मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

गिनती सीख [ बाल कविता]

 086/2026


         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


एक एकम एक।

हम   बनें  नेक।।


एक   दूनी   दो।

पड़ा  मत  सो।।


दो   दूने    चार।

छोड़ दे खुमार।।


तीन  दूनी  छह।

यों ही  मत  बह।।


चार  दूनी  आठ।

याद  कर  पाठ।।


पाँच  दूनी  दस।

अभी नहीं  बस।।


छह    दूनी    बारह।

सचाई का पथ गह।।


सात    दूनी   चौदह।

अत्याचार मत  सह।।


आठ    दूनी  सोलह।

करेंगे      किलोलह।।


नौ    दूनी   अठारह।

गोपनीय मत  कह।।


दस     दूनी    बीस।

जिएं    सौ   बरीस।।


शुभमस्तु,


10.02.2026◆3.15प०मा०

                 ◆◆◆

कोयल कुहू- कुहू कर बोली [ बाल कविता ]

 085/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कोयल    कुहू- कुहू   कर   बोली।

उठो    बालको     आई      होली।।


फूल    खिले     हैं   क्यारी -क्यारी। 

रंग-बिरंगी          है          तैयारी।।


गेंदा      और     गुलाब     महकते।

जिन  पर तितली  भ्रमर  चहकते।।


जंगल- जंगल     दहकन      कैसी।

आग  लगी हो    वन     में   ऐसी।।


टेसू      लाल-लाल       हैं     फूले।

कीट - पतंगे     डालें           झूले।।


सरर-सरर     बह      रहीं    हवाएँ।

भरी  गलन में       धूप      तपाए।।


'शुभम्'  लगे  वसंत     ऋतु  आई।

चलती  शीतल     सद     पुरवाई।।


शुभमस्तु,


10.02.2026◆6.45आ०मा० 

                  ◆◆◆

जीवन में मजबूरियाँ [ गीत ]

 084/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आ जाती हैं

कैसी- कैसी

जीवन में मजबूरियाँ।


पास न

माता-पिता बहन भी

गोद धरा की सो जाना

लगा

ईंट पत्थर का तकिया

नव सपनों में खो जाना

बने  विषम

हालात रही क्यों

निज पालक से दूरियाँ।


जीवन में

क्या -क्या होना है

कौन जानता भावी को

वक्त दिखाए

दिन ये कैसे

ताला बंद न चाबी को

इस वीरान

धरा पर कोई 

उसे सुनाए लोरियाँ।


मैले वस्त्र

देह पर धारे

फटी चप्पलें पैरों में

आ जाती है

देख दशा ये

दया हृदय में गैरों में

नहीं मुलायम 

गद्दे बिस्तर

नहीं फटी भी बोरियाँ।


शुभमस्तु,


10.02.2026◆ 6.00आ०मा०

                  ◆◆◆

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

आहट विरल वसंत की [ दोहा गीतिका ]

 083/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आहट विरल  वसंत  की,रँगे  हुए   निज चीर।

तन -मन वन -वन झूमती,सर सरिता के तीर।।


अमराई    में   गूँजते,   कुहू-कुहू     के  बोल,

विरहिन   बाट  निहारती,टिके न उर में धीर।।


क्यारी    में   पाटल   खिले,वन  में टेसू  लाल,

मह-मह-मह  गेंदा करे,  सरसों   सरस अमीर।


सरर-सरर चलती  हवा,गलन  भरी दिन-रात,

अरहर  रह-रह  झूमती, उड़ता  लाल अबीर।


फगुनाहट  घुलने  लगी, जड़-चेतन के   बीच,

डफ-ढोलक की गूँज में,मस्त   हुए  नर वीर।


दिन   होली  के  आ गए,बालक   करें धमाल,

उड़ता रंग   गुलाल   का,महका विरल उशीर।


'शुभम्' गंध  मलयानिली,तन-मन के हर पोर,

काम-बाण   नित  बेधती,जगा  हृदय में पीर।


शुभमस्तु,


09.02.2026◆7.45 आ०मा०

                  ◆◆◆

क्यारी में पाटल खिले [ सजल]

 082/2026


  

समांत          : ईर

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आहट विरल  वसंत  की,रँगे  हुए   निज चीर।

तन -मन वन -वन झूमती,सर सरिता के तीर।।


अमराई    में   गूँजते,   कुहू-कुहू     के  बोल।

विरहिन   बाट  निहारती,टिके न  उर में धीर।।


क्यारी    में   पाटल   खिले,वन  में टेसू  लाल।

मह-मह-मह  गेंदा करे,  सरसों   सरस अमीर।।


सरर-सरर चलती  हवा,गलन  भरी दिन-रात।

अरहर  रह-रह  झूमती, उड़ता  लाल अबीर।।


फगुनाहट  घुलने  लगी, जड़-चेतन के   बीच।

डफ-ढोलक की गूँज में,मस्त   हुए  नर वीर।।


दिन   होली  के  आ गए,बालक   करें धमाल।

उड़ता रंग   गुलाल   का,महका विरल उशीर।।


'शुभम्' गंध  मलयानिली,तन-मन के हर पोर।

काम-बाण   नित  बेधती,जगा  हृदय में पीर।।


शुभमस्तु,


09.02.2026◆7.45 आ०मा०

                  ◆◆◆

कांति कामिनी काय की [ दोहा ]

 081/2026


   

[कांति,चमक,आभा,प्रभा,सुषमा]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                 सब में एक


कांति कामिनी काय की,करती क्रमिक कमाल।

दो  दृग  से  उर  में   धँसे,  भरती   हुई उछाल।।

कांति बिना इस रूप का,जीवन में क्या मोल।

भ्रमर  झूमते  शाख  पर,मधुरस  चखें अडोल।।


चमक बिना   चंदा   नहीं, नहीं चंद्रिका   चारु।

जीव     सभी   हैं  चाहते, चमक बिखेरे आरु।।

तड़ित   कौंधती   मेघ में,लिए चमक का  तेज।

कंपित उर   नर-नारि  के,निज को रखें सहेज।।


यौवन   की आभा   नई,  भरती ओज अपार।

तन-मन  में नव जोश का, करती सघन प्रसार।।

आभा   से  आकृष्ट   हो, आतीं तितली   पास।

महक  रहे   उद्यान   में,अनगिन   सुमन सहास।।


प्रभा   नई   आकाश में,उषः काल की दिव्य।

प्राची   का      शृंगार   कर,    दर्शाती मंतव्य।।

सौर प्रभा   मंडल  नया,भरता दिव्य प्रकाश।

उषा  न  जाती साथ में, दिनकर नहीं निराश।।


सुषमा सज्जित कामिनी,यौवन का नव  रंग।

आकर्षित   नर   को   करे,भरता हृदय उमंग।। 

सुषमा में  उद्यान  की,भ्रमित हुआ मन  मोर।

नाच उठा   प्रमुदित   बड़ा,बिना  मचाए शोर।।


                 एक में सब


कांति चमक आभा प्रभा,सुषमा के सब नाम।

जैसी   भी   हो भावना, करें  सकल निज काम।।


शुभमस्तु,


08.02.2026◆9.45आ०मा०

                    ◆◆◆

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

किटकन्ना [ संस्मरण ]

 080/2026


               

©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

उस समय मेरी अवस्था लगभग सात वर्ष की थी और वर्ष 1959 का ;जब मैं अपने खेल के  हमजोलियों के साथ पहली-पहली बार प्राथमिक पाठशाला ग्राम धौरऊ  में पढ़ने के लिए ले जाया गया। यों तो सहज ही मेरे मन में पढ़ने-लिखने और पाठशाला में जाने का कोई मन नहीं था;किंतु अनिच्छापूर्वक ही सही मुझे पढ़ने के लिए  जाना ही पड़ गया। यह अलग बात है कि कालांतर में मेरा मन वहाँ लग गया और दैनिक चर्या में साथियों के साथ ढलने लगा।मेरे हाथ में लकड़ी की हत्थेदार एक तख्ती जिसे हम पट्टी कहते थे,पकड़ा दी गई।जिन कोमल हाथों से मैं गेंद बल्ला और कंचा गोली खेलता था,उनमें लकड़ी की यह तख्ती जैसे एक बोझ ही हो गई। पर क्या करता,पढ़ना जो था। मेरे पिताजी अम्मा दादी और बाबा को मुझे पढ़ाना था न ! तो मेरी गाड़ी पढ़ाई की पगडंडी पर चल पड़ी ; अनिच्छा से ही सही ,पर चलने लगी।

