बुधवार, 1 जुलाई 2020

मयंक [ दोहा ]

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✍ शब्दकार©
🌝  डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
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शशि मयंक विधु इंदु द्विज,कहलाते हो सोम।
निशिपतिऔ राकेश भीचमक दिखाते व्योम।

नारी- मुख सौंदर्य के,विधु मयंक  उपमान।
घटते बढ़ते नित्य हो,कभी न एक समान।।

देख तुम्हें आकाश में,प्रमुदित हुआ चकोर।
दर्शन  में ही तृप्त है, पंछी  भाव विभोर।।

विधु वदनी का देख मुख,उठी हृदय में पीर।
जो देखे मदमत्त हो, खो बैठे निज  धीर।।

चाँद बिना क्या चाँदनी,तुम रजनी के नाथ।
औषधीश तुमको कसम, छोड़ न देना साथ

होती मावस-रात जब, जाते कहाँ  मयंक।
बस पूनम की रात को,रहता चाँद न बंक।।

षोडश कला विराजतीं,दिया कलाधर नाम।
पर पूनम की रात को, ग्रसता राहु निकाम।।

औषधियों में  सोमरस,भर कहलाते  सोम।
चन्द्र सुधाकर भी कहें,शशि चमकाते व्योम।

पितासिंधु से दूर जा,जा पहुँचे आकाश।
होता प्रमुदित देखकर,भले न हो तुम पास।।

शीश चाँद के लग गया,काला दाग कलंक।
जो दिखता  है दूर से,उर का काला अंक।।
  
सारँग  हिमकर चंद्रमा,निशि कर  तेरे  नाम।
राजनीपति तुम धन्य हो,जग में शुभं ललाम।

शुभमस्तु !

01.07.2020.12.01 अप.

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