सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

जेलेंस्की रणधीर 🔱 [ दोहा गीतिका ]

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🔱 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

युद्ध नाम है नाश का ,नहीं शांति का नाम।

रूसी  यूक्रेनी  लड़े,  हुआ  न युद्धविराम।।


धोखा  दे भड़का दिया, अमरीका  ने  देश,

चार  कदम  पीछे हटा, वादा किया  हराम।


वादा  अपना भूलकर, भड़काई  है  आग,

लड़ो, लड़ो , लड़ते रहो,नहीं हमारा  काम।


अहंकार  विस्तार का, पाले पुतिन  सरोष,

कूद  पड़े  मैदान   में , होती धूम-धड़ाम।


साहस का प्रतिमान हैं,जेलेन्स्की रणधीर,

नहीं छोड़ना देश को, नहीं छोड़ना   धाम।


देशभक्त   रणबाँकुरे,   यूक्रेनी नर  -  नारि,

देश  बचाने  के  लिए ,दौड़े किया प्रणाम।


गोले, तोप,मिसाइलें,सुलगी भीषण  आग,

त्राहि -त्राहि मचने लगी,हुए विधाता  वाम।


पुतिन आज बहरा हुआ,देता बात न  कान,

संहारक  दानव  बना, धमकी का   पैगाम।


'शुभम' ईश रक्षा करें, दुनिया में  हो शांति,

युद्धों का होता नहीं,कभी भला  परिणाम।


🪴शुभमस्तु !

२८.०२.२०२२◆४.४५

पतनम  मार्तण्डस्य।


सजल 🌻

  

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

समांत : ऊला।

पदांत : न होता।

मात्राभार :16.

मात्रा पतन: शून्य।

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

✍️शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

समय  सदा अनुकूल न  होता

जीवन-पथ नित फूल न  होता


बाधाओं   से   हार    न   मानें

हर  बाधा  में   शूल  न   होता


कर्मठता  में  लक्ष्य    छिपा  है

फल  कर्मों  का  धूल  न होता


मुखड़ों  से मत  धोखा  खाना

हर मुखड़े  पर ऊल   न  होता


वसन-वसन का पृथक मोल है

अवगुंठन  मुख - झूल न होता


कितने   पादप   और   लताएँ 

हर  पादप में   मूल   न   होता


'शुभम' चुभन  देने   वाला हर

मानव शूल   बबूल   न   होता 


ऊल =उल्लास।

मुख-झूल= मुख पर झूलता हुआ वस्त्र।



🪴 शुभमस्तु !


२८.०२.२०२२◆८.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।

कर्मठता में लक्ष्य 🪴 [ गीतिका ]

 

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

✍️शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

समय  सदा अनुकूल न  होता।

जीवन-पथ नित फूल न  होता।।


बाधाओं   से   हार    न   मानें,

हर  बाधा  में   शूल  न   होता।


कर्मठता  में  लक्ष्य    छिपा  है,

फल  कर्मों  का  धूल  न होता।


मुखड़ों  से मत  धोखा  खाना,

हर मुखड़े  पर ऊल   न  होता।


वसन-वसन का पृथक मोल है,

अवगुंठन  मुख - झूल न होता।


कितने   पादप   और   लताएँ ,

हर  पादप में   मूल   न   होता।


'शुभम' चुभन  देने   वाला हर,

मानव शूल   बबूल   न   होता। 


ऊल =उल्लास।

मुख-झूल= मुख पर झूलता हुआ वस्त्र।



🪴 शुभमस्तु !