पाठशाला जाने का रोज का वही एक ही क्रम था, सुबह उठो ,तैयारी करो ,पट्टी बस्ता सँभालो,दोपहर के खाने को एक कपड़े में पैक करो,बस्ते में रखो, लकड़ी की काली पट्टी को तवे की कालोंच से काला करो, काँच के हरे- हरे मोटे घोंटे से उसे चमकाओ उस पर सीतासरसों के नरम -नरम हरे -हरे पत्ते रगड़ो ,एक हाथ में पट्टी और एक कंधे पर बस्ते का झोला लटकाओ और चल पड़ो।

स्कूल में पहुँचकर टाट पट्टियों पर अपना स्थान ग्रहण करने के बाद जैसे ही प्रार्थना की घण्टी बजे ,पंक्तियाँ बनाकर एक के पीछे एक हाथ जोड़कर खड़े हो जाओ और  'वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्य मार्ग पर डट जावें।' प्रार्थना को समवेत स्वर से गाओ और अंत में भारत माता की जय  और जय हिंद के नारे लगाकर अपने -अपने स्थान पर बैठ जाओ। इसके बाद मुंशी जी श्री अजंट सिंह जी कक्षा में आते और सभी बच्चों को किटकंनों पर इमला लिखने का आदेश करते। कितकन्ने कभी बड़े बच्चे और कभी स्वयं मुंशी जी बना दिया करते।बस पढ़ाई शुरू। जब लिख लिया जाता ,उसके बाद उसका निरीक्षण मुंशी जी करते और सुंदर लेख वाले बच्चों को शाबाशी देते ,पीठ थपथपाते। इमला के बाद गिनती और पहाड़े याद करने का आदेश होता ,जिसका पालन सभी बच्चे अनुशासित होकर करते। कभी -कभी हमें एक गोलाकार में बैठा दिया जाता ,उस समय एक छात्र कोई पहाड़ा या गिनती बोलता जाता और शेष बच्चे उसे एक स्वर में जोर-जोर से गीत जैसे स्वर में सुनाते। नित्य निरंतर पढ़ने-पढ़ाने का यही क्रम चलता था। लगभग दो बजे भोजनावकाश होता ,सभी बच्चे अपने साथ लाए हुए खाने को खोलते और इधर उधर बैठकर खा लेते। पानी पीकर पुनः अपने स्थान पर जाकर टाटपट्टी पर बैठ जाते।

भोजनावकाश के बाद लगभग डेढ़ घण्टे का समय बचता था। इस समय में कभी पीटी तो कभी गिनती पहाड़ों की पुनरावृत्ति तो कभी अन्य मनोरंजक कार्यक्रम कराए जाते। कभी -कभी अंत्याक्षरी भी कराई जाती। कभी- कभी पीटी में लेजम चलाना सिखाया जाता। इस प्रकार एक डेढ़ घण्टे का समय ज्यों ही पूरा होता ,एक बच्चा चार बजे की घण्टी टन -टन का जैसे ही बजाता ,सभी बच्चे खुश हो जाते और हल्ला गुल्ला करते हुए आजाद पंछी की तरह घर की ओर दौड़ पड़ते।

सप्ताह में शनिवार की सबको प्रतीक्षा रहती थी। उस दिन बालसभा का आयोजन होता था,जिसमें बच्चे गीत आदि से मनोरंजन करते ।उस समय विद्यालय के सभी शिक्षक भी उपस्थित रहते थे। यहाँ यह बता देना भी आवश्यक है कि हमारी प्रारंभिक कक्षाओं में बस्ते का कोई पाँच दस किलो का वजन नहीं होता था। उस समय कच्ची एक और पक्की एक दो प्रारंभिक कक्षाएं होती थीं,जिनको पार करके ही विद्यार्थी कक्षा दो में जाता था। उस समय एक पतली सी हिंदी की पुस्तक ,जिससे अक्षर बोध कराया जाता था और एक पतली सी आठ दस पन्नों की गिनती पहाड़ों की पुस्तक बस।कक्षा दो में जोड़ बाकी(घटाना) सिखाया जाता था। पट्टी छूटने लगती थी और उसका स्थान  पत्थर की स्लेट ले लेती थी। जिस पर एक कड़ी पेंसिल की बत्ती से लिखा जाता था। इसी पर जोड़ घटाने के प्रश्न हल किए जाते थे। तीसरी कक्षा में हिंदी गणित कृषि विज्ञान और कला की नोटबुक मिल जाती थी। पहाड़ा तो सदा ही हमारा साथी रहा ,जो गणित के प्रश्न हल करने में सहायक होता।हमने बीस से अधिक पहाड़े याद नहीं किए, आगे के गणित का काम उन्हीं से चलता रहा।गिनतियाँ सौ तक आती ही थीं ,बस इतने से ही गणित का काम हो जाता था।

पाँचवीं कक्षा उत्तीर्ण करने तक अंग्रेज़ी का कहीं दूर-दूर तक भी पता नहीं था। पहली बार छठी कक्षा से ही अंग्रेज़ी हमारी जानकारी में आई ,फिर तो संस्कृत,इतिहास,भूगोल, विज्ञान, जीव विज्ञान,कला ,कृषि विज्ञान  आदि  बहुत कुछ पढ़ा। किटकंनों की इसी सड़क पर चलकर आज तक की मंजिल तय की है। यद्यपि हम आजकल की नई पीढ़ी की तरह आधुनिक भले ही  न हुए हों , तथापि किसी भी जीवन मूल्य और किसी भी अर्थ में किसी तरह के  हीनताबोध से भी ग्रस्त नहीं हैं।पथरीली जमीन और गर्म रेत की तपन को भी इन पाँवों ने महसूस किया है और  इन हाथों ने हर ठंडे गर्म के ताप को भी झेला है। इस जीवन की यह कठोर सच्चाई है। जो मैंने अपने अतीत के किटकंनों पर चलकर बताई है।

शुभमस्तु ,

07.02.2026◆6.00आ०मा०

                 ◆◆◆

किटकंनों की पगडंडी [ नवगीत ]

 079/2026


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


डॉट पैन

तब न थी नोटबुक

किटकंनों की पगडंडी।


एक हाथ में

तख्ती लटकी

कंधे पर बस झोला

नाम मात्र की

तीन किताबें

चंचल था मन डोला

पहुँचे जब 

शाला में अपनी

किटकंनों की पगडंडी।


इमला और

सुलेख रोज का

काम यही जो करना था

समय मिले तो

खिलंदड़ी भी

लिखने से कब डरना था

मुंशी जी

गिनती रटवाते

किटकंनों की पगडंडी।


गा- गाकर

समवेत पहाड़े

बैठ गोल में रटते थे

बीच-बीच में

मुंशी जी भी

प्रश्न सभी से करते थे

जँचवाते

अपनी इमला को

किटकन्नों की पगडंडी।


शुभमस्तु ,


07.02.2026◆4.45 आ०मा०

                 ◆◆◆

किटकन्नों पर चलकर आया [ नवगीत ]

 078/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बनी काठ की

श्यामल तख्ती

किटकन्नों पर चलकर आया।


अ आ इ ई

उ ऊ ए ऐ 

ओ औ अं अ: बारह आखर

क च ट त प

पंच वर्ग सब

य र ल   व ह    से   बढ़कर 

बावन की

संख्या कर पूरी

गिनती और पहाड़े लाया।


सूखी खड़िया के

किटकन्ने

चलती सरकंडे की कलमें

खड़िया घोल

दवातों में हम

रहते थे  रोजाना   हल में

एक- एक

अक्षर हम सीखे

अपनी मंजिल का पथ पाया।


जोड़-जोड़

अक्षर मात्राएँ

वाक्य बनाना आया जब से

भाषा ज्ञान 

दिया गुरुवर ने

कविता लिखना आई तब से

कृपा शारदा 

माँ की ऐसी

कविता का शृंगार सजाया।


शुभमस्तु,


07.02.2026◆4.00आ०मा०

                 ◆◆◆

कितने बंधन जीव को [ कुंडलिया ]

 077/2026


      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                           -1-

