गुरुवार, 31 अक्टूबर 2024

किसी का दिल न जले! [ अतुकांतिका ]

 493/2024

      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


दीप जले तो जले

किसी का दिल न जले

आदमी आदमी को

क्यों कर छले?

अंततः कुछ लोग हैं दोगले।


गधे घोड़ों से भी

सस्ता है आदमी,

अब बची है कहाँ है

उसकी आँखों में नमी!

बोझ से दबी जा रही है जमीं।


न माँ - बाप की कीमत

न गुरुजन का मान,

आदमी न देवता था

न देवता होना सम्भव

हुआ है ,न हो सकता है,

है वह मात्र दानव हैवान।


धन ही माँ- बाप

सर्वस्व वही 

वही है भगवान,

जैसे हैं  माँ- बाप

वैसी ही संतान!

मेरा भारत महान।


उठाते ही दुम

भेद खुल गया,

वह मर्द नहीं था

रहस्य धुल गया,

आओ

 आ भी जाओ 'शुभम्'

दुमों की परख करते चलें,

छले जाएँ न किसी से

न किसी को हम भी छलें।


शुभमस्तु !


31.10.2024 ●2.00प०मा०

बारह मास दिवाली हो [ गीत ]

 492/2024

       


©शब्दकार

डॉ.भगवत  स्वरूप 'शुभम्'


ऐसा ही कुछ

जतन करो प्रिय

बारह मास दिवाली हो।


सख्य और

सौहार्द्र भाव का

हर मन में उजियारा हो।

बैर भाव

मिट जाय धरा से

त्रिपथगा की धारा  हो।।

हो मुस्कान

सभी अधरों पर

उषा काल की लाली हो।


मेरी धरती की

माटी में

कालिदास आए  तुलसी।

वाल्मीकि वर

कृष्ण व्यास  से

फूली और फली विकसी।।

यहाँ वहाँ

बरसे समर्थता 

सबके मन खुशहाली हो।


शोषण और

मिलावटखोरी

से उन्मुक्त देशवासी।

मानव को

मानव ही समझें

शासन के समर्थ शासी।।

'शुभम्' कर्मरत

युवा सभी हों

तन मन  से बलशाली हो।


शुभमस्तु !


31.10.2024●9.45 आ०मा०

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बुधवार, 30 अक्टूबर 2024

आलोकित उजियार है [ दोहा ]

 491/2024

       

[आलोकित,उजियार,समृद्धि,प्रदीप्त,ज्योतिर्मय]


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                  सब में एक

तमसावृत श्यामल निशा,आलोकित हर ओर।

चाँद  नहीं    है  चाँदनी, तदपि  सुनहरा  भोर।।

घर  - आँगन  जगमग  करें, छत दीवार  मुँडेर।

आलोकित  तन-मन सभी, दीपावली-उजेर।।


रूप रुपहला  रात का, दुग्ध  सदृश उजियार।

कार्तिक  अमा निशीथ का,एक पृथक  संसार।।

अमा - निशा  में  रूपसी,तव दैहिक उजियार।

मुस्काती ज्यों चंद्रिका,अविरल ज्योति अपार।।


सुख  - समृद्धि आती  वहाँ,जहाँ सुमति आनंद।

अलंकार   मन  मोहते, ज्यों  कविता के  छंद।।

आशा  ज्योति  सुदीप  की,लाती सघन  समृद्धि।

बरसे नित धन- धान्य ही,सदा सौम्यता - वृद्धि।।


रहता  भाग्य प्रदीप्त तब,जले कर्म की ज्योति।

कर्मशील  मानव  बने,  रहे न  मन में    छोति।।

दीपोत्सव मनभावना,जल  थल असिताकाश।

अगणित दीप प्रदीप्त हैं,ज्यों जीवन में आश।।


ज्योतिर्मय   करते   रहें, आशाओं   के  दीप।

ज्यों   मुक्ता  को  अंक में,गोपन करती  सीप।।

ज्योतिर्मय  करते  सदा ,भाग्य तुम्हारे    कर्म।

बीज    वपन  जैसा   करे, बने  वही तव   धर्म।।

                     एक में सब

आलोकित उजियार है,ज्योतिर्मय   संसार।

हर समृद्धि बरसे यहाँ, हो प्रदीप्त जन प्यार।।


शुभमस्तु !


