शनिवार, 6 अप्रैल 2024

सजीव अंगारा [ व्यंग्य ]

 166/2024

             

©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

   आग की सामान्य प्रकृति है : जलाना।उसके समक्ष जो भी वस्तु आती है या लाई जाती है ;वह उसे जलाकर राख कर देती है।अंगारा ,चाहे उपले का हो ,कोयले का हो ,लकड़ी का अथवा किसी अन्य वस्तु का हो ; वह किसी अन्य वस्तु को जलाता ही है।अंगारे द्वारा किसी वस्तु को जलाने के सम्बंध में एक विशेष बात भी है। वह यह है कि किसी अन्य को जलाने से पहले वह स्वयं जलकर खाक हो जाता है;राख हो जाता है।

अंगारा केवल उपले,लकड़ी,कोयले आदि निर्जीव वस्तु का ही नहीं होता।मनुष्य एक सचेतन, सजीव, साक्षात  और साकार अंगारा है।वह चाहे जिस वस्तु को जलाए,किन्तु सबसे अधिक किसी को जलाता है ,तो भी मनुष्य ही है। दूसरे को अंगारे से जलाने का अकाट्य सिद्धांत सौ में से सौ  टका यहाँ भी काम करता है कि वह जलाने से पहले स्वयं आत्माग्नि में जलकर राख हो लेता है।अब ये अलग बात है कि वह चाहे पड़ौसी हो ,जो अपने पड़ौसी से जलता है ; कोई नेता हो जो अपने प्रतिद्वंद्वी नेता है जलता है ,कोई कर्मचारी या अधिकारी हो जो अपने निकटस्थ कर्मचारी या अधिकारी  से जलता है, कोई दुकानदार हो जो अपने जैसे दुकानदार से जलता है; व्यापारी हो जो अन्य व्यापारी से जलता है; कोई देश हो जो पड़ौसी देश से जलता है ,कोई मित्र हो जो अपने ही मित्र से जलता है; कोई रिश्तेदार हो जो अपने रिश्तेदार से जलता है।जलने का पात्र कोई भी और कहीं भी हो सकता है। जब कोई किसी से जलता है ; तो यही कहा जाता है कि अमुक अमुक से जलता है।

इस जलने के अनेक कारण हो सकते हैं।धन,पद,सत्ता,उन्नति,यश आदि अनेक उत्प्रेरक कारक हैं,जो किसी को जलाने में सहायक सिद्ध होते हैं।कभी - कभी बिना कारण भी लोग दूसरों से जलते हैं।आनन्द की बात ये है कि जलने वाला अपना ही खून जलाकर राख और कोयला बनाता है। वह अपने किसी प्रतिद्वंद्वी का बाल भी बाँका नहीं कर पाता। इसके बावजूद वह जले जा रहा है ,रात-दिन जले जा रहा है। जिसे देखकर या लक्ष्य करके एक 'सुपात्र व्यक्ति'  अपने तन और मन को अंगारा बनाता है,उस तक तो कभी- कभी इस बात की हल्की सी लपट भी स्पर्श नहीं कर पाती कि कोई उससे जल रहा है। इसीलिए यह कहावत बनी है कि ' जलने वाले जला करें ,किस्मत हमारे साथ है।'

   कहावत यह भी है कि 'हाथी अपने रास्ते पर चलते चले जाते हैं और कुत्ते भौंकते रह जाते है।' देश और समाज में ऊपर से नीचे तक 'जलना' एक अनिवार्य  प्रक्रिया है।इससे नेता,मंत्री,अधिकारी,सामान्य जन कोई भी अछूता नहीं है।थोड़ी परिष्कृत हिंदी में इसी 'ज्वलन भाव' को ईर्ष्या भी कहा जाता है। मानव मन में प्रेम,ममता, स्नेह,दया,करुणा जैसे मनोभावों के साथ - साथ कुछ  मनोविकार भी उसका पीछा नहीं छोड़ते। जैसे क्रोध,घृणा,ईर्ष्या आदि।मनुष्य नहीं  चाहता कि कोई उससे ऊपर हो।वह हर क्षेत्र में शीर्ष पर  रहना  चाहता है। किंतु चाहने भर से कोई ऊँचा नहीं बन सकता।

यह 'जलन' ही है कि 'माता न कुमाता पुत्र कुपुत्र भले ही' (मैथिलीशरण गुप्त) वाली सौतेली माता ही अपनी सौतेली संतान से जलन के कारण जहर भी दे देती है।उस समय उसका मातृत्व और ममत्व क्यों मर जाता है? पड़ौसी से जलता हुआ एक पड़ौसी उसके घर में आग लगा कर उसे स्वाहा कर देता है। नेता प्रतिपक्षी नेता पर मिथ्या दोषारोपण करके उसे कारागार की हवा खाने को विवश कर देते हैं।राजीनीति की रोटियाँ ही ईर्ष्याग्नि के आवे पर सेंकी जाती रही हैं। कहीं कुछ बदला नहीं है। यह परस्पर जलने की प्रक्रिया दिनोंदिन तेज होती जा रही है।

