मंगलवार, 31 मार्च 2026

बौराए हैं आम [ गीत ]

 121/2026


             

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बौराए हैं आम

बाग में

महक रही है अमराई।


ऋतु वसंत का

हुआ आगमन

कुहुक-कुहुक कोकिल कूके

कानों में 

अमृत घुलता है

नहीं एक पल को चूके

कभी हवा

चलती है पछुआ

कभी लहकती पुरवाई।


भौंरे चले

झुंड में  अनगिन

चलो मंजरी को चूमें

मतवाले हों

पीकर मधुरस

ले-ले अँगड़ाई  झूमें

मुस्काती हैं

अरुण कोंपलें

गमक रही नव तरुणाई।


रहें तितलियाँ

क्यों अलि दल से

मधुरस पीने में पीछे

रंगबिरंगी

पहन साड़ियाँ

चहक रहीं ऊपर नीचे

भू पर बिछी

पीत चादर-सी

मंजरियों की उफनाई।


शुभमस्तु,


31.03.2026◆5.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

नील गगन की छटा [ गीतिका ]

 120/2026


   



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नील  गगन  की  विमल   छटा है।

नहीं  तनिक भी   कहीं  घटा   है।।


चैत्र मास   मधु    बाँटे    प्रतिदिन,

अलि   गुंजन   से   बाग  पटा  है।


तपने    लगा   गगन    में     सूरज,

लटकी  वट  की सघन  जटा   है।


ब्रह्म    मुहूरत    में     आ    चहके,

चिड़िया , प्रभु का नाम   रटा  है।


वन   में   गए   भ्रमण   करने  हम,

मिला न  किंचित  एक    गटा   है।


करती है   कल - कल  सुरसरिता,

नहीं  नीर     में     कहीं   भटा  है।


राजा   है     वसंत   ऋतुओं    का,

'शुभम्'   यत्र   सर्वत्र    खटा    है।


शुभमस्तु,


30.03.2026◆ 5.45 आ०मा०

                     ◆◆◆

नहीं घटा है [ सजल ]

 119/2026


           


समांत          : अटा

पदांत           : है

मात्राभार       :16.

मात्रा पतन     : शून्य.


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नील  गगन  की  विमल   छटा है।

नहीं  तनिक भी   कहीं  घटा   है।।


चैत्र मास   मधु    बाँटे    प्रतिदिन।

अलि   गुंजन   से   बाग  पटा  है।।


तपने    लगा   गगन    में     सूरज।

लटकी  वट  की सघन  जटा   है।।


ब्रह्म    मुहूरत    में     आ    चहके।

चिड़िया , प्रभु का नाम   रटा  है।।


वन   में   गए   भ्रमण   करने  हम।

मिला न  किंचित  एक    गटा   है।।


करती है   कल - कल  सुरसरिता।

नहीं  नीर     में     कहीं   भटा  है।।


राजा   है     वसंत   ऋतुओं    का।

'शुभम्'   यत्र   सर्वत्र    खटा    है।।


शुभमस्तु,


30.03.2026◆ 5.45 आ०मा०

                     ◆◆◆

कविता के दरबार में [ कुंडलिया ]

 118/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

कविता के दरबार में, खड़ा 'शुभम्' कर जोड़।

करे विनय माँ शारदा,न  दें 'शुभम्'  को छोड़।।

न दें  'शुभम्'  को  छोड़,लिखे मनहारी रचना।

गद्य-पद्य   का  साज, पड़े  यद्यपि  नित तपना।।

'शुभम्' चले उस ओर,न जाए दिनकर सविता।

लगे  चरण  में  ध्यान,करे  कवि  ऐसी कविता।।


                         -2-

बचपन   यौवन     प्रौढ़ता, गए  बीत   युग   तीन।

करता है कवि  कल्पना,   नित  ही दिव्य   नवीन।।

नित ही  दिव्य  नवीन,  नहीं  कुछ इसमें  अपना।

कविता   हो   कमनीय,  देखता हर   पल  सपना।।

'शुभम्'   हृदय   हो  लीन,झूमती कविता रुनझुन।

चौथापन     है   पीन,   याद   आता   है बचपन।।


                         -3-

मानव तन  शुभ  कर्म  का, फल  है एक अमोल।

उसमें भी  कवि कर्म से,  कविता   करे अडोल।।

कविता   करे अडोल, अटल सौभाग्य  मिला  है।

ज्ञात   नहीं  यह तथ्य,बना क्यों काव्य- किला है।।

'शुभम्'     शारदा   मातु, करें आजीवन कलरव।

कविता   ही    सौभाग्य, बने  रहना  नित मानव।।


                         -4-

आओ   कविता  से करें,  जन-जन  का कल्याण।

शुभता   के    संदेश   से,  करें जीव   का   त्राण।।

करें जीव   का  त्राण, कर्म  वाणी   या मन   से।

सबको    करें   कृतार्थ,  देह से अपने   तन   से।।

'शुभम्'  कर्म  ही  सत्य, गीत  यह  मन से  गाओ।

कर्म   योनि   का  बीज,   उसे बोएँ जन  आओ।।


                         -5-

दोहा     चौपाई    लिखे,   कुंडलिया   बहु   छंद।

जनहित   में निज व्यंग्य से,  बिखराया मकरंद।।

बिखराया    मकरंद,  लेख लिख किया चितावन।

ग़ज़ल    सवैया  नेक, किया  कविता को पावन।।

'शुभम्'   कहे अतुकांत, काव्य   ने जनमन मोहा।

करें      वाह    ही   वाह,   लिखे   चौपाई   दोहा।।


शुभमस्तु,


29.03.2026◆5.30आ०मा०

                  ◆◆◆

शुक्रवार, 27 मार्च 2026

अहंकार [अतुकांतिका]

 117/2026


                


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अहंकार 

यों ही हार नहीं मानता

वह मरेगा और मारेगा

क्या वह नहीं जानता?


अनादिकाल से

अहंकार

खेल खेल रहा है,

अविवेक के साथ

उसका तालमेल रहा है।


आत्महंता है अहंकार

नहीं जानता वह दुत्कार

भरता रहता है

क्षण -क्षण वह फुंकार

इसीलिए तो हो रहा है

आज दुनिया में हाहाकार।


अहंकार को 

कैसे और क्यों समझाओगे

उसके मूल में

विनाश अंतर्निहित है,

वह नहीं जानता कि 

यह सब अनुचित है।


पीछे हटना

 उसने सीखा नहीं,

साँप के बिल में

हाथ जो डालेगा

उसे साँप

डसेगा ही डसेगा,

इंतजार कीजिए

और अहंकार की

विनाश लीला को देखिए।


शुभमस्तु,


27.03.2026◆5.00आ.मा.

