शनिवार, 10 जुलाई 2021

आगे कुछ: पीछे रुक्ष 🔰 [ व्यंग्य ]

 

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 ✍️ लेखक © 

 🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 

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                अरे!आप जानते नहीं दुनिया का हाल।आगे से मराल पीछे से काग।ये दुनिया है ही ऐसी। जैसी बनाई प्रभु ने वैसी।जहाँ भी जाइए ,यही दशा पाइए। आप और हम भला कर भी क्या सकते हैं।उसके हर आयाम को समान कैसे कर सकते हैं! इस धरती को ही देख लीजिए ,कहीं पर्वत कहीं मैदान,कहीं सागर कहीं झीलों का गहन आह्वान, कहीं फटते हुए भयंकर ज्वालामुखी, कहीं हिमाच्छादित पर्वत राशि, कहीं सरिताएँ, सरोवर, तालाब, कहीं रेगिस्तान में रेत का तपता हुआ बहाव।कहीं कोई समता नहीं ।आगे न पीछे ,ऊपर न नीचे। 

            अब बताइए भला! आदमी इस उपक्रम से कैसे बाहर हो सकता है! इसी प्रकृति से अनुरूप साँचे में उसे भी ढलना पड़ेगा।उसका भी झंडा ऐसे ही किसी स्थल पर गड़ेगा।जिसका श्रेय वह अपने माथे पर मढ़ेगा। आदमी के आगे मुँह, आँख, नाक,कान,गाल,अधर,चिबुक, और उस ओर सब केश आच्छादित ढालू सपाट, नीचे ग्रीवा, स्कंध ,वक्ष,वक्षोज (नारी में) उदर,नाभि, जाँघ ,टाँग, पैर और अन्य आवश्यक उपकरण,अंग ,उपांग, निम्नांग। पीछे पर्वतों जैसा उतार - चढ़ाव।मानव - देह की रचना का विचित्र बना - सजाव। हृदय में भाव,देह के विविध अंगों से हाव, मष्तिष्क में ताव, माँस की जीभ से अपूरणीय घाव, कभी प्रभात की वात, कभी तमाच्छादित रात। कभी जलजात का महकता श्वास- प्रश्वास ! कभी प्रभंजन का आकस्मिक आघात। 

                आप ही देख लीजिए। एक एक मुँह में दो -दो जबान।एक गंगा की तरह दृश्य औऱ दूसरी नाले की तरह सुरंग - समाई अदृश्य। जैसे पटा हुआ कोई सीवर , दृश्य जीभ जैसे पवित्र रिवर। आगे गंगा ,पीछे नाला। एक गोरी ,दूजा काला। कहीं श्मशान कहीं शिवाला।

             आदमी के सामने आदमी कुछ और ही होता है। पीछे उसी के लिए शूल ही बोता है। उसकी आगे औऱ पीछे की बात जान ली जाए,तो रस में भी विष का वास स्पष्ट नज़र आए। इसमें वह अपने किसी प्रिय को भी नहीं छोड़ता।आदत से मजबूर है ,क्या करता! जीभ जो दो हैं। दोनों से काम जो लेना है। बिना एक को चलाए दुम की तरह खो नहीं देना है।यही तो जीव विज्ञान का सिद्धांत है।औऱ ये आदमी भी सिद्धांतवादी है। भला वह सिद्धांत से पीछे कैसे हट सकता है।इसलिए दोनों जीभों के पृथक - पृथक कार्यों से परांगमुख कैसे रह सकता है। इसीलिए वह आगे कुछ और पीछे कुछ और ही है। आगे स्निग्ध! मुग्ध,पीछे क्षुब्ध,क्रुद्ध। आगे से कुछ ,पीछे से रुक्ष!! मुँह पर रस की धार लगातार, पीछे विष का ज्वार अपार। बदल जाती हैं आँखें भी, बदल जाते हैं स्वर ! बदल जाती हैं नज़रें बदल जाते हैं तेवर।कभी घेवर ,कभी उड़ता है बे पर। 

