सोमवार, 31 मई 2021

धरती माता धन्य तू! 🌳 [ दोहा -ग़ज़ल ]

  

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 ✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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धरती   माता  धन्य  तू, हम तेरी   संतान।

लेती  पहले अंक   में,ममता, धीर  महान।।


सहती कितने कष्ट माँ, भरे न फिर भी आह,

धरती सबको धारती, हम सबको वरदान।


अन्न, दूध, फ़ल, फूल का,माँ अवनी भंडार,

तुझसे ही जीवन मिला,देती माँ  तू   ज्ञान।


पर्वत, सागर, झील,सर,भरे तरल  तालाब,

गंगा, यमुना, सिंधु में,कर्ता  का  अभिमान।


वृक्षों    पर  कलरव करें,कोयल,तोते, मोर,

गौरैया  घर  में  करे,चूँ - चूँ  का  शुभ  गान।


वन  में   चीता,  शेर हैं, भालू, हाथी,  गौर,

गाय, भैंस  सब गाँव में,देते पय का दान।


गेहूँ,  जौ, तिल, चणक के, लहराते  हैं  खेत,

सरसों  पीली नाचती,मह-मह अरहर,  धान।


गेंदा, बेला, चाँदनी, खिलते कमल,गुलाब,

जूही, रानी रात  की, धरती  के  अहसान।


'शुभम'धरा का प्यार पा,जीता मानव मात्र,

उऋण नहीं होना कभी,आन मान शुचि शान


🪴 शुभमस्तु !


३१.०५.२०२१◆१.०० पतनम मार्तण्डस्य।

ग़ज़ल 🌴

  

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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बदला  - बदला   जहां  लगता है।

इंसाँ   अपना    कहाँ    लगता है।।


वीरानगी   का   है  आलम शहर में,

आदमी      दोमुहाँ        लगता  है।


गीत     गाती     न   कोयल सुरीले,

बेजुबां        बागवां      लगता   है।


पीले   पत्तों   का   झरना   है  जारी,

हर    शजर   खामखाँ   लगता   है।


तारे      आँखें     दिखाने   लगे   हैं,

अश्क  भर    आसमां    लगता   है।


न       दरिया   में    पहली   रवानी,

ताल     सूखा     वहाँ    लगता  है।


'शुभम'   रब    छिपा     तू  कहाँ  पर,

रेत     जैसा       यहाँ      लगता  है।


🪴 शुभमस्तु !


३०.०५.२०२१◆२.००पतनम मार्तण्डस्य।

बहाना कोरोना का 🌸 [ कुंडलिया ]


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✍️शब्दकार©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                         -1-

मानव  को मृत देखकर, मानवता की मीच।

आई  बाहर  कलुष की,काली -मैली कीच।।

काली - मैली  कीच, देख जग काँप  रहा  है।

मुख  पर लगा लगाम, यंत्रणा-जहर बहा है।।

'शुभम' बिना  ही  सींग, देश में उमड़े  दानव।

खाते  जीवित  माँस, आज के काले मानव।।


                         -2-

मानव  से  विश्वास  का, टूट गया  है   बाँध।

नर  ही  नर  को खा रहा, नहीं रहा  है  राँध।।

नहीं   रहा   है   राँध,  निकाले  गुर्दे   आँखें।

बना जंगली  श्वान,मिटी मानव  की  साखें।।

'शुभम' दहलते प्राण,देख मानव का ये ढव।

वह नर है अज्ञान, कहे जो इसको  मानव।।


                         -3-

मानव की पशुता निकल,आई बाहर  आज।

कठिन परीक्षा ले रहा,समय सदा सरताज़।।

समय  सदा  सरताज़, बहाना कोरोना  का।

गिरी मनुज पर गाज, हिए में भाला भौंका।।

'शुभं'पतन का काल,मनुजता का उठता शव

बिलख रहे 'घड़ियाल',देहधारी जो मानव।।


                         -4-

मानव  सत्ता-लालची,पल - पल  करे प्रपंच।

आश्वासन -भाषण बहे, चढ़- चढ़ ऊँचे मंच।।

चढ़- चढ़  ऊँचे  मंच, मात्र कीचड़ की होली।

मधुवत मीठे बोल,स्वाद की शोधित  गोली।।

'शुभम'आड़ का खेल,शेष है कागा का रव।

शिक्षित बेचें तेल, आज का धोखा मानव।।


                         -5-

मानव  की मत कीजिए,सूरत से  पहचान।

सींग  लुप्त हैं शीश में,बनें नहीं  अनजान।।

बनें  नहीं  अनजान, आपदा -अवसरवादी।

लगा मुखौटे चारु,पहनकर तन  पर खादी।।

'शुभम' नष्ट  विश्वास, लगी नगरों में है दव।

दो पग दो कर धार नहीं अब साँचा मानव।।


🪴 शुभमस्तु!


