शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2023

जनेऊ 🦢 [ दोहा ]

 63/2023

   

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🦢 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

सोलह शुभ संस्कार में,'शुभम्' जनेऊ एक।

आयु बुद्धि बल तेज कर,जाग्रत करे विवेक।

संयम  से  जीवन  जिएँ, धरे  जनेऊ   सूत्र।

बाँधें  बाएँ  कान पर, त्यागें जब मल - मूत्र।।


गुरु  बालक  को  ज्ञान दे,सह गायत्री   मंत्र। 

धरे जनेऊ सूत्र त्रय,बँधे नियम तन  -  तंत्र।।

बाएँ   से   दाएँ    बँधा,   सूत्र जनेऊ    मीत।

पावन ही रखना  सदा, चले नहीं   विपरीत।।


नारी   भी   अपने   गले, पहनें मानो     हार।

नियम जनेऊ का यही,'शुभम्'सत्य सुविचार।

न्याय दृष्टि   पावन करे,'शुभम्' जनेऊ  ध्येय।

तीन  सूत्र बंधन  यही,ज्ञाता को   यह  ज्ञेय।।


सप्त  ग्रंथि  शुभ सूत्र में,धागे हैं  बस   तीन।

ब्रह्मा विष्णु महेश के,शुचि प्रतिमान नवीन।।

गुरु - दीक्षा  के  बाद में,सूत्र जनेऊ   धार।

बालक निकलें देश में,करने ज़न उपकार।।


कहलाए  ये  उपनयन, यज्ञसूत्र,  व्रतबन्ध।

ब्रह्मसूत्र, बलबंध भी,रख निज बाएँ कंध।।

देव पितृ ऋषि ऋण कहें,सत रज तमस प्रतीक

गायत्री के सूत्र त्रय,है उपनयन सु-नीक।।


🪴शुभमस्तु!


08.02.2023◆11.45आ.मा.

फागुन जोगी वेश में 🎊 [ दोहा ]

 62/2023

 

[फागुन,फाग,पलास,वन, जोगी]

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🎊 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

      🌹 सब में एक 🌹

शिशिर शीत सी-सी करे,फागुन लाया रंग।

होली के नव फ़ाग गा,मन हो गया  मतंग।।

फागुन कहता झूमकर,लाया  मैं मधुमास।

पाटल डाली पर खिले,वन में खिले पलास।।


फाग लगाए  आग तन,उर में  प्रेम-उजास।

गाते - गाते नाचता,हिमगिरि खिला  बुराँस।।

बजे ढोल डफ जोर से,स्वरित सुरीला फाग।

हिया झूमता मत्त हो,बगिया में ज्यों  नाग।।


देख रही छत पर खड़ी,दूर लपट ज्यों आग।

फूले फूल पलास के,काम उठा उर जाग।।

वन- पलास रँग लाल से,मन में उठी उमंग।

लगता छिप-छिप ताकता,ताने बाण अनंग।।


वन उपवन तरु बेल में,कोंपल विकसे लाल।

लगता है मधुमास ने,आकर किया  धमाल।।

वन-वन भटके राम जी,लखन सिया के संग।

नियति-लेखनी जो लिखे,मिटे न उसका रंग।


रावण जोगी-वेश में, ठगने को सिय-राम।

जब आया मिट ही गया,पाया है प्रभु-धाम।।

सजा वेश जोगी बने,धरते ठग  का  रूप।

जनता को ठगते फिरें,गिरें छद्म भव - कूप।।


      🌹 एक में सब 🌹

फागुन जोगी  वेश  में,

                      कर ले सुमन पलास।

फाग - गान  में  लीन है,

                    वन में  अरुण उजास।।


🪴शुभमस्तु!


08.02.2023◆6.15 आ.मा.