                    ◆◆◆

भारहीन होती हैं खुशियाँ [ गीत ]

 116/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भारहीन

होती हैं खुशियाँ

शब्दों में जो कही न जाती।


आँचल में भर

पकी फसल की

सोने जैसी बाल सुनहरी

नहीं खुशी से

समा पा रही

स्मिति ये बतलाती गहरी

अधरों से

जो खुशी फूटती

हँसी स्वयं में है शर्माती।


पहनी 

लाल शाटिका तन पर

पीले हरे वसन अँग ढाँके

पाँव नहीं

धरती पर पड़ते

सुख के खुले बंद दृढ़ टाँके

लगता

धवल पंक्ति दाँतों की

गीत अधर के भीतर गाती।


श्रम का फल

होता है मीठा 

स्वेद बहाए वही जानता

जिसके पाँव न

फटी बिवाई

कैसे जग की पीर मानता

चली जा रही

पगडंडी पर

ठुमक -ठुमक अँगना इठलाती।


शुभमस्तु,


24.03.2026◆ 6.45 आ०मा०

                   ◆◆◆

सबसे पहले देश है [ दोहा गीतिका ]

 115/2026


               


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सबसे     पहले    देश    है, रक्षक  धीर प्रवीर।

जाति-संकुचन व्यक्ति का, देता पद  न कबीर।।


हितकर हो  जो  देश को, करना  है वह काम,

ऊँच -नीच   के  भेद   के, नहीं  चलाएँ   तीर।


सार्थक  मानव  योनि   है, जिए  देश   के हेत,

कर्मों   की   सद्गन्ध   का,  उड़ता   रहे  उशीर।


भर   लेते   हैं  श्वान भी,  यों   तो अपना   पेट,

परपीड़ा   जो    जानते,  कहलाते वह   पीर।


पढ़े-लिखे  शिक्षित  सभी, अनपढ़ मूढ़ गँवार,

जातिवाद    के   भक्त  हैं,अंधा   बाँटे खीर।


देश  रसातल  को  गया, जातिवाद  से आज,

सोच    बड़ी  संकीर्ण   है,देश  दिया   है चीर।


'शुभम्' समर्पित  देश को,भारत जिसका नाम,

नित सेवी  साहित्य   का,  तोड़    क्षुद्र जंजीर।


शुभमस्तु,


23.03.2026◆4.30 आ०मा०

                   ◆◆◆

रक्षक धीर प्रवीर [ सजल ]

 114/2026


  

समांत          :  ईर

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       :24.

मात्रा पतन     :शून्य।


©शब्दकार

डॉ०भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सबसे     पहले    देश    है, रक्षक  धीर प्रवीर।

जाति-संकुचन व्यक्ति का, देता पद  न कबीर।।


हितकर हो  जो  देश को, करना  है वह काम।

ऊँच -नीच   के  भेद   के, नहीं  चलाएँ   तीर।।


सार्थक  मानव  योनि   है, जिए  देश   के हेत।

कर्मों   की   सद्गन्ध   का,  उड़ता   रहे  उशीर।।


भर   लेते   हैं  श्वान भी,  यों   तो अपना   पेट।

परपीड़ा   जो    जानते,  कहलाते वह   पीर।।


पढ़े-लिखे  शिक्षित  सभी, अनपढ़ मूढ़ गँवार।

जातिवाद    के   भक्त  हैं,अंधा   बाँटे खीर।।


देश  रसातल  को  गया, जातिवाद  से आज।

सोच    बड़ी  संकीर्ण   है,देश  दिया   है चीर।।


'शुभम्' समर्पित  देश को,भारत जिसका नाम।

नित सेवी  साहित्य   का,  तोड़    क्षुद्र जंजीर।।


शुभमस्तु,


23.03.2026◆4.30 आ०मा०

                   ◆◆◆

'हुआ' ही 'हुआ' [ अतुकांतिका ]

 113/2026


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सब लफ्ज़ का खेल है

साहित्य हो

या सियासत,

साहित्य में सत्य है

पर सियासत में  

'सत'  कहाँ?


साहित्य 

लफ्ज़ की कला

लफ्ज़- लफ्ज़

कला के साँचे में ढला,

कवि के 

मुखारविंद में पला,

करता हुआ

सबका ही भला।


दूसरी ओर  सियासत

लफ़्फ़ाजी का घूर

जहाँ सत्य नहीं दूर- दूर,

सर्वथा असत्य ही भरपूर

चमचों की चमक का नूर,

तिरछी कर दृष्टि

जनता को रहा घूर।


लफ़्फ़ाजी 

मात्र लफ्जों का ढकोसला,

कोयल के अंडे

कौवों का घोंसला,

कहीं दूर नहीं जाना,

क्या आपने

अभी तक  नहीं पहचाना?

शहर के हर चौराहे

और मंचों पर नाना,

जिनका काम है

मात्र जनता को लुभाना

उलझाना 

मूर्ख बनाना।


लफ़्फ़ाजी से ही तो

बना है

देश की सियासत का

 तानाबाना,

उद्देश्य एकमात्र

अंधभक्तों की फौज का

खोल देना कारखाना,

जहाँ अंधभक्तों को 

साँचें में ढलवाना।


देश 'विश्वघूर' बन  गया है,

लफ़्फ़ाजी को देखो

कैसा तन गया है,

आप बड़े समझदार हैं

पहले ही सब समझ गए हैं

फिर बताने -जताने को

बचता ही क्या है !

इधर से उधर चारों ओर

'हुआ' ही 'हुआ' है।


शुभमस्तु ,


20.03.2026◆6.45 आ०मा०

               ◆◆◆

मंगलवार, 17 मार्च 2026

'वैसे मैं नीरस नहीं' [ संस्मरण ]

 112/2026


    


©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


एक बड़ा -सा हाल लोगों से खचाखच भरा हुआ था।उसमें सैकड़ों पंक्तिबद्ध  लोग कुर्सियों पर बैठे हुए  परस्पर वार्तालीन थे। सामने की एक पंक्ति में कुछ सम्मानन्नीय लोगों के मध्य मैं भी बैठा हुआ था। तभी क्या देखता हूँ कि एक व्यक्ति मेरे तथा अन्य कुछ लोगों के सामने पड़ी हुई मेज पर एक -एक फाइल रखता जा रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि कोई प्रतियोगितात्मक कार्यक्रम होना है,जिसमें हम इने-गिने लोगों को  निर्णायक बनाया गया है।  

तभी मेरे पीछे बैठे हुए एक व्यक्ति ने मुझसे पूछा -रस आया था,क्या आपको मिला? उसके इस अनायास प्रश्न पर मैंने भी कह दिया -'वैसे मैं नीरस नहीं। रस मैं पीता नहीं।' मेरे इस प्रत्युत्तर पर वह  निःशब्द हो गया। तभी यकायक मेरी आँख खुल गई और  मैं बिस्तर से उठ कर बैठ गया। कर्पूर दान के  मध्यम  प्रकाश में समय देखा तो ब्रह्म मुहूर्त के सवा तीन बज रहे थे। और मैं यह सोचने लगा कि यह कैसा स्वप्न था। घटित हुई पूरी घटना के साथ उस व्यक्ति द्वारा मुझसे पूछा गया प्रश्न और मेरा उत्तर मुझे नहीं भूला और तुरंत मोबाइल खोलकर एक स्थान पर उन्हें अंकित करने के साथ -साथ अपने हृदय पटल पर भी लिख लिया और सोचने लगा कि यह  रस को पीने ,मेरे द्वारा स्वयं को नीरस नहीं होने और रस न पीने की बात का अर्थ क्या है? मंतव्य क्या है ? यह स्वप्न -संस्मरण मेरे अवचेतन से पूर्ण चेतन होने की अवस्था में साकार हुआ,जिसे आपको बता रहा हूँ। यदि आप इस तथ्य पर कुछ प्रकाश डाल सकें तो मुझे भी बताने की कृपा करें।

