मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

खुशियाँ [ मुक्तक ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🏕️  डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                 -1-

भौतिक सुख,सुख का संभ्रम है,

लगता  दीपक   लेकिन  तम है,

खुशियाँ   वहाँ   नहीं  हैं  साथी,

न्यून  न्यूनतम  सुख का क्रम है।


                   -2-

माया  की   छाया   में   अंधा,

मानव के पग,तन , मन,कंधा,

दिन  में  लेकर   दिया  ढूँढ़ता,

खुशियाँ, सपने का यह धंधा।


                  -3-

पर  - पीड़क  के  नैन  नहीं हैं,

सोते - जगते   चैन    नहीं   हैं,

खुशियाँ   कैसे   उसे  मिलेंगीं,

'शुभम'सरल,सत बैन नहीं हैं।


                   -4-

मन में ही  खुशियाँ  बसती हैं,

बागों  में  कलियाँ   हँसती  हैं,

माया का गुलाम  बन सिसके,

मानव'शुभम'खुशी रिसती हैं।


                   -5-

पर - उपकारी   सदा सुखी है,

परपीड़क  जन  कालमुखी है,

'शुभम' उसे  खुशियाँ हैं सारी,

दीन -हीन लख बना दुःखी है।


💐 शुभमस्तु !


29.12.2020◆2.00अपराह्न।

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