मच्छर टोपी ले उड़ा🦟 [ दोहा ]

 61/2023


 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️शब्दकार ©

🦟 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

मच्छर टोपी ले उड़ा, सँभले नहीं सँभाल।

जनता चिल्लाती रही,बुरा हुआ  है  हाल।।


टोपी  अंबर में   गई, मच्छर जी के  संग।

सभी  देखते   रह गए, भौंचक होते  दंग।


ताकत  मच्छर की बढ़ी,मानव है  बेहाल।

सिर  से  ले टोपी उड़ा,नंगे सिर  के बाल।।


नीले  अंबर  के तले,जनता की  भरमार।

ले कर मच्छर जा उड़ा,मानव की है हार।।


बचो-बचो रे मानवो, मसक हुआ खूँख्वार।

ले  मेरी   टोपी  उड़ा,नर -नारी की  हार।।


07.02.2023◆ 4.25 प.मा.


फागुन का धमाल 🎊 [ गीतिका ]

 60/2023

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

फागुन   का   होता धमाल है।

प्राची का अरुणाभ  भाल है।।


चादर   सेत   न   सूरज  ओढ़े,

डफ ढोलक की बजी ताल है।


पादप पर पखेरु  की हलचल,

नाच उठी हर डाल -  डाल है।


कुक्कड़ - कूँ  की  टेर  लगाए,

तमचूरों   की   नई   चाल   है।


मानसरोवर     में    जा   देखें,

है   प्रसन्न    भोला  मराल  है।


हँसती मुस्काती रवि - किरणें,

फैला स्वर्णिम किरण-जाल है।


'शुभम्' महकते क्यारी- क्यारी,

पाटल - दल  मानो प्रवाल  है।


🪴शुभमस्तु !


06.02.2023◆5.00आरोहणम् मार्तण्डस्य।


पाटल महके क्यारी- क्यारी 🌹 [ सजल ]

 59/2023


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

●समांत : आल।

●पदांत : है।

●मात्राभार: 16.

●मात्रा पतन:शून्य।

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️शब्दकार ©

🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

फागुन   का   होता धमाल है।

प्राची का अरुणाभ  भाल है।।


चादर   सेत   न   सूरज  ओढ़े,

डफ ढोलक की बजी ताल है।


पादप पर पखेरु  की हलचल,

नाच उठी हर डाल -  डाल है।


कुक्कड़ - कूँ  की  टेर  लगाए,

तमचूरों   की   नई   चाल   है।


मानसरोवर     में    जा   देखें,

है   प्रसन्न    भोला  मराल  है।


हँसती मुस्काती रवि - किरणें,

फैला स्वर्णिम किरण-जाल है।


'शुभम्' महकते क्यारी- क्यारी,

पाटल - दल  मानो प्रवाल  है।


🪴शुभमस्तु !


06.02.2023◆5.00आरोहणम् मार्तण्डस्य।

रविवार, 5 फ़रवरी 2023

कविता में कविता कहाँ है? 🎊 [ व्यंग्य ]

 58/2023 


 ■●■●■●■●■●■●■●■●■●

 ✍️व्यंग्यकार © 

 🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

 ■●■●■●■●■●■●■●■●■● 

           धड़ल्ले से कवियों के सम्मेलन हो रहे हैं और बराबर होते भी रहेंगे।कवि हैं,तो उनके सम्मेलन तो होंगे ही।ये अखिल भारतीयता के स्तर से नीचे तो हो नहीं सकते। कोई विराट कवि- सम्मेलन हो सकता है ,किंतु आज तक एक भी बैनर ऐसा नहीं देखा या सुना गया ; जिस पर 'लघु कवि सम्मेलन' अथवा 'मध्यम कवि सम्मेलन' अथवा 'मोहल्ला कवि सम्मेलन' लिखा हुआ हो। भानुमती के पिटारे की तरह हैदराबाद, गाज़ियाबाद, फ़िरोज़ाबाद, इलाहाबाद, फ़तेहाबाद, मुरादाबाद,नजीबाबाद आदि शहरों से कुछ 'निःशुल्क' और कुछ सपारिश्रमिक (बेचारे इतनी दूर से परिश्रम करके आते हैं; इसलिए सशुल्क नहीं कह सकते ; 'सपारिश्रमिक' ही कहेंगे) ।