चूँकि मैं एक अकिंचन कवि हूँ। इसलिए रस तो मेरे काव्य और जीवन का प्राण तत्त्व है।उधर मधुमेही होने के कारण मीठे रस खाद्य या रस आदि से दूर भी रहता हूँ। यही वास्तविकता है।उस व्यक्ति ने जिस अभिधा भाव से प्रश्न किया ,उसका प्रत्युत्तर मेरे द्वारा व्यंजना और अभिधात्मक रूप से दिया जाना युक्तिसंगत ही लगा,जिससे मैं अपने अंतर मन में पूर्णतः संतुष्ट हूं।जब काव्य के नौ- नौ रस इस उरस्थल में निरंतर बहते हों तो किसी बाहरी रस की कोई आवश्यकता ही कहाँ रह जाती है। उस व्यक्ति ने भले ही हास्य किया हो या  यथार्थ में पूछ लिया हो किन्तु मेरा सटीक उत्तर पाकर वह निरुत्तर हो गया। ये भीड़ ,दर्शक,श्रोता, फाइल आदि किस बात के प्रतीक हो सकते हैं, कहा नहीं जा सकता।

प्रायः हम लोग जागरण के बाद  स्वप्नों को  भूल जाया करते हैं,किंतु इस स्वप्न का विस्मरण न होना और और उस पर अपना मंतव्य प्रकट करना कुछ तो विशेषार्थ हो सकता है ! स्वप्न तो स्वप्न ही है,कहकर टाला भी नहीं जा सकता और उसे प्रायः विशेष गहनता के साथ ग्रहण भी नहीं किया जाता । पर क्या किया जाए इस  नाचीज़ 'शुभम्' को माँ सरस्वती ने एक कोमल और विचारक मन  भी तो दिया है,उसका क्या ? वह किसलिए काम आएगा। जब एक विचारक और चिंतक ही चिंतन नहीं करेगा तो क्या देश- विदेश  के तानाशाह  विचार करेंगे? उन बेचारों को वैसे ही  अवकाश नहीं है ! जो भी है,जो जैसा था;मैंने आप के समक्ष व्यक्त कर दिया। यदि आप भी अवकाश में हों तो विचार करें।

शुभमस्तु ,

17.03.2026◆9.45आ०मा०

                  ◆●◆

फहरा नवल तिरंगा . [ गीत ]

 111/2026


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अंबर धरती बीच

शून्य सँग

फहरा नवल तिरंगा।


प्राची में केसरिया

लहरे

कहता  रे जन जागो

तन -मन में

जो आलस व्यापित

उसे शीघ्र ही त्यागो

त्याग तपस्या

धर्म कर्म की

बहे सदा ही गंगा।


भू पर

हरे -भरे खेतों में

श्रमिक कर्म में लीन

खुशहाली का

वे प्रतीक हैं

भाव नहीं मन दीन

कोई रहे न

भूखा -प्यासा

तन से मानव नंगा।


श्वेत गगन में

खग दल उड़ता

हर लेता तम सारा

कलरव से

गुंजित है कण -कण

प्रसरित नव उजियारा

नव उल्लास

नवोदित प्रतिपल

तन-मन जन का चंगा।


शुभमस्तु,

17.03.2026◆9.00आ०मा०

                 ●◆●

आपदा में अवसरों की खोज [ नवगीत ]

 110/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आपदा में

अवसरों की खोज का

एक नाम है इंसान।


युद्ध हो 

भूडोल हो

या बाढ़ का अतिचार

रक्तरंजित

लाश से भी

दानवी व्यवहार

कहता धरा पर

श्रेष्ठतम है

मानवी संतान।


मार कर

इंसान को

है  बन रहा जो शेर

नाश के

सन्निकट है

बजता घना रणभेर

कीड़े-मकोड़ों सा

मसलता

विश्व है श्मशान।


आँख से अंधा

प्रभंजन

में उड़ाए तीर

विश्व को

दिखला रहा

वह शक्तिशाली मीर

शांति सुख

भाता नहीं

बहरे हुए हैं कान।


शुभमस्तु,


16.03.2026◆9.30 आ०मा०

                ◆◆◆

भ्रष्टता के सामने [ अतुकांतिका ]

 109/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भ्रष्टता के सामने

हर नियम

कानून

अनुशासन 

प्रबंधन ध्वस्त हैं।


गैस हो

पेट्रोल डीजल

या कि राशन,

जिसकी लाठी

उसकी भैंस।


आदमी के खून की

हर बूँद में हो

भ्रष्टता

क्या कीजिए,

कम नहीं 

यह भी कि 

जिंदा आप हैं।


न्याय या सच

दिखता नहीं

इस आदमी की

आँख पर बँधी

काली पट्टियाँ।


वक्त सबका

न्याय करता

आईना सच का

दिखाता,

बच सका है

कौन उससे 

आज तक।


शुभमस्तु,


16.03.2026◆2.15आ०मा०

                  ◆◆◆

जीवन है मधुयामिनी [ दोहा गीतिका ]

 108/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



जीवन है मधुयामिनी,जब  तक  है मधुवास।

समय न रहता एक-सा,सदा  न रहे उजास।।


तब त्रेता में   दुष्ट   था,   रावण   केवल एक,

कलयुग में रावण घने,हरते   शांति-सियास।


पाप बढ़ा है सोच में,  दूषित   मन के   तार,

शांति-सिया  कैसे  बचें,अमरीका  का  त्रास।


मानवता मन में  नहीं, रहा    नहीं  कुछ  शेष,

वन्य  हुआ  है  आदमी,  बुद्धि   चर रही घास।


ढोंग सभ्यता  का करे, अणुबम का कर शोर,

मानस जिसका  मर गया,हिंसा का वह दास ।।


शक्ति प्रदर्शन  हिंस्र का,क्षम्य  नहीं पल एक,

समय बड़ा बलवान है, करता पल में  ह्रास।


'शुभम्' मूढ़ क्यों चेतता,नहीं    इसी क्षण कूर,

करवाता   है  आप    ही,   अपना   तू उपहास।


शुभमस्तु,


16.03.2026◆1.45आ०मा०

समय न रहता एक-सा [ सजल ]

 107/2026



समांत          :आस

पदांत           :अपदांत

मात्राभार      :24.

मात्रा पतन    :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



जीवन है मधुयामिनी,जब  तक  है मधुवास।

समय न रहता एक-सा,सदा  न रहे उजास।।


तब त्रेता में   दुष्ट   था,   रावण   केवल एक।

कलयुग में रावण घने,हरते   शांति-सियास।।


पाप बढ़ा है सोच में,  दूषित   मन के   तार।

शांति-सिया  कैसे  बचें,अमरीका  का  त्रास।।


मानवता मन में  नहीं, रहा    नहीं  कुछ  शेष।

वन्य  हुआ  है  आदमी,  बुद्धि   चर रही घास।।


ढोंग सभ्यता  का करे, अणुबम का कर शोर।

मानस जिसका  मर गया, हिंसा का  वह दास ।।


शक्ति प्रदर्शन  हिंस्र का,क्षम्य  नहीं पल एक।

समय बड़ा बलवान है, करता पल में  ह्रास।।


'शुभम्' मूढ़ क्यों चेतता,    नहीं  इसी क्षण कूर।

करवाता   है  आप    ही,   अपना   तू उपहास।।


शुभमस्तु,


16.03.2026◆1.45आ०मा०

                  ◆◆◆

कब तक चुप होकर बैठोगे! [ तुकांतिका ]

 106/2026


       

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कब तक 

चुप होकर बैठोगे

यों घुटनों को टेके,

टेप लगा है

क्या होठों पर

स्वयं बने हो जेठे।


अपनी गलियों में 

कुत्ता भी शेर

हुआ करता है,

बाहर नाक

रगड़ता  अपनी

गीदड़ से डरता है।


बना स्वयंभू

दुनिया का जो

शहनशाह अपने को

नोबुल माँग 

रहा फैलाए

उठा युगल वह कर दो।


रावण से भी

अधिक अहं का

चरम न देखा ऐसा

स्वयं थूक कर

चाट रहा है

अभिनय करता कैसा।


भारतवादी

बनना होगा

तोड़ें सब दीवारें

जाति धर्म

विनाश की जड़ हैं

तोड़ी सभी कगारें।


शुभमस्तु,


12.03.2026◆7.00आ०मा०

               ◆◆◆

बुधवार, 11 मार्च 2026

हरे -भरे लहराते खेत [ गीत ]

 105/2026


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


गेहूँ गह-गह

गहराया है

हरे-भरे लहराते खेत।


दूधों भरी

सुदीर्घ बालियाँ

अधिक अन्न उपजाएँ

देख -देख

हर्षित किसान है

माप उन्हें उमगाएँ

उन्नतिशील 

किसान देश का

सबके भरें निकेत।


आम माप से

जो विशेष हो

गुण भी हों भरपूर

उत्पादन हो

अधिक फसल का

रहे गरीबी दूर

आशाएँ 

विश्वास अडिग हों

क्यों न सिद्ध अभिप्रेत!


