गुरुवार, 22 अक्तूबर 2020

आदमी का मापन [ अतुकान्तिका ]


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✍️ शब्दकार ©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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बचपन की

आँखों में

भविष्य की चमक,

यौवन में

आज के

वर्तमान की हनक,

वृद्ध देखता है

मुड़ -मुड़कर

पीछे की छुन -छुनक।


यौवन को

कहते हैं अंधा,

उसे तो चाहिए

बस आज का ही

मजबूत कंधा,

न इधर 

न उधर ,

कैसे देखेगा ?

गिरा तो गिरा 

कैसे सँभलेगा?

उठा तो उठा

फिर क्या कहना!


बूढ़े की पहचान:

अतीत में समाई

रहती है जान,

यदि देख ले वर्तमान

या भविष्य की ओर,

जीवन अमृत हो जाये!


अपनी ही बनाई

रील को

उलट -पलटकर

देखता है,

बीते दिनों की

रंगीनियों में

सुख ढूँढ़ता है,

भविष्य में

निराशा औऱ तम,

बस भ्रम ही भ्रम,

जरा -जरा सा 

कर दे,

यही तो जरा है,

कमी है इतनी,

कि वह 

अभी नहीं मरा है,

किन्तु उसका

राग -रंग 

खट्टा -मीठा अनुभव

ताजा और हरा है,

इसी से तो 

वह वृद्ध 

जिंदा रहा है !


कुछ भी 

नहीं है स्थाई,

न बचपन,

न यौवन,

न बुढापा,

वक्त ने

अपने ही पैमाने से

आदमी को नापा!

फिर क्या खुशफ़हमी

क्या स्यापा?


💐

 शुभमस्तु !


23.10.2020◆ 6.15अपराह्न।

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