रविवार, 29 जून 2025

धूप धरा का शुभ वरदान [बालगीत]

 296/ 2025


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


धूप     धरा   का     शुभ    वरदान।

सूरज      दादा      बड़े      महान।।


जाड़ों   में     हम      धूप    सेंकते।

गर्म     रजाई         दूर      फेंकते।।

जीवन      देती      मातु     समान।

धूप   धरा    का    शुभ    वरदान।।


धूप   निकलती    विशद   उजाला।

करता  भू    पर    खेल    निराला।।

खेत     बाग   वन     या     मैदान।

धूप  धरा   का       शुभ   वरदान।।


जेठ  मास   में   सही   न   जाती।

झुलसें    पेड़    कली   मुरझाती।।

बहे  पसीना    श्रमिक    किसान।

धूप  धरा     का   शुभ   वरदान।।


शुल्क     नहीं   किंचित   लेता    है।

फिर   भी  भानु    धूप     देता   है।।

समझो     करो    नहीं     अपमान।

धूप   धरा    का     शुभ    वरदान।।


धूप    स्वच्छता  तन    में    लाती।

दूषण   में        पावनता    भाती।।

दिन  में   धूप   करे    निज    गान।

धूप  धरा    का    शुभ     वरदान।।


शुभमस्तु !


28.06.2025●7.00आ०मा०

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यह वसुधा भू माँ कहलाती [बालगीत]



295/ 2025


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


यह    वसुधा   भू   माँ    कहलाती।

वैसा    ही       दायित्व    निभाती।।


जब  हम     जन्मे     गोद    उठाए।

हुआ -  हुआ  कर  हम   चिल्लाए।।

अपनी  रज    को    हमें    लगाती।

यह  वसुधा   भू   माँ     कहलाती।।


सबसे     पहले     लाड़     लड़ाए।

रोए    जाएँ       तो       बहलाए।।

चुप जा - चुप जा  कह   मुस्काती।

यह  वसुधा  भू    माँ    कहलाती।।


धरती  को   हम    स्वच्छ   बनाएँ।

झाड़ -  पौंछ   कर   के  चमकाएं।।

पल  भर को   भी   नहीं   सताती।

यह  वसुधा    भू  माँ    कहलाती।।


खोदें      गर्त        कूप     बनवाएं।

माटी      खोदें     उसे       सताएँ।।

तो  भी    मौन     रहे  सह   जाती।

यह  वसुधा   भू  माँ     कहलाती।।


धरती   की    हम    संतति   सारी।

स्वच्छ     रखें    यह    जिम्मेदारी।।

बढ़ता  भार    न    कभी   अघाती।

यह  वसुधा    भू  माँ     कहलाती।।

शुभमस्तु !

28.06.2025● 6.00आ०मा०

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शुक्रवार, 27 जून 2025

जहाँ- जहाँ पर मानव जाए [ बालगीत ]

 294/ 2025

        

 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जहाँ -  जहाँ    पर   मानव   जाए।

कचरा     वहाँ  -   वहाँ     फैलाए।।


हों     पर्वत    की    ऊँची     वादी।

सागर   बीच     खोज    आजादी।।

पॉलीथिन        रैपर       छितराए।

जहाँ  - जहाँ  पर    मानव   जाए।।


हिलकोरे     सागर      में    भरता।

खाता  -  पीता  उछल   विचरता।।

नहीं      हरकतों     में      शरमाए।

जहाँ - जहाँ   पर   मानव    जाए।।


पानी    की       बोतलें     फेंकता।

नग्न  देह   से    नयन     सेंकता।।

मुंबई     गोवा      बीच     सिधाए।

जहाँ  - जहाँ    पर    मानव  जाए।।


अल्कोहल   की     शीशी   खाली।

रम ह्विस्की   से  शान   सजा  ली।।

नैतिकता     चूल्हे        में     जाए।

जहाँ -  जहाँ   पर   मानव   जाए।।


आती   हैं    जब    सिंधु    सुनामी।

तब न   सोचता    मानव    कामी।।

बला  अन्य  के   सिर   पर   लाए।

जहाँ -  जहाँ    पर    मानव  जाए।।


शुभमस्तु !


27.06.2025●3.00प०मा०

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ऊँचे गिरि रत्नाकर सारे [ बालगीत ]