कृषि प्रधान

हम रहे सदा से

सबकी भूख मिटाना

भूखे पेट न

सोए कोई

ऐसा साज सजाना

बरसें मेघ

समय पर 

मन में आए जन के चेत।


शुभमस्तु,


10.03.2026◆6.00आ०मा०

                 ◆◆◆

सदा कर्म हैं साथ हमारे [ गीतिका ]

 104/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सदा   कर्म     हैं     साथ     हमारे।

जीव    जिएं     सब   कर्म-सहारे।।


कर्म      योनि    के   दाता     होते,

कर्म     चमकते     बनकर    तारे।


कीट मनुज   खग   जलचर  नाना,

कर्माश्रित    हैं      थलचर    सारे।


स्वर्ग-नर्क     कर्मों       से     बनते,

मधुर  नीर     या     सागर   खारे।


निशा दिवस सम  जन का जीवन,

सघन तमस  रवि  के    उजियारे।


सत्कर्मी  सुख - शांति      भोगता,

कर्मों  के  फल     टरें      न  टारे ।


बुरे  कर्म      से      डूबे      तरणी,

'शुभम्'  कर्म    नित  जीव  उबारे।


शुभमस्तु,


09.03.2026◆4.30 आ०मा०

                 ◆◆◆

कर्म योनि के दाता होते [ सजल ]

 103/2026


       

समांत          : आरे

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      :16.

मात्रा पतन    :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सदा   कर्म     हैं     साथ     हमारे।

जीव    जिएं     सब   कर्म-सहारे।।


 होते कर्म     योनि     के     दाता ।

कर्म     चमकते     बनकर    तारे।।


कीट मनुज   खग   जलचर  नाना।

कर्माश्रित    हैं      थलचर    सारे।।


बनें  कर्म   से    स्वर्ग-नर्क      सब।

मधुर  नीर     या     सागर   खारे।।


निशा दिवस सम  जन का जीवन।

सघन तमस  रवि  के    उजियारे।।


सत्कर्मी  सुख - शांति      भोगता।

कर्मों  के  फल     टरें      न  टारे ।।


बुरे  कर्म      से      डूबे      तरणी।

'शुभम्'  कर्म    नित  जीव  उबारे।।


शुभमस्तु,


09.03.2026◆4.30 आ०मा०

                 ◆◆◆

गुरुवार, 5 मार्च 2026

होली है ये होली है [ दोहा ]

 102/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


भाँग  पीएं साहित्य की, कुछ जन हैं बेहोश।

छलनी हुए चरित्र में,सबल   देह  का जोश।।

चंदा   से   धंधा   करें,झोंक   आँख  में धूल।

भैंस सहित खोया  बना,भले हिल रही चूल।।


साझा   संग्रह   छाप कर,  खूब मचाई धूम।

कृपावन्त  मोबाल  है,  कलियाँ  जातीं चूम।।

शुभम् शराबी हो गया,किया व्यंग्य-रस पान।

सत्य -सत्य  ही बोलता, नहीं   झूठ गुणगान।।


दूध   धुले  नेता   यहाँ,   होता  देश विकास।

जनता को कण भर नहीं,उनसे  कोई आस।।

नरक पालिका की  बनी,नाली खुली हजार।

होली   खेलो     प्रेम  से,डाल  उपानह हार।।


अधिकारी   नेता    सभी,  करें   ऊपरी आय।

पेट   नहीं   भरता कभी,चाह  बड़ी निरुपाय।।

बिना  ऊपरी    आय के,  चले  न  कोई काम।

छुरी चलावें   पेट  में,   मुँह    से   जपते राम।।


जन्मजात    है  भृष्टता,  नर- नारी  के बीच।

करें  मिलावट लीद की, लगे सुगंधित कीच।।

धुले   नहीं   हैं  दूध से, शिक्षक  और वकील।

सबसे   ऊपर   हैं   वही, जन के ऊपर हील।।


होली के   परिवेश  में, खुली  मनुज की पोल।

मुख   धोया   जाना  तभी,नेताजी अनमोल।।


शुभमस्तु,


04.03.2026◆11.30 आ.मा.

                 ◆◆◆

फागुन गाए फाग [ दोहा ]

 101/2026


      

[फागुन,फाग,भाँग,गुलाल,अबीर]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                सब में एक

जी ले जी भर जगत में,फागुन के दिन चार।

पिचकारी   ले    प्रेम   की, चला रंग-बौछार।।

फागुन में कलियाँ खिलें, कोयल करे गुहार।

अमराई   मह-मह   करे,   चलती रंग-फुहार।।


डफ ढोलक  बजने  लगे,मची  फाग की धूम।

अलिदल   झूमें   बाग   में,सुमन   रहे   हैं चूम।।

फाग बिना  फागुन नहीं,राग  बिना क्या  गीत।

आग बिना क्या ताप है,प्रियल बिना क्या प्रीत।।


पिए   भाँग जो   प्यार   की,उसे कहाँ है होश।

उचित   नहीं   इतना   सखे,जीवन  में ये जोश।।

भाँग -धतूरा  नित्य   ही, शिव शंकर का भोग।

करते  हैं   विष  पान  जो, करें   जगत नीरोग।।


रँग- गुलाल  उड़ने   लगा, आया है मधुमास।

होली   के   हुड़दंग  में, सी-सी     करे फरास।।

बरसाने   में   उड़ रहा,  पीला   लाल गुलाल।

ब्रजबालाएँ   नाचतीं,  ब्रज   में   मचा धमाल।।


मला गाल पर श्याम के,ज्यों ही लाल अबीर ।

शरमाई   ब्रज   बालिका,  भूल गई निज चीर।।

कोई     गाता  फाग   है,  गाते     कहीं कबीर। 

चंदन  महके भाल पर,सज्जित गाल अबीर।।


                एक में सब

भाँग   गुलाल   अबीर की,मची  हुई है   धूम।

फागुन   गाए   फाग ही,इधर-  उधर जा  घूम।।


शुभमस्तु,


04.03.2026◆8.00आ०मा०

                    ◆◆◆

रंगों का हुड़दंग देखिए! [ गीत ]

 100/2026


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


लाल गुलाबी

नीले पीले

रंगों का हुड़दंग देखिए।


फागुन आया

समा सुहाया

मन में मस्त तरंग है

नाचें गाएँ

मौज मनाएँ

उठती अंग  उमंग है

डफ ढोलक ले

मगन युवा दल

मन में उठी उचंग देखिए।


हाथ पाँव

तन-मन  डूबे हैं

उड़ने लगा गुलाल है

कोई भांग 

पिए मतवाला

मस्ती का संजाल है

रोली चंदन

मलें भाल पर

हमजोली का संग देखिए।


होली होली

होली होली

गाँव नगर बाजार में

चश्मे लगा

नाचते बालक

फागुन फबी बहार में

उमड़ रहा

तन- मन के भीतर

विचलित वीर अनंग देखिए।


शुभमस्तु ,


03.03.2026◆8.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

कुहू- कुहू कोकिल करे [दोहा गीतिका ]