                   विचित्र है मानव का चरित्र।साहित्यकारों ने खींचे हैं जिनके अनगिनत चित्र।कहानियों, कविताओं ,उपन्यासों, नाटकों आदि में मानवीय चरित्र के बहुरूपिये चरित्र के बहुरूप। चाहे हो राजा या मंत्रियों का स्वरूप। प्रजा हो या अमीर गरीब , दिन पर दिन बदलते चेहरे, बदलते रंग रूप। गिरगिट को भी पीछे छोड़ दिया है। आगे औऱ पीछे के चरित्र को इतना झिंझोड़ दिया है। कभी करता हुआ प्रभु की पूजा, कभी बकता हुआ गाली कि हे भगवान! तूने क्या किया। भगवान को भी नहीं बख़्सता। इंसान क्या चीज है। आदमी के अंदर पड़ा हुआ ही ऐसा बीज है। जो कभी कीकर है, करील है, करेला है। कभी तीतर है,बाज है,कोयलों का मेला है।

               आदमी को आदमी से ,उसके अदृश्य आघात से बचना है। प्रकृति की ये है ही ऐसी विचित्र विरोधाभासी रचना है ।मैं इससे भी अधिक क्या बतलाऊँ कि आदमी आगे से कुछ है औऱ पीठ पीछे कुछ और ही है ,रुक्ष है। 

   🪴 शुभमस्तु !

 १०.०७.२०२१◆६.४५पतनम मार्तण्डस्य। 


शनिवार, 3 जुलाई 2021

जंगल 🌳 [ बाल कविता ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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पास  गाँव  के   जंगल  भारी।

गए  सैर   बालक, नर, नारी।।


घने     कँटीले    पेड़   लताएँ।

लिपट-लिपट कपड़ों में जाएँ।


कीकर,शमी ,करील  खड़े थे।

शीशम, पीपल  बड़े- बड़े थे।।


पेड़ों  पर  थीं   घनी   लताएँ।

कितनी सुन्दर  तुम्हें  बताएँ!! 


रंग - बिरंगे   फूल   खिल रहे।

आपस में सब झूम हिल रहे।।


देखे हिरन, सियार , लोमड़ी।

हाथी  की थी टाँग भी बड़ी।।


झाड़ी  में खरगोश   छिपे थे।

वानर,  बहु लंगूर   मिले थे।।


कलकल कर सरिता बहती थी।

लगता था वह कुछ कहती थी।।


सरिता में   हम   खूब  नहाए।

फूल बीन  कर  नीर   बहाए।।


संग   हमारे   थे     दादा  जी।

खाए वन फल हमने  ताजी।।


शेर   नहीं   थे    भालू, चीता।

'शुभम'दिवस मंगलमय बीता।


🪴 शुभमस्तु !


मुखचोली -पुराण 😷 [ व्यंग्य ]


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 ✍️ लेखक © 

 😷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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 अथ श्री 'मुखचोली पुराणम' प्रारभ्यते । 

                   आधुनिक युग का मानव इतना अधिक 'विरस' (VI RUS) अर्थात रस विहीन हो गया है कि अपनी विरसता के कारण वह अपना मुख किसी को दिखाने में भी शर्माता , हिचकिचाता है।वह पशुओं (कुत्तों, बिल्लियों, गायों, भैंसों, बकरियों ,भेड़ों,घोड़ों ,गधों आदि) का विश्वास कर सकता है, किन्तु अपनी तरह के शरीरधारी मानुष को अपना चेहरा तक दिखाने से पहले दस बार विचार करता है, इसके लिए उसने नारियों की कुच - चोली के समान ही 'मुख चोली' की खोज कर ली है। जिसे वह कम से कम घर से सड़क, बाज़ार, दुकान, हाट,बारात ,जनवासा, बैंक की कतार, राशन की भीड़, मंदिर , गुरुद्वारा आदि स्थानों पर अपने -अपने मुख पर लगाने की अवश्य सोचता है।यदि लगाता नहीं है तो पेंट की जेब, पर्स ,थैला आदि की शोभा बढ़ाता है औऱ बहुत 'ज़्यादा समझदार' हुआ तो अपने दोनों कानों रूपी खूटियों पर टाँगकर अपनी ठोड़ी की मेंड़ पर अटका ही लेता है।चौराहे पर उसे पुलिस वाले से चालान होने का डर जो है ! 

