बुधवार, 22 जून 2022

संतुलन 🏋🏻‍♀️ [ मुक्तक ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🏋🏻‍♀️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                         -1-

रात दिन के संतुलन से है प्रकृति शुभदा सदा

उदित होते सोम सूरज हैं न विचलित एकदा

बह रही सरिता सजीली सिंधु से मिलना उसे

गूँजती  वीणा  सुरीली,विमल वाणी  शारदा।


                         -2-

शुभ्रतम जीना अगर तो संतुलन अनिवार्य है

अग्रसर  हो  कर्मपथ पर धर्म तेरा  कार्य  है

दूसरों के छिद्र में क्यों डालता है   अँगुलियाँ

राह मेंअपनी चला चल शिष्य या आचार्य है।


                         -3-

पित्त कफ या वात तीनों संतुलन होना सही

विषम भोजन रोगकारी दूध के सँग ज्यों दही

मास दो - दो के लिए आ जा रहीं ऋतुएँ यहाँ

याद रखना बात सच ये जो शुभम् ने है कही


                         -4-

भू गगन जल वायु पावक से जगत साकार है

संतुलन विकृत हुआ तो विश्व ये  बीमार   है

सृष्टिकर्ता की महारत देखिए अद्भुत  अटल

आँधियाँ, भूकंप , बाढ़ें  ले  रहीं आकार   है।


                         -5-

संतुलन परिवार में हो संतुलन हो   देश   में

संतुलन  संसार में  हो  विश्व में  परदेश  में

होड़  भी हथियार  की ये हो नहीं  संसार  में

शांति का साम्राज्य होगा भूमि के हर देश में।


🪴शुभमस्तु !


२२.०६.२०२२ ◆१०.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।


दो - दो खरहे पाले 🐇 [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🐇 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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मैंने   दो  -   दो  खरहे   पाले।

आधे     गोरे    आधे   काले।।


घर  भर में   वे   दौड़  लगाते।

दिखते कभी कभी छिप जाते।

चिकने  बाल  सरकने  वाले।

मैंने   दो - दो   खरहे   पाले।।


सुबह  सैर  को मम्मी जातीं।

घास नोंचकर उनको लातीं।।

मैं  कहता  ले  खरहे  खा ले।

मैंने  दो  -  दो  खरहे  पाले।।


कूकर   बिल्ली  से  वे डरते।

दौड़ भागकर छिपते फिरते।।

बंद   किए   कमरे   के ताले।

मैंने  दो -  दो   खरहे   पाले।।


सब्जी  के  छिलके  तरबूजा।

खा   लेते   हैं  वे   खरबूजा।।

खाते   खीरा  बिना   मसाले।

मैंने   दो  -  दो  खरहे  पाले।।


शश की देखभाल हम करते।

नहीं किसी गृहजन से डरते।।

नाम   रखे   हैं    गोरे   काले।

मैंने   दो  -  दो  खरहे  पाले।।


🪴शुभमस्तु !


२१ जून २०२२◆१.४५

पतनम मार्तण्डस्य।

पावस ऋतु मनभावनी 🌈 [ दोहा ]


[पावस,बरसा,फुहार,खेत,बीज]

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✍️ शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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         🌳 सब में एक 🌳

आसमान नीला नहीं, छाए सित   घन   घोर।

रिमझिम पावस नाचती,गीत लीन पिक मोर।

पावस ऋतु झरझर करे, उधर विरह का नीर

विरहिन के दृग से झरे, टीस रही  उर  पीर।।


बाहर आ सखि देख तो,बरसा निर्मल नीर।

झुक-झुक बादल आ गए,कलरव करते कीर

प्यासी धरती देखकर,द्रवित हुए  घन  मीत।

बरसा जल आषाढ़ में,बढ़ी धरा  की  तीत।।


नन्हीं   बूँद फुहार  का, लेना   हो    आंनद।

चलो मीत  बाहर चलें,बरस रहे    घन  मंद।।

सखि फुहार बढ़ने लगी,चिपकी चोली देह।

बंद  करें अब झूलना,चलतीं हैं निज गेह।।


पावस ऋतु मनभावनी,शेष नहीं  अब  रेत।

बरस  रहे हैं मेघ  दल,भरते सरिता  खेत।।

सावन बरसा देखकर,मन में मुदित किसान।

खेत बने तालाब- से, छोड़ी  खाट  विहान।।


बोए बीज  किसान  ने, उर्वर  धरती  खेत।

हरे -हरे अंकुर खिले,सकल सघन समवेत।।

बीज-वपन की कामना, नारी - हृदय अधीर।

विकल प्रतीक्षा में बड़ी,मिटे गात की  पीर।।


      🌳 एक में सब  🌳

बरसा बादल खेत में,

                         पड़ती सघन   फुहार।

पावस  में   हलवाह   ने, 

                              बोए बीज   अपार।।


🪴शुभमस्तु !