 099/2026


  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कुहू -कुहू  कोकिल करे,फागुन मास धमाल।

डफ-ढोलक बजने  लगे,उड़ने लगा गुलाल।।


बरसाने   की   राधिका, नंदगाँव   के श्याम,

ब्रजबालाएँ    साथ में, नृत्यलीन  ब्रज बाल।


होली   के  उल्लास    में,  मस्त  लताएँ पेड़,

इठलाती  यमुना नदी, बदल रही निज  चाल।


देवर -भौजी     खेलते,  मची    हुई   है धूम,

होली  की खिलवाड़ में,लाल   हुए   हैं गाल।


लाल  अधर   लाली  लसी, बूढ़ा पीपल  एक,

यौवन  छाया    देह    में, बदल   रहा है छाल।


मन्मथ   ले  अंगड़ाइयाँ,  चहक  रहा हर ओर,

तितली   भौंरे   झूमते ,चहक   उठी    हैं डाल।


'शुभम्'   समा   मधुमास का,जड़ चेतन रसलीन,

गेंदा    पाटल   झूमते,  भरें    कुकड़   कूं ताल।


शुभमस्तु ,


02.03.2026◆5.15 आ०मा०

                  ◆◆◆

होली का उल्लास [ सजल ]

 098/2026


       

समांत          : आल

पदांत           :अपदांत

मात्राभार      :24.

मात्रा पतन    :शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कुहू -कुहू  कोकिल करे,फागुन मास धमाल।

डफ-ढोलक बजने  लगे,उड़ने लगा गुलाल।।


बरसाने   की   राधिका, नंदगाँव   के श्याम।

ब्रजबालाएँ    साथ में, नृत्यलीन  ब्रज बाल।।


होली   के  उल्लास    में,  मस्त  लताएँ पेड़।

इठलाती  यमुना नदी, बदल रही निज  चाल।।


देवर -भौजी     खेलते,  मची    हुई   है धूम।

होली  की खिलवाड़ में,लाल   हुए   हैं गाल।।


लाल  अधर   लाली  लसी, बूढ़ा पीपल  एक।

यौवन  छाया    देह    में, बदल   रहा है छाल।।


मन्मथ   ले  अंगड़ाइयाँ,  चहक  रहा हर ओर।

तितली   भौंरे   झूमते ,चहक   उठी    हैं डाल।।


'शुभम्'   समा   मधुमास का,जड़ चेतन रसलीन।

गेंदा    पाटल   झूमते,  भरें    कुकड़   कूं ताल।।


शुभमस्तु ,


02.03.2026◆5.15

रविवार, 1 मार्च 2026

अथिर बुलबुला जीव का [ दोहा ]

 095/2026


   


©शब्दकार

डॉ० भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अथिर बुलबुला जीव का,जाता है जब फूट।

दिखे अँधेरा   विश्व   में,जब   घट  जाए टूट।।

बुरे वक्त   में   ही दिखे,  अपनेपन   का भाव।

निजी बिराने रूप का,जैसा भी भी हो चाव।।


वक्त  परीक्षा  ले  रहा, अपनों की पहचान।

इने-गिने   ही लोग   हैं,जिनको अपना मान।।

करते   हैं   भगवान   जो,  सभी कर्म वे नेक।

टर्र -टर्र   मानव   करे,  ज्यों   सरवर  में भेक।।


आना-जाना  जीव  का, धर्म  एक अनिवार। 

बंद  पड़ा जो  गेह था,कब  खुल  जाए द्वार।।

खूब समझ जाना यही,गति जीवन का नाम।

सड़ता   जल  तालाब  में,   वृथा  रहे बेकाम।।


जब तक अपने पास है,तब तक अपना जान।

विदा हुआ जब जीव ये,उसे न अपना   मान।।

मोह   मिटाने   के  लिए,जन्म-मृत्यु  का खेल।

खेल रहे   भगवान   जी,  चला जीव की रेल।।


समय   सबक सबका यहाँ,जान सके तो जान।

विनत भाव  रखना  सदा,जगती  को पहचान।।

जोड़-जोड़   घर को  भरे, तुझे न पल का होश।

जीना  है  तो जीव जड़, जीना  तू   बिन  जोश।।


सात   दशक   पूरे किए,किन्तु न पाया ज्ञान।

मेरा - मेरा   कर   रहा, गया  नहीं अभिमान।।


शुभमस्तु,


23.02.2026◆8.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

फागुन के नवरंग हैं [ दोहा ]

 097/2026



[ होली,रंग,गुलाल,भंग,धमाल]

                


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


              सब में एक

होली है  मधुमास  का, रंग  भरा त्योहार।

भेदभाव  भूलें  सभी,  करें  सुहृद आचार।।

होली के    हुड़दंग  में,  भूलें  नहीं विवेक।

गले मिलें सद्भाव   से,त्याग   भाव अतिरेक।।


फागुन    के  नव रंग में, नर -नारी आबाल।

तितली भौरें     झूमते, उड़ने   लगा गुलाल।।

रंग-रँगीली    सृष्टि  है,रँगा   हुआ मन मोर।

कुहू-कुहू   कोयल  करे,   स्पंदित    हर पोर।।


बरसाने   में   रंग   की,बही   मृदुल बौछार।

उड़ता लाल गुलाल भी,होली का त्योहार।।

देवर-भौजी   खेलते,  भर -भर  रंग गुलाल।

मर्यादा   के  मान   की, जलती  हुई मशाल।।


रंग  भंग  के    खेल में, उठतीं प्रबल तरंग।

ब्रजबाला  मदमस्त  है, नर -नारी    हैं दंग।।

जब   तरंग  हो भंग की,  शेष न रहे विवेक।

अंग -अंग   है   रंग  में,हलचल  बढ़ीं अनेक।।


सोच-समझकर  खेलना,  रंगों   का त्योहार।

सीमित रहे धमाल भी,मिटे न मन-उजियार।।

बालक  युवा  किशोर भी,करते खूब धमाल।

डफ    ढोलक  मंजीर  के,फड़क रहे हैं गाल।।


                एक में सब

होली   प्रेमिल   पर्व  है,  लाया   रंग गुलाल।

पीते जन कुछ भंग भी,  करते   धूम धमाल।।



शुभमस्तु !