           आप जानते ही हैं ,नि:शुल्क तो निःशुल्क ही है। उसे तो कुछ मिलना नहीं है।इसलिए वह स्थानीय भी हो सकता है। घर की मुर्गी दाल बराबर जो होने लगी है।इसलिए उसे ही हलाल करना अधिक आवश्यक माना जाता है।कभी- कभी उसे बैनर झंडे लगवाने ,टेंट के गड्ढे खोदने या खुदवाने, टेंट का विशाल पांडाल बनवाने, दरियाँ बिछवाने , मंच- सज्जा कराने जैसे अति महत्वपूर्ण कार्यों के लिए भी बाइज्जत नियुक्त कर लिया जाता है। तब कोई एक 'अखिल भारतीय कवि सम्मेलन' सफलता पूर्वक सम्पन्न होने की स्थिति की प्राथमिक दशा को प्राप्त होता है।

          'सपारिश्रमिक कवि' को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं। उसे तो बारात में पधारे हुए वरयात्रियों की तरह सब कुछ पका - पकाया चहिए।आए और जीमने बैठ गए। अब बात आती है कवि सम्मेलन की।भले ही मोहल्ले भर के दर्शक और श्रोता इकट्ठे न हों ,किंतु अखिल भारतीय के स्तर से कम तो कहलाया ही नहीं जा सकता। यह कवि सम्मेलन का न्यूनतम सोपान है। विश्व स्तर के कवि सम्मेलन में किसी पड़ौसी देश का प्रवासी भारतीय यदि पधार जाए तो उसकी विश्व स्तरीयता का मानक पूरा हो जाता है।इस देश में 'अखिल ब्रह्मांड स्तर' के कवि सम्मेलन होना भी सामान्य - सी बात है, बस बैनर ही तो बनवाना है।शेष सब वही का वही। 

                इन महा कवि सम्मेलनों की एक विशेषता यह देखी जाती है कि इन्हें कवि सम्मेलन कहने से पहले सोचना पड़ता है कि ये कवि सम्मेलन हैं या कुछ और।मेरे मंतव्य के अनुसार इनका नाम 'महा हा ! हा !!ठी! ठी!! सम्मेलन', 'महा चुटुकला सम्मेलन', 'महा हास्य सम्मेलन' अथवा ऐसा ही कोई अन्य नाम होना उचित जँचता है; परन्तु नामकारण से पूर्व भला मुझ अकिंचन को कौन पूँछने जा रहा है? जब इन कवि सम्मेलनों का नामकरण बदला जाएगा तो कवियों को भी कवि नहीं कहा जायेगा।उन्हें भी चुटकुलेबाज,लतीफ़ेबाज, या हास्यकार आदि किसी भी नाम से सम्मानित किया जाएगा। 

           अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए कि इन तथाकथित सम्मेलनों में अस्सी प्रतिशत समय में केवल चुटकुले सुना - सुना कर श्रोताओं को मूर्ख बनाया जाता है। उधर हमारे श्रोतागण भी वैसे ही हैं ,जिन्हें कविता और चुटकुले में अंतर ही पता नहीं है। वे चुटकुले को ही कविता -   पाठ समझ लेते हैं।कोई कवि किसी कवि के निजी जीवन की हस्यपरक धज्जियाँ उधेड़ने लगता है ,कोई किसी की सुंदर पत्नी के सौंदर्य सागर में गोते लगाने लगता है। और यदि मंच पर कोई सुंदरी कवयित्री दिख गई तो कहना ही क्या?सोने में सुहागा वाली कहावत ही चरितार्थ हो गई।फिर तो श्लीलता को ताक पर रख कर जो कुछ कहा औऱ सुनाया जाता है ;उससे तो बड़े बूढ़ों में भी वसंत का संचार हो- हो जाये। उधर कवयित्री भी कब पीछे रहने वाली हैं, वे भी नहले पर दहला मारते हुए तीर पर सुपर तीर बौछार करने में कब पीछे हटने वाली हैं? इस प्रकार वाद- संवाद की स्थिति के दौर से गुजरता हुआ तथाकथित सम्मेलन अपनी चरम गति को प्राप्त हो जाता है। अंत में चलते -चलते रही- बची ऊर्जा के साथ दो चार मिनट की कविता भी अपनी अंतिम गति को प्राप्त हो लेती है ।एक छोटी - सी कविता की भूमिका लघु महाभारत ही हो लेती है। वह भी विषयेतर ,अप्रसांगिक औऱ असंवैधानिक।इन हँसोड़- सम्मेलनों को कवि सम्मेलन का नाम देते हुए भी कविता की मट्टी पलीद करते हुए देखकर हँसना नहीं ,रोना ही आता है।

