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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
कविता के दरबार में, खड़ा 'शुभम्' कर जोड़।
करे विनय माँ शारदा,न दें 'शुभम्' को छोड़।।
न दें 'शुभम्' को छोड़,लिखे मनहारी रचना।
गद्य-पद्य का साज, पड़े यद्यपि नित तपना।।
'शुभम्' चले उस ओर,न जाए दिनकर सविता।
लगे चरण में ध्यान,करे कवि ऐसी कविता।।
-2-
बचपन यौवन प्रौढ़ता, गए बीत युग तीन।
करता है कवि कल्पना, नित ही दिव्य नवीन।।
नित ही दिव्य नवीन, नहीं कुछ इसमें अपना।
कविता हो कमनीय, देखता हर पल सपना।।
'शुभम्' हृदय हो लीन,झूमती कविता रुनझुन।
चौथापन है पीन, याद आता है बचपन।।
-3-
मानव तन शुभ कर्म का, फल है एक अमोल।
उसमें भी कवि कर्म से, कविता करे अडोल।।
कविता करे अडोल, अटल सौभाग्य मिला है।
ज्ञात नहीं यह तथ्य,बना क्यों काव्य- किला है।।
'शुभम्' शारदा मातु, करें आजीवन कलरव।
कविता ही सौभाग्य, बने रहना नित मानव।।
-4-
आओ कविता से करें, जन-जन का कल्याण।
शुभता के संदेश से, करें जीव का त्राण।।
करें जीव का त्राण, कर्म वाणी या मन से।
सबको करें कृतार्थ, देह से अपने तन से।।
'शुभम्' कर्म ही सत्य, गीत यह मन से गाओ।
कर्म योनि का बीज, उसे बोएँ जन आओ।।
-5-
दोहा चौपाई लिखे, कुंडलिया बहु छंद।
जनहित में निज व्यंग्य से, बिखराया मकरंद।।
बिखराया मकरंद, लेख लिख किया चितावन।
ग़ज़ल सवैया नेक, किया कविता को पावन।।
'शुभम्' कहे अतुकांत, काव्य ने जनमन मोहा।
करें वाह ही वाह, लिखे चौपाई दोहा।।
शुभमस्तु,
29.03.2026◆5.30आ०मा०
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