01.03.2026◆12.15प०मा०

                   ◆◆◆

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

कैसे-कैसे रंग:कैसे-कैसे ढंग [ आलेख ]

 096/2026



©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सम्भवतः विपत्तियाँ मनुष्य को सबक सिखाने के लिए ही आती हैं।यह बतलाती हैं कि आपका कौन अपना है और कौन पराया है।किसी की विपत्ति में किसी का पास खड़ा हो जाना ही धूप में तपते राही को  वटवृक्ष की सघन छाँव जैसा होता है।लेकिन इस आकस्मिक आई मेरे किशोर पुत्र के विछोह ने दुनिया के कैसे -कैसे रंग दिखाए, मैं ही जानता हूँ।ये आगामी होली के रंग नहीं थे,ये रंग थे उनकी भावनाओं के,संभावनाओं के,उपेक्षाओं के,उपहासों के,कुछ अंदर ही अंदर प्रसन्नों के ,कुछ उदासों के।सब कुछ मेरी इन डूबती हुई नजरों ने पढ़ा,देखा और अनुभव किया।मेरे हृदय के कोने में कुछ ने स्थान बनाया तो कुछ हृदय से निकल गए। मेरा मति भ्रम दूर हुआ कि वे मेरे शुभचिंतक थे। जी,नहीं  यहाँ और इस विपत्ति काल में भी उनका स्वार्थ बहुत कुछ कह रहा था। एक परीक्षा हो रही थी।हमारी परीक्षा तो अंतर्यामी परमात्मा ले ही रहे थे,साथ ही इस व्यक्ति और समाज की परीक्षा भी हो रही थी।

इधर मेरे किशोर पुत्र साई दत्त का निष्प्राण शरीर माँ धरती की गोद में विश्रांति पाए हुए था,उधर नर नारियों का हुजूम विविध भाव और भंगिमाओं के साथ मूक दर्शक बना हुआ था।किसी का हृदय वास्तव में मेरे दुःख से दुःखी था,किन्तु कुछ नर- नारी ऐसे  भी थे; जो मात्र एक  पाषाण दर्शक थे। जैसे कोई तमाशा हो,एक नजर तमाशे की ओर अपनी वज्र दृष्टि डाली और  ये गए वह गए। जैसे उन्हें किसी से कोई मतलब ही न हो।जैसे उनके हृदय में मानवीय दिल नहीं कोई पत्थर का टुकड़ा फिट कर दिया गया हो। कुछ लोगों की आँखों में आँसू भले ही न हों,पर उनका हृदय द्रवीभूत था। जिससे जो बना वह सहयोग कर रहा था। आगरा से बच्चे के देह को लाने पर घर के बराबर के प्लाट में मेरे शुभचिंतकों ने पहले से ही दरियाँ आदि बिछाकर और धूप से बचाव के लिए टेंट लगाकर सारी व्यवस्थाएँ कर रखी थीं। यह दृश्य देखकर मेरा हृदय उनकी सद्भावना और दूरदर्शिता से भर-भर आया। गाँव से घर परिवार के लोग तो कुछ घण्टे के बाद आए किन्तु उससे पूर्व सारी व्यवस्थाएं उनके द्वारा कर दी गई थीं।

दुनिया और समाज का एक रंग यह भी देखा गया कि सभी लोग स्वार्थी नहीं होते । कुछ ऐसे भी निस्वार्थ लोग हैं जो दूसरों के दर्द का अनुभव कर पाते हैं और समय आने पर अपनत्व से भर जाते हैं। यही सच्ची ईश भक्ति है, समाज से अनुरक्ति है, और उत्पीड़ित की मुक्ति है।पता नहीं कब उड़ता हुआ तिनका डूबते का सहारा बन जाए और कब भारी भरकम शहतीर भी डुबा देने का काम करे। अपना वही है जो समय पर साथ दे। औपचारिकता तो सभी करते हैं किंतु सच्चे मन और तन से साथ निभाने वाले विरले ही होते हैं।उन सबके प्रति मैं नतमस्तक हूँ,जिन्होंने मुझे अपना समझा और डूबती किश्ती के लिए पतवार बने। आभारी मैं उनका भी हूँ जिन्होंने अपने आचरण और व्यवहार से मुझे वह सबक सिखाया ,जो किसी विश्वविद्यालय की बड़ी से बड़ी डिग्री से भी हासिल नहीं हो सकता। 

मैं सोचता हूँ कि क्या विपत्तियाँ और संकटकाल हमें एक नए जीवन की सीख देने के लिए आते हैं अथवा दुनिया और समाज के नए रंग और ढंगों की पहचान की परख के लिए आते हैं ! आज इस विपत्तिकाल में प्रतीत होता है कि  आदमी कितना बहुरूपिया है और समय ही बलवान है। अपना समय निकल जाने पर आदमी भूल जाता है कि ऐसा समय उसके जीवन में भी आ सकता है और आता ही है।

यह मनुष्य की मनुष्यता की पहचान का अवसर है। जब किसी का सुख स्थाई नहीं तो दुःख भला कैसे स्थाई हो सकता है ? दिन के बाद रात आती है और रात के बाद दिन। जीवन का भी यही क्रम है।मेरा छोटा-सा मन  अपने अंतर्मन को यही समझाता है कि चिंता मत कर। जो आज है वह कल नहीं होगा। आशा और विश्वास का सूरज पुनः उदित होगा।

दुःख और विषाद के इन विविध रंगों ने बहुत कुछ सिखाया है। वक्त की पहचान कराई है। सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता। इस स्थान पर आकर दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है।उस दूध और पानी के वे सभी रंग मेरी इन छोटी -छोटी आँखों ने देख लिए हैं।मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है।हम सब समय की डोर से बँधे हैं। वक्त ही कर्ता है ,वक्त ही ईश्वर है। शेष संसार उनका भोक्ता है। इस अनंत ब्रह्मांड में हमारा स्थान पिपीलिका से भी तुच्छ और नगण्य है।इसी स्थान पर पहुँचकर हमारा अहं मर जाता है। समय सबका सबक प्रदाता है। जीवन के विविध रंगों में यह भी जीवन का एक रंग है,जिसे चीन्हकर हम सभी दंग हैं। सम्भवतः दुनिया का यही एक ढंग है। वक्त की कसौटी पर सब कसे जा रहे हैं,मैं भी आप भी और समग्र संसार का जन-जन भी।खरे स्वर्ण और लोहे की पहचान हो रही है। 

शुभमस्तु ,

24.02.2026◆12.45 प०मा०

                  ◆◆◆

अथिर बुलबुला जीव का [ दोहा ]

 095/2026


  


©शब्दकार

डॉ० भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अथिर बुलबुला जीव का,जाता है जब फूट।

दिखे अँधेरा   विश्व   में,जब   घट  जाए टूट।।

बुरे वक्त   में   ही दिखे,  अपनेपन   का भाव।

निजी बिराने रूप का,जैसा भी भी हो चाव।।


वक्त  परीक्षा  ले  रहा, अपनों की पहचान।

इने-गिने   ही लोग   हैं,जिनको अपना मान।।

करते   हैं   भगवान   जो,  सभी कर्म वे नेक।

टर्र -टर्र   मानव   करे,  ज्यों   सरवर  में भेक।।


आना-जाना  जीव  का, धर्म  एक अनिवार। 

बंद  पड़ा जो  गेह था,कब  खुल  जाए द्वार।।

खूब समझ जाना यही,गति जीवन का नाम।

सड़ता   जल  तालाब  में,   वृथा  रहे बेकाम।।


जब तक अपने पास है,तब तक अपना जान।

विदा हुआ जब जीव ये,उसे न अपना   मान।।

मोह   मिटाने   के  लिए,जन्म-मृत्यु  का खेल।

खेल रहे   भगवान   जी,  चला जीव की रेल।।


समय   सबक सबका यहाँ,जान सके तो जान।

विनत भाव  रखना  सदा,जगती  को पहचान।।

जोड़-जोड़   घर को  भरे, तुझे न पल का होश।

जीना  है  तो जीव जड़, जीना  तू   बिन  जोश।।


सात   दशक   पूरे किए,किन्तु न पाया ज्ञान।

मेरा - मेरा   कर   रहा, गया  नहीं अभिमान।।


शुभमस्तु,


23.02.2026◆8.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

बेकस अदाओं की तेरी दीवानगी [ गीत ]