ईर्ष्या की आग में भले ही लपटें नहीं उठतीं, भले ही प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देती ,किन्तु धुँआ तो उठता ही है;जिससे सारा वातावरण विषाक्त हो जाता है।स्वयं जलकर दूसरे को कष्ट देने और हानि पहुंचाने का 'विशेष गुण' भले ही अमानवीय कहा जाए,किन्तु अस्तित्व में तो है ही। इससे नकारा नहीं जा सकता।सम्भव है कि 'जलन' का यह दुर्भाव कीड़े -मकोड़ों, पशु -पक्षियों ,जलचरों, नभचरों आदि में न हो। यदि उनमें भी यह होता तो मनुष्य न बन जाते? इसका अर्थ यह भी हुआ कि 'जलन' किंवा 'ईर्ष्या' मनुष्य का एक दानवीय अनिवार्य तत्त्व है। 

आज दुनिया के मनुष्य समाज में 'जलन' की यह दुर्भाग्यपूर्ण आग निरंतर जंगल की आग की तरह बढ़ रही  है। रूस और यूक्रेन  तथा इसराइल और फिलिस्तीन के युद्ध इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।यह 'जलन' ही वह दावाग्नि है जो मानव को पशुता नहीं, दानवता की ओर ले जा रही है।शांति के समर्थकों को कमजोर,डरपोक और कायर समझा जाता है।बारूद के ढेर पर बैठी हुई मानवता इस 'जलन' की  अग्नि में जलकर कब राख हो जाएगी; कहा नहीं जा सकता। निरंकुश और विपक्ष रहित शासन की मंशा के मूल में भी यही आग है।अपने को सर्वेसर्वा ,सर्वश्रेष्ठ और सबसे बुद्धिमान मानने का अहं उन्हें पतनोन्मुख कर रहा है ,जिससे निस्तारण का कोई उपाय नहीं है।

हम तो यही चाहेंगे और कहेंगे:

सर्वो    भवन्तु     सुखिनः,   सर्वे    संतु  निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित दुःख भाक भवेत।


शुभमस्तु !


06.04.2024●10.45आ०मा०

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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2024

चमचा [बाल गीतिका]

 165/2024

              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चमचे  का  भी  बड़ा   काम   है।

सुर्खी    में   नित   छपे  नाम है।।


कोई     आगे        कोई     पीछे,

रहने     देता    नहीं    आम   है।


जिसके  पास  न   चमचा   कोई,

लगती   उसको    सदा  घाम  है।


चमचा     चाटे    नित्य   भगौना,

भरे    तिजोरी    स्वर्ण  दाम   है।


झंडा     लेकर     चलता    आगे,

लेता  एक न   पल    विराम   है।


लोकतंत्र    का    खंभा    चमचा,

पड़ा   धूप   में   चर्म     श्याम  है।


चमचा    बिना   न    नेता   कोई,

नहीं  आज   तक   बना   राम है।


मतमंगों के   साथ     रात - दिन,

खाक   छानता   गाम - गाम   है।


'शुभम्'   छिपा   चमचागीरी   में,

पद  पाने  का   सुलभ   बाम  है।


शुभमस्तु !


05.04.2024● 11.15आ०मा०

एक आदमी [बाल गीतिका]

 164/2024

          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

 

 हमने  पाला   एक   आदमी।

बड़ा   निराला  एक  आदमी।।


कहता   पूरब   जाता   पश्चिम  ,

भीतर    काला   एक आदमी।


बतलाता  ये   आँखें     दर्पण  ,

चोटी   वाला   एक    आदमी।


कहता  मैं   गंगा  - सा  पावन,

लगता  नाला   एक   आदमी।


बात - बात  में  कसमें  खाता,

माला  वाला    एक   आदमी।


चलता-फिरता एक   लतीफा,

धुत  नित हाला एक आदमी।


'शुभम्' पहेली चलती -फिरती,

अटक निवाला  एक  आदमी।


शुभमस्तु !


05.04.2024●9.00आ०मा०

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पथरीला यथार्थ [अतुकांतिका]

 163/2024

              

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अपने भीतर

छिपाए रखना,

सच न बोलना,

निज जीवन में

विष न घोलना,

जगत ये विषमय पूरा।


झूठों का संसार 

रुपहला,

झूठा ही

नहले पर दहला,

सच पोथी की बात

अलग कुछ,

सच का होता

नित प्रति चूरा।


आदर्शों  से

चले न जीवन,

पथरीला यथार्थ का

उपवन,

मुँह में राम

बगल में छूरा।


खेत धर्म का

नागफनी उगती है

जिसमें,

राजनीति की बाड़ कँटीली,

फूल रही है रंग-बिरंगी

आग -बबूला।


'शुभम्' सत्य से दूर 

रहा जो,

दिखता है वह

 फला-फूलता,

भले हस्र 

जो भी हो उसका,

चिंता किसको 

केवल वर्तमान ही

सब कुछ

वही है धुला दूध का।


शुभमस्तु !


