मंगलवार, 5 जुलाई 2022

अरुन्धती का मंच 🪦 [ दोहा ]

  

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✍️ शब्दकार ©

🪦 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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दाँत  पड़ौसी  मीत   हैं, रसना के    बत्तीस।

 नित  करते  सहयोग  वे,रक्षा में  इक्कीस।।

कूट - पीस  कर खाद्य को,सदा सौंपते  दाँत।

रसना  रस  लेती  रहे,  नहीं रदन  की पाँत।।


दो  जबड़े  दो  गाल  भी,रसना के आवास।

दो अधरों का द्वार ये,रसिका को  है  रास।।

है अभेद्य मुख की गुहा,अरुन्धती का मंच।

नित स्वतंत्र बड़भागिनी, वक्ता वाचा पंच।।


स्वर्ग  नरक  की दायिनी,वाचा पढ़ती  मंत्र।

भीतर से हर कर्म का, चला रही निज तंत्र।।

कोकिल -सी रस घोलती, कभी टिट्टिभी एक

वीणा  बन  झंकारती,रसना साध    विवेक।।


किसी-किसी की मुखगुहा,में दो का सुखवास

दिखती है बस एक ही,करे जीभ   उपहास।।

लाल गाल पिचकें भले, रहती सदा  जवान।

रदन विदा भी हो चले,यौवन मत्त  ज़बान।।


हर  पल  रस में लीन है,संज्ञा रसा   सुनाम।

वाणी भाषा स्वाद में,निपुण करे बहु  काम।।

कुलटा  नेता की गिरा, गिरती आठों  याम।

कुलटा कुल की बोरनी,नेता निपट निकाम।।


सत्कवि वाचा मोहिनी,विकट विमल सत मंत्र

'शुभम्' सुहृद रस जानते, सुधरे विकृत तंत्र।।


🪴 शुभमस्तु !


०४.०७.२०२२◆१२.३० 

पतनम मार्तण्डस्य।


रविवार, 3 जुलाई 2022

कर्मों का वरदान चाहिए 🪷 [ सजल ]

 

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समांत: आन।

पदांत: चाहिए।

मात्राभार :16.

मात्रापतन: शून्य।

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✍️शब्दकार ©

🪷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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हर      मानव        को     मान      चाहिए।

जगती         में           पहचान   चाहिए।।


कर्म      नहीं          करना      नर   चाहे,

फिर      भी      ऊँची      शान     चाहिए।


जीभ           उगलती         है  चिनगारी,

जलवाने   को                  छान  चाहिए।


आग       देख        घी     लेकर     दौड़ें,

अंधे           भक्त          महान    चाहिए।


शब्द        नहीं        निकले    वाणी   से,

सुन    लें     फिर      भी    कान   चाहिए।


पीटें             ढोल         प्रशंसक     सारे,

स्वर       की      ऊँची      तान    चाहिए।


'शुभम्'   न     कोई    अति विशेष     है,

कर्मों            का         वरदान    चाहिए।


🪴 शुभमस्तु!


०३.०७.२०२२◆१०.१५

पतनम मार्तण्डस्य।


रसना - उवाच 🚨 [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🚨 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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एक   नहीं    अड़तीस    साथ  हैं,

