शनिवार, 14 जनवरी 2023

बेपटरी मानव 🌲 [ अतुकान्तिका ]

 24/2023

 

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✍️ शब्दकार ©

📖 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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अपने द्वारा

अपने लिए

बनाए गए

विधान की

 पटरी पर

चलने में 

उसे लाज आती है!


छोड़ देता है

सुंदर राजमार्ग,

और छुट्टा ढोरों की तरह

पगडंडियों से

पकी फसल पर

खेतों में 

मारता है मुँह।


नहीं सीखा

आत्मानुशासन

आत्म अनुसंधान,

बस दूसरों के लिए

पाठ पढ़ाना सीखा,

और स्वयं 

दूसरों का चारा

 चट करता हुआ दीखा!


क्या ही 

विभेद रहा

मानव और ढोर में?

एक नियम-विधायक

और चपल चोर में?

इधर -उधर

मुँह मारना

सम्भवतः

उसका स्वभाव है,

जहाँ मन हुआ

लगा देता

अपना दाँव है।


अपने राजमार्ग में

स्वयं गड्ढे खोदता है,

अपनी ही फसल

पैरों तले रौंदता है,

विचित्र है यह 

मानव स्वभाव भी,

जहाँ रहता है 

'शुभम्' सद्ज्ञान का

अभाव भी।


🪴शुभमस्तु!

13.01.2023◆2.45आरोहणम् मार्तण्डस्य।


आँसू 🫧 [ सोरठा ]

 23/2023

        

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✍️ शब्दकार ©

☘️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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निकले दृग की कोर,द्रवित हुए उर-भाव जो।

तनिक न करते शोर, आँसू बन बहने लगे।।


हुआ हृदय में शोक,जननी ने जब ली विदा।

नहीं सका मैं रोक,अविरत आँसू  बह  रहे।।


बनकर आँसू धार,पिता गए सुरलोक को।

दुखी  हुआ  परिवार, नयनों से  मेरे  बहे।।


उर को देता शोक,कठिन बहुत है बोझ ये।

चुभती तीखी नोक,बन आँसू बहता वही।।


दृग से  आँसू धार,  नहीं मात्र दुख  में   बहें।

हैं सुख का उपहार,अति सुख में भी वे कहें।


रासायनिक गुण तत्त्व,सुख केआँसू के इतर।

अलग सदा अस्तित्व, दुख के आँसू भिन्न हैं।


होम  दिए हैं  प्राण,देश - सुरक्षा  के लिए।

करते  हैं जो त्राण,अश्रु बहाते हम  सभी।।


बहते बन जल-बिंदु,हैं प्रतीक उर भाव के।

अंबर में ज्यों इंदु, मानव कहता  अश्रु ये।।


आई    ऐसी   बाढ़, आँसू  नारी  के    बहे।

रिश्ते  नसे  प्रगाढ़,महल  किले राजा  मिटे।।


उद्धव  अति  बेचैन, अश्रु गोपियों  के  बहे।

त्यों तड़पे दिन रैन,जल बिन तड़पे मीन ज्यों


 जाती  है   ससुराल, पीहर से बेटी    विदा।

आँसू - बिंदु विशाल,जननी के रुकते नहीं।।


🪴शुभमस्तु !


🪴12.01.2023◆12.30 पतनम मार्तण्डस्य।


बुधवार, 11 जनवरी 2023

अहंकार 🤺 [ दोहा ]

 22/2023

 

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✍️ शब्दकार ©

📖 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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अहंकार जिसने किया,हुआ उसी का नाश।

तम वह मानव बुद्धि का,हरता ज्ञान प्रकाश।


सोने की  लंका  जली,ध्वस्त हुआ  परिवार।

अहंकार दशग्रीव का,नाशक बुद्धि-विकार।।


पुतिन आज साक्षात है,अहंकार  का  रूप।

मिटा  रहा यूक्रेन को,मूढ़ बुद्धि - तम  भूप।।


रूप   वृथा नवयौवने, अहंकार  मत  पाल।

विनता बन जीना सदा,रूप हरे तव काल।।


यौवन   तेरा   धूप  है, अहंकार  है   काल।

मति तेरी  हरता वही,  फैलाए अघ - जाल।।


अहंकार धन बुद्धि तन,सबका करता नाश।

होता  मानव  में नहीं, संत बने नर   काश।।


अहंकार के कीट से,मिटे मनुज का   सार।

जीवित दिखता आदमी,पर देता वह  मार।।


बुद्धि खोखली कर रहा, अहंकार का कीट।

नहीं किसी  को मानता,देता जीवित  पीट।।


छिद्र एक जलयान में,करता है  जलमग्न।

अहंकार नर- देह  में,कर देता मति  भग्न।।


अहंकार  ने कंस का, छीना बुद्धि  विवेक।

कान्हा का दुश्मन बना,त्याग कर्म हर नेक।।


ज्ञानी ध्यानी  सूरमा, या हो संत    महान।

अहंकार  में वे  नसे, बड़े - बड़े  धनवान।।


🪴शुभमस्तु !