२९.०५.२०२१◆४.४५पतनम मार्तण्डस्य


मेरा देश महान! 🎯 [ दोहा ]


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✍️ शब्दकार ©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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कोरोना  कलि - काल में,चले यास  तूफ़ान।

कफ़न ख़सोटी नर करे,सजी कफ़न दूकान।।


मानव की यह आपदा, दानव को  वरदान।

माँस ,रक्त खा - पी   रहे, मेरा देश महान।।


मानवता की लाश पर, शैया सजा 'सुजान'।

डूब  रहे   हैं  ऐश   में, मेरा  देश   महान।।


बिलख रहे रोते स्वजन,भयाक्रांत श्मशान।

अंधे   बहरे    लूटते,   मेरा  देश    महान।।


चील  गिद्ध  नर वेश में,कोल डिपो की खान।

ब्लैकमेल  शव  को  करें, मेरा देश  महान।।


आँखों  से   नर   भेड़िया,नेता जैसे  कान।

मानव  के   शव प्रिय उसे,मेरा देश  महान।।


मनुज - परीक्षा  की घड़ी,नहीं रहा  पहचान।

जितना    चाहे  लूट  ले,  मेरा देश    महान।।


सभी   मुसीके  में  छिपे,कंडू, कोदों,  धान।

ज़हर - दान अहि कर रहे,मेरा देश महान।।


करदाता  की  जेब पर,डाका सरल सुजान।

बिना  किए  घर भर रहे,मेरा देश   महान।।


दया, शांति ,करुणा  मरी,पैसा ही  भगवान।

जैसे    चाहो    लूट   लो ,मेरा  देश   महान।।


मानवता   मृत   प्राय है,मानव है    अज्ञान।

दानव    भूखा   भेड़िया,  मेरा  देश  महान।।


🪴 शुभमस्तु !


२९.०५.२०२१◆२.३० पतनम मार्तण्डस्य।

कविता कैसी हो! 🏄‍♀️ [ अतुकान्तिका ]

 

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✍️ शब्दकार©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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शब्दकोश के सागर में जा

पाहन - से रंग बिरेंगे

शब्द खोजकर 

कविता कामिनि को 

सज्जित करना

उचित कहाँ तक!

भावों के अनुरूप

शब्द ही उचित सदा ही।


हो जाता रसभंग 

वहीं जब पढ़ते-पढ़ते 

पाठक की गति में

अवरोधक आए!

छोड़ पठन रचना का

कर शब्दकोश ले

अर्थ खोजने में खो जाए!


रसराज शृंगार 

रस के कोण  - उभार

न रस दे पाएँ!

रस पाने की लालसा

भटक -अटक जाए!

फिर कैसे कोई 

उसको कविता बतलाए!


लगी होड़ जब

केशव कालिदास बनने की

कबिरा सूर बिहारी तुलसी भी

पीछे हट जाएँ ,

 बेचारे क्या कर पाएँ!


रसानुकूल हो

शब्दों का विन्यास,

कवि का सफ़ल प्रयास,

न हो कुछ भी सायास,

वही  कविता 

काव्य- रसिकों में 

गई सराह,

चले जो अपनी सच्ची राह।


शिल्प औऱ भाव

सहज संकल्पित भरित प्रवाह

सरितवत कलकल

 स्वर उत्साह,

वही करती पाठक 

श्रोता में लय गति का

अवगाह।

वही है 'शुभम' 

सत्य सुंदर शिवता की थाह।

करता है हर पाठक

वाह! वाह !! वाह!!!


🪴 शुभमस्तु !


२०.०५.२०२१◆४.३०पतनम मार्तण्डस्य।

धरती पर क्यों आया बंदे!🏵️ [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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धरती   पर   क्यों  आया बंदे!