              इस देश की यह त्रेतायुग से निरंतर चली आ रही परम्परा रही है कि यहाँ भय के बिना तो प्यार भी नहीं होता : (भय बिनु होय न प्रीति लाख करौ बैरी की सेवा)। इस पवित्र परम्परा का श्रेय समुद्र महाराज को दिया जाता है ,जो सीधे- सीधे भगवान राम को समुद्र में मार्ग भी नहीं देना चाहते। परन्तु जब भगवान राम क्रोधावेश में धनुष पर शर- संधान कर लेते हैं ,तो करबद्ध प्रार्थना करते हुए उनके समक्ष आकर खड़े हो जाते हैं :'आदेश कीजिए प्रभु!' यही स्थिति पुलिस के सामने बिना 'मुखचोली' धारी महिला / पुरुष की होती है।तब वह झट से पर्स/जेब से 'मुखचोली' निकाल कर स्व- मुखारविंद औऱ स्व - नासिका छिद्रों को फ़टाफ़ट आवृत्त करने लगता/लगती है। यह सब 'श्रीराम - सागर परम्परा' का निर्वाह ही तो है।

                'मुखचोली' का विकास औऱ रूप परिवर्तन असाधारण रूप से हो रहा है। निरंतर उसके रंग, रूप ,आकार और प्रकार में बदलाव देखे जा रहे हैं। साड़ी की डिजाइन तथा रंग से मैच करती हुई 'मुखचोलियों' से बाजार गरम हैं।जैसी साड़ी वैसी 'मुखचोली' (जैसी साड़ी वैसी बिंदी की तरह )अनेक छींटों , रंगों , औऱ विविध आकारों में 'मुखचोलियाँ' उपलब्ध हैं। अंततः बाज़ार भी तो हमारी रुचियों के गुलाम हैं न! जैसे हम ,वैसे बाज़ार, वैसा माल, वैसी हमारी चाल, (भले ही उखड़ रही हो देह की खाल), पर प्रदर्शन (फैशन) के अनुरूप होगी हमारी चाल, बस 'मुखचोलियों' का भी है यही हाल। पंक्तिबद्ध लटकती हुई 'मुखचोलियों' की बहार देखते ही बनती है। मर्द लगाए या औरत , बच्चा, बूढ़ा या नौजवान। सबके मुख की हैं ये 'मुखचोलियाँ' निराली शान।

            'मुखचोली ' की अगली प्रगति में अब इनके अंदर तरह -तरह के इत्र और सुगन्धों के संयोजन की बारी है।आवश्यकता अविष्कार की जननी है। अब रंग रूप बदल ही रहा है ,तो लगे हाथ उसमें यदि फ़ूलों की बसंत बहार भी आ जाए ,तो हर्ज ही क्या ! अब उसी की तैयारी चल रही है।

