शुक्रवार, 27 जून 2025

शव सरिता में नहीं बहाएँ [बालगीत]

 289/2025




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शव     सरिता    में    नहीं   बहाएँ।

पावन    सरिता     सभी     बनाएँ।।


गंगा     यमुना      सरयू      बहतीं।

मौन  धरा   पर   कलकल  कहतीं।।

दूषण    से    हम     उन्हें   बचाएँ।

शव   सरिता   में     नहीं     बहाएँ।।


संक्रामक    रोगों       से     मरता।

रोग     फैलता     जीवन   हरता।।

कैसे       कोई       वहाँ     नहाएँ।

शव   सरिता   में   नहीं    बहाएँ।।


कफ़न  फूल क्यों   जल   में  डालें।

दूषण से   क्या    नाम   कमा  लें??

आड़   धर्म   की    कभी   न  लाएँ।

शव    सरिता  में     नहीं     बहाएँ।।


सबसे    उत्तम      मृतक    जलाएँ।

भले    नदी     में    खूब     नहाएँ।।

मल -  मल   साबुन   नहीं    लगाएँ।

शव    सरिता   में    नहीं     बहाएँ।।


आओ    इस  पर    आज    विचारें।

सरिताओं    के       दोष     सँवारें।।

डालें     नहीं   मृतक   पशु    गायें।

शव   सरिता    में    नहीं    बहाएँ।।


शुभमस्तु !


27.06.2025●9.30 आ० मा०

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मच्छर हमें नहीं भाते हैं [ बालगीत ]

 288/2025


       

© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मच्छर       हमें     नहीं   भाते    हैं।

दंशित  हो    हम   खुजलाते     हैं।।


मिलें    गंदगी     में     वे      सारे।

नाले     में      पनपें       बजमारे।।

तन    को    काट     सुजाते      हैं।

मच्छर     हमें     नहीं   भाते    हैं।।


नहीं    गंदगी     करनी     घर    में।

रखें  स्वच्छता   ज्यों    मंदिर    में।।

मलेरिया     ज्वर  वे      लाते     हैं।

मच्छर   हमें     नहीं     भाते     हैं।।


अंधकार       में    पनपा     करते।

पड़ें    रसायन    कभी   न  मरते।।

बारह       मास        सताते      हैं।

मच्छर    हमें    नहीं     भाते    हैं।।


कुछ    ऐसा     अभियान    चलाएँ।

मच्छर रहें    न      हमें       सताएँ।।

पीते         रक्त          सिहाते     हैं।

मच्छर  हमें     नहीं      भाते     हैं।।


मच्छरदानी       भले           लगाएँ।

अंदर   तक   मच्छर    घुस   जाएँ।।

लगता     वे       गीत     सुनाते   हैं।

मच्छर     हमें      नहीं    भाते   हैं।।


शुभमस्तु !


27.06.2025● 9.00आ० मा०

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वासना का खेल [अतुकांतिका]

 287/2025


            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


वासना बलि

माँगती है,

मिल भी रही है,

उसके लिए

कोई जिंदगी

कुछ भी नहीं है।


वासना का खेल

एक सौदेबाजी है,

इस हाथ ले

उस हाथ दे।


वासना का 

बाजार लगा,

दूल्हे नहीं

प्रेमी मिलते हैं।


वासना के 

बाजार में

सब कुछ नकद 

उधार कुछ भी नहीं।


सच को भला 

कौन स्वीकारता 

है यहाँ

प्रेम की चिड़िया

उड़ गई

बहुत पहले।


वासना का खेल

अक्लवन्द खेलते हैं

और मूर्ख ठगे

जाते हैं।


शुभमस्तु !


26.06.2025● 9.15 प०मा०

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छिलका नहीं सड़क पर डालो [बालगीत]

 286/ 2025



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप  'शुभम्'


छिलका   नहीं  सड़क    पर डालो।

रपटे     कोई    उसे     बचा   लो।।


सभी    घरों     में     केले     आते।

बड़े  प्रेम   से       परिजन   खाते।।

घर    पर     कूड़ेदान    बना    लो।

छिलका  नहीं  सड़क   पर  डालो।।


छिलके   पर    जब   पैर    पड़ेगा।

मुख  के   बल    गिरकर   रपटेगा।।

अपना        शिष्टाचार     सँभालो।    

छिलका    नहीं  सड़क  पर डालो।।


अपने   जैसा     समझो    सबको।

गिरते  हो   तब   भजते    रब को।।

संतति  को    यह   पाठ  पढ़ा  लो।

छिलका  नहीं  सड़क  पर   डालो।।


जब  गाड़ी    कचरे    की   आती।

गाना    गाकर     तुम्हें    बुलाती।।

कूड़ेदान           उठाओ     लालो।

छिलका  नहीं  सड़क पर  डालो।।


स्वच्छ    घरों     में    हैं    भगवान।

स्वच्छ  रहे    वह    मनुज  महान।।

मानव  जीवन  स्वच्छ   बिता  लो।

छिलका  नहीं   सड़क  पर डालो।।


शुभमस्तु !