30.10.2024 ●3.15आ०मा०

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मंगलवार, 29 अक्टूबर 2024

मैं भी ऐसा तन जाऊँ! [ गीत ]

 490/2024

    


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


टाई सूट बूट 

कर धारण

मैं भी ऐसा तन जाऊँ।


फटेहाल क्यों

रहूँ हमेशा 

मुझको ऊपर उठ जाना।

विद्यालय में

शिक्षा पाकर

जग में नाम कमा लाना।।

सबके दिन 

रहते न एक सम

ठाठबाट से सज पाऊँ।


फटे चीथड़े

भले आज हैं

मेरे तन पर तो क्या है?

झोला लटका

हुआ सड़ा-सा

मेरा सपना ऊँचा है।।

मैंने भी सपना 

देखा है

बाबूजी बन इठलाऊँ।


माली हालत

नहीं ठीक है

तो ऐसे ही क्या रहना ?

परिश्रम करूँ कठिन

निशिदिन जो

चमकेगा तन पर गहना।।

'शुभम्' एक दिन

भाग्योदय हो 

सर! सर! सर! सर !! कहलाऊँ।


शुभमस्तु !


29.10.2024● 2.15प०मा०

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फॉल इन लव [ व्यंग्य ]

 489/2024 


 ©व्यंग्यकार 

डॉ० भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 'लव' (प्रेम) में पड़कर किसी का 'राइज' ,'अपराइज' अथवा 'गेटअप' नहीं हुआ। यदि हुआ है तो 'फॉल' ही हुआ है। पतन ही हुआ ,वह गिरा है अथवा गिरी है।प्रेम में कोई ऊपर चढ़कर पहाड़ पर नहीं गया। आप अच्छी तरह जानते हैं कि अंग्रेज़ी शब्द 'फॉल' का अर्थ 'गिरना' अथवा 'पतन' ही होता है। कहते हैं कि प्रेम या लव किया नहीं जाता ,हो जाता है।इसके लिए 'क्यों' प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है।कहते हैं कि प्रेम सकारण नहीं होता, अकारण ही हो जाता है।जब सब कुछ जानते हैं,फिर भी प्रेम में गिरते हैं,पतित होते हैं।

  प्रेमोपदेशकों ने प्रेम का बहुत अधिक महिमा - मंडन किया है। प्रेम का गुणगान कर करके तथाकथित प्रेमियों को पुदीने के झाड़ पर चढ़ाया है। राधा - कृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम को लौकिक प्रेम के सूखे बाँस पर चढ़वाया है। चढ़ जा बेटे शूली पर भली करेंगे राम।छोड़ दे घर परिवार माता -पिता हैं बेकाम।बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा ? पहन ले गुजरिया प्रेम का चोगा ।लाज,हया,शर्म सब उतार दे। प्रेम की माला से गले को सँवार ले। नकद न मिले तो इज्जत को धुँआर दे।कूद जा लव के कुएँ में।हार जा मान इज्जत प्रेम के जुए में।बड़ा ही स्वाद है इस प्रेम के पुए में।

    नया शब्द आया है 'रिलेशनशिप'।समाज और उसकी मान्यताओं को धता बता। गिर जा किसी के प्रेम में और बन जा पेड़ की लता।कहती फिर यही मैंने की नहीं है कोई खता। 'रिलेशनशिप ' अर्थात 'सहजीवन' और विधिक विवाह अर्थात 'असह्य जीवन'।मानवता की उधड़ती हुई सीवन। ये प्रेम में पतित होने का परिणाम है।जहाँ मनुष्यता और नैतिकता को अलविदा प्रणाम है।बन गया आदमी गाय, भैंस ,बकरी, भेड़,श्वान, बिल्ली,गर्दभ,अश्व ढोर। अत्याधुनिकता का जीवंत उपहास। न कोई माता -पिता न कोई ससुर- सास।इनसे तो लगने लगी है बास। अल्पावधि का चढ़ता हुआ नशा। जिसने भी जाना - सुना हँसा ही हँसा।बिक गए गहने। खत्म हुईं हैं चुहलें। और प्रेम - पयोधि में तैर ले,मछली - सा बह ले। अब नहीं दिखते कहीं नहले पर दहले। सहे जा !सहे जा !! दुनिया के हमले।मुरझा गए प्रेम - सुमन , टूट गए गमले।