 094/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बेकस 

अदाओं की तेरी

दीवानगी ने मार डाला।


ओट खिड़की की

बचाकर 

नज़र अपनी

देखती 

आँखें चुराकर

विकल हिरनी

मधुर तेरे

बोल दो

मनुहार बाला।


देखकर

अनदेख बनना

क्या कहें हम

लाल बिंदी

लाल साड़ी

सहज सरगम

बिखरे हुए 

कुंतल 

नहीं सिर पर दुशाला।


इश्क का

इज़हार

चिलमन में लुकाकर

पास होकर भी

नहीं मिलती

उजागर

ढल रही है

युगल दृग से

मधुर हाला।


द्वार पर तेरे

खड़े 

नजदीक आओ

ओट में

दुबकी खड़ी

मत शर्म खाओ

लक्षमणी रेखा

बनी

अटका निवाला।


शुभमस्तु,


17.02.2026◆9.30आ०मा०

                   ◆◆◆

करते हैं जग का कल्याण [ गीतिका]

 093/2026




©शब्दकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करते   हैं    जग   का      कल्याण।

नीलकंठ    नित     करते     त्राण।।


जगवंदित      जगपूजित       शंभु,

जगत     पुकारे    कहें      पुराण।


गंगाधर            वे         भोलेनाथ,

तरकस  नहीं    हाथ   में     बाण।


शिव  का    नाम  जपें    हर   बार,

रक्षा    करें     जीव    के     प्राण।


हिम   आवृत    मनहर      कैलाश,

फिर भी  शिव को प्रियल मसाण।


धर्मप्राण    जो     मानव      जीव,

अक्षतवीर्य         करें      निर्वाण।


'शुभम्'  जपे   हर   ॐ     शिवाय,

दिखने      में    प्रतीत     पाषाण।


शुभमस्तु,


16.02.2026◆5.45 आ०मा०

                    ◆◆◆

नीलकंठ नित करते त्राण [ सजल ]

 092/2026


  

समांत         :आण

पदांत          : अपदांत

मात्राभार     : 15.

मात्रा पतन   : शून्य


©शब्दकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करते   हैं    जग   का      कल्याण।

नीलकंठ    नित     करते     त्राण।।


जगवंदित      जगपूजित       शंभु।

जगत     पुकारे    कहें      पुराण।।


गंगाधर            वे         भोलेनाथ।

तरकस  नहीं    हाथ   में     बाण।।


शिव  का    नाम  जपें    हर   बार।

रक्षा    करें     जीव    के     प्राण।।


हिम   आवृत    मनहर      कैलाश।

फिर भी  शिव को प्रियल मसाण।।


धर्मप्राण    जो     मानव      जीव।

अक्षतवीर्य         करें      निर्वाण।।


'शुभम्'  जपे   हर   ॐ     शिवाय।

दिखने      में    प्रतीत     पाषाण।।


शुभमस्तु,


16.02.2026◆5.45 आ०मा०

                    ◆◆◆

शुभम्' कहमुक़री:3

 091/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                       -1-

घर      के   भीतर    आवे     जावे।

कभी   रिझावे     कभी     सतावे।।

करता  कभी- कभी   वह अनबन।

क्या सखि साजन? तेज प्रभंजन।।


                       -2-

कठिन   किया     है   मेरा    जीना।

बहे    देह     से    गरम    पसीना।।

मुझे     भावता      उसका     रूप।

क्या सखि साजन? ना सखि धूप।।


                       -3-

चैन    पड़े    जब    मुझको   छूता।

उसके  बिना   न       मेरा    बूता।।

पड़ा - पड़ा    है     घर     में  सूता।

क्या सखि साजन?ना सखि जूता।


                       -4-

मित्र  मंडली    घर     में     लाता।।

चाय    नाश्ता     भी     बनवाता।।

करता  काम    कभी   वह    लेटा।

क्या सखि साजन?ना सखि बेटा।।


                         -5-

एक    हार   वह     भारी    लाया।

पकड़    मुझे   उसने    पहनाया।।

कहता    कोई      उसे     भतार।

क्या सखि  साजन? रहा   सुनार।।


                     -6-

न    थी  जरूरत     उसको    मेरी।

न  की    दान    में     थोड़ी   देरी।।

एक     दिवस    कर     कन्यादान।

क्या सखि साजन? पिता सुजान।।


                      -7-

घूँघट  में      दुबका   कर    लाया।

घर  पर   जाकर    उसे    उठाया।।

क्या  सावन- का   कोमल     घेवर?

