शुक्रवार, 27 जून 2025

वासना का खेल [अतुकांतिका]

 287/2025


            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


वासना बलि

माँगती है,

मिल भी रही है,

उसके लिए

कोई जिंदगी

कुछ भी नहीं है।


वासना का खेल

एक सौदेबाजी है,

इस हाथ ले

उस हाथ दे।


वासना का 

बाजार लगा,

दूल्हे नहीं

प्रेमी मिलते हैं।


वासना के 

बाजार में

सब कुछ नकद 

उधार कुछ भी नहीं।


सच को भला 

कौन स्वीकारता 

है यहाँ

प्रेम की चिड़िया

उड़ गई

बहुत पहले।


वासना का खेल

अक्लवन्द खेलते हैं

और मूर्ख ठगे

जाते हैं।


शुभमस्तु !


26.06.2025● 9.15 प०मा०

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