 293/ 2025


       ऊँचे गिरि रत्नाकर सारे

                  [ बालगीत ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


ऊँचे       गिरि      रत्नाकर     सारे।

जन - जीवों     के    रक्षक   प्यारे।।


पर्वत    पर    जब     कोई    जाएँ। 

वहाँ   न  कचरा    तनिक   गिराएँ।।

वे     हैं     सारे      मनुज     सहारे।

ऊँचे       गिरि     रत्नाकर    सारे।।


उच्च     हिमाचल     वर्षा    लाता।

औषधि    का    भंडार    सजाता।।

लगते     निकट     वहाँ   से   तारे।

ऊँचे    गिरि      रत्नाकर     सारे।।


उगते     वहाँ     बूटियाँ     तरुवर।

जग में वह   कहलाता    गिरिवर।।

छोटे -  बड़ें    अन्य    गिरि     हारे।

ऊँचे     गिरि     रत्नाकर     सारे।।


करें    स्वच्छता    और    सफाई।

दूषण  की   मत   फटके    काई।।

पिकनिक  मना न   गदला  ला रे।

ऊँचे     गिरि     रत्नाकर     सारे।।


गिरिवर  -  से    ऊँचे    बन   जाएँ ।

जब  ऊँचे   कुछ    काज   कराएँ।।

सरिता  स्रोत     नहीं   जल   खारे।

ऊँचे     गिरि     रत्नाकर      सारे।।


शुभमस्तु !


27.06.2025●2.15प०मा०

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करें वनों की हम रखवाली [ बालगीत ]

 292/2025

  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करें   वनों    की   हम     रखवाली।

बन   पेड़ों  के     सब    वनमाली।।


प्रकृति   सब    पेड़ों    को    बोती।

धरती   पर      हरियाली      होती।।

होती    है    छवि    सुघर  निराली।

करें    वनों   की    हम   रखवाली।।


फल    औषधियाँ    हमको    देते।

कंद- मूल   वन     पादप     जेते।।

गाते  खग   पल्लव     दें     ताली।

करें  वनों  की    हम    रखवाली।।


जीव  - जंतु        बहुतेरे      होते।

माँद  बनाकर  सुख   से    सोते।।

नहीं     चलाएँ    वहाँ     दुनाली।

करें  वनों   की   हम   रखवाली।।


सघन    वनों    से   वर्षा    होती।

बूँद  -बूँद  अमृत    कण   बोती।।

भरी  रहे     कुदरत   की   थाली।

करें  वनों  की  हम    रखवाली।।


आओ    हम   सब    वृक्ष  लगाएँ।

प्रकृति  के  संग  कदम    मिलाएँ।।

रहे  न    कोई       मानव    खाली।

करें  वनों    की   हम    रखवाली।।


शुभमस्तु !


27.06.2025 ●1.45 प०मा०

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पानी को यों व्यर्थ न करना [बालगीत ]


291/ 2025

 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पानी   को   यों   व्यर्थ   न   करना।

पड़े     जरूरत     उतना    भरना।।


सूखे    कूप   न     नल   में   पानी।

इनकी     बीती    हुई      कहानी।।

बचे   हुए    सर     सरिता   झरना।

पानी  को   यों   व्यर्थ   न   करना।।


पीते      कम      फैलाते     ज्यादा।

लगता    अच्छा      नहीं     इरादा।।

पानी   बिना    न    जीवन    तरना।

पानी  को   यों   व्यर्थ    न  करना।।


सब   मर्सीबिल     चला    रहे    हैं।

बेमतलब    जल    बहा   रहे    हैं।।

भैंस    लोरतीं     खुला     विचरना।

पानी   को   यों   व्यर्थ   न  करना।।


बोतल     में     पीते     हो    पानी।

भूल    गए    क्या   बात   पुरानी।।

पानी   बिना  न      जीवन   हरना।

पानी   को   यों   व्यर्थ   न  करना।।


बूँद -  बूँद    की     कीमत   होती।

मानव  जाति  बिना   जल   रोती।।

भावी से   क्या   तुम्हें   न  डरना ??

पानी    को    यों   व्यर्थ न करना।।


शुभमस्तु !


27.06.2025●11.30आ०मा०

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[1:54 pm, 27/6/2025] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

नदियों में क्यों खुलते नाले [ बालगीत ]

 290/2025


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नदियों    में   क्यों    खुलते    नाले!

सरिता   जल   हैं     काले - काले!!


मानव   को   क्यों  समझ  नहीं  है।

जो   करते  वह   सभी  सही  है ??

जैसे  भी     निज    काम  निकाले।

नदियों   में    क्यों    खुलते   नाले।।


हो    प्रयाग    मथुरा   या   दिल्ली।

शहर  आगरा   की   हर    बिल्ली।।

मैला     सकल     नदी    में   डाले।

नदियों    में    क्यों   खुलते  नाले।।


चमड़ा    जहर     रसायन    पानी।

नहीं  कहीं कुछ    भी   निगरानी।।

पावनता    पर       पड़ते     ताले।

नदियों   में  क्यों     खुलते   नाले।।


नदियों      को      कहते    माताएँ।

दूषित    करते      खूब     निभाएं।।

पड़े      हुए      आँखों  पर    जाले।

नदियों    में    क्यों   खुलते   नाले।।


करते     क्या     उपदेशक      सारे।

बने     हुए   हैं       सब      बेचारे।।

स्वयं  ढले    जनता     को     ढाले।

नदियों    में    क्यों   खुलते  नाले।।


शुभमस्तु !


27.06.2025●10.00आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...