शादी   बंधन  प्यार  का,  बँधा  हुआ संसार।

नर-नारी  बँधते सभी, जब  यौवन का ज्वार।।

जब यौवन   का   ज्वार, ढूँढ़ते  उत्तम जोड़ी।

धन भी  लिया  उधार, मिले  बस सुंदर मोड़ी।

'शुभम्'   वंश   की  बेल,  बढ़ाएं  करें मुनादी।

मित्रो  चलो  बरात  ,   हमें   करनी   है शादी।।


                         -2-

बंधन  यह  संसार  का,मिले जदपि अनचाह।

किंतु   निभाना  ही  पड़े, बना  आप ही राह।

बना आप   ही  राह,  सहज  हो या पथरीली।

चलना    है  अनिवार्य, भले वह सूखी गीली।।

'शुभम्' कर्म  कर  मीत, बना बंधन को चंदन।

महके जीवन - गीत,जगत का अनुपम बन्धन।।


                         -3-

आया था  जब  कुक्षि में, जननी  के जब जीव।

बंधन   है   यह   कर्म  का, सुदृढ़   बनी जरीव।।

सुदृढ़  बनी  जरीव, भजन  प्रभु से वह करता।

मुक्त  करो  भगवान, जटिल  बंधन   के हर्ता।।

'शुभम्'  शृंखला   एक, कर्म की लेकर  धाया।

मानव  जीवन  नेक,  जटिल  बंधन   है आया।।


                         -4-

कितने बंधन  जीव  को, सुख-दुख के जो हेत।

कभी  शिखर  पर  जा  चढ़े,मिले  कभी भू-रेत।। 

मिले   कभी   भू -रेत,   नियंत्रण  एक न कोई।

तदपि    नहीं    है  चेत, जदपि   मर्यादा खोई।।

'शुभम्' जगत  जंजाल, हजारों मिलते फितने।

बंधन   अपने   काट,  मिले  जीवन में कितने।।


                         -5-

चाहे      अनचाहे      मिलें,   बंधन    है संसार।

देह  मिली  है  जीव   की,  करना   ही है  पार।।

करना  ही    है  पार,  कलपने    से  क्या होगा।

निज  इच्छा  से जीव,  बदल  क्या  पाए चोगा??

'शुभम्'   न  तजता  प्राण, कभी गाहे- अवगाहे।

निज   बंधन   को   भोग,  भले   चाहे अनचाहे।।


शुभमस्तु,


06.02.2026◆7.30आ०मा०

                     ◆◆◆

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

कान को पकड़ें घुमाकर [ नवगीत ]

 076/2026


      शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कान को 

पकड़ें 

घुमाकर हाथ अपना।


चाल टेढ़ी

साँप जैसी 

लहर खाती

नृत्य की

हर भंगिमा को

जो लजाती

उचित होती

डगमगाती

बढ़ खुजाकर माथ अपना।


शब्द की

फुटबॉल से

तू खेलता जा

रूपकों को

घूर से ले

ठेलता जा

गीत में 

अपना 

बना कर पाथ अपना।


तू नए के 

नाम पर

खा छील छिलके

फेंक 

अंतरमाल 

सारी फाँक गिन के

बन जा

अमर भगवान

अनोखा नाथ अपना।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆3.15 प०मा०

                  ◆◆◆

जल रहे टायर पुराने [ नवगीत ]

 075/2026

     ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जल रहे

टायर पुराने

आँच से डरना नहीं है।


कह रहे 

वे चाँद सूरज

और सब तारे अधूरे

मात्र उनमें

रौशनी है

करकटों के अन्य घूरे

बात है

सच्ची खरी तो

साँच से  डरना नहीं है।


नव प्रयोगों

के लिए

वे  सचल शाला स्वयंभू

कोष वे

नव रूपकों के

कान में करते  कभी  कू

अगर हीरा

पास हो तो

काँच से डरना नहीं है।


दंभ इतना

और कोई

पालता मन में नहीं है

अन्य कह दे

गलत है सब

वे कहें सब कुछ सही है

आँधियों के

वे झकोरे

टांच से डरना नहीं है।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 2.15 प०मा०

                  ◆◆●

किटकंनों की सड़क [ नवगीत ]

 074/2026


            


©शब्दकार

डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'


किटकन्ने की

सड़क कच्ची

है मुझे अपनी बनानी।


इधर भी

खिड़की खुली है

उधर दरवाजा खुला

कह रहा तू

आज क्यों फिर

पाँव इतना ही झुला

बन के

ठेकेदार  तुझको

बात ही  अपनी चलानी।


आंचलिकता

रूपकों का

है जखीरा पास मेरे

बन खुदा मेरा

न बंदे

जानता  दुर्भाव  तेरे

एक तू

सूरज नहीं है

धूप की तेरी कहानी।


हंकार की

फुंकार तेरी

सुन रहे हैं कान मेरे

ऑंख भी हैं

बंद तेरी

धी गई है तमस घेरे

गोल चक्कर में

भुलाया

उठ रही ऊपर जवानी।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 1.30 प०मा०

नवगीतों की ठेकेदारी [ नवगीत ]

 073/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नवगीतों की

ठेकेदारी 

हथियाए हैं।


नहीं चाहते

लिखे नए

नवगीत और कवि

ठेका ठोके 

वही चाहते

कवि नभ के रवि

उन्हें न लिखने 

के ढंग किसी 

अन्य के भाए हैं!


शायद घुट्टी में

पीकर 

वे माँ की आए

नहीं शिष्य जो

कभी अन्य के

वे कहलाए

नव कवियों के

भाग्य 

इन्होंने खाए हैं।


बस

कमियों की बात

उन्हें आती है कहना

लिखे पुराने को

पढ़ 

कर किटकन्ना 

अपनी ही 

मस्ती में

ठेके पर इतराए।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆1.00 प०मा०

                ◆◆◆

डिजीटल तर्जनी [ अतुकांतिका ]

 072/2026

    

             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तर्जनी-स्पर्श से

कविता

डिजीटल हो गई,

पर्दा मोबाइल का

उजेरा  कह रहा।


अगर चाहें तो

उतारें छाप लें

एक पुस्तक में

नया अवतार लें

आज सम्भव है सभी

देखा गया।


किस रूप में थे 

भाव 

अंतर में छिपे

अब डिजीटल

 मंच पर

आकर रुके

ऑंख छूती मात्र

यह अनुभव नया।


अंतरण धन का

हुआ  डिजिटल सभी

जो कभी

अभिलेख्य था

पकड़े जमीं

विज्ञान की

चमकार का 

खेला नया।


विज्ञान ने

रुकना नहीं

सीखा कभी

कभी धीरे

कभी सत्वर

चाल बढ़ती ही  गई

बद और अच्छा

जो भी हुआ

झेला गया।


शुभमस्तु ,


05.02.202◆12.30प०मा०

                 ◆◆◆

समय ने सब कुछ गहा [ नवगीत ]

 071/2026

    

       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


समय बदला

समय ने 

सब कुछ गहा।


तर्जनी-स्पर्श से 

कविता

डिजीटल हो गई,

नोटबुक वह

लेखनी

किस ओर जाकर सो गई,

पर्दा 

मोबाइल का

उजेरा  कह रहा।


श्याम अक्षर

शब्द भी

 साकार है,

पटल उजला

काव्य का

 आधार है,

भाव उर का

आज  यों

अविरल बहा।


किस दिशा में

आज हम सब

जा रहे

विज्ञान के

नवरंग

ये जतला रहे

शब्द आखर में

नहीं 

जाता कहा।


शुभमस्तु ,


05.02.2026◆12.15 प०मा०

                  ◆◆◆

मनुहार [ सोरठा ]

 070/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



फुला लिए क्यों गाल,मत रूठो प्रिय भामिनी।

करके   एक   सवाल, करता हूँ मनुहार     मैं।।

मिले आपका प्यार,   नहीं   कभी   मैं रूठती।

 करो   नहीं   मनुहार  ,सदा आपको चाहती।।


जिसका  कोई     मीत,    रूठेगा   केवल वही।

हार नहीं   है   जीत,लगती   प्रिय मनुहार तब।।

 तुम्हें     मनाऊँ      कन्त,तुम   रूठो मनुहार से।

 जीवन विमल वसंत,इसी   तरह  मिलता   रहे।।


 हम      दोनों  का   प्यार,होता   है मनुहार में।

 ऐसा  नेह   दुलार,   कभी - कभी मनभावता।।

प्रेम   न    लेश   लगाव,  कभी  हमारा गैर   से।

नहीं   क्रोध  का   ताव,  वहाँ नहीं मनुहार भी।।


प्रिय     लगती  मनुहार,   पत्नी    हो या प्रेयसी।

अपना    नेह     उदार,  सदा  मनाने   में लगे।।

सभी   मनाते     लोग,  संतति   अपनी रूठती।

करें हर्ष   का   योग,  लालच   दे मनुहार  से।।


चलें   उतार-चढ़ाव,धन ऋण से जीवन बना।

कभी   उपेक्षा -ताव, कभी  हुई मनुहार   भी।।

सदा   अपेक्षित   तेल,जीवन  की घुड़दौड़   में।

कर   रूठे से   मेल,   मस्त   रहें   मनुहार   में।।


आ   जाए  यदि गाँठ,   भेद   मिटाती नेह में।

नष्ट   करे   उर   नाँठ,   अमृत-सी मनुहार से।।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 9.30आ०मा०