04.04.2024●6.30प०मा०

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बुधवार, 3 अप्रैल 2024

कृषक फसल खलिहान [ दोहा ]

 162/2024

       

[फसल,किसान,चैत,खलिहान,मिट्टी]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                   सब में एक

कृषक  उगाता अन्न फल,शाक ईख बहु दाल।

जीवनदाता फसल  से ,कृषि का करे कमाल।।

जीवनदात्री  देश को, फसल सभी   अनमोल।

कृषक नित्य पोषण करे,जय जलधर की बोल।।


स्वेद बहाता रात-दिन,कृषि हित एक किसान।

मिले न  उसको देश में,समुचित नित सम्मान।।

सदा  अभावों  में  रहा, जीता   एक किसान।

श्रम के बदले कब मिला,उसको जग में  मान।।


चैत   मास  में  अन्न   की,छाई  हुई   बहार।

प्रमुदित सभी किसान  हैं, हर्षमग्न परिवार।

चैत मधुर मधुमास है,सुमन खिले चहुँ ओर।

पिक भौंरे तितली सभी, नाच रहे वन   मोर।।


चना मटर  गोधूम  की, पकी  फसल को  देख।

कृषक मुदित खलिहान में,उदित भाग्यलिपि लेख।

कृषि-श्रम का परिणाम है,फसल भरा खलिहान।

जुटे  कृषक निज कर्म में, प्रभु  का शुभ  वरदान।।


मिट्टी   से  सोना  उगे, अन्न दुग्ध फल    शाक।

श्रमकर्ता  फल  पा  रहे,  अन्य  रहे हैं   ताक।।

मिट्टी में  हर  रंग  है ,श्वेत   हरा  या    लाल।

सभी  सुगंधें    मोहतीं,  करती   मृदा कमाल।।


                     एक मे सब

चैत मास अति मोद में,फसल रखी खलिहान।

मिट्टी ने  सोना  दिया, हर्षित  सभी   किसान ।।


शुभमस्तु !


03.04.2024●7.15आ०मा०

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रंग के संग [गीतिका]

 160/2024

                  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रंग  के  संग  में    खेलतीं   होलियाँ।

नृत्यरत कसमसाती हैं  हमजोलियाँ।


रात  आधी  हुई  बाग  महका  बड़ा,

पेड़  महुआ  करे  खूब  बरजोरियाँ।


टेसू   गुल  की  छाई   हुई  लालिमा,

मोर  के   संग में   नाचती  मोरियाँ।


चैत्र  लगते  तपन  देह  में अति बढ़ी,

भानु की चढ़ गईं भाल की त्यौरियाँ।


रंग   की   मार  की  तीव्र  बौछार है,

अंग आँचल  छिपाए  फिरें  गोरियाँ।


ये  पाटल उठा   सिर  प्रमन   झूमते,

गोप ग्वाले  कसे   झूमते   कोलियाँ।


रंग  उत्सव - समा   सराबोर  रंग से,

'शुभम्'क्यों चुभेंगीं शब्द की गोलियाँ!


शुभमस्तु !


01.04.2024●8.30 आ०मा०

रंगोत्सव होली [सजल]

 159/2024

           

समांत :इयाँ

पदांत : अपदांत

मात्राभार :20

मात्रा पतन: शून्य। 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


रंग  के  संग  में    खेलतीं   होलियाँ।

नृत्यरत कसमसाती हैं  हमजोलियाँ।


रात  आधी  हुई  बाग  महका  बड़ा,

पेड़  महुआ  करे  खूब  बरजोरियाँ।


टेसू   गुल  की  छाई   हुई  लालिमा,

मोर  के   संग में   नाचती  मोरियाँ।


चैत्र  लगते  तपन  देह  में अति बढ़ी,

भानु की चढ़ गईं भाल की त्यौरियाँ।


रंग   की   मार  की  तीव्र  बौछार है,

अंग आँचल  छिपाए  फिरें  गोरियाँ।


ये  पाटल उठा   सिर  प्रमन   झूमते,

गोप ग्वाले  कसे   झूमते   कोलियाँ।


रंग  उत्सव - समा   सराबोर  रंग से,

'शुभम्'क्यों चुभेंगीं शब्द की गोलियाँ!


शुभमस्तु !


01.04.2024●8.30 आ०मा०

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...