             'मुखचोली 'के रंग ,रूप आदि की चर्चा के बाद यदि इसके जन्म और विकास की चर्चा भी कर ली जाए ,तो उचित रहेगा।जब हमारे यहाँ बैलों से कृषि कार्य हुआ करते थे, तब गेहूँ आदि की मड़ाई करते समय बहुत सारा अन्न ये वृषभ गण अपने मुख से भक्षण कर जाया करते थे। इस अन्न हानि को रोकने के लिए कृषक उनके मुख पर जालीदार आवरण कस दिया करते थे ,जिसे वे 'मुसीका' कहते थे। अब भला हम उसे 'मुसीका' कैसे कह सकते हैं! बैलों औऱ मनुष्य को एक ही डंडे से कैसे हांक सकते हैं! इसलिए 'मुसीका' औऱ 'मुखचोली' का लगभग एक समान काम (Function) होने पर भी उसे 'मुसीका' कैसे कहा जा सकता है! पशु और मानव के दर्जे में कुछ तो अंतर होना ही चाहिए न! इसीलिए उसका आधुनिक नाम 'मुखचोली' की व्यक्तिवाचक संज्ञा से अभिहित किया जाता है। यह अलग बात है कि दो 'मुखचोलियों' को यदि विधिवत संयोजित कर दिया जाए ,तो एक 'कुचचोली' का निर्माण हो जाता है। दोनों ही इंसान के लिए उपयोगी हैं।एक केवल स्त्री उपयोगी दूसरी सर्वोपयोगी। क्या ही अद्भुत संयोग है: 'कुचचोली' और 'मुखचोली'।

                  'मुखचोली' को ही आंग्ल भाषा में 'मास्क' नाम से उच्चरित किया जाता है , लगता है कि कितनी महत्त्वपूर्ण वस्तु होगी। पर उसे कम महत्व की समझ लेना भी बड़ी भूल होगी। अंततः वह जीवन -रक्षक, जीवाणु- रक्षक,अशुद्ध वायु- रक्षक, रोगाणु - रक्षक और पहचान-रक्षक,(इसकी आड़ में चोर- शाह, अमीर - गरीब , चोर- डकैत, नेता -अभिनेता) किसी की कोई पहचान नहीं हो पाती भी है। 

                     बहुउद्देशीय 'मुखचोली' की महिमा अनन्त है। चाहे कोई नेता हो या सिपाही, लोग हो या लुगाई , अधिकारी या कर्मचारी,सीमा-रक्षक या किसान, अब पशुओं को छोड़कर सबके लिए अनिवार्य है। यह सुरक्षा - कवच का आधुनिक अवतार है।कोई किसी को क्यों बताए! क्या समझाए! समझावन सिंह का अवतार मानव इसे लगाए तो लगाए और न लगाना हो तो न लगाए।उसे अपनी जान की रक्षा का मंत्र कितनी बार समझाएं! कितनी प्रकार समझाए। 

 इति 'मुखचोली-पुराणस्य' प्रथमो$ध्याय समाप्यते।        


🪴शुभमस्तु !


 ०२.०७.२०२१◆१०.४५ आरोहणम मार्तण्डस्य।     


मुखचोली'- आख्यान 🔷 [ दोहा ]


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✍️ शब्दकार ©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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वृषभ- मुसीका से हुआ, मुखचोली अवतार।