                 ◆◆◆

प्रिय लगती मनुहार [ दोहा ]

 069/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मत रूठो प्रिय भामिनी,फुला लिए क्यों गाल।

करता  हूँ   मनुहार    मैं, करके   एक सवाल।।

नहीं   कभी   मैं रूठती,मिले आपका प्यार।

सदा   आपको   चाहती, करो   नहीं मनुहार।।


रूठेगा    केवल   वही, जिसका   कोई मीत।

लगती  प्रिय    मनुहार तब, हार  नहीं है जीत।।

तुम   रूठो   मनुहार   से,   तुम्हें   मनाऊँ  कन्त।

इसी तरह   खिलता   रहे,  जीवन विमल वसंत।।


होता  है   मनुहार   में, हम      दोनों  का प्यार।

कभी- कभी    मनभावता,   ऐसा  नेह दुलार।।

कभी हमारा   गैर   से,  प्रेम    न  लेश  लगाव।

वहाँ नहीं  मनुहार भी, नहीं क्रोध का   ताव।।


पत्नी  हो    या   प्रेयसी, प्रिय लगती मनुहार।

सदा  मनाने   में  लगे ,  अपना    नेह उदार।।

संतति   अपनी    रूठती,  सभी मनाते   लोग।

लालच   दे   मनुहार   से, करें   हर्ष  का    योग।।


धन ऋण से   जीवन   बना,चलें  उतार चढ़ाव।

कभी हुई   मनुहार    भी, कभी   उपेक्षा-  ताव।

जीवन   की   घुड़दौड़   में, सदा अपेक्षित तेल।

मस्त   रहें   मनुहार    में,  कर   रूठे   से मेल।।


भेद    मिटाती   नेह  में , आ    जाए यदि गाँठ।

अमृत- सी   मनुहार   से, नष्ट    करे   उर नाँठ।।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 10.15 आ०मा०

                 ◆◆◆

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

आहट मिली बसंत की [ दोहा ]

 068/2026



[फागुन,आहट,अभिसार,बसंत,पतझर]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                सब में एक

रंग भरे मधुमास का,फागुन   ही    शुभ मास।

फूल -फूल  गुंजार  है, मधुकर  का परिहास।।

अंत भला तो   सब भला, फागुन गाए फाग।

वर्ष समापन  हो   रहा,  तोड़    खुमारी जाग।।


कुहू-कुहू   कोकिल  करे,  अमराई   के कुंज।

आहट मिली वसंत की,गुंजित अलिदल पुंज।।

आहट पा निज  कन्त  की, मन में उठी  तरंग।

सन्नारी  कब  सो  सकी,  देख   हुआ प्रिय दंग।।


प्रियतम से अभिसार का, अवसर फागुन मास।

कलियाँ   चटकीं   बाग   में,उड़ती प्रबल सुवास।।

मर्यादा     की   आड़    में,करे  प्रिया अभिसार।

पहने श्यामल   शाटिका,  नयन सजल रतनार।।


यौवन    वयस बसंत है,  राग   रंग   रस   रास।

किसलय विकसित शाख में,जागी सुमन सुवास।।

टेसू      पाटल      रंग     में,   झूम   रहे रतनार।

है  बसंत    मनभावना,   तितली    करे दुलार।।


सदा  न   वेला  फूलते, सदा   न   रहे खुमार।।

पतझर आया  बाग   में,सेमल   सुमन  बहार।

संकेतक   नित   नव्यता,  का   देता मधुमास।

एक  ओर पतझर  हुआ,उधर सुमन की वास।।


                एक में सब

आहट मिली बसंत की,फागुन का मधुमास।

रमणी रत अभिसार में,पतझर भरे उसास।।


शुभमस्तु,


04.02.2026◆7.15 आ०मा०

                       ◆◆◆

नियति यही है [ गीत ]

 067/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


इधर अँधेरा

उधर उजाला

नियति यही है।


उगा दिवाकर

जब प्राची में 

मचा जगत में शोर

उषा जगी

कलियाँ मुस्काईं

हुआ सुहाना भोर

नमन प्रणाम

करे जन जीवन

सुगति यही है।


संध्या काल

हुआ तम छाया

खग जाते निज नीड़

घटने लगी

बाजार सड़क पर

नर-नारी की  भीड़

हुआ दिवस-

अवसान शांति से

प्रगति यही है।


उदय हुआ जो

अस्त उसे भी

होना ही यह सत्य

सिंहासन से

पतित हुए नृप

अविचल जीवन तथ्य

पुनः एक 

नव नृप आना है

निरति यही है।


शुभमस्तु ,


03.02.2026◆4.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

मनोरथ [ चौपाई ]

 066/2026


           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शुद्ध  मनोरथ  जिसका    कोई।

उसने     लता    सुंगंधित    बोई।।

हरियाली   उर   में     भर    देती।

हर  नकार को   वह    हर  लेती।।


दूषित   मन  से   काम   न   होता।

सफल मनोरथ  पथ  से  खोता।।

तिलक  छाप का  ढोंग  न  करना।

अभिनय  से सत काज  न सरना।।


करें मनोरथ  मन     से    सच्चा।

बने रहें    ज्यों        भोला    बच्चा।।

छल कपटों  से    करे      विमुखता।

करे पलायन       हृदय - विकलता।।


मन   के   रथ   की   करें     सवारी।

भले-बुरे      विकृत        नर-नारी।।

कैसे    सफल    मनोरथ    होते।

वही   अंत      में     मानुष     रोते।।


अश्व   मनोरथ  के    हों    चंचल।

यत्र    तत्र     करवाते        दंगल।।

भग्न  करे   रथ   रथी   न   बचना।

शेष न रहती   तन    की    रचना।।


नर स्वतंत्र     जो   करे   मनोरथ।

रहे  हाथ में   भावी     का   पथ।।

वल्गा   थाम    नियंत्रित    करना।

नहीं  हवा    में     ऊँचा    उड़ना।।


'शुभम्' मनोरथ  सब  सुखदाता।

यदि    मानव    कर्तव्य   निभाता।।

वहीं  सफलता    करतल    होती।

मिलें  गहन  सागर    में     मोती।।


शुभमस्तु !


02.02.2026◆4.00प०मा०

                 ◆◆◆

शुद्ध बनाओ निज अन्तर्घट [ गीतिका ]

 065/2026


    शुद्ध बनाओ निज अन्तर्घट

                

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शुद्ध     बनाओ    निज   अन्तर्घट।

नहीं    उघाड़ो   प्रिय      अन्तर्पट।।


उर  में  वास करे    जो   प्रति पल,

नाम  उसी का ले क्षण- क्षण  रट।


निज सतपथ से  मत विचलित हो,

एक    इंच   भी   तू  न कभी हट।


सब चलते   हैं  अपने  पथ    पर ,

चलता  रह तू  करे  न  खट-खट ।


छलके  नहीं     बूँद    भर   पानी,

सँवर -सँवर कर  ले चल   ये घट।


अभिनय  में   सब   लगे   हुए   हैं,

तू    भी   बना   हुआ  मंचन-नट।


'शुभम्' दृष्टि-पथ  हो न  धुँधलका,

आने मत दे   दृग   पर   ये    लट।


शुभमस्तु ,


02.02.2026◆6.00आ०मा०

                    ◆◆◆

नहीं उघाड़ो प्रिय अन्तर्पट [ सजल ]

 064/2026




समांत          :अट

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 16.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शुद्ध     बनाओ    निज   अन्तर्घट।

नहीं    उघाड़ो   प्रिय      अन्तर्पट।।


उर  में  वास करे    जो   प्रति पल।

नाम  उसी का ले क्षण- क्षण  रट।।


निज सतपथ से  मत विचलित हो।

एक    इंच   भी   तू  न कभी हट।।


सब चलते   हैं  अपने  पथ    पर ।

चलता  रह तू  करे  न  खट-खट ।।


छलके  नहीं     बूँद    भर   पानी।

सँवर -सँवर कर  ले चल   ये घट।।


अभिनय  में   सब   लगे   हुए   हैं।

तू    भी   बना   हुआ  मंचन-नट।।


'शुभम्' दृष्टि-पथ  हो न  धुँधलका।

आने मत दे   दृग   पर   ये    लट।।


शुभमस्तु ,


02.02.2026◆6.00आ०मा०

                    ◆◆◆

चलती उलटे पाँव सियासत [ ग़ज़ल ]

 063/2026


  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चलती  उलटे    पाँव    सियासत।