२२.०६.२०२२◆०६.००

आरोहणम् मार्तण्डस्य।

टिप -टिप औलाती ⛈️ [ चौपाई ]

 

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✍️  शब्दकार ©

🌈 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्म'

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बरसे   पावस  के   घन प्यारे।

दिखते  नहीं   गगन  में तारे।।

टपक  रहे  हैं  छप्पर , छानी।

बरस  रहा  है  शीतल पानी।।


औलाती  से टिप -टिप झरता। 

वर्षा-जल भूतल  पर भरता।।

गिरती   धार  हाथ से  छूकर।

छिटक  गई है  गीली  भूपर।।


सस्वर    बूँदें   गीत   सुनातीं।

कानों को वे अतिशय भातीं।।

हैं  प्रसन्न    सारे   नर -  नारी।

जल थलचर खग प्रमुदित भारी।


आओ हम  सब  मोद  मनाएँ।

रवि-आतप अब क्या कर पाएँ

बैठे   हम   छप्पर   के   नीचे।

बिछा  खाट निज आँखें मीचे।


छिटक-छिटक कर बूँदें आतीं।

तन मन वसन भिगोकर जातीं।।

'शुभम्'  सुहाती  नम औलाती।

भूरे     घन    पावस  बरसाती।।


🪴शुभमस्तु !


२१ जून २०२२◆११.००आरोहणम् मार्तण्डस्य।

सोमवार, 20 जून 2022

तम के पास उजास 🪷 [ सजल ]


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समांत : आस ।

पदांत:  है।

मात्राभार :16.

मात्रापतन: शून्य।

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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सुर       गण     को    शुभदा  सुवास    है।

आती       उनको      सदा     रास      है।।


तामस        ग्राही      असुर   सदा      से,

सुमनों        में        लगती   कुवास     है।


अस्ताचल        में        रविकर      पहुँचा,

हयदल         खाए      तमस    घास     है।


भले       न      भाए      तम    को   सूरज,

हर     तम        के      पीछे    उजास   है।


एक     ओर      शव     जलें  चिता    पर,

उधर         जन्म      लेता    विकास    है।


साथ      -    साथ     उद्भव - विनाश   भी,

प्रकृति         का        अद्भुत   प्रयास    है।


'शुभम्'       पुतिन   के    संग  देश    कुछ,

जेलेंस्की         की      आस,   पास       है।


🪴 शुभमस्तु ! 


१९जून २०२२ ◆१०.४५पतनम् मार्तण्डस्य।

रविवार, 19 जून 2022

प्राकृतिक न्याय 🪴 [ गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बिना         भाव         साकार    न     होता।

शब्दों          का        आकार   न    होता।।


जननी          जनक       नहीं   यदि    होते,

संतति       का      आधार    न         होता।


कृत       पुण्यों     के     बीज   न    फलते,

भव   -    सागर      से     पार   न     होता।


सत         करनी       सुमनों  -   सी  महके,

क्या      मानव   -   आचार   न       होता ?


नहीं           वासना         होती    अतिशय,

मानव       भू       का      भार    न   होता।


होड़          लगी       आगे     बढ़ने     की,

ग्रीवा      में        शुभ     हार   न      होता।


'शुभम्'      प्रकृति       का   न्याय  बड़ा  है,

देश    -    देश      में     वार   न      होता।


🪴 शुभमस्तु !


१९ जून २०२२◆ ७.३०

 पतनम मार्तण्डस्य।

स्वर्ग का द्वार :पिता 🪷🪷 [ दोहा ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम् '

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प्रथम पता मेरे पिता, पावन मम    पहचान।

उऋण नहीं होना कभी, सागर,शृंग  समान।।

संस्कार शुभतम दिए,जनक 'शुभम्' सुत मूल

भले क्रोध  करते कभी,रहे सदा   अनुकूल।।


कभी न ऊँचे बोल में,बोला पितु के   साथ।

दृष्टि विनत मेरी रही,सदा झुका पद -माथ।।

पितृ- दत्त आदेश का,सदा किया   सम्मान।

वह अनुभव के  ग्रंथ थे,हित मेरे    वरदान।।


अश्रु पिता के नयन से,गिरे न 'शुभम्' समक्ष।

घर भर के आधार वे,गृह- वाहन  के अक्ष।।

जननी के दो चरण में,रहता स्वर्ग - निवास।

पिता द्वार उस स्वर्ग के,मत समझें  ये हास।।


दिया पिता ने प्यार जो, कौन करेगा   और।

नहीं अभावों में जिया,'शुभम्'पिता सिरमौर।

सूरज-से पितु गर्म थे, पर प्रकाश - भंडार।

उनके छिपते ही भरा, जीवन में  अँधियार।।


आज पिता की रश्मियाँ, देतीं सुखद प्रकाश।

ऊर्जा उनके नेह की,भरती'शुभम्' सु-आश।।

पितृ कर्म से कीर्ति का,ध्वज लहरा आकाश।

शक्ति,ज्ञान,सम्मान से,मिला 'शुभम्'मधुप्राश।


जीवन में सब कुछ मिला,मात पिता आशीष

जन्म-जन्म भूलूँ नहीं,'शुभम्'कृतज्ञ मनीष।।


🪴 शुभमस्तु !


१९जून २०२२◆१२.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...