लगा रहे हैं मनुज भी,नगर गाँव  नर -  नार।।


इधर-उधर मुँह मारते, जब कृषकों के  बैल।

कसा मुसीका नाक-मुख,निकली रक्षक गैल।


मानव ने अपना लिया, मुखचोली हथियार।

रक्षक फुफ्फुस का सबल, कोरोना पर वार।।


जान गए हैं नारि-नर, मुखचोली अनिवार्य।

खुले नाक -मुख घूमते,करते अपने कार्य।।


मुखचोली  है   जेब में,या ठोड़ी   आधार।

ले बाइक सरपट उड़े,दौड़े सड़क बज़ार।।


मुखचोली  की आड़ में,छिपे शाह या  चोर।

पहचाने  जाते   नहीं,रात,साँझ या   भोर।।


मुखचोली क्रय कर रहीं, मिला शाटिका रंग।

लाल,हरी, पीली  बहुत,नारी पति  के   संग।।


मुखचोली  में  इत्र का ,दे दें 'शुभम'   बघार।

कोरोना   झाँके  नहीं, इतना करें     सुधार।।


मुखचोली  साड़ी  नहीं,अपनी करें   प्रयोग।

नहीं  पहनना    ननद की, दूर रहेंगे    रोग।।


मुखचोली  फैशन  नहीं,करती सदा बचाव।

बनी  रक्षिता  मनुज की,करे न कोई घाव।।


मुखचोली  को टाँग लें,श्रुति- बन्धों के साथ।

नाक सहित मुख को ढँकें,रोग न पाए पाथ।।


सब अपनी मुखचोलियाँ, रखना घर दो चार।

बदल-बदल कर लें लगा,जब जाएँ घर द्वार।


धोएँ  निज मुखचोलियाँ, साबुन  से हर बार।

धोकर डालें  धूप में,लें फिर मुख  के   द्वार।।


है  युग की  अनिवार्यता, मुखचोली  हे मीत!

हारेंगे   रोगाणु    सब, होगी  तेरी    जीत।।


मुखचोली धारक सदा,रोग मुक्त  ही  जान।

बाहर मत जा तू 'शुभम', दिखलाने मुस्कान।


🪴 शुभमस्तु !


०३.०७.२०२१◆२.३०पतनम मार्तण्डस्य।


अंत भला तो सब भला 🪴 [ दोहा ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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इतना  तो सब  जानते, मनुज शांति  से  दूर।

चिन्ता  और  तनाव  से,  है जीवन  भरपूर।।


सदा    शांति  से  बैर है, लेता तीर - तनाव।

तन - मन के तूफान ही, देते जन को घाव।।


भौतिक साधन से नहीं ,मिलता सुख संतोष।

तृष्णा  मानव  में बसी, भरा हृदय में  रोष।।


जाते  जब  तन छोड़कर, मानव तेरे प्राण।

मन अशांत होता इधर,नहीं लेश भर त्राण।।


जाने  वाला  जा चुके, तब आते  हैं  लोग।

संवेदन  सँग  शांति के, शब्द न हरते  रोग।।


हुआ  दिवंगत  आत्मा,भू  पर तन  निर्जीव।

करें शांति की वंदना,  प्रभु से नत सिर ग्रीव।।


जीवन भर  को बो लिए, जहरीले विष बीज।

तना अहं की डाल- सा,मानव अद्भुत चीज़।।


शांति  चाहने  से नहीं,मिलती है  पल  एक।

उस नर को कैसा कहें,जिसमें नहीं विवेक।।


अंत भला  तो सब भला,नर जीवन का मूल।

फूलों  की  खेती  करें, मिलें अंत  में  फूल।।


शांति  अचानक  शून्य से,गिरे न  तेरे  अंक।

जीता  है  जो भ्रांति में,गिरता ही   है  पंक।।


आदि अंत अरु मध्य का,कर ले'शुभं'विचार।

जो  तुझको  दे पुष्प को,करना नहीं  उधार।।


🪴 शुभमस्तु !


०१.०७.२०२१◆९.१५पतनम मार्तण्डस्य।

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

जीवन का परम सत्य🪦 [ अतुकान्तिका ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🎍 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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 अपने सम्पूर्ण जीवन 

ऑक्टोपस की तरह 

अपनी आठ -आठ 

भुजाओं से 

किया संघर्ष,

पाने के लिए उत्कर्ष,

निरंतर अपार हर्ष,

पर नहीं समझी

आवश्यकता मेरी,

करता रहा आजीवन

मेरी - तेरी।


जब जाएगा छोड़कर

यह कीमती चोला,

उठेगा जिस दिन

तेरा आखिरी डोला,

अब  तक तो तू

कुछ भी नहीं बोला,

क्योंकि तू जानता है,

इस बात को 

सही मानता है,

कि यह काम तो

जाने के बाद 

आने वालों का है,

जो कहते हैं :

'हे ईश्वर ! जाने वाली

आत्मा को शांति देना।

जो उड़ गई है

बिना पंख बिना डेना।'


जब दूसरे ही

शांति- पाठ कर रहे हैं,

ब्राह्मण देव मंत्र 

पढ़ रहे हैं,

इसलिए लोग 

अशांति के साथ

मर रहे हैं,

क्या आवश्यकता है

उन्हें शांति अर्जन की !