समझे  शहर न   गाँव सियासत।।


उसका  अपना  एक    न    कोई,

नहीं  बनाए    ठाँव     सियासत।


सुनती  नहीं  कान   से कुछ   भी,

अपनी कर - कर  काँव सियासत।


गलत  सही  कुछ   भी  कब माने,

मस्त  चांव ही    चांव   सियासत।


मरे    धूप     में    सारी     जनता,

वोटों  की   घन   छाँव   सियासत।


अपना   सीधा     करती      उल्लू,

पर जन को नित खांव  सियासत।


पाशा 'शुभम्'  पड़े  यदि     उलटा ,

लेती  अपना     दाँव     सियासत।


शुभमस्तु ,


01.02.2026◆12.00मध्याह्न

                ◆◆◆

जो दहका वह निखर गया [ ग़ज़ल]

 062/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप शुभम्'


जो  दहका    वह     निखर   गया।

टूट   गया  जो      बिखर    गया।।


चलता       गया      राह     अपनी,

मंजिल  के    वह     शिखर   गया।


मंजता     रहा     रात -दिन      जो,

बर्तन  घर   का      सँवर        गया।


सहने   की      ताक़त     न     रही,

कमजोरी     में       बिफ़र     गया।


गर्म     रेत    को      छुआ      नहीं,

छुआ  तुरत     ही    सिहर     गया।


आया   था     कुछ     करने    को,

किए  बिना    कब    किधर   गया।


'शुभम्'      गए      कितने    आए,

इधर     दिखा था    उधर     गया।


शुभमस्तु ,


01.02.2026◆11.30 आ०मा०

                   ◆◆◆

बीती हुई कहानी है [ ग़ज़ल ]

 061/2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बीती     हुई       कहानी    है।

फिर  भी   याद   जबानी   है।।


अनगिन    बीत     गई     बरसें,

पर  वह      नहीं   पुरानी      है।


छोटी   भी     छोटी      न    लगे,

वह   सब     आज     बतानी  है।


जो  सोचा      था    नहीं    हुआ,

बात      वही     समझानी     है।


काम  निकाला        चले     गए,

कहन    लगे       बचकानी    है।


उठापटक     सब     याद    रही,

मगर   नहीं      उलझानी      है।


है      खुदगर्ज़       जमाना      ये,

बाकी    नहीं        निशानी      है।


शुभमस्तु !


01.02.2026◆10.15 आ०मा०

                    ◆◆◆

सकल मनोरथ शुद्ध हों [ दोहा ]

 060/2026

        


[इच्छा,चाह,अभिलाषा,कामना,

मनोरथ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                सब में एक


भली-बुरी     इच्छा  करे, मानव इच्छा-दास।

तृप्त  नहीं    होता  कभी, चरता इच्छा-घास।।

इच्छा  सदा   अनंत   हैं,इनका  ओर न   छोर।

सदा  नियंत्रित  ही  करें, मचा   रहीं उर शोर।।



चाह रहे   सब कुछ मिले,किए बिना कुछ काम।

ऐसे    नर   बस   चाहते,  कर्महीन   बन नाम।।

चाह वही   मन  में  करें,निज वश की जो बात।

छुएँ   नहीं   आकाश  को, मिले सुनिश्चित घात।।


करना अभिलाषा वही, जो जनहित  की  हेतु।

भार     उठाए     आपका,   वही   बनाएँ सेतु।।

अभिलाषा  पावन  जगा, करें  ईश की  भक्ति।

सद्भावी   उर  से    रहें, जन-जन से अनुरक्ति।।


सकल कामना हीन   जो,जीवन खेह समान।

बिना  किए  फल  चाहते, तानें जीभ-कमान।।

सबके   प्रति   शुभ  कामना,का  देता संदेश।

उगता  सूरज  नित्य  ही,जग  में देश-विदेश।।


सकल   मनोरथ  शुद्ध हों,  तब होता उद्धार।

मन को   पावन   कीजिए,करके जन उपकार।।

कुटिल मनोरथ से कभी,मिले नहीं सुख चैन।

मन में   जिसके   खोट   है,दुखी   रहे दिन-रैन।।


                एक में सब


अभिलाषा  या कामना, इच्छा हो  या चाह।

वही  मनोरथ कीजिए,मिले  जहाँ शुभ   राह।।


शुभमस्तु!


01.02.2026◆5.30 आ०मा०

                 ◆◆◆

शनिवार, 31 जनवरी 2026

उल्लू बनाम अनुल्लू! [ अतुकांतिका ]

 059/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अनुल्लूओं की सरकार

कुछ उल्लूओं के 

कंधों पर चलती है,

उल्लूओं को सीधा 

करना पड़ता है, 

अन्यथा एक उल्लू ही

गले के नीचे

नहीं सरकता है।


सभी उल्लू टेढ़े ही क्यों ?

यदि उल्लू टेढ़े न हों

तो जलेबी समझकर

सब कोई निगल जाए,

अंततः उल्लू का भी

मान है, 

उसका भी स्वाभिमान है।


उल्लू  जब चाहे 

लड़ बैठते हैं,

कारण अकारण 

यों ही ऐंठते हैं,

उनसे चाहे

 बाँस बल्लियाँ गड़वा लो

अथवा नारे लगवा लो

जरूरत पड़े तो

कहीं भी आग जलवा लो।


 ये  उल्लू बहुमुखी

प्रतिभासंपन्न हैं

ये भी इसी देश की

माँओं से उत्पन्न हैं,

इन उल्लूओं से ही 

सियासत धन्य है।


कभी सोचना भी मत

कि देश उल्लू विहीन हो,

देश का उल्लू

देश की माटी में विलीन हो,

उल्लू वही सर्वश्रेष्ठ

जो जितना बड़ा कमीन हो।


शाखें  हैं  तो उल्लू भी हैं

और हर शाख पर

उल्लू विराजमान है,

आखिर उल्लू भी तो

इंसान है,

वही तो उनका

चुनाव चिह्न है

उल्लूओं से यह देश

बना हुआ महान है।


उल्लू जिंदाबाद के

नारे लग रहे हैं,

अनुल्लू पर्दे में

मजे कर रहे हैं,

देखते हैं उल्लू

 किस करवट बैठता है,

हर उल्लू दूसरे पर

अनायास ऐंठता है।


शुभमस्तु ,


30.01.2026◆ 6.00आ०मा०

                 ◆◆◆

उल्लू सदैव टेढ़ा क्यों? [ व्यंग्य ]

 058/2026

 

          

©व्यंग्यकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

विचारणीय प्रश्न यह है कि उल्लू सदैव टेढ़ा ही क्यों होता है,जिसे सीधा करने की आवश्यकता पड़ जाती है ? इसके उत्तर में इतना कहा जा सकता है कि कुछ चीजें जन्मजात टेढ़ी ही बनाई जाती हैं।जिन्हें आवश्यकतानुसार सीधा करना पड़ जाता है। अब हर उल्लू जलेबी तो नहीं हो सकता ,जिसे ऐसे ही उदरस्थ कर लिया जाए।उल्लू के हाथ पैर पंख अस्थियाँ आदि सभी टेढ़े होते होंगे इसलिए उसे सीधा करना पड़ता है। एक बात यह भी है कि उल्लूओं के बिना आदमी का काम भी नहीं चलता। सभी अक्लमंदों की सरकार कुछ उल्लूओं के आसरे चलती है। यदि दुनिया में उल्लू न हो तो कितनी बड़ी समस्या पैदा हो जाए!उल्लू व्यक्ति ,समाज और देश की अनिवार्य आवश्यकता हैं। ये कुछ प्रतिशत उल्लू ही हैं ,जिनके सिर पीठ और हाथों में हम सबके भविष्य का दारोमदार है। यदि परिवार समाज और देश में सभी अनुल्लू पैदा होने लगें तो कौन किसकी बात मानेगा ! वह तो बेचारा उल्लू ही है कि उसे थोड़ा सा अपनी ओर सीधा कर लो और अपना काम निकाल लो।यह अलग बात है कि काम निकल जाने के बाद उल्लू को दूध की मक्खी की तरह बाहर निकालकर फेंक दो।उल्लू कोई घी की मटकी में गिरी हुई मक्खी तो है नहीं कि घी छानकर या अँगुली की नोंक पर रखकर बाहर फेंक  दिया जाए और घी को पुनः इस्तेमाल में ले लिया जाए !

