मंगलवार, 7 जुलाई 2020

ग़ज़ल


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✍ शब्दकार©
🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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तेरे  जिस  काम  का अंजाम बुरा है।
हुआ है बदनाम वह नाम बुरा है।।

किसी चेहरे के उस पार नीम अँधेरा,
गोरा  हो  भले  चाम वह चाम बुरा है।

पहचानता नहीं हो आदमी आदमी की तरह,
रहना  नहीं उस धाम वह गाम बुरा है।

जिसको नहीं पहचान कोई भी वक्त की,
बिना कोई काम किए वह आराम बुरा है।

मशगूल हैं वे काम में पर काम  है कहाँ!
बेअंजाम जो काम हो  वह काम बुरा है।

लेता नहीं है आपको आगोश में अपने,
ऐसा भी पीना व्यर्थ है वह जाम बुरा है।

बाहर से पीला महकता लल चा उठा 'शुभम',
काटा तो बदबूदार है वह आम बुरा है।

💐 शुभमस्तु !

04.07.2020 ◆4.15 अपराह्न।

ग़ज़ल

 
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✍ शब्दकार©
🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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हर बुरे काम का अंजाम बुरा है।
बद से ज्यादा यहाँ बदनाम बुरा है।।

किसी चेहरे के पार नीम अँधेरा,
दिल बुरा है तो उसका चाम बुरा है।

आदमी की तरह,आदमी नहीं रहता,
कैसे कह दूँ  कि हरिक गाम बुरा है।

जिसको मालूम नहीं वक्त की कीमत,
उसकी खातिर तो ये आराम बुरा है।

 जो  हैं मशगूल अपनी मस्ती  में,
उनकी  खातिर तो हरिक काम बुरा है।

बेख़ुदी ग़र न ले आगोश में अपने,
ऐसा मयख़ाना बुरा जाम बुरा है।

ज़ुल्म सहना भी 'शुभम' जुल्म के जैसा, 
करना ज़ालिम का एहतराम बुरा है।

💐 शुभमस्तु !

04.07.2020 ◆4.15 अपराह्न।

शनिवार, 4 जुलाई 2020

शनि -महिमा [ दोहा ]

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✍ शब्दकार©
🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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-१-
छाया-रवि के पुत्र शनि,शतशः नमन प्रणाम।
कष्ट हरो मेरे सभी,देकर शुभ परिणाम।।

 -२-
शनै शनै चलते सदा,नाम पड़ा शनि नेक।
पिंगल कृष्णा वभ्रु तुम,देना शुभं विवेक।।

   -३-
छायानंदन रौद्र तुम,दुखभंजन  शनिदेव।
बार -बार विनती करें,करते हैं तव सेव।।

   -४-
अष्ट वाहनों पर चढ़े,गज मृग कागा श्वान।
गर्दभ भैंसा गिद्ध भी, और अश्व शनि शान।।

-५-
कर्मों के फल दे रहे,प्रतिक्षण मानव भीम।
न्यायकारिता में बड़े,हे कोणस्थ असीम।।

 -६-
प्रकृति संतुलन के धनी,नील वर्ण शनिदेव।
स्वामी अनुराधा नखत,हम करते तव सेव।।

  -७-
रवि समाप्त होते जहाँ,शनि सीमा प्रारंभ।
सीमाग्रह शनिदेव हैं, राशि मकर औ'कुंभ।।

   -८-
नवग्रहों में श्रेष्ठ शनि,धरते हैं अष्टांक।
उदर जाँघ में बस रहे,जानें शुभम निशंक।

    -९-
सत असत्य के भेद को, समझाते शनिदेव।
गुरु शिक्षक कीभूमिका, नमन करें नित सेव।

    -१०-
कहलाते शनि मंद भी, सौरी सूरज - पूत।
कृपा  करें नर पर कभी ,देते सु-धन अकूत।।

     -११-
चार चरण शनिदेव के,लोहा चाँदी स्वर्ण।
ताँबा चौथा चरण है,तन का श्यामल वर्ण।।

    -१२-
चार भुजाएँ वभ्रु की,मुकुट सुशोभित माथ।
रत्न जड़े सुंदर वहाँ, गदा त्रिशूल सु हाथ।।

     -१३-
क्षण में राजा रंक  हो,   रंक सँभाले  राज।
बिगड़े सब कारज बनें,शनि का ऐसा साज।।

     -१४-
पर्वत को तिनका करें,तिनका बने पहाड़।
शनि जी की शुभ दृष्टि से शीतल होता भाड़।

      -१५-
भक्तों के पालक प्रभो,नमन तुम्हें शत बार।
मुझको अघ से दूरकर,रखना सदा उबार।।

💐 शुभमस्तु !