11.01.2023◆11.30 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


शिशिर शीत संताप 🗻 [ दोहा ]

 21/2023


[शीत,शरद,माघ,पूस,कुहासा]

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ .भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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         ☘️ सब में एक ☘️

शिशिर शीत संताप से,जीव जंतु  बेहाल।

मानव भी पीड़ित बड़ा,बदल गई है चाल।।

थर-थर  काँपे नारि-नर,चादर ओढ़े  भोर।

शीत तुषारापात  से,मौन छिपे खग   मोर।।


शरद सुहानी आ गई,नाच उठे   मन  मोर।

विदा हुई पावस  झड़ी, निर्मलता  हर ओर।।

शरद देख खंजन चले,खिले काँस के फूल।

ऋतु बदली है पावनी,नहीं डगर  में  धूल।।


सघन कोहरे में यहाँ, आया शीतल माघ।

काँप  रहे  नर ढोर हैं,छिपे सौर  में  घाघ।।

माघ  मास  में  उष्णता, कैसे  हो  भरपूर।

वसन  गर्म  आहार   से,  करते  ठंडी  दूर।।


छोटे  दिन  रातें  बड़ी,मंद  पूस की  चाल।

ओढ़  रजाई   बैठते, शीत  रहा  है   साल।।

जिन्हें चाव संग्राम का,क्या सावन क्या पूस!

ध्वंस किया यूक्रेन को,मंद बुद्धि   है  रूस।।


सघन कुहासा छा गया, दिखे न चारों ओर।

लगता  सूरज   चादरें,  ओढ़े लाया    भोर।।

जड़ता बढ़ती जा रही, बढ़ा कुहासा - धूम।

दाँत  कटाकट  हैं बजे,रहा धरा  नभ  चूम।।


     ☘️ एक में सब ☘️

पूस  माघ  का शीत है,

                           शरद शिशिर  की भोर।

सघन कुहासा  ओढ़कर,

                           शीतलता चहुँ    ओर।।


🪴शुभमस्तु !


11.01.2023◆7.30 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


मंगलवार, 10 जनवरी 2023

भाषित भाव भरी बगिया 🌻 [ सिंहावलोकन सवैया ]

 20/2023


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✍️ शब्दकार ©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

अपनी -अपनी  अनमोल लगे,

             शुभ भाषित भाव भरी  बगिया।

बगिया महके  बहु  शब्दमयी,

                रचि भाल सजाइ रही  बिंदिया।।

बिंदिया सत रूप उदोत लिए,

              निज ओप लुभाइ करे  सुखिया।

सुखिया वह नेह  स्वदेश करे,

                बनता नर अन्य महा दुखिया।।


                         -2-

जननी शुभ बोल सिखाय दिए,

                 जननी-उपकार नहीं  बिसरा।

बिसरा जन मूढ़ कृतघ्न महा,

                    उर नेक नहीं निखरा सुथरा।।

सुथरा  घर  मंदिर  पूज्य  लगे,

                      जँह देव बसें फिरते चँवरा।

चँवरा  गह  हाथ  सुसेव  करें,

                   प्रति फूल फिरें उड़ते भँवरा।।


                         -3-

यह   भारत  देश  महान सदा,

                  अभिनंदन वंदन ही   करिए।

करिए सब  काम  सही अपने,

                   बद काम सभी करते डरिए।।

डरिए  नहिं  बोल कहें बिगड़े,

                घट पुण्य सु काज सदा भरिए।

भरिए कवि काव्य सुभाष सदा,

               कर भक्ति स्वदेश नदी तरिए।।


                         -4-

जननी  मम  तात  धरा जनमे,

                     यह देह नई बनती  उनसे।

उनसे  सत काज हुए  भव में,

                  अणु रक्त बने उनके कन से।।

कन से यह सृष्टि स्वरूप सजा,

               कविता करते कवि जी मन से।

मन से गतिशील नहीं जग में,

                 ममता न नसे मानव तन से।।


                         -5-

शुभ की शुभता दुर की दुरता,

              मिटती न कभी कवि की कविता।

कविता भर भाव बहे उर से,

                  पहुँचे उस ठौर जहाँ  सविता।।

सविता-कर ज्योति करें जग में,

                  कवि नम्र सदा सत से झुकता।

झुकता कब काठ नहीं नम जो,

                  वह टूट रहा जब भी  तनता।।


🪴शुभमस्तु !