रक्षक        सदा      सबल    मेरे।

कहते   हैं   सब       कोमल रसना,

दसों    दिशाओं         से      घेरे।।


हर  रस   को   चखती  रस लेती,

नहीं   किसी     से     मैं   डरती।

रुचिकर लगता  यदि  कलियों को,

अपनी     तृप्ति     पूर्ण    करती।।

सीमित   स्वाद   यहीं   तक सारा,

नहीं      उदर      में    है      तेरे।

एक   नहीं   अड़तीस    साथ  हैं,

रक्षक       सदा         सबल   मेरे।।


दो   कपोल       दो    जबड़े  देखो, 

दो        दीवारें         रद     बत्तीस।

बाहर      दो -  दो   अधर  रसीले,

गिनती      है        पूरी    अड़तीस।।

मुख  मंडल    के   बीच   छिपी   हूँ,

उदर     -       अंग      मेरे     चेरे।

एक      नहीं   अड़तीस    साथ   हैं,

रक्षक      सदा        सबल   मेरे।।


होती    हूँ     वाचाल    कभी   तो,

कुछ    भी    मैं     कह   जाती  हूँ।

लगे    किसी   को  बुरा - भला  तो,

सहन    नहीं       कर      पाती    हूँ।

कैकेयी    या   द्रुपद   -   सुता   हो,

सबने         उलट          दिए    भेरे।

एक    नहीं    अड़तीस    साथ   हैं,

रक्षक         सदा         सबल   मेरे।।


मैं      ही      गाती       गीत    रसीले,

मैं     कलहा     बन     कर    आती।

महाभारतों              की     रणचंडी,

रक्त        चाटने            छा   जाती।।

मुझसे     ही    शुचि   सुमन बरसते,

सुनते         कान        बिना     हेरे।

एक     नहीं     अड़तीस    साथ   हैं,

रक्षक        सदा         सबल    मेरे।।


मैं       वाणी      मैं     रसा,  रसज्ञा,

मैं    ही       रसिका ,    वाचा   हूँ।

जिह्वा ,  गिरा      कहो     या रसना,

करती    तिया       न     पाँचा  हूँ।।

'शुभम्'      रंग  -  रस     देती इतने,

इक्षु   - दंड       के       बिन    पेरे।

एक      नहीं       अड़तीस   साथ हैं,

रक्षक         सदा         सबल   मेरे।।


🪴शुभमस्तु !


०३.०७.२०२२◆३.१५ पतनम मार्तण्डस्य।

चपल है जीभ हमारी 🔴 [ बालगीत ]


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✍️ शब्दकार ©

🌹 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बड़ी  चपल  है जीभ  हमारी।

नहीं  किसी से रखती  यारी।।


सास - बहू को कभी लड़ाती।

आग   पड़ौसी से  सुलगाती।।

रहती   है   हर   पल   तैयारी।

बड़ी  चपल है जीभ  हमारी।।


फूल   सुंगंधित   ये  बरसाती।

नरक  घरों  में भी  बनवाती।।

छोटी ,कभी  पड़े अति  भारी।

बड़ी  चपल है जीभ  हमारी।।


कैकेयी  के  जीभ   न   होती।

सीता   नहीं वनों   में  सोती।।

होती क्यों रावण की  ख़्वारी।

बड़ी  चपल है जीभ  हमारी।।


नेताओं की   जीभ   निराली।

लाल नहीं होती  वह  काली।।

होती  विष - तलवार  दुधारी।

बड़ी चपल है जीभ  हमारी।।


महाभारती   एक   न   होती।

युग- युग में नित काँटे बोती।।

अब  देखो  है किसकी बारी।

बड़ी  चपल है  जीभ हमारी।।


🪴शुभमस्तु !


०३.०७.२०२२◆१०.१५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।


नेताओं की अनुप्रास 🌶️ [ गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🫑 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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रसा       रदन      के    आस - पास     है।

फिर   भी   क्यों    आती   न रास     है??


सास   -    बहू      में     मूल   रार     की,

घर    -   घर      फैली     बुरी   वास   है।


नित्य       देश      में     बोती     है   विष,

नेतागण         की        अनुप्रास         है।


गली       -   गली       में     खड़ी   द्रौपदी,

महाभारतों         का      विकास         है।


कैकेयी          के          निकट      मंथरा,

वन      में      खाता    राम   घास       है।


कह    कर     झट     घुस   जाती   भीतर,

अस्थिविहीना        शुद्ध     माँस         है।


कभी          नाक         पर    बैठा    देती,

कभी     नरक    का    गरल त्रास       है।


उलट    -    पलट        रुख   बदले   अपने,

कभी     तमस     निशि  का उजास       है।


'शुभम्'        जीभ      है    बहु    आयामी,

हर      क्षण       इसमें     समुल्लास   है।


🪴 शुभमस्तु !