निज   कर्तव्य    निभाना  है ।

शूकर, गर्दभ    ,श्वान   बना है ,

 मनुज    नहीं    रह    पाना है।।


नहीं  भूलना  मात -पिता  को,

जिनने  तुझको  जन्म   दिया।

उस धरती  माँ  को  मत  भूले,

जिसने  अपने   अंक  लिया।।

गुरुजन  देते    ज्ञान  सदा  ही,

मस्तक    उन्हें    झुकाना   है।

धरती  पर   क्यों  आया  बंदे!

निज   कर्तव्य    निभाना  है।।


क्षिति जल पावक गगन वायु से,

निर्मित  होते   तव   तन- मन।

उनका  ऋणी  सदा ही रहना,

दूषित मत करना कन -कन।।

बिना  शुल्क  के  तुझे पालते,

उनका   कर्ज़    चुकाना    है।

धरती   पर  क्यों  आया  बंदे!

निज  कर्तव्य    निभाना   है।।


कर्मों   के  फ़ल  से मिलता है,

किसी जीव   को  मानव तन।

नर - देही  की  लाज  बचाना,

यही धर्म का   शुभ   साधन।।

बिना धर्म पशु, कीट, कीर तू,

सदा   धर्म     अपनाना   है।

धरती   पर   क्यों  आया बंदे!

निज   कर्तव्य   निभाना  है।।


प्रभु कर्ता  ने  जोड़-जोड़ कर,

अंग -  देह का  सृजन  किया।

जो प्राणों  को  तन  में भरता,

तूने   उसका  भजन किया ??

उस अंशी का   अंश  मात्र तू,

आत्मज्ञान   भी    पाना   है।

धरती पर    क्यों   आया बंदे!

निज  कार्यव्य   निभाना  है।।


देश,समाज और परिजन सब,

करते    हैं       तेरा     पोषण।

तुझे   कृतज्ञ  रहना आजीवन,

कभी  नहीं   करना  शोषण।।

प्राणों की भी  आहुति   देकर,

तुझको   देश     बचाना    है।

धरती  पर  क्यों  आया   बंदे!

निज  कर्तव्य   निभाना   है।।


कर्मयोनि    मानव    की  बंदे,

सदा   कर्म   शुभ  ही करना ।

'शुभम'बुरे कर्मों से निशिदिन,

हे मानव ! तू   नित   डरना।।

भोगयोनि है  पशु - पक्षी  की,

पशु न कीट   बन  जाना है।

धरती पर  क्यों  आया  बंदे!

निज   कर्तव्य  निभाना है।।


🪴 शुभमस्तु !


१९.०५.२०२१◆८.४५पतनम मार्तण्डस्य।

पाहन-सा घिस-घिस है जाना ! 🎄 [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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पाहन-सा घिस-घिस है जाना।

अपना  दृढ़ कर्तव्य  निभाना।।


जीवन की  सरिता  है  चालू।

घिस-घिस पाहन बनते बालू।

सरिता  का  सौंदर्य  सजाना।

पाहन-सा घिस-घिस है जाना।


लुढ़क  रहे    हैं   धीरे -  धीरे।

कुछ मँझधार पड़े कुछ तीरे।।

बढ़ने का  हर  पल  है  ठाना।

पाहन-सा घिस-घिस है जाना।


कितने  सागर  तक  जा पाते।

बालू बन  कुछ भवन बनाते।।

चलना!चलना!चलना! जाना

पाहन-सा घिस-घिस है जाना।


मानव  बनता   जाता  पाहन।

करता  पाप  व भरता आह न।

मकड़ी   जैसा   ताना - बाना।

पाहन-सा घिस-घिस है जाना।


पाहन   नहीं  पिघलते  पाया।

घिस जाने पर लघुतम काया।

सरिता  के  सँग  गाए  गाना।

पाहन-सा घिस -घिस है जाना।


'शुभम' सीख   बालू  से लेता।

नहीं   बैठकर    अंडे   सेता।।

जग में  जगता  मधुर  तराना।

पाहन-सा घिस-घिस है जाना।


🪴 शुभमस्तु !

१७.०५.२०२१◆२.००पतनम

मार्तण्डस्य।


किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...