        अगले दिन अखबारों में औऱ ताज़ा का ताजा सोशल मीडिया पर तथाकथित कवि सम्मेलनों के स्तरोन्नयन पर आत्म स्तुतियाँ देखकर तो हँसी रोके नहीं रुकती।सुर्खियां बटोरने के लिए लोग क्या कुछ नहीं करते , यदि एक सच्चे साहित्यकार को भी नौटंकी के जोकर की भूमिका में जाना पड़े ,तो साहित्य की क्या गति होगी, यह सोचनीय ही होगा। हास्य के इन प्रपाती प्रतापी फब्बारों के बीच कविता के नन्हे गुब्बारे ढूँढ़े भी नहीं मिलते।ऊँचे स्तर की कविता सुनने के लिए कुछ तो खोना पड़ता है ,इसलिए आज का श्रोता अपना बहुमूल्य समय और समझदारी का बलिदान कर ही देता है। वैसे भी जीवन में हँसने- हँस पाने का सुअवसर नहीं मिलता ,तो इन सम्मेलनों में आने के बाद वह सब कमी पूरी हो लेती है।अंत में बस यही कसक शेष रह जाती है कि इस पूरे कार्यक्रम में कविता कहाँ थी?दाल में नमक का आस्वादन कराती हुई कविता जाए तो किधर जाए ,जब कवि जन ही चुटुकुलेबाज हो जाएँ। 

 🪴शुभमस्तु ! 

 05.02.2023◆ 6.45 पतनम मार्तण्डस्य।

 

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

चलें प्रकृति की ओर 🌳 [ दोहा ]

 57/2023

 

[फसल,सोना,कृषक,कुसुम, बसंत]

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

       🌻 सब में एक 🌻

श्रमजल से ही सींचता,अपनी फसल किसान

अन्न, शाक,फल  दे रहा, दाता सदा  महान।।

मौसम के आघात से,फसल  हुई  बरबाद।

आसमान में  देखता, करे कृषक प्रभु-याद।।


उत्पादित  सोना  करे,धरती माँ  का  रूप।

पालन हो जन-सृष्टि का,कृषक धरा का भूप।

संतति सोना है  वही, करती  जो उपकार।

मात-पिता गुरु धन्य वे,मिलता नेह अपार।।


कर्षित कर अवनी-मृदा,कृषक  उगाए अन्न।

मानव   की   रक्षा   करे,  देश बने    संपन्न।।

सैनिक  सीमा  पर डटा,रक्षा का  प्रतिमान।

कृषक स्वेद अपना बहा,करता अन्न प्रदान।


कुसुम स्वेदजल से खिलें,उनकी अलग सुगंध

अलग तृप्ति फल दें वही,जो फलते निर्बंध।।

कुसुम सुगंधित देखकर, होता  हर्ष  अपार।

पत्थर का अंतर जहाँ,दिखता उसे न सार।।


फागुन में होली जली, हुआ वर्ष  का  अंत।

चैत्र और  वैशाख  में, आया नवल  बसंत।।

आते  मास बसंत के,प्रकृति  बदलती  रूप।

खिलतीं कलियाँ बाग में, स्वागत में ऋतु-भूप


    🌻 एक में सब 🌻

कृषक -फसल सोना बनी,

                      खिलते कुसुम अपार।

आया   नवल   बसंत   है,

                       छाया   मद  -  संभार।।


🪴शुभमस्तु !


01.02.2023●5.00आरोहणम् मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...