इसलिए आजीवन

खटते हैं, 

औरों को मिटाकर 

स्वयं मिटते हैं,

जरूरत पड़ी तो

पीटते -पिटते हैं,

लेते हैं

 पैसे खर्च करके 

बड़े -बड़े तनाव,

देते हैं लोगों को

गहरे - गहरे घाव!

यदि रहा है तो

जीवन भर 

शांति का अभाव,

जो प्रत्येक आत्मा की

मौलिक आवश्यकता है,

शांति के बिना 

रिक्तता ही रिक्तता है।


जीना है  'शुभम'

सबको कि

जीते जी मैं 

अर्थात ' शांति ' 

मिल जाए ,

औऱ बिना पंखों का हंस,

सहजता से निकल जाए,

उस अनंत ब्रह्मांड में

उड़ जाए ,

क्योंकि 

यही जीवन का

अनिवार्य सत्य है।


🪴 शुभमस्तु !


०१.०७.२०२१◆ ३.४५पतनम मार्तण्डस्य।


सबको चाहिए ! [ व्यंग्य ]


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 ✍️लेखक © ☘️ 

डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 

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                    गोस्वामी तुलसीदास की एक प्रसिद्ध उक्ति है :' सबते भले वे मूढ़ जन ,जिन्हें न व्यापे जगत गति।' इस भूमंडल पर सारा खेल इसी 'जगत गति' का है।समस्त मानव जगत इसी 'जगत गति' से चलायमान है। बिना इसके मानव- जीवन का पत्ता भी नहीं हिलता। जिसके लिए दिन - रात जूझ रहा है, वह नहीं मिलता। निरंतर गतिशील रहकर ही उसकी मेहनत का पुष्प खिलता ! वह इस बात की तनिक भी चिंता नहीं करता , कि वह यह सब किसके लिए कर रहा है? क्या पाने के लिए कर रहा है? जिसे पाने के लिए जितना अधिक करता है , उतना ही वह उससे दूर जा विचरता है। और ! और!! और!!! की यह धुन उसे उसके प्रातव्य से दूर ही ले जाती रहती है। मानव की अनन्त तृष्णा उसे अपने प्रातव्य से कोसों नहीं , लाखों करोड़ों कोस दूर फेंक देती है, औऱ अंततः एक दिन वह क्षण भी आ जाता है ,कि उसे इस असार संसार से अंतिम विदाई का भी अनैच्छिक बुलावा आ जाता है।औऱ वह बुलावा टलनीय नहीं होता। जाना ही पड़ता है।

                हमारी आज की बात 'मूढ़ जन' से प्रारंभ हुई थी।पुनः लौटकर वहीं पर आते हैं औऱ आगे की बात बताते हैं। मूढ़ होने में सबसे बड़ा सुख यही है कि उसे कुछ भी नहीं करना है। बस सुअर के कीचड़ में लोटने के सदृश मस्त रहना है। नाले की धारा समान बहना है। न किसी की सुनना है ,न किसी से कुछ कहना है। फिर किस बात की चिंता ,किस बात का तनाव ! न उधेड़ना न सीना। न जाना मुंबई न जाना बीना। न किसी को देना न किसी से छीना। सुख ही सुख ,शान्ति ही शांति ! न कोई क्रांति ! न कोई भ्रांति! बस एकमात्र शांति ही शांति!