26.06.2025●4.30 प०मा०

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बुनकर बया सीख सिखलाती [बालगीत]

 285/2025

  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बुनकर   बया   सीख    सिखलाती।

स्वच्छ   रखें   घर    पाठ   पढ़ाती।।


तिनका  -   तिनका  जोड़    बनाए।

लिए   स्वच्छता    नीड़     सजाए।।

यही    सत्य      सबको   बतलाती।

बुनकर  बया   सीख   सिखलाती।।


यद्यपि       छोटा     गेह      बनाएँ।

मिलजुल    कर   दंपती    सजाएँ।।

प्रेम भाव      जीवन    में     लाती।

बुनकर बया   सीख   सिखलाती।।


होता     है    जब   सघन    अँधेरा।

पड़े      जरूरत       करे    उजेरा।।

जुगनू  से    उजास     कर    पाती।

बुनकर  बया सीख    सिखलाती।।


दुश्मन  से    परिजन    की   रक्षा।

बया सिखाती  है   वह     शिक्षा।।

काँटों  के    समीप   बस   जाती।

बुनकर  बया  सीख  सिखलाती।।


आओ   हम    भी   गेह   सजाएँ।

बया  विहग से    कुछ   तो पाएँ।।

नहीं  किसी  को   कभी  सताती।

बुनकर बया  सीख  सिखलाती।।


शुभमस्तु !


26.06.2025●3.30 प०मा०

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समय -समय पर बाल कटाएँ [बालगीत]

 284/2025


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


समय  - समय     पर  बाल  कटाएँ।

अधिक    नहीं     नाखून    बढ़ाएँ।।


बाल - वृद्धि     की   सीमा    होती।

नहीं    चैन    की    माला    पोती।।

केश    लता -  से   क्यों    लहराएँ।

समय - समय  पर  बाल   कटाएँ।।


छोटे     बाल    शीघ्र   धुल   जाते।

नहीं    साँप - से     वे      गहराते।।

नर    -  नारी    का   भेद   मिटाएँ।

समय -  समय   पर  बाल कटाएँ।।


तेल     डालते       धूल   पकड़ते।

असमय झड़ें   कभी  वे   पकते।।

गर्दन   से   वे  सट   -  सट जाएँ ।

समय  -समय पर  बाल   कटाएँ।।


उलझ - उलझ   कर   हमें  सताते।

लंबे  बाल       मुश्किलें      लाते।।

आधा     एक    इंच    रह    जाएँ।

समय - समय पर    बाल  कटाएँ ।।


नहीं     बाल       जो     कटवाएँगे।

नाई       भूखे     मर        जाएँगे।।

अगर  बढ़े    हों    तुरत    सिधाएँ।

समय -  समय पर  बाल   कटाएँ।।


शुभमस्तु !


26.06.2025●1.15 प०मा०

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गंगा यमुना शुचि सरिताएँ [बालगीत]

 283/2025

             

    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



गंगा    यमुना      शुचि    सरिताएँ।

इनकी     रक्षा      करें      बचाएँ।।


मूर्ति     पूजते        हिंदू       सारे।

करें   विसर्जन     नदी     किनारे।।

नहीं    नदी    में     उन्हें    सिराएँ।

इनकी      रक्षा     करें      बचाएँ।।


रंग     रसायन    जल   में   घुलते।

मछली  मेढक     कछुए     मरते।।

जल जीवों    के  प्राण   न   जाएँ ।

इनकी     रक्षा      करें      बचाएँ।।


सरिता    जल   पीते    नर - नारी।

विष  से  फैल      रहीं     बीमारी।।

नहीं  लाश     सरि -  नीर    बहाएँ।

इनकी      रक्षा     करें      बचाएँ।।


धोएँ     नहीं     वस्त्र   भी   गदले।

अगर  नहीं  मानव  जो    सँभले।।

असमय    मरें      और    पछताएँ।

इनकी    रक्षा        करें     बचाएँ।।


सरि    का    मैल   सिंधु  जो पाए।

दूषण    से    खारी    हो     जाए।।

आओ      सागर    मधुर    बनाएँ।

इनकी     रक्षा      करें      बचाएँ।।


शुभमस्तु !


26.06.2025●11.45 आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...