  वासना पर प्रेम का मुलम्मा कब तक टिकेगा!खुमार उतरते ही एल्मुनियम चमकेगा।वासना ही प्रेम का आधुनिक भ्रम है।जैसे किसी मद्प्रेमी को मिल जाए रम है।उसके बाद उसे नहीं कोई भी ग़म है। वासना में ही इस अनचीन्हे 'प्रेम' का क्रम है। ऐसे प्रेम की कहानी पूर्णता नहीं पाती। इस अपूर्णता की ही कहानियाँ कही जातीं।पति -पत्नी के प्रेम के महाकाव्य नहीं मिलते। क्या वे गृहस्थ जन सुमनवत नहीं खिलते। वे गिरते नहीं,उठते हैं।देश और समाज में सिर उठाकर चलते हैं।वे बिगड़ते भी नहीं ,बनते हैं।समाज के विस्तार में अहं भूमिका का निर्वाह करते हैं। 

 मोह की गोह ने नया प्रेम टोह लिया है।दायित्वों से जिसने सदा द्रोह किया है।कोई कितना नीचे गिरे,इसकी कोई थाह नहीं।सुनाई भी नहीं पड़ती इसकी आह नहीं। होती भी कहीं कहानी किस्सों में इसकी वाह वाह नहीं।जो गिरा तो गिरता चला गया। अपने ही हाथों निरंतर छला गया।विवेकशीलों ने यही कहा भला गया। यदि वंश भी बढ़ा लिया तो निर्दोष पुत्र वर्णशंकर कहलाया।यह मोहिल प्रेम के पतन की पराकाष्ठा है। आज के नौजवानों को इसी में आस्था है। जब गिरना है,तो डूब - डूब जाना है। वहाँ जाकर कोई भी सुरक्षित नहीं लौटा, फिर आपको क्या समझाना है?

 शुभमस्तु ! 

 28.10.2024● 8.30प०मा० 

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भावों के हम दीप जलाएँ [ गीत ]

 488/2024

   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शब्दों के 

परिसर  में आओ

भावों के हम दीप जलाएँ।


कोने - कोने में 

अँधियारा

नेह - वर्तिका ज्योति भरेगी।

मुँडगेरी  पर

पिड़कुलिया की

मीठी ध्वनि तम घोर हरेगी।।

मधुर व्यंजना के

व्यंजन से

घर आँगन मंदिर महकाएँ।


दिया बेचतीं

कमली विमला

उनकी भी तो दीवाली है।

उनसे क्रय कर

दिये जलाएँ

पीटें सब बालक ताली है।।

शब्द शक्ति त्रय

अलंकार रस

कविता का नव छंद सजाएँ।


रमा शारदा का

स्वागत है

स्वच्छ करें मन का हर कोना।

निर्धन का

अपमान नहीं हो

बीज नेह के मिलजुल बोना।।

रंग - रंग की

कविता बाँचें

गीत एकता के शुभ गाएँ।


शुभमस्तु !


28.10.2024●1.00प०मा०

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सोमवार, 28 अक्टूबर 2024

चाह रहे सब [ गीतिका ]

 487/2024

                

©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चाह   रहे  सब   सफल  सिलसिले।

मन का   चाहा   कहाँ  कब मिले !!


तपे      निदाघ    जेठ     में   भारी,

तब  रसाल  हो    सके  पिलपिले।


श्रम  का  फल    होता   है   मीठा,

रहते  जीवन   में   तब  न    गिले।


कर्मों   पर    विश्वास    नहीं    हो,

नहीं   जीतते   मनुज  नव   किले।


मीठे  फल    उनको    ही   मिलते,

चलते -   चलते  पाँव    हैं    छिले।


नहीं   धूप   में     बाल    पके   ये,

चमक  रहे जो  आज    चिलचिले।


'शुभम्'   अहर्निश    चलते   रहना,

शाखा  पर  बहु  सुमन सद  खिले।


शुभमस्तु !


28.10.2024●4.30आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...