04.07.2020 ◆10.10 पूर्वाह्न।

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शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

कविजी ! [ व्यंग्य ]

 
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✍ लेखक © 
🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप' शुभम
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           वे अपने को कवि कहते हैं।कहते ही नहीं अपने नाम से पहले लिखते भी हैं। जब वे कवि हैं तो भला किसकी जुर्रत है कि उन्हें कोई कवि न कहे , कवि की मान्यता न दे।अपने पूरे मोहल्ले में तो कवि जी कवि जी का हल्ला मचा ही रहता है , पूरे शहर में भी लोग उनका असली नाम भूल गए हैं। उनका उपनाम ही उनका पता है। यदि बाहर से कोई उनका नाम लेकर उनके पास पहली बार आता है ,तो उनके असली नाम से तो कोई उन्हें बता ही नहीं पाता कि श्री अशर्फी लालजी कहाँ निवास करते हैं। जब तक कोई कवि श्री अशर्फी लाल जी नहीं कहता ,तब तक उनका नाम पता बताना ऐसा हो जाता है जैसे गधों के झुंड में अपना गधा ढूँढ़ पाना ! 
          जब कोई उन्हीं जैसा हुआ तो गनीमत है कि जब तक उनके पास आने वाला इच्छा या अनिच्छा से दस बीच रचनाएँ सुन नहीं लेता ,तब तक वे पानी की भी नहीं पूँछते।हाँ, यदि कोई बेशर्मी से पानी माँग भी लेता है तो पानी आने में ही चार -पाँच रचनाएँ सुन लेना आम बात है। कवि जी की रचनाओं को सुनने में कोई रुचि रखता हो या नहीं , इस बात से कवि जी को कोई रुचि नहीं। उन्हें तो बस अपनी कविताएँ सुनानी हैं तो बस सुनानी ही हैं। बस आप वाह ! वाह !! क्या बात कही है! आप तो आप ही हैं, आपने तो तुलसीदास सूरदास को भी पीछे छोड़ दिया।आप तो आज कर तुलसी हो , बिहारी हो ।जैसे अनेक प्रशंसात्मक वाक्य कहते रहिए और उनकी कविताओं के अगाध सागर में गोते लगाते रहिए। बेचारा आने वाला उनकी कविता सुनकर यह भी भूल जाता है कि वह किस काम से आया था। 
                यदि कोई अरसिक व्यक्ति उनके पास आया तो भी उसे कविता तो सुननी ही पड़ेगी। उनकी देहरी से निकलने के बाद ऐसा आगंतुक पुनः लौटकर भी उनके दरवाजे की ओर नहीं देखता कि कहीं फिर से आवाज देकर न बुला लें और पुनः काव्यलाप न शुरू कर दें। वह फिर कभी भी कविजी के पास नहीं आने की कसम लेकर ही उनसे पीछा छुड़ाता है। 
             मोहल्ले -पड़ौस के सभी लोग कवि के इस पवित्र गुण और चरित्र से भली भाँति सुपरिचित हैं , इसलिए नमस्ते करके ऐसे दूर भागते हैं जैसे उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव दूर विकर्षित होता है। अपने ही शहर में कवि जी ने कुछ ऐसे चेले पाल रखे हैं , जो आए दिन उनके घर पर कवि सम्मेलन का आयोजन कर मोहल्ले वालों की नींद खराब करते हैं। प्रायः कवि निशाचर जो होते हैं न ! इसलिए उनके आयोजन रात में रतजगा करते हुए ही सम्पन्न होते हैं। मोहल्ले वालों को इसमें कोई रुचि नहीं है। इसलिए कवि जी उनके लिए एक ही जुमला प्रयोग करते हुए देखे जाते हैं, भैंस के आगे बीन बजाई , भैंस खड़ी पगुराय।
            यह तो हुई एक कवि जी की बात। इस शहर में ऐसे अनेक कवि उपाधिधारी मानव जीवन -यापन करते हैं।जिनके अपने -अपने तख़ल्लुस हैं, कोई टोंटी है , कोई ढप, कोई बगला कोई हंस, कोई दादू है कोई चाचू, कोई उत्कृष्ट है ,कोई प्रकृष्ट। निकृष्ट कोई नहीं है।एक से बढ़कर एक उपनाम धारी कवि औऱ कवयित्रियाँ।कवयित्रयों के उपनाम भी एक से बढ़कर एक हैं , जैसे चोंची, स्माइल, तबस्सुम, ख़ुशबू, आराध्या औऱ बहुत से मनोहर नाम ,उपनाम। इन कवियों के अपने -अपने ग्रुप हैं , जो प्रायः जाति आधारित हैं। इसलिए वे सब चाहे जैसी रचना करें , उनका नाम चमकना ही है। उन्हें तरह -तरह के सम्मान पत्रों से सम्मनित करना मंच का पावन अधिकार है। वे सब के सब हंस हैं ,उनमें कोई भी कागा नहीं है । यदि दुर्भाग्यवश कोई अन्य जाति वाची उनमें सम्मिलित हो जाता है तो उसका स्थान किसी टिटहरी या कौवे से अधिक नहीं होता।
           यह देश का सौभाग्य है कि देश में हजारों जातियाँ हैं, इसलिए कवि कवयत्रियाँ भी लाखों करोड़ों में हैं। एक - एक गली से लारी भर कलमकार मिलना सामान्य बात है। देश में हजारों लारियाँ भर सकती हैं। वे अपने काव्यगत वीररस से समुद्र में लहरें पैदा कर रहे हैं, पर दुर्भाग्य कि कविताओं से गोलियां नहीं निकलतीं ।धुआँ भी नहीं पैदा हो पाता तो किसी दुश्मन को कैसे मार पाएँगे। हमारे मान्यवर कविजी श्री अशर्फी लाल जी भी देश के ऐसे ही हीरा हैं, जिनकी शब्दराशि से बारूद की सुगंध वातावरण में व्याप्त हो जाती है। 
 💐 शुभमस्तु ! 