०३.०७.२०२२◆९.४५ आरोहणम् मार्तण्डस्य।

बुरी न हो यदि सास 🏕️ [ दोहा गीतिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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दो कपोल बत्तीस द्विज,का सुदृढ़  आवास।

अस्थिहीन रसना रहे, करती जगत उजास।।


युगल अधर की ओट में,युगल रदन   दीवार,

पीछे  से  शर   मारती,  गिरा चटुल उपहास।


रसना  से  झरते कभी,सद पाटल  के  फूल,

कभी कलह-विष घोलती,घर में भरती त्रास।


रसिका  से  ही  नाक है,रसना से  यमलोक,

जो  इच्छा   हो  लीजिए, सदा तुम्हारे  पास।


रसना के कारण मिले, सादर सद   गलहार,

जूती  पड़े  कपाल  पर, आए किसको रास?


पांचाली  की गर्विणी,   गिरा गिरी ज्यों शैल,

रक्त बहा कुरुक्षेत्र में,उचित न था  ये  हास।


षटरस भाते जीभ  को, मीठा तीक्ष्ण कषाय,

हर रँग में  मदकामिनी,प्रिय है बद  वातास।


त्रेता द्वापर  ही  नहीं,कलयुग में   भी   रार,

कैकेयी की जीभ ने, दिया राम  -  वनवास।।


'शुभम्' नियंत्रण जीभ पर,करना ही है मीत,

बहू चाहती प्यार ही,बुरी न हो यदि  सास।।


🪴शुभमस्तु !


०३.०७.२०२२◆८.३० आरोहणम् मार्तण्डस्य।


शनिवार, 2 जुलाई 2022

जिह्वा - पुराण ! 🗣️ [ व्यंग्य ]

  

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 ✍️ व्यंग्यकार © 

 🗣️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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 परदे के पीछे रहकर भी बड़े - बड़े काम किए जा सकते हैं।किए जा रहे हैं, पहले भी किए जाने का लंबा इतिहास रहा है।इससे कोई ज्यादा अंतर नहीं पड़ता कि चीज कितनी बड़ी अथवा छोटी है।भीमकाय मनुष्य भी एक नन्हीं-सी चुहिया नहीं मार पाता और नन्हीं सी पिपीलिका भी हाथी को चिंघाड़ भरने के लिए पर्याप्त है।बात परदे के पीछे छिपकर कार्य करने की है। 

 प्रकृति ने जितनी भी चीजों का निर्माण किया है ,उनके सबके ही नकारात्मक औऱ सकारात्मक दोनों ही पहलू हैं।अब मुँह के भीतर दो गालों ,बत्तीस दाँतों और दो मजबूत जबड़ों के बीच बहुमुखी प्रतिभा की धनी, हर समय रस से सनी,प्रेम के लाल रंग से बनी- ठनी,अस्थि हीन ,लचीली ,रबर की तरह कभी छोटी कभी तनी :जीभ की ही बात करते हैं। 

 ये मत समझिए कि ये बहुत छोटी है ,क्या कर सकेगी। इसकी क्षमता अपार है।ये कभी रस - भरी है , कभी तलवार का प्रहार है।जहाँ ये निवास करती है; वह कभी नरक का द्वार है तो कभी स्वर्ग का सार है। बात केवल उसके प्रयोग की शैली की है। एक लोक प्रचलित दोहा इस प्रकार कहा गया है :

