रविवार, 27 मई 2018

माँ

माँ    की    ममता
कोई    न    समता
आजीवन     कोई
उऋण  न   बनता।

तू       ही      थी
इसलिए  तो मैं हूँ
तेरा    ही    एक
पदचिन्ह तो मैं हूँ।

तेरे    बिन   क्या
कुछ    है     मेरा
तेरा ही अस्तित्व
बिखेरा।

 जन्म      दिया
सह कष्ट हज़ारों
पाला      पोसा
दिवस   हज़ारों।

गिना   न    तूने
दिवस    न रातें,
अब    तो   बस
तेरी   ही    बातें।

रह -    रह      याद
सताती           तेरी
सजल      नयन हैं
स्मृति           तेरी।

जन्म -   जन्म  में
तुझसे        जन्में
सब         सद्गुण
मम तनमन पनपें।

मेरी       प्रथम   गुरु
तू                अम्मा
कर्मठ            बनूँ
सद्ज्ञान      सुकर्मा।

भगवत   तेरा   सुत
इस       जग     में
"शुभं"       कर्मरत
जीवे     भव     में।

सदा     रहे    सिर
आशीष        तेरा
तू   मेरी     अम्मा
मैं      सुत   तेरा ।।

💐शुभमस्तु!
©✍🏼डॉ.भगवत स्वरूप "शुभम"

शनिवार, 26 मई 2018

दुनिया एक ड्रामा है

ये    दुनिया    एक      ड्रामा    है,
चाहिए    सबको    बस   नामा है।
सब    रंगमंच   के     ऊपर   हैं,
कोई आसमान  कोई   भूपर  हैं।
कोई नायक  है   कोई खलनायक,
कोई   निर्देशक   कोई   है गायक।
कोई   फुलस्टॉप  कोई   कॉमा है,
बदले रंग     बदले     जामा    हैं।
ये दुनिया...
कोई   हँसता   है   कोई    रोता है,
कोई  खाता  है  कोई    बोता   है।
मुँह से  कहता    कुछ  और  बोल,
चाहता  हृदय   कुछ  और   तोल।
नर  देह    मगर   मन   वामा   है,
बाहर सित   अंदर    श्यामा    है।
ये दुनिया ....
कोई  नेता   है   कोई   अभिनेता,
निज हुनर का  सत्त्व  सदा  लेता।
कोई  व्यापारी   कोई  व्यभिचारी ,
कोई तांत्रिक मांत्रिक   अभिचारी।
सबका   इक लक्ष्य     दिखाना  है,
इस जग   जगती से   कमाना   है।
कुछ करो   कहो    बस हाँ-हाँ है,
ऐसे     कर्तव्य       निभाना     है।
हर    चेहरा    एक    मुखौटा   है,
नेता   बेपेंन्दे   का      लोटा    है।
जिस   ओर पेंदे   का वजन  बढ़े,
उस ओर 'सुजन'के  चरण   पड़े।
जातियों  में    देश   बंटवाना  है,
चाहे फिर गुलाम   हो   जाना है।
ये दुनिया....
वस्त्रों     के   ऊपर     देशभक्ति,
मुख में अमृत  वही   पूर्ण   तुष्टि।
जनता   को    मूर्ख    बनाना  है ,
खुद  मोरी   से   बच   जाना   है।
नाटक    का      ताना -बाना   है,
सबने   मन   में   ये     थाना  है।
ये दुनिया...
चिड़िया  चरित्र   की   रही  नहीं,
वह उड़कर किस दिशि ओर गई।
क्या    नौकरशाही    क्या   नेता,
थोड़ा    देकर       ज्यादा   लेता।
"शुभं"   रामराज्य  यूँ   लाना  है,
चाहे फिर गुलाम  बन  जाना है।
ये   दुनिया       एक    ड्रामा   है,
चहिए   सबको   बस   नामा   है।
शुभमस्तु!
✍डॉ. भगवत स्वरूप"शुभम"

समय और सत्य

     पल -पल हम ही बीतते,
     कहते      बीता    काल।
     समय  वहीं है  था जहाँ ,
     विकट  समय -संजाल।।
                   
     समय  खड़ा   हम दौड़ते,
     गिरते ,     मरते      रोज़।
     हमें   बिताने    की  घड़ी ,
     की   होनी      है   खोज।।
                     
    झूठी   ये    घड़ियाँ  सभी ,
    जो कहें समय   की चाल।
    समय   कभी चलता नहीं,
    हम   चलते     लय-ताल।।
 