 03.07.2020◆6.15 अपराह्न।

यज्ञ [अतुकान्तिका]


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✍शब्दकार©
🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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अग्नि का पर्याय 
है पावक
करता है 
जो पावन
तन मन 
जग का कण- कण,
है शुद्धि की क्रिया
कहते हैं जिसे
यजन।

मानव- जन्म
यज्ञ से उत्पन्न,
यज्ञ ही कारण,
योग की विधि 
है यज्ञ 
परमात्मा द्वारा
मानव हृदय में
सम्पन्न।

त्याग कर भय
सोत्साह
लक्ष्य पर दृष्टि
सप्रसन्न मन
आत्मचिंतन है
यजन 
यज्ञ।

ज्ञान को प्रकाशित
करता पावक
मिटाता निबिड़ तम,
वायुभूत होते
हवनीय पदार्थ
करते शुद्ध वायु,आकाश
तन मन के 
सर्व विकार।

अनुभव का दुग्ध
घृत ज्ञान का,
विवेक -पावक में
तपता,
सत्य का प्रकाश
अगजग में  भरता
विकार हरता।

यज्ञ का तात्पर्य,
त्याग ,
बलिदान,
शुभ कार्य,
जीव का आत्मा में 
विलयन,
देव पूजन ,
दान,
धार्मिकों को
सतप्रयोजनार्थ
संगठित करना 
कहलाता है
संगतिकरण।   

किन्तु बहुत दुःख है
कि सती माता के
बाद इतिश्री
 हो  गई
यह पावन 
यज्ञ संस्कृति! 
घुलती मिलती 
रही हैं 
अनेक विकृति।

               
💐 शुभमस्तु !

