कम बल होता,

भारी  -  भरकम   फबे      रजाई।


शुभमस्तु !


12.01.2025● 11.00प०मा०

                 ●●●

मानव इतना आज तना है [ गीतिका ]

 010/2025

     

शब्दकार© 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मानव     इतना    आज   तना   है।

अहंकार    का     धूम     घना   है।।


समझे  नहीं   किसी   को   अपना,

तमस   पंक  में    निपट  सना   है।


धन - संपति  के  रिश्ते    हैं    सब,

मानवता   के     लिए    मना    है।


बालाओं  को    पति    पसंद   वह,

पैसों     से    जो    बना -  ठना है।


चरित  घास    घूरे     पर     चरता,

भ्रष्ट   आचरण   का   जपना    है।


नर    नहला   तो     दहला   नारी

संस्कृतियों  को    यों   मिटना   है।


'शुभम्'  गर्त  में  मानव  प्रति क्षण,

भाड़    न    फोड़े   एक  चना   है।


शुभमस्तु !


12.01.2025●10.00प०मा०

                     ●●●

भाड़ न फोड़े एक चना [ सजल ]

 009/2025

       

समांत        :अना

पदांत         : है

मात्राभार    :16

मात्रा पतन  : शून्य।


शब्दकार© 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मानव     इतना    आज   तना   है।

अहंकार    का     धूम     घना   है।।


समझे  नहीं   किसी   को   अपना।

तमस   पंक  में   निपट  सना   है।।


धन - संपति  के  रिश्ते    हैं    सब।

मानवता   के     लिए    मना    है।।


बालाओं  को    पति    पसंद   वह।

पैसों     से    जो    बना -  ठना है।।


चरित  घास    घूरे     पर     चरता।

भ्रष्ट   आचरण   का   जपना    है।।


नर    नहला   तो     दहला   नारी।

संस्कृतियों  को    यों   मिटना   है।।


'शुभम्'  गर्त  में  मानव  प्रति क्षण।

भाड़    न    फोड़े   एक  चना   है।।


शुभमस्तु !


12.01.2025●10.00प०मा०

                     ●●●

सर्वे भवन्तु सुखिनः [ अतुकांतिका ]

 008/2025

          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आप चाहते हैं 

कि हम खुश रहें,

ठीक है,

किंतु क्या खुश रह लेना

इतना सहज है?

क्या यह सब सु-संभव है?

शायद नहीं।


नहीं है संभव

और सहज खुश रह पाना

इसलिए आशीर्वाद मिलता है

'खुश रहो'।


रहना तो सभी चाहते हैं

पर दुष्कर है यह सब,

कुछ लोग तो 

दूसरों को दुखी देखने में ही

परमानन्द में हैं,

इसी में खुश हैं,

वे क्यों चाहेंगे कि

कोई खुश रहे !

किसी का दुख ही

उनके सुख और खुशी का

पर्याय है।


संसार दुःखमय है,

इसीलिए 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' है,

संसार रोगग्रस्त है,

इसीलिए 'सर्वे संतु निरामयाः' भी है,

लोग दूसरों का

 बुरा देखने के इच्छुक हैं,

इसीलिए 'सर्वे भद्राणि पश्यन्तु' है,

यह संसार दुःख स्वरूप है,

इसलिए किसी को 

दुःख न मिलने की

कामना की गई है।


हम शुभकामना मात्र 

कर सकते हैं,

शुभ होना या न होना

नियति और कर्म पर

आधारित है,

इसीलिए शुभाकांक्षी को

शुभ ही करना अपेक्षित है,

तभी उसे सदा शुभ मिलेगा।

दूसरों का शुभ चाहेंगे

तो आपका 

स्वतः शुभ ही होगा।


शुभमस्तु !


09.01.2025●9.15प०मा०

                 ●●●

जो बचपन में बीते [ गीत ]

 007/2025

             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


वे दिन नहीं 

लौट कर आते

जो बचपन में बीते।


सर्दी गर्मी

नहीं सताए

सावन भादों बरसे।

रहे प्रफुल्लित

बचपन खिलता

हरसे हरसे हरसे।।

हृदय लबालब

है खुशियों से

रहते कभी न रीते।



क्या होती है

निपट गरीबी

मन से सभी अमीर ।

हर हालत में

खुश ही रहना

गाते फाग कबीर।।

जो कुछ है

सब वर्तमान ही

सारी खुशियाँ जीते।


कपड़े मैले

फटे पुराने 

चिंता करें न कोई।

मुख हो यदि

काला पीला तो

मस्ती रहे भिगोई।।

'शुभम्' याद 

आता है बचपन

करते सब मनचीते।।


शुभमस्तु !


07.01.2025●6.00आ०मा०

                   ●●●

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...