 क्या सखि साजन?ना सखि जेवर।।


                    -8-

मेरे     बिना     न    रोटी     खाता।

जब   खाए     मुस्काता     जाता।।

नहीं  समझना     मीठी     लपसी।

क्या सखि साजन?वह चिकना घी।


                       -9-

कहते   चार     दिनों    का    मेला।

जिसने  पाया       उसने     खेला।।

चूसें     मधुरस      करते     गुंजन।

क्या सखि साजन?तन का यौवन।।


                       -10-

समय  मिले   मम  मुख  को  चूमे।

मदमस्ती    में  हर    पल     झूमे।।

घर  में रहे   कभी    वह       लेटा।

क्या सखि साजन?   अपना बेटा।।


शुभमस्तु,


15.02.2026◆4.00प०मा०

                    ◆◆◆

शुभम्' कहमुकरी:2

 090/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                    -1-

पतला -पतला     मोटा     लंबा।

बिना बाल का  कहें  न    दुम्बा।।

देख उसे   सब      जाते    काँप।

ए सखि   साजन,  कहते  साँप।।


                   -2-

जंगल  में   नित   मंगल    करता।

पेट   शिकारों    से    ही   भरता।।

कभी  न    खाता      खट्टे     बेर।

ए सखि साजन, वन   का    शेर।।


                    -3-

नहीं    माँगकर     भोजन   करता।

माँगे  बिना   वसन   तन    धरता।।

साहस  हो    तो    बता    हिसाब।

वह  सखि   साजन, पढ़े  किताब।।


                   -4-

ऋतु   अषाढ़ सावन     की   आए।

अंबर में      वह   छा-छा     जाए।।

नदिया तब चलती हैं    कल- कल।

ए सखि साजन, नभ का   बादल।।


                     -5-

हो  जाता    जब     घना    अँधेरा।

चिड़ियाँ  करतीं    नीड़      बसेरा।।

मिट्टी    उसके      बिना     पलीद।

ए सखि साजन,    कहते     नींद।।


                      -6-

दूर   खड़ा   रहता     है     जाड़ा।

पूस माघ  में     बजे      नगाड़ा।।

सभी   चाहते     उसका    संबल।

ए सखि   साजन, भरके    कंबल।।


                      -7-

नित्य  भोर  में    घर   आ   जाता।

सब    कोई    उसको   ललचाता।।

संडे      मंडे       या       शनिवार।

ए सखि   साजन, वह    अखबार।।


                      -8-

गाढ़ा-गाढ़ा         दूध       पिलाए।

सनातनी  की      माँ     कहलाए।।

जननी    नहीं      नहीं     है   धाय।

ए सखि साजन,    सबकी    गाय।।


                     -9-

ब्रह्मकाल     में      हमें     जगाता।

सिर पर मुकुट    धरे     इठलाता।।

गली - गली    में     दौड़े    सरपट।

ए सखि  साजन,कुकड़ूँ  कुक्कुट।।


                       -10-

मुड़गेरी     पर     पड़ा       रुपैया।।

लेता  चोर   न     उसका     भैया।।

उठा  न       लेना     करो     अदेर।

ए सखि साजन,  खग   की   छेर।।


शुभमस्तु,


14.02.2026◆5.00प०मा०

                    ◆◆◆

शुभम्' कहमुक़री:1

 089/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



                      -1-

सिर-आँखों    पर      रहे    सवार।

करता     मुझसे     भारी    प्यार।।

कैसा   है    वह    नया     करिश्मा।

क्या सखि साजन,ना सखि चश्मा।।


                    -2-

मौसम    कुहू -कुहू     का आया।

कलियों पर अलि  दल  मँडराया।।

अमराई   में        मधुरस    घोले।

क्या सखि साजन,कोयल  बोले।।



                    -3-

नेतागण को    अतिशय     प्यारी।

तन- मन    में   भरती  उजियारी।।

भर - भर  देती      ऐसी    तुरसी।

ए सखि साजन, ना सखि कुरसी।।


                     -4-

फैलाता          निज         अंतर्जाल।

नर -नारी       सब     ही      बेहाल।।

भीतर -भीतर      मन    है     घायल।

क्या सखि साजन,हाथ      मुबायल।।


                     -5-

उसको   प्यार     करे  सब  कोई।

नहीं  मिले   तो    किस्मत    रोई।।

समझ नहीं    कुछ      ऐसा-वैसा।

है सखि   साजन,   केवल   पैसा।।


                      -6-

करता  घर  भर   की    रखवाली।

नहीं    अस्त्र     बंदूक    दुनाली।।

समझ सको    तो   लो जी  ताड़।

ना सखि साजन,  युगल किवाड़।।


                    -6-

पूजा   घर     में    करे     निवास।

दिव्य  शक्तियाँ     उसमें    खास।।

उड़ता  नहीं  न     उसके     पंख।

ना सखि साजन,  बजता   शंख।।


                      -7-

पीकर    पानी      जमती     मिट्टी।

लाल सुर्ख   हो   तपकर      भट्टी।।

तन  पर   नहीं    बनी    है    छींट।

क्या सखि   साजन,  सुथरी   ईंट।।


                      -8-

जग    में    एक       न    परमानेंट।

सेंट     लगाए        पहने       पेंट।।

लगा       डाइयाँ       सुथरे     डेंट।

क्या सखि    साजन,   लेडी-जेंट।।


                   -9-

आग  जले    तो    ऊपर    जाए।

अंबर    में     जाकर     मँडराए।।

आँखों    को वह    लेता     चूम।

क्या सखि साजन,ना सखि धूम।।


                     -10-

अद्भुत  उसकी   अजब  कहानी।

टपके    छप्पर     टूटी     छानी।।

उसके  बिना  न     जीता    वीर।

क्या सखि साजन,अनुपम  नीर।।


शुभमस्तु,


14.02.2026◆2.30 प०मा०

                 ◆◆◆

गलबाँही कर ली [ गीत ]

 088/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 गेंदा ने

गुडहल के सँग

गलबाँही कर ली।


फगुनाहट 

हर ओर

खेत वन क्यारी- क्यारी

नाचे सरसों झूम

चने की 

महिमा न्यारी

कुहू -कुहू के रंग

मृदुल मनचाही कर ली।


महका सित

लाल गुलाब

शलभ मधुकर मंडराए

अरहर  मटकाती कमर

नृत्यरत

अँग उमड़ाए

उड़ता 

पीत पराग

पवन पछुआही कर ली।


मन को मथे

मनोज

विरहिणी बाट निहारे

चैन नहीं

दिन नेंक

यामिनी  नींद  बुहारे

आने में है देर

सजन ने

नाही कर ली।


शुभमस्तु,


14.02.2026◆12.15 प०मा०

                  ◆◆◆

अंतर्जाल की रोड [ अतुकांतिका ]

 087/1026

     

      

       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अंतर्जाल में फँसना ही

ऑनलाइन होना है,

कुछ खरीदो या बेचो

पैसा भेजो या प्राप्त करो

खेल भी खेल लो

बिना सामान के

बिना मैदान के।


मकड़ी की तरह

आदमी ने जाला बनाया

स्वयं ही जा टंगा

कैसे निकले बाहर

अंतर्जाल बुना गया है

अपने ही लिए।


जाल की रंगीनियाँ

कितनी लुभावनी

सम्मोहक

जो एक बार धँसा

वह फंसा ही फंसा

अंतर्जाल का ऐसा है नशा।


लाभ और हानि

चलते साथ -साथ

अपने ही हाथों में है

जाल की नाथ

अति सर्वत्र वर्जित है।


क्या बाल

क्या किशोर युवा प्रौढ़

कोई नहीं किसी से गौड़

विमुख नहीं करता

वृद्धावस्था का मोड़,

सब कुछ छोड़

चलता चला जा रहा

अंतर्जाल की रोड।


शुभमस्तु,


12.02.2026 ◆6.15 प०मा०

                   ◆◆●

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

गिनती सीख [ बाल कविता]

 086/2026


         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


एक एकम एक।

हम   बनें  नेक।।


एक   दूनी   दो।

पड़ा  मत  सो।।


दो   दूने    चार।

छोड़ दे खुमार।।


तीन  दूनी  छह।

यों ही  मत  बह।।


चार  दूनी  आठ।

याद  कर  पाठ।।


पाँच  दूनी  दस।

अभी नहीं  बस।।


छह    दूनी    बारह।

सचाई का पथ गह।।


सात    दूनी   चौदह।

अत्याचार मत  सह।।


आठ    दूनी  सोलह।

करेंगे      किलोलह।।


नौ    दूनी   अठारह।

गोपनीय मत  कह।।


दस     दूनी    बीस।

जिएं    सौ   बरीस।।


शुभमस्तु,


10.02.2026◆3.15प०मा०

                 ◆◆◆

कोयल कुहू- कुहू कर बोली [ बाल कविता ]

 085/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कोयल    कुहू- कुहू   कर   बोली।

उठो    बालको     आई      होली।।


फूल    खिले     हैं   क्यारी -क्यारी। 

रंग-बिरंगी          है          तैयारी।।


गेंदा      और     गुलाब     महकते।

जिन  पर तितली  भ्रमर  चहकते।।


जंगल- जंगल     दहकन      कैसी।

आग  लगी हो    वन     में   ऐसी।।


टेसू      लाल-लाल       हैं     फूले।

कीट - पतंगे     डालें           झूले।।


सरर-सरर     बह      रहीं    हवाएँ।

भरी  गलन में       धूप      तपाए।।


'शुभम्'  लगे  वसंत     ऋतु  आई।

चलती  शीतल     सद     पुरवाई।।


शुभमस्तु,


10.02.2026◆6.45आ०मा० 

                  ◆◆◆

जीवन में मजबूरियाँ [ गीत ]

 084/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आ जाती हैं

कैसी- कैसी

जीवन में मजबूरियाँ।


पास न

माता-पिता बहन भी

गोद धरा की सो जाना

लगा

ईंट पत्थर का तकिया

नव सपनों में खो जाना

बने  विषम

हालात रही क्यों

निज पालक से दूरियाँ।


जीवन में

क्या -क्या होना है

कौन जानता भावी को

वक्त दिखाए

दिन ये कैसे

ताला बंद न चाबी को

इस वीरान

धरा पर कोई 

उसे सुनाए लोरियाँ।


मैले वस्त्र

देह पर धारे

फटी चप्पलें पैरों में

आ जाती है

देख दशा ये

दया हृदय में गैरों में

नहीं मुलायम 

गद्दे बिस्तर

नहीं फटी भी बोरियाँ।


शुभमस्तु,


10.02.2026◆ 6.00आ०मा०

                  ◆◆◆

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

आहट विरल वसंत की [ दोहा गीतिका ]

 083/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आहट विरल  वसंत  की,रँगे  हुए   निज चीर।

तन -मन वन -वन झूमती,सर सरिता के तीर।।


अमराई    में   गूँजते,