मंगलवार, 1 दिसंबर 2020

आ गई रजाई [ बालगीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🦋 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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शीत  बढ़ी  आ  गई  रजाई।

मौसम ने ली  है   अँगड़ाई।।


दादी अम्मा शी-शी करतीं।

ओढ़ रजाई  सर्दी   हरतीं।।

दिन में धूप   करे   गरमाई।

शीत  बढ़ी आ गई  रजाई।।


साग  चने   का मोटी  रोटी।

चूर्ण  बाजरे  की वह छोटी।।

खाते हम सब चुपड़ मलाई।

शीत  बढ़ी  आ  गई रजाई।।


ले-ले स्वाद गज़क हम खाते।

शकरकंद   मीठे   मनभाते।।

मूँगफली    रुचती   मधुराई।

शीत  बढ़ी  आ  गई रजाई।।


सरसों की  भुजिया है  सौंधी।

तेज   धूप में    आँखें  चौंधी।।

स्वेटर   की   हो  रही  बुनाई।

शीत  बढ़ी  आ  गई  रजाई।।


गेंदा, लाल   गुलाब  खिले हैं।

मुर्गी  बतखें  हिले - मिले हैं।।

खेत,बाग,वन   शोभा  छाई।

शीत  बढ़ी आ   गई  रजाई।।


💐 शुभमस्तु !


01.12.2020◆11.00पूर्वाह्न।

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