२८.०२.२०२२◆८.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।

शनिवार, 26 फ़रवरी 2022

घूँघट - पट की ओट [ दोहा ]

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🧕🏻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

मुख का दर्पण देख कर,होता हर  अनुमान।

दोष औऱ गुण झाँकते,मुख मन की पहचान।


हाव -भाव मुख आँख के,होते हैं  सब  दृष्ट।

उन्हें  छिपाने  के लिए,करता घूँघट    कष्ट।।


जितना छिपे छिपाइए,कर घूँघट  की ओट।

घूँघट-पट में क्यों छिपे,युगल नयन की चोट।


कलिका आधी हो खिली,नहीं बनी हो फूल।

जिज्ञासा  बढ़ती  रहे,आकर्षण  का   मूल।।


नर की कपट-कुदृष्टि से, बचना सदा सकार।

अवगुंठन  झीना  करे,नारी कृत   उपचार।।


नारी  की  रक्षार्थ  ही,नर  का अविष्कार।

घूँघट मुख की ढाल है,नहीं समझना  भार।।


नारी  कोमल फूल है,पुरुष वर्ग   है   भृङ्ग।

अवगुंठन  की कल्पना, देख न होना  दंग।।


घूँघट के इतिहास का,किया 'शुभम' ने शोध।

चलते  में गिरती नहीं,जागृत है  ये  बोध।।


भावों  की रँगरेलियाँ, घूँघट पट की  ओट।

बाहर  ही आती  नहीं,ढूँढ़ें मिले  न   खोट।।


चूड़ी,पायल,माँग की,विविध रूपिणी खोज।

नर ने  नारी के लिए,आनन किया  सरोज।।


नयन बाण आघात का,खतरा भारी   जान।

अवगुंठन से ढंक दिया,नारी-मुख शुभमान।।


🪴 शुभमस्तु !


२६.०२.२०२२◆१०.३०आरोहणं मार्तण्डस्य।


शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2022

सरकारी संत 🐧 [ कुंडलिया ]


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

                        -1-

हम  सरकारी   संत  हैं, रहना हमसे    दूर।

उपदेशक हम  ज्ञान के,करने को  मजबूर।।

करने को  मजबूर,  मलाई आश्वासन   की।

तुम्हें  चटाते  खूब, मिठाई निज भाषन की।।

'शुभम' न  हमको पाप,झूठ की हम बीमारी।

पहले अपनी जाति, संत हैं हम  सरकारी।।


                        -2-

कोई   भी   जाने नहीं, हम सरकारी    संत।

अवगुण  के भंडार हम,धारण पाप  अनंत।।

धारण पाप अनंत, समझना मत हम भोले।

अभिनेताई    नित्य,  बोलते  हैं   अनतोले।।

'शुभम' भिड़ेगा कौन,बुद्धि जिसकी हो सोई।

शिक्षा  से हम  दूर, नहीं समता  में   कोई।।


                         -3-

सरकारी   तालाब   में, मछली हैं    भरपूर।

हर छोटी को खा रही, मछली बड़ी  अदूर।।

मछली  बड़ी  अदूर,चाहते हम  ही जीना।

पीते रक्त अबाध, तानकर अपना   सीना।।

'शुभम'बहाना स्वेद, आम जन की लाचारी।

चाहें धन,पद, मान,  संत   सारे  सरकारी।।


                         -4-

दिन -दिन  तेरे  कान  में,मंत्र फूँकते    संत।

भेजे चुन तालाब में,बहु घड़ियाल सु - दंत।

बहु घड़ियाल सु-दंत,व्यर्थ है पढ़ना   सारा।

बिना पढ़े हर साज,मिला है हमको   प्यारा।।

'शुभम' त्याग स्कूल,रहो नोटों को गिन- गिन।

निखरे तेरा ओज,मंत्र तू जप ले दिन -दिन।।


                         -5-

धुले -  धुलाये  दूध के,सब सरकारी   संत।

आदर्शों  की  लीक पर,चलना ही  है  पंत।।

चलना ही है  पंत,दिखावट विज्ञापन  - सी।

चमक-दमक है बाह्य,विधाता के सर्जन-सी

'शुभम' न आते पास,कभी वे बिना   बुलाए।

सब  सरकारी  संत,  दूध के धुले - धुलाये।।


🪴 शुभमस्तु !