02.07.2020◆7.15 अपराह्न।

गुरु [ कुण्डलिया]


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✍शब्दकार©
🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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                          -1-
पहली गुरु माँ को नमन,आदर सहित प्रनाम।
लाई मुझको अवनि पर,देकर भगवत नाम।।
देकर भगवत नाम,मुझे पोशा औ' पाला।
दिए तोतले बोल,खिलाया प्रथम निवाला।।
अनगिनती उपकार,पुत्र की बाहें गह ली।
शुभम किया उद्धार,मात मम गुरु है पहली।

                           -2-
मुझसे जो गुण में बड़े,गुरु मम पूज्य महान।
मात पिता शिक्षक सभी,सब का है अहसान।
सबका है अहसान,ज्ञान के नित प्रति दाता।
 शुभम सदा ही शीश,चरण में उन्हें नवाता
गुरु दिखलाते राह,सदा ही शुभ युग युग से।
वे सब मेरे पूज्य,बड़े हैं जो गुरु मुझसे।।

                        -3-
महिमा गुरु की जानना मानव हित अनिवार्य
उचित राह दिखला रहा करना  ही शुभ कार्य
करना नित शुभ कार्य,पतन से सदा बचाता।
हो वर्षा का कोप,लगाता सुंदर छाता।।
गुरु की प्यारी सीख सिद्धियाँ सारी लघिमा।
मिल जाती हैं आप शुभं सत गुरु की महिमा

                            -4-
भगवा में भगवान हों, नहीं कभी अनिवार्य ।
ज्ञान कर्म से गुरु बनें, करते नित सत कार्य।।
करते नित सत कार्य, वही ईश्वर दिखलाते।
भूले कोई राह,वही मंजिल पहुँचाते।।
गुरु ही श्रेष्ठ महान,नहीं वे शचिपति  मघवा।
'शुभम' न गुरु का हेत, रँगे कोई तन भगवा।।

                          -5-
साँचा गुरु मिलता नहीं,ढोंगी मिलें अनेक।
स्वयं नरक में गर्क हैं,ज्ञान बाँटते नेक।
ज्ञान बाँटते नेक, शिष्य को मेष बनाते।
दिखला अंधी राह,नरक के कूप गिराते।।
कैसे हो उद्धार,'शुभम'गुरु ही है काँचा।
छान फूँककर देख,जगत में गुरु है साँचा।।

💐 शुभमस्तु !

02.07.2020◆8.00 पूर्वाह्न।

बुधवार, 1 जुलाई 2020

मयंक [ दोहा ]

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✍ शब्दकार©
🌝  डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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शशि मयंक विधु इंदु द्विज,कहलाते हो सोम।
निशिपतिऔ राकेश भीचमक दिखाते व्योम।

नारी- मुख सौंदर्य के,विधु मयंक  उपमान।
घटते बढ़ते नित्य हो,कभी न एक समान।।

देख तुम्हें आकाश में,प्रमुदित हुआ चकोर।
दर्शन  में ही तृप्त है, पंछी  भाव विभोर।।

विधु वदनी का देख मुख,उठी हृदय में पीर।
जो देखे मदमत्त हो, खो बैठे निज  धीर।।

चाँद बिना क्या चाँदनी,तुम रजनी के नाथ।
औषधीश तुमको कसम, छोड़ न देना साथ

होती मावस-रात जब, जाते कहाँ  मयंक।
बस पूनम की रात को,रहता चाँद न बंक।।

षोडश कला विराजतीं,दिया कलाधर नाम।
पर पूनम की रात को, ग्रसता राहु निकाम।।

औषधियों में  सोमरस,भर कहलाते  सोम।
चन्द्र सुधाकर भी कहें,शशि चमकाते व्योम।

पितासिंधु से दूर जा,जा पहुँचे आकाश।
होता प्रमुदित देखकर,भले न हो तुम पास।।

शीश चाँद के लग गया,काला दाग कलंक।
जो दिखता  है दूर से,उर का काला अंक।।
  
सारँग  हिमकर चंद्रमा,निशि कर  तेरे  नाम।
राजनीपति तुम धन्य हो,जग में शुभं ललाम।

शुभमस्तु !

01.07.2020.12.01 अप.

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...