183/2024
©शब्दकार
डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब में एक
रविकर धधकें जेठ में,बनकर भीषण ज्वाल।
पकी फसल गोधूम की,करती खड़ी धमाल।।
शब्द - ज्वाल के तेज से,हो जाता उर खाक।
वाणी शीतल ही भली,रसना को रख पाक।।
धधक निदाघी भानु की,सही न जाती मीत।
दिनकर चलते जेठ में,चाल क्रुद्ध विपरीत।।
सुनकर रिपु के कटु वचन, धधक रहा है रक्त।
आग जले प्रतिशोध की,हृदय हुआ है तप्त।।
श्वान घुसा ज्यों गेह में,गृहिणी ने ली लूक।
चूल्हे से ले तानकर , मारी हुई न चूक।।
बरस रहे हैं शून्य से,लूक सुलगते नित्य।
जेठ और वैशाख में, क्रोधित हैं आदित्य।।
शीतलता में नम्रता, करती भाव - निवेश।
धी मन को शीतल रखें,करें न अनल प्रवेश।।
बैठे तरु की छाँव में,तन- मन हुआ प्रसन्न।
शीतलता सुख शांति दे,हरती भाव विपन्न।।
दिया रात - दिन नेह से,फिर भी नदिया नाम।
स्वार्थ भरे क्यों लोग हैं, नहीं जानते काम।।
तप्त जेठ की आग है, नदिया उधर अबाध।
जल सेवा सबकी करे, सजल साधना साध।।
एक में सब
लूक धधक रवि- ज्वाल में,शीतलता का नाम।
नदिया को यदि छोड़ दें,नहीं लेश भर काम।।
शुभमस्तु !
24.04.2024●7.45आ०मा०
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