दिन के साथ रात का होना अनिवार्य है। अन्यथा दिन को कोई क्या समझेगा ! इसी प्रकार देश और समाज को चलाने के लिए उल्लुओं की परम आवश्यकता है। प्रयोगकर्ता को उल्लू सीधा करने की कला का विशेषज्ञ होना चाहिए। हर आदमी भी यह काम बखूबी नहीं कर सकता। उसे इसका हुनर जानना और सीखना पड़ता है। 'करत- करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान' के अनुसार जब उल्लूओं से पाला पड़ता है तो हुनर भी आ ही जाता है।

उल्लू देश और समाज के व्यक्तित्व की रीढ़ हैं। ये वही हैं जिन्हें नेताओं ने झंडे- बैनर लगाने ,मंच सजाने,कुर्सियाँ लगाने,नारों को ऊँची से ऊँची आवाज में बुलंद करने,गड्ढे खोदने, टेंट तंबू में बम्बू गाड़ने, रातों रात पेंफलेट चस्पा करने आदि महत कार्यों में लगा दिया जाता है और वे  मद्यपान की एक बोतल में ही खुश ही नहीं होते ,उसके टैंक में आकंठ डूब-डूब जाते हैं।एक बार डूबे कि बस ,फिर उन्हें कुछ कहने और बताने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। वे अपना काम अच्छी तरह सँभाल लिए जाते हैं। इतना अवश्य है कि कोई उल्लू बस एक बार सीधा करना पड़ता है,उसे बार बार सीधा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अरे भाई !उल्लू तो बहुत ही संतोषी प्राणी है, बस एक बार उसकी समझ में उसका काम आ जाए ,फिर तो वह जिस समर्पण भाव से कार्य करता है,उतना तो कोई भक्त भी भगवान के साथ समर्पित नहीं होता।

देश के उल्लू समाज के कंधों पर देश का बहुत बड़ा भार है। जब कहीं कोई लड़ाई ,आगजनी,तोड़ फोड़,विद्रोह आदि की बात आती है तो देश के ये उल्लू ही सेना की हरावल बन कर आगे आते हैं। और उल्लूओं की फौज से जा जूझते हैं। और उधर उनका नायक गुप्त निर्देश देता हुआ मूँछों पर ताव देता हुआ श्रेय से बचता या श्रेय को ओढ़ता बिछाता दिखाई देता है। बुद्धिमान या अनुल्लू तभी प्रकाश में आते हैं,जब उनके गलों में  भारी भरकम माला पहनाई जाती हो। अन्यथा वे अपना चेहरा छिपाए हुए मुक्तहस्त मुस्कराते रहते हैं।  ऐसा कोई युग नहीं रहा,जब देश और समाज में उल्लू पैदा न हुए हों। गेहूँ के साथ भले ही घुन पिस जाता हो ,परंतु उल्लू इतने उल्लू भी नहीं होते कि सहजता से पिस जाएँ।उन्हें अपने मालिकों के लिए कितने बड़े-बड़े काम जो करने हैं। उल्लू ही इस देश का भविष्य हैं। उनका अपना एक सुनियोजित और सुनिश्चित एजेंडा है,जिसके तहत उन्हें सक्रिय रहना है।

उल्लूओं के सम्बंध में एक विशेष और महत्वपूर्ण बात यह भी है किजो  'महान'  स्त्री-पुरुष  उल्लू पालते हैं, वे भी किसी अन्य के उल्लू हो सकते हैं। भले ही उल्लू होना गौरव की बात न मानी जाती हो ,किन्तु हर उल्लू को अपने उल्लूत्व के गौरव का अभिमान होता है। कोई उल्लू अपने को उल्लू कहलवाना अथवा कहना कदापि पसंद नहीं करता। वह तो बस होता है। यह एक अंडरस्टूड तथ्य है। इन उल्लूओं की आंखें सामान्य उल्लूओं की तरह रात में भी नहीं खुलतीं। वे रात- दिन और बारहों मास बन्द ही रहती हैं। वे इन उल्लूओं के भी बाप के बाप हैं।उल्लू के सम्बंध में यह तथ्य भी ज्ञातव्य है कि उल्लू अपने को छोड़ सबको उल्लू समझता है।वह इसी भ्रम में जीवन बिता देता है कि मैंने सबको खूब उल्लू बनाया।

शुभमस्तु !

30.01.2026◆5.15आ०मा०

                   ◆◆◆

अभिमान [ कुंडलिया ]

 057/2026


          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करता नर अभिमान जो,झुकता उसका शीश।

रहता  नहीं  विवेक  भी, करे  अन्य   से रीश।।

करे  अन्य  से  रीश,किसी  का   मान न जाने।

कहता  वही  अहीश,   खींचकर    लंबी ताने।।

'शुभम्'   निरंकुश मूढ़,  वनैला पशु ज्यों चरता।

अभिमानी नर   क्रूर, नहीं   हित   कोई करता।।


                         -2-

मानव  जो अभिमान में, हुआ मगन मदहोश।

नहीं मानता अन्य को, भरा  हुआ नित जोश।।

भरा हुआ  नित  जोश, बड़ों  को मान न देता।

रिक्त   विवेकी   कोष, स्वार्थ  हित  अंडे सेता।।

'शुभम्'  कर्म   से  हीन, बना  कर्मों  से दानव।

मिली मनुज  की  देह, कौन कहता है मानव।।


                         -3-

मानव जो गुणहीन हो,फिर भी हो अभिमान।

सभी   जानते    हैं   उसे, वह अज्ञान वितान।।

वह    अज्ञान   वितान , हठी अविवेकी होता।

प्रेम  दया   से  हीन,   धर्म    का  सूखा सोता।।

'शुभम्'अशुभ का रूप,शून्य कर्मों का अनुभव।

धर्म   पड़ा  भव  कूप, नाम का  है वह मानव।।


                         -4-

करता  जो संगति  कभी, अभिमानी के साथ।

डूबे  वह  अभिमान    में, पकड़ आपका हाथ।।

पकड़  आपका  हाथ, पतन  का कारण होगा।

कभी   न    देता    साथ, बदलता केवल चोगा।।

'शुभम्'  सुलगती आग,आप  मरता  ही मरता।

उस नर   का   दुर्भाग, साथ उसका जो करता।।


                         -5-

रहता  नहीं    विवेक का,  जिस नर को संज्ञान।

भरा   हुआ उसमें   रहे, नित अकूत अभिमान।।

नित  अकूत  अभिमान, न जाने  ममता क्रोधी।

धर्म  कर्म  या  दान, मान  का  ज्ञान   न बोधी।।

'शुभम्' पिता की बात,कभी पल भर भी सहता।

करता   वह   आघात,   नहीं   सीमा   में रहता।।


शुभमस्तु ,


29.01.2026◆9.30प०मा०

                 ◆◆◆

दूरदर्शिता की बात [ अतुकांतिका ]

 056/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अपना उल्लू 

सीधा करने के लिए

कुछ उल्लुओं को

 लड़वाना भी

एक हुनर है,

राजनीति है,

यह बात 

सभी नहीं जानते

दूरदर्शिता की बात है।


कभी-कभी गलतियाँ

होतीं नहीं

की जाती हैं,

सबके दिमाग में

यह बात नहीं आती

ये वही समझते हैं

जो खुराफ़ाती हैं।


जमालो आग लगाकर

दूर खड़ी 

तमाशा देखती है,

जलती हुई आग पर

अपने हाथ सेंकती है,

इसे मूर्ख कैसे समझें !

सियासत सबके 

वश की बात नहीं मित्रो!


खुराफातियों को

देश में शांति नहीं भाती,

उठती हुई

आग की लपटें ही

उन्हें खूब ही सुहाती ,

नए के नाम पर

कुछ ऐसा करवा देना है

जिसे निज हित में

अपने अंडे ही सेना है,

समझदार के लिए

इशारा ही

बहुत होता है,

मालिक लिए है

हाथ में बड़ा-सा डंडा

भारी भरकम बोझ तो

ढोता ही  सदा खोता है।


शुभमस्तु ,


29.01.2026◆ 8.15 प०मा०

                  ◆◆◆

आया है मधुमास [ सोरठा ]

 055/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आया  है मधुमास, कुहू-कुहू  कोयल    करे।