२५.०२.२०२२◆३.०० पतनम मार्तण्डस्य।


गुरुवार, 24 फ़रवरी 2022

समय ⏳ [अतुकान्तिका ]


■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

⏳ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

लौट कर

आता नहीं

समय

जो चला गया,

जिसने न समझा

मूल्य उसका

अपने ही हाथों

छला गया,

समय को करने वाला

बरवाद 

किया  है सदा

समय ने ही

बरवाद।


निर्धारित है

हर क्षण,

सृष्टि का कण - कण,

समय के पड़ते

जब चरण,

शक्तिशाली भी

पतित बन

बनते कर्ण।


जन्म या मरण

सबका है निर्धारित

वह क्षण,

जब धरती पर

आना है ,

और कब 

प्राण छूट 

जाना है,

अज्ञात है

अनजान है तू,

कब क्या होना है,

अर्थ नहीं इसका यह

कि तानकर चादर

सोना है।


कर्मरत रह ,

अज्ञान में मत बह,

जो मिले 

उसे सह,

जैसा बोएगा बीज

खिलेंगे वही फूल,

बबूल को बबूल

आम वपन का परिणाम

आम ही आम।


बचपन यौवन

प्रौढ़ता बुढ़ापा,

क्यों खोता है आपा,

जो जितना तापा

भय से वह नहीं काँपा।


कर्मशीलता ही 

जीवन का इतर नाम,

सोते -सोते न हो जाए

जीवन की शाम,

इसलिए समय को

न कर बदनाम,

इस देह को ही

बना ले सुकर्म धाम,

यहीं हैं प्रयाग

हरिद्वार,

भटक मत 

सारा संसार,

यही है

'शुभम' कथ्य का सार।


🪴शुभमस्तु !


📅2022◆10.25 आरोहणं मार्तण्डस्य।

विश्वबंधुत्व 🫂 [ गीत ]

 

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

✍️ शब्दकार ©

🫂 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■◆■

आज विश्व  में   बंधु-भाव का,

पतन      दिखाई      देता   है।

अपने  तक   सीमित   है मानव,

बनता       विश्व  -  विजेता   है।।


अपना  उदर   श्वान  भी भरते,

बस   अपने    तक   जीते   हैं।

ऐसे   मानव     देह    धरे   बस ,

अंतर     में     वे     रीते    हैं।।

परहित  में     जीने   वाला  ही,

सबको    अपना      लेता    है।

आज विश्व में  बंधु- भाव का,

पतन     दिखाई    देता   है।।


एक - एक    मिल    ग्यारह  होते,

शक्ति     बहुत    बढ़   जाती  है।

मानव  की   एकता    सदा   ही,

सहज    सुखद  बन   पाती   है।।

जीवों     में     मानव    सर्वोत्तम,

वही     जगत    का      नेता   है।

आज   विश्व में बंधु -भाव का,

पतन      दिखाई       देता   है।।


प्रभु     ने   तुम्हें      बनाया  मानव ,

मानवता        से        जीना     है।

परहित  में  विष   भी   मिल जाए,

उसे    सहज      ही      पीना है।।

नीलकंठ    शिव   बन   जा  मानव,

धरती        का      अभिनेता    है।

आज   विश्व   में बंधु -भाव का,

पतन       दिखाई        देता है।।


सूरज,  सोम,   वायु,  जल, धरती,

बिना       शुल्क    सब    देते   हैं।

गगन, अनल   कुछ   भी  न माँगते,

जग     को      अपना     लेते   हैं।

बूँद    -  बूँद   से     सागर   बनता,

तू    न   अभी    क्यों    चेता   है?

आज   विश्व   में बंधु -भाव  का,

पतन      दिखाई        देता     है।।


तू     प्रहार      पाहन    का करता,

फिर  भी   तरु    फल     देता  है ।

सरिताओं    को       दूषित  करता,

नैया      जलनिधि       खेता    है।।

'शुभम'  नेह   से    जग  को भर  दे,

तू       ही     मीत       सुचेता    है।

आज    विश्व    में  बंधु -भाव का,

पतन        दिखाई       देता    है।।


🪴 शुभमस्तु !


📅 .२०२२◆८.३० आरोहणं मार्तण्डस्य।

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...