                फ़िर ये सब दिमाग़ वाले ! तरह -तरह की माँग वाले!! देह से स्वेद बहाने वाले! खेत में मेह पाने वाले!! सरकारी ,गैर सरकारी काम वाले! सरकार को सरकाने वाले! अपराध पर डंडा बरसाने वाले ! सड़क पर गिट्टी फैलाने वाले ! तिजोरियों में दस -- दस ताले लटकाने वाले ! धनिये में लीद मिलाने वाले ! पानी की दोहनी में दूध दुहने वाले! हल्दी, मिर्च में रंग , खोए में मैदा रिफाइंड मिलाने वाले! सड़क, पुल,भवन निर्माण में सीमेंट की जगह बालू से काम चलाने वाले!महीने पर वेतन पाने वाले! रोज की रोज कमाने खाने वाले! इन सभी को 'उसकी' आवश्यकता महसूस तो होती है। किंतु वे कभी एक प्रतिशत भी उसके पाने का प्रयास करते हुए दिखाई नहीं देते। 

             अनेक - अनेक भौतिक साधनों की भीड़ एकत्र करके मनुष्य सुख और शांति चाहता है । लेकिन क्या किसी को आज तक मिली? उत्तर एक ही है : नहीं। फिर कैसा सुख और कैसी शांति ? सब भ्रांति ही भ्रांति। इसकी खोज के लिए तो कितनों ने कपड़े रँग लिए , घर, पत्नी ,बच्चे ,माँ - बाप तजकर भाग लिए ,तीर्थ, व्रत, पूजा, ध्यान ,योग में रत हुए ; किन्तु क्या शांति मिली ? उत्तर फ़िर वही :  'नहीं मिली।'

               सब मन का खेल है। 'मन चंगा तो कठौती में गंगा।' परंतु प्रत्येक व्यक्ति रैदास तो नहीं हो सकता ! तथागत बुध्द नहीं हो सकता। राजा जनक अपने महलों में रहकर भी विदेह  हो सकते हैं, लेकिन क्या संसार के अन्य सभी विरक्त जंगलों में रहकर भी विदेह  हो सके  ? उत्तर एक है : नहीं। पर चाहिए सबको। 

               अंतिम समय में देह को छोड़कर , घर परिजन से मुख मोड़कर , जब जीव रूपी हंस उस अनन्त की यात्रा पर जाता है ,तो हम सभी परम पिता परमात्मा से एक यही प्रार्थना करते हुए देखे जाते हैं: 'प्रभु दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करे।' इस अपरिहार्य प्रार्थना को करने से पूर्व हमें जो कहना चाहिए, वह अंडरस्टूड (स्वतः समझने योग्य) ही रहता है। वह स्वतः समझने योग्य क्या है ? वह इस प्रकार बयां किया जा सकता है : ' हे प्रभु ! इस जीव ने सारा जीवन चिंता की आग में जल- जल कर काट दिया । जीवन भर खटता ,मिटता रहा ,कभी प्रभु नाम भी सच्चे मन से नहीं लिया।कभी शांति पाने का प्रयास भी नहीं किया। जो किया सब ढोंग और दिखावे के लिए किया। अपने नाम को चमकाने , अख़बार में फोटू और खबर छपवाने के लिए किया। पर शांति के लिए तिनका भर भी नहीं किया। अब तो वह चला गया। हे प्रभु !अब तो .........।' 'इस दिवंगत आत्मा को शांति दे ही दीजिए।' जो चाहिए थी, अपरिहार्य थी ,उसे ही भुला बैठा! अपने अहं के मायाजाल में ऐसा ऐंठा ! कि अंत तक करता रहा हाय बेटी , हाय बेटा! स्वनिर्मित चक्र में ऐसा लपेटा, कि ग्रीवा में कस गया कमर का फेंटा, फ़िर शांति से कैसे हो पाता भेंटा। तब तक दबा दिया यमपाश उसका टेंटा। तभी तो जीवित जन प्रभु से उसकी उस शांति को देने के लिए प्रार्थना करते हैं कि ' हे प्रभु!.........' भले ही वे सभी भी उसी श्रेणी के यात्री हैं , पर यहाँ तो सबको दूसरों को ज्ञान देने में पी एच.डी. की उपाधि जो मिली हुई है ! 

 🪴 शुभमस्तु ! 

 ०१.०७.२०२१◆ ११.४५आरोहणम मार्तण्डस्य । 

   

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...