10.01.2023◆4.30 पतनम मार्तण्डस्य।


डालें पानी दूध में 🥛 [ कुंडलिया ]

 19/2023


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

डालें  पानी   दूध   में,  करते  जो   व्यापार।

निर्धन  वे   रहते   सदा,रहता घर   बीमार।।

रहता  घर   बीमार, रोग  की रहे   सवारी।

कभी भैंस को रोग,कभी उजड़ी घर क्यारी।।

'शुभम्' न मिलता चैन, धारणा  झूठी  पालें।

मिला  दूध  में नीर, छिपा चोरी   से  डालें।।


                         -2-

दोहन  भैंसों   से  करें, श्वेत दूध - सा   दूध।

पानी  में ही  काढ़ते,पालित पशु  का  ऊध।।

पालित पशु  का  ऊध, बेच पय धंधा करते।

नित्य  कमाते  पाप,नहीं  ईश्वर से    डरते।।

'शुभम्' सयानी नारि,भैंस पालक नर मोहन।

प्रति लीटर जल साठ,बेचते कर पय दोहन।।


                         -3-

पाली घर  में एक  भी, बकरी भैंस  न  गाय।

फिर भी बेचें दूध  वे,सुन मुख निकले हाय।।

सुन मुख निकले हाय, यूरिया तेल मिलाएँ।

कैमीकल भरपूर,मनुज को जहर पिलाएँ।।

'शुभम्' पाप का खेल,खेलता नर घरवाली।

गुप्त दुग्ध -व्यापार, नहीं मादा पशु पाली।।


                         -4-

देती  केवल  एक ही, दूध  भैंस  या  गाय।

ग्राहक नित बढ़ते रहे,जल ही मात्र उपाय।।

जल  ही  मात्र  उपाय, मिलाते जाएँ  पानी।

श्वेत  रहे   बस  दूध,  ढोर दूधों की   रानी।।

'शुभम्' दोहनी हाथ, मालकिन ज्यों ही लेती।

पानी  में  पय  काढ़,दोहनी वह  भर देती।।


                          -5-

पानी  में   यों   दूध  का,रँग दिखलाता  रंग।

केमीकल   गाढ़ा  करे,तेल वसा  का  संग।।

तेल  वसा  का  संग, भैंस क्यों  कोई  पाले।

गुप्त  कोठरी  बीच, ढंग से जहर  मिला ले।।

'शुभम्' नहीं ये पाप, बनी घर वाली  रानी।

करती नित सहयोग,मिलाए  जीभर  पानी।


🪴शुभमस्तु !


10.01.2023◆2.30 

पतनम मार्तण्डस्य।

बचना सबको शीत से 🏔️ [ कुंडलिया ]

 18/2023


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✍️ शब्दकार ©

🪦 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

पकड़े    प्याला   हाथ में, ओढ़े मोटी   सौर।

अंग-अंग आवृत सभी,शीत लहर का दौर।।

शीत लहर का दौर,शिशिर में थर-थर काँपे।

दिखते  हाथ  न  पैर, वसन  में  ऐसे  ढाँपे।।

'शुभम्'माघ का मास,चाय को कर में जकड़े

झाँकें ऊपर केश, ठंड उनको क्यों  पकड़े??


                         -2-

बचना सबको शीत से,करना कुछ उपचार।

मोटा-सा गद्दा बिछा,परिहृत शीत विकार।।

परिहृत शीत  विकार, रजाई ओढ़े   भारी।

लगे न थोड़ी  ठंड,मिटे कँपकँपी  तुम्हारी।।

'शुभम्'गर्म हो चाय,सुखद कर्ता की रचना।

प्याला थामें हाथ,ठंड  से सबको  बचना।।


                         -3-

ओढ़ी   मोटी  सौर   जब,शीत हो  गया  दूर।

नीचे  गद्दा  भी  बिछा, सुखद हुआ  भरपूर।।

सुखद  हुआ  भरपूर,ढँके तन सारा  अपना।

थामा प्याला हाथ,चाय का क्या फिर तपना!

'शुभम्'माघ का शीत, निकट है उत्सव लोढ़ी।

सबल  शीत  उपचार,  रजाई मोटी   ओढ़ी।।


                         -4-

आई   उत्तर    से   हवा,  संग  तुषारापात।

थर-थर नारी-नर कंपे,शीतल होते  गात।।

शीतल  होते  गात, ओढ़  लें गरम   रजाई।

बूढ़े  बालक  वृंद, युवा  सब लोग- लुगाई।।

'शुभम्' चाय ले हाथ,बैठ कर कवि कविताई।

आवृत करले देह,तुहिन क्यों अंदर आई!!


                         -5-

धरती जल आकाश में बढ़ी शिशिर की शीत

ओस लदी तरु शाख पर,पल्लव होते पीत।।

पल्लव  होते   पीत, काँपते  हैं नर  -  नारी।

ओढ़े   मोटी   सौर,    सताती सर्दी   भारी।।

'शुभं' चाय कप हाथ,थाम नीहारें  झरती।

मछली से ले सीख,नदी में निज पर धरती।।


🪴शुभमस्तु !


10.01.2023◆7.30 आरोहणम् मार्तण्डस्य।


किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...