 काने तें कानों कहौ,कानों जागौ रूठ। 

 हौले - हौले पूछिओ,गई तेरी कैसें फूट।। 

 जीभ को अनेक नामों से संबोधित किया जाता है।जैसे रसना,रसज्ञा, रसिका, रसा ,रसेन्द्रिय, जिह्वा, अरुन्धती, वाचा ,वाणी,गिरा,जबान, आदि। नाम के अनुसार ही उसके अनेक गुण भी हैं।जहाँ रस की बात आती है ,ये स्वाद लेने के लिए विख्यात है।इसे खट्टे, मीठे ,तीखे,नमकीन, कड़ुए, कसैले सभी प्रकार के रसास्वादन में आनन्द आता है।दूसरी ओर ये मीठा या कडुवा बोलकर देश ,समाज या व्यक्ति व्यक्ति में क्या से क्या कर डालती है।महाभारत का युद्ध एक नारी की जीभ के कारण ही अठारह अक्षौहिणी सेना, हाथी ,घुड़सवारों आदि के विनाश का कारण बन गया।इस प्रसंग से भला कौन अनभिज्ञ है ? वही बात आती है कि 'काने तें कानों कहौ' तो बुरा मानना (कानों जायगौ रूठ) तो स्वाभाविक है ,फिर उसका दुष्परिणाम भुगतना भी स्वाभाविक ही है। कौन किस सीमा तक जाकर विनाश को दावत दे सकता है ,ये कौन जानता है भला? यही जीभ जब मीठा बोल बोलती है ,तो मानो फूल झड़ते हैं। अमृत की वर्षा ही होती है। मीठा बोलने से बड़े से बड़े असाध्य काम भी सहज साध्य हो जाते हैं। दूसरी ओर बड़ी बड़ी ठगियाँ भी होती हुई देखी जाती हैं।इसका एक नाम 'जबान' भी है, तो इससे यह भी ध्वनि आती है कि ये सदा जवान ही रहती है। कभी बूढ़ी नहीं होती। 

 जीभ की अनेक विशेषताओं में यह भी कि इसकी रचना अति साधारण होते हुए भी जटिल है। इसमें अस्थि या हड्डी जैसी वस्तु नाम मात्र को भी नहीं होने के कारण इसका लचीलापन इसका विशेष चमत्कारिक गुण बन जाता है। चूँकि इससे हम सभी बोलने का काम लेते हैं, तो यदि कोई कही हुई बात का परिणाम हमारे विपरीत होता हुआ दिखाई देता है ,तो ये अवसर देखकर पलट भी जाती है। लचीली जो है।इसे झूठ या सच से कोई मतलब नहीं है ,ये आप जानो, आपका मन जाने, आप ही भुगतो। ये तो बस कहकर तुरंत भीतर घुस जाती है।

 रहिमन जिह्वा बाबरी,कहि गई सरग पताल। 

 आपु तो कहि भीतर रही,जूती खात कपाल।

 रस औऱ विष की एकसाथ वाहिका रसना देवी तेरी महिमा अपरंपार है।तेरे ऊपर नियंत्रण एक हाथी पर अंकुश के नियंत्रण की तरह है।जैसे एक बिगड़ा हुआ अनियंत्रित हाथी सदैव विनाश ही करता है,वैसे ही तू भी परिवार,समाज और देश का विनाश ही करती है। बोलने वाली जीभ चाहे आदमी की हो या औरत की, उस पर नियंत्रण का चाबुक चलना ही चाहिए। बिगड़ैल बोल कभी किसी का भला नहीं कर सकते।युग -युग से बिगड़ैल जीभों की यही कहानी चली आ रही है।राजनेताओं की बिगड़ी हुई ज़बान हमेशा से कीचड़ उछालने में पारंगत रही है। चौराहे से चौपालों तक, रेडियो से टीवी चर्चाओं तक, यहाँ तक कि सारे समाज में राजनेताओं की जीभ की दुर्गंध विष के बीज बोती हुई प्रदूषण को बढ़ावा दे रही है। देश के वही कर्णधार यदि देश को आग से बचाना चाहते हैं ,तो क्या यह कभी सम्भव हो सकता है।बड़बोले पन के समर्थक लोग ,अंधे भक्त, चमचे आदि सभी आग में घृत छिड़काव की नहीं,घृत वर्षा के बड़े -बड़े काले बादल लेकर आ रहे हैं, विषैली वाणी की घृत -वर्षा कर रहे हैं। इनके जाने देश जाए भाड़ में , पर उन्हें गलत जीभों का सबल समर्थन करना है ,तो करना है। सच को स्वीकार करने में इनकी नाक जो कटती है।इसलिए झूठ पर मक्खन लगाकर प्रस्तुत किया जाता है ,किया जा रहा है।एक छोटी -सी ज़हरीली जीभ कितने घातक कांड करवाने की उत्तरदायी है, जाना नहीं जा सकता । पूर्वानुमान नहीं किया जा सकता।इसीलिए तो कहा है : 

 सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात असत्यम प्रियम। 

 🪴शुभमस्तु ! 

 ०२.०७.२०२२◆३.००पतनम मार्तण्डस्य।


              

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...