   आते -  जाते     हैं     हमीं,
   समय    न     आए   जाय।
   सूरज  चाँद    सदा    वहीं ,
   हम   जीवें     मर    जायँ।
 
    समय  सत्य है  और सब,
    मिथ्या     झूठ     असार।
    काल   सदा   स्थिर  रहा,
    गतिमय   जगत   निसार।।

    पड़े   प्रेम    में  जब युवा,
    युवती     पहली      बार।
    धरती  पर  उनने   किया,
    प्रेम   यह    पहली   बार ।।

    स्वाभाविक   यह  भूल  है,
   लगे   उन्हें    निज     प्रेम ।
   अरबों   ने   पहले    किया,
    वही     प्रेम    का    फ्रेम।।

   सबको लगता   प्रेम  निज,
   मौलिक    पहला     प्यार।
   नवीकरण    करता    रहा,
   यह         सारा      संसार ।।

    ऐसे  जग   के    प्रेम   के ,
    साक्षी        तारे       चाँद।
    लगे   प्रेमियों    को   यही,
    ऐसी   महक     न     नाद ।।

   'कोई   न   जाना  सत्य यह,
   जो    मैं      जाना     आज।'
   मानव   की   यह   भूल  है,
   अहंकार     का         ताज।

   मतलब   हमें    न   सत्य से,
   यह     विवाद     का    मूल।
  "मेरा सत्य"      बचा      रहे ,
   कोई  गिरे    भाड़  या  धूल ।।

   'मैं '  'तू' का      आधार   ही ,
    कलह ,     युद्ध,       संघर्ष।
    होती    हत्या    सत्य     की,
   मिटता     उर      का     हर्ष।।

   'जो   मैं   कहता    सत्य   है',
   सत्य     कहा     ना     जाय।
  पूँछ  पकड़   कर   झूठ   की ,
   ये        मानव         इतराय।।

'परम् सत्य'    'मम सत्य '   का ,
सारा        यहाँ           विवाद।
'मेरा सत्य'        असत्य     की,
 परिभाषा        -        सम्वाद।।

तेरे      मेरे         सत्य       के ,
न्यायालय         में          वाद।
'परम् सत्य'      से    दूर    जो,
बढ़ते        नित्य         विवाद ।।

छाया   सत्य   न   बन    सके,
नर    -   नारी     की      मित्र।
हम   ही   छाया     सत्य   की ,
"शुभम"   जगत     के      चित्र।।

इति शुभम।
✍🏼डॉ. भगवत स्वरूप"शुभम"

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने
नदी बह रही है,
बहते -बहते कुछ कह
रही है,
कभी कलकल
कभी हलचल
कभी समतल प्रवाह ,
कभी सूखी हुई आह,
नदी में चल रही हैं
कुछ नावें,
अरे आप भी
कुछ समझें
कि सब कुछ
हमीं बतावें,
नदी कभी सूखी है,
कुछ नावें सुखी
कुछ दुःखी हैं,
पानी भी नहीं है
नाव में कभी कभी
पर नावें चल रही हैं,
अपनी मंजिल
पर बढ़ रही हैं,
बिना पानी के ही
लोग गोते लगा रहे हैं,
हँस रहे नावों के
गीत गा रहे हैं,
नावों पर फहरा रहे हैं
कुछ झंडे,
मतवाले मस्ती में
मुस्टंडे,
अपना झंडा लिए
जयकारे लगा रहे,
दूसरी नाव पलटने
की होड़ मचा रहे।

आने वाली है बरसात
मेढ़क उछलने लगे हैं,
कभी नदी में कभी
बाहर मचलने लगे हैं,
मछलियां बेचारी लाचार हैं
बिना पानी जीना दुश्वार है,
पर नावें नदी में
चली जा रही हैं,
हवा के रुख को
भांपने लगे हैं जीव,
जिनकी अपनी नहीं
है कोई नींव ,
और किनारे पर
स्थित मैं देख
रहा हूँ,
ये नदी
ये नावें ,
ये उछलते
हुए मेढ़क,
तड़पती सिसकती मछलियां
और नावें चली जा रही हैं
चलती चली
जा रही हैं,
अनिश्चित भविष्य की ओर,
न जाने कब हो अपनी भोर।

और मैं किनारे पर भौंचक
खड़ा सारा दृश्य
देख रहा हूँ ,
देखे जा रहा हूँ।
क्योंकि मेरी आसक्ति
न नदी के अंधे प्रवाह में है
और ही झंडे वाली नावों में।

शुभमस्तु
✍🏼डॉ. भगवत स्वरूप "शुभम"

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...