 कंदर्पी    अनुप्रास,    आम्रकुंज    में  गूँजते।।

  नर   कोयल     के  बोल, अमराई गुंजारती।

मादक मधुरस घोल,सजग  करें परिवेश को।।


नर  ही   करे जगार,  मादा  कोयल मौन है।

नर  से  सुंदर नार,इस   भ्रम  में  रहना नहीं।।

भ्रमर  उड़ें चहुँ  ओर,सरसों  फूली  खेत में।

नाच  रहे  वन मोर, कोयल    कूके  बाग में।।


नर मनमोहक   जान,  कोयल मानव  मोर  में। 

प्रभु का यही विधान, मेढक   भी नर ही फबे।।

पर वाणी   रसदार,   कोयल   काला रंग का।

करना प्रथम   विचार,  नहीं   रूप पर मोहिए।।


ठगे गए हैं काग, समझें  कोयल - कपट  को।

लिखा   यही    दुर्भाग,  सेते   अंडे   छद्म से।।

कोयल धरती मौन,  ऋतु   वसंत   आई नहीं।

वचन समझता कौन,असमय उचित न बोलना।।


रंग न जानें लोग,  अशुभ  सदा   काला नहीं।

मसधुरस भरे प्रयोग,कोयल  की  वाणी सुनें।।

नहीं देख रँग -रूप,प्रथम   आचरण जानिए।

है   माधुर्य  अनूप,कोयल  ज्यों  काली भले।।


भले एक   ही   रंग,  कोयल   कागा एक-से।

सुनते ही सब दंग,जब   खोलें   रसनांग को।।


शुभमस्तु ,


29.01.2026◆8.45 आ०मा०

                   ◆◆◆

कुहू-कुहू कोयल करे [ दोहा ]

 054/2026


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कुहू-कुहू   कोयल   करे,आया  है मधुमास।

आम्रकुंज   में    गूँजते,    कंदर्पी  अनुप्रास।।

अमराई  गुंजारती,   नर  कोयल   के बोल।

सजग करें परिवेश को,मादक मधुरस घोल।।


मादा   कोयल  मौन है,नर  ही   करे जगार।

इस भ्रम  में  रहना  नहीं, नर  से  सुंदर नार।।

सरसों  फूली खेत  में, भ्रमर  उड़ें चहुँ ओर।

कोयल   कूके  बाग  में, नाच  रहे  वन मोर।।


कोयल  मानव  मोर में,नर मनमोहक जान।

मेढक भी नर ही फबे,प्रभु का यही विधान।।

कोयल  काला  रंग का,  पर  वाणी रसदार।

नहीं रूप  पर  मोहिए,करना  प्रथम विचार।।


 समझें  कोयल-कपट को,ठगे गए हैं काग।

सेते  अंडे   छद्म  से,  लिखा   यही दुर्भाग।।

ऋतु वसंत  आई  नहीं,   कोयल   धरती मौन।

असमय उचित न बोलना,वचन समझता कौन।।


अशुभ सदा काला  नहीं,रंग  न जानें लोग।

कोयल की वाणी सुनें,  मधुरस  भरे प्रयोग।।

प्रथम  आचरण जानिए, नहीं  देख रँग-रूप।

कोयल   ज्यों  काली  भले,है   माधुर्य अनूप।।


कोयल  कागा  एक-से, भले  एक ही   रंग।

जब खोलें  रसनांग  को, सुनते  ही सब दंग।।


शुभमस्तु !


29.01.2026◆8.45 आ०मा०

                    ◆◆◆

बचपन मेरे अभी न जाओ [ बालगीत ]

 053/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बचपन   मेरे  अभी    न  जाओ।

कुछ  दिन  मेरे  साथ   बिताओ।।


पुनः  नहीं       आवर्तन      होना।

मुझे    पड़ेगा     तुमको    खोना।। 

 आओ  सँग-सँग   खेलो    खाओ।

बचपन   मेरे   अभी   न    जाओ।।


कंचे      और     कबड्डी     खेलें।

चलो  उधर    हम   दंडें     पेलें।।

अपनी   धूनी    यहीं      रमाओ।

बचपन  मेरे  अभी  न    जाओ।।


वर्षा  हुई      भींग     लें   थोड़ा।

मस्त  घूम    लें     मोड़ी -मोड़ा।।

दूर  नहीं  तुम    हमसे    आओ।

बचपन  मेरे  अभी  न   जाओ।।


कागज   की हम    नाव   चलाएं।

जुगनू  पकड़ें    उन्हें     खिलाएं।।

छोड़  गज़ब हम   पर  मत ढाओ।

बचपन  मेरे   अभी    न   जाओ।।


बड़े  नहीं      है   हमको     होना।

नहीं   चाहते     तुमको     खोना।।

झंडा  ऊँचा    मिलकर      गाओ।

बचपन  मेरे   अभी   न    जाओ।।


शुभमस्तु ,


27.01.2026◆11.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

हम सबने झंडा फहराया [बालगीत]

 052/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संविधान    का  दिन   है   आया।

हम    सबने     झंडा   फहराया।।


तीन    रंग     का    झंडा   अपना।

पूरा   करता      हैं    हर    सपना।।

लहर - लहर    कर  वह  लहराया ।

हम   सबने     झंडा      फहराया।।


केसरिया    बलिदान       सिखाए।

श्वेत बीच       में    शांति   कराए।।

हरा      रंग     हरियाली      लाया।

हम     सबने     झंडा    फहराया।।


वीरों  ने      बलिदान    किया   है।

तब स्वतंत्र यह    हुआ   हिया  है।।

राष्ट्रगान मिलजुल    कर    गाया।।

हम    सबने       झंडा  फहराया।।


ध्वज   की    शान न    जाने    देंगे।

यद्यपि    हम    बलिदान    करेंगे।।

मिले  आम्र   तरुवर     की  छाया।

हम      सबने      झंडा  फहराया।।


आओ         भारतवासी     आओ।

देशभक्ति     के    गीत    सुनाओ।।

शुभ  स्वतंत्रता    का  दिन    पाया।

हम      सबने     झंडा    फहराया।।


शुभमस्तु,


27.01.2026🇮🇳 6.45 आ०मा०

भारत भाग्य तिरंगा [ गीत ]


051/2026


            

© शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लाल किले पर

फर-फर फहरे

भारत भाग्य तिरंगा।


मान हमारा

शान देश की

हम सब पहरेदार

नहीं झुकेगा

कभी तिरंगा

हमको इससे प्यार

यमुना

 ब्रहपुत्र कावेरी

बहें नर्मदा गंगा।


है गणतंत्र

दिवस भारत का

संविधान का दिवस महान

अनुशासन में

बँधे  हुए हम

अपना  यही अनूप वितान

अन्न दूध

जल से पोषित जन

रहे न कोई नंगा।


केसरिया

बलिदान सिखाए

श्वेत शांति का वाहक

हरियाली 

नित ही बिखेरता

हरा धान्य धन ग्राहक

चक्र जागरण

करे अहर्निश

सदा रहे मन चंगा।


शुभमस्तु ,


27.01.2026🇮🇳6.15 आ०मा०

                  ◆◆◆

[6:48 am, 27/1/2026] DR  BHAGWAT SWAROOP: 

गरिमामय गणतंत्र हमारा [ गीतिका ]

 050/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


गरिमामय          गणतंत्र    हमारा।

बहती     यमुना-सुरसरि      धारा।।


फहराता   है        तरुण     तिरंगा,

सत्यमेव     का      गूँजे       नारा।


हिंदी         हिंदुस्तान         हमारे,

सूत्र      एकता    का   है    प्यारा।


षड्  ऋतुओं    के   रंग     बिखरते,

सूरज     सोम     करें    उजियारा।


डरे      नहीं     हम    संघर्षों     से,

नील    गगन    में   चमके    तारा।


बरसाते   मीठा     जल      बादल,

यद्यपि  जल सागर     का   खारा।


'शुभम्'  कभी   हम   धर्म न त्यागें,

सबने  मिल कर     देश    सँवारा।


शुभमस्तु ,

26.01.2026 ◆4.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

हिंदी हिंदुस्तान हमारे [ सजल ]

 049/2026


     

समांत          : आरा

पदांत           : अपदांत

मात्राभार       :16.

मात्रा पतन     :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


गरिमामय          गणतंत्र    हमारा।

बहती     यमुना-सुरसरि      धारा।।


फहराता   है        तरुण     तिरंगा।

सत्यमेव     का      गूँजे       नारा।।


हिंदी         हिंदुस्तान         हमारे।

सूत्र      एकता    का   है    प्यारा।।


षड्  ऋतुओं    के   रंग     बिखरते।

सूरज     सोम     करें    उजियारा।।


डरे      नहीं     हम    संघर्षों     से।

नील    गगन    में   चमके    तारा।।


बरसाते   मीठा     जल      बादल।

यद्यपि  जल सागर     का   खारा।।


'शुभम्'  कभी   हम   धर्म न त्यागें।

सबने  मिल कर     देश    सँवारा।।


शुभमस्तु ,

26.01.2026 ◆4.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

शनिवार, 24 जनवरी 2026

सुख की खेती [ आलेख ]

 048/2026

               

©लेखक

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'

यहाँ प्रत्येक नर -नारी सुख की खेती कर रहा है। सुख की फसलें उगा रहा है।उन फसलों पर सुख के फूल और फलों का लाभ उठाता हुआ आनंदित भी हो  रहा है।परंतु न जाने इन सुख की फसलों के बीच दुःखों के झाड़ -झंखाड़  कहाँ से और कैसे उग ही आते हैं। इसका पता उसे तब लगता है जब वे उसे कष्ट देने लगते हैं और सुख की फसलों के लिए बाधा बन जाते हैं। यदि इसके मूल में जाकर देखा जाए तो पता लगता है कि बिना बोए हुए झाड़-झंखाड़ों के ये बिरवे कहाँ से पनप गए। जिस प्रकार किसान के द्वारा बीज बोते समय कुछ ऐसे बीज उसकी दृष्टि को नजरंदाज करते हुए आ ही जाते हैं,जिनकी छँटनी बारीकी से नहीं की गई होती है।परिणाम यह होता है कि वे फसल के साथ ही उगते और पनपते रहते हैं ।यदि समय रहते उन्हें काटकर विनष्ट नहीं किया जाता तो वे किसान और मूल फसल के लिए भी घातक बन जाते हैं।स्वामी की लापरवाही और दूरदृष्टि का अभाव उसकी फसल को चौपट करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ता।

ऐसी स्थिति में क्या करणीय है?यह एक जटिल प्रश्न बनकर उभरता है। इसके समाधान के लिए प्रथमतः तो यह आवश्यक है कि स्वामी में पूर्व नियोजन की क्षमता होनी चाहिए। उसमें दूरदर्शिता होनी चाहिए। पूर्व नियोजन और उसकी दूरदर्शिता का अभाव उसकी फसल को चौपट कर देता है। केवल पैसा ही सब कुछ नहीं है। जहाँ पैसा काम नहीं आता,वहाँ उसका मष्तिकीय नियोजन अधिक उपयोगी सिद्ध होता है।एक अनुभवी कृषक या स्वामी इस प्रकार की असावधानियाँ  नहीं करता। और उसकी फसल में कम से कम झाड़- झंखाड़ उगते हैं,जिनके विनष्टीकरण का उपाय भी वह सहज ही कर सकता है।

मानव जीवन में सुख के साथ दुःख भी अनिवार्य हैं। इन दोनों का समन्वित नाम ही जीवन है। अब बात मात्र इतनी है कि इन दुःख के काँटों का निराकरण कौन किस प्रकार करता है।प्रत्येक व्यक्ति की जीवन जीने और कार्य करने की शैली अलग-अलग प्रकार की होती है। इस शैली की नकल नहीं की जा सकती। प्रत्येक व्यक्ति की स्थितियाँ और परिस्थितियां अलग- अलग होती हैं।ऐसी स्थिति में सबका जीवन भी अलग -अलग प्रकार से चलता है। यह अनुकरणीय नहीं है।इसमें उसकी परिवारिक आर्थिक सामाजिक भौगोलिक और पारिस्थितिक स्थितियाँ बदलती रहती हैं,जो उसकी सुख की खेती को प्रभावित करती हैं। बिना किसी पूर्व योजना और दूरंदेशी के सब काम खराब हो जाता है। लोग समझते हैं कि उनके पास पैसे की कोई कमी नहीं है, इसलिए उनका कुछ भी अशुभ नहीं हो सकता। यह उनके चिंतन की एक बहुत बड़ी भूल है।पैसा एक साधन हो सकता है,भगवान नहीं हो सकता। किसी कार्य की सफलता के लिए बुद्धि चातुर्य भी अनिवार्य है।जो सबके पास नहीं होता। प्रायः धनिक लोग समझते हैं कि वे बुद्धि के भगवान हैं,उन्हें कहीं कोई रुकावट नहीं आ सकती। यह उनकी सबसे बड़ी भूल है।

आदमी जल्दी से जल्दी धनी बनना चाहता है। और इस प्रयास में वह अपने चारों ओर मकड़ी का ऐसा जाल बना लेता है,जिसमें वह स्वयं ही उलटा टंग जाता है।कार्याधिक्य भी फसल में झंखाड़ों को उगने के लिए आमंत्रण है। इसके लिए व्यवस्थित प्रबंधन का होना अति अनिवार्य है। यदि समुचित प्रबंधन नहीं तो किसी छोटे से छोटे कार्य में सफलता मिलना भी संदिग्ध है।

पशु हो या पक्षी, कीट पतंगा हो या मनुष्य :सभी सुखाकांक्षी हैं।सबके सुख अलग- अलग प्रकार के हैं।अपनी ही सीमा का अतिक्रमण भी दुःखों को आहूत करने के समान है। 'जब आवे संतोष धन ,सब धन धूरि समान ' -कथन के अनुसार किसी सुख की कोई सीमा नहीं है। जब फसल उगेगी तो खर पतवार उगना भी अनिवार्य है। बस उनका निस्तारण कैसे करना है;यह सीखना भी जरूरी है।अगर यह नहीं आया तो एक दिन पूरे खेत में खर पतवार और झाड़ -झंखाड़ ही

खड़े मिलेंगे,फसल तो उजड़ ही जाएगी। वनैले जानवरों और चिड़ियों से सुरक्षा भी खेत स्वामी का दायित्व है।इसको  नजरंदाज नहीं किया जा सकता।खूब सुख की फसल लगाइए ,किन्तु उसका समुचित नियोजन और श्रेष्ठ प्रबंधन भी उसकी सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। बया पक्षी अपने श्रेष्ठ प्रबंधन और श्रम से अपने सुंदर और सुडौल नीड़ में निवास करता है और कौवा इतना कुशल प्रबंधन अनिभिज्ञ है कि सही घोंसला भी नहीं बना पाता ,तो उस प्रकार से सूखी जीवन जिएगा भी तो कैसे !आदमी को भी बया पक्षी की तरह नियोजक और कुशल प्रबंधक होना चाहिए । फिर देखिए उसकी खेती में झाड़ -झंखाड़ कैसे फसल को बरबाद करते हैं ?

शुभमस्तु ,

24.01.2026◆12.00 मध्याह्न

                ◆◆◆

जीवन है अनमोल [ कुंडलिया ]

 047/2026


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

मानव  तन अनमोल  है,रखना  इसका ध्यान।

पुष्ट  रखें हर   अंग  को,चंद्रहास   ज्यों म्यान।।

चंद्रहास   ज्यों    म्यान,देह   के  अंग सँजोएँ।

ऑंख नाक  मुख दंत,नित्य सद जल से धोएँ।।

'शुभम्'  करें मत पान,सुरा का बनकर दानव।

तन   जीवन   की  खान,सहेजे ही  हर मानव।।


                         -2-

मानव जीवन  धन्य  है,मिला  तुम्हें नर गात।

सदा समझ अनमोल ये, तुच्छ नहीं ये बात।।

तुच्छ नहीं  ये बात, इतर  पशु खग से न्यारा।

नहीं कीट या भेक, नहीं  सरिता की   धारा।।

'शुभम्' लगा  ले बाँध,नहीं  रहना बन दानव।

प्रतिपल    इसे  सँवार, बने  रहना है मानव।।


                         -3-

अपना  चरित   सँवारिये,चरित बड़ा  अनमोल।

बद  करनी   इस  देह   की,देती  है  विष घोल।।

देती    है  विष    घोल,  दाग  जीवन  में लगता।

मिले  जहाँ  भी  पोल,  वहाँ सद्गुण कब उगता।।

'शुभम्' चरित ही सत्य, न  समझें इसको सपना।

समझ  मूढ़ नर तथ्य,कनक -सा जीवन अपना।।


                         -4-

मानव  जीवन   के लिए,ज्ञान   बड़ा अनमोल।

सभी  बड़ों  से   लीजिए,मिले जहाँ अनतोल।।

मिले   जहाँ  अनतोल,  विश्व शिक्षालय सारा।

पंच  तत्त्व  खग   वृक्ष,सभी   ने   ज्ञान सँवारा।

'शुभम्'  बने  सत पात्र,  नहीं करना कोरा रव।

मौन गगन   के  सूर्य,  चाँद   से  सीखे मानव।।


                         -5-

पानी    व्यर्थ  न   कीजिए, पानी  है अनमोल।

कम से कम  में काम   ले,बहा   नहीं अनतोल।।

बहा नहीं  अनतोल,  एक  दिन  प्यासा मरना।

नहीं   रहे  कुछ  हाथ,पड़े जब तुझे बिफरना।।

'शुभम्'   न   उगना  अन्न,  मरेगी   तेरी नानी।

बूँद - बूँद  अनमोल,अमिय  यह निर्मल पानी।।


शुभमस्तु !


23.01.2026◆9.15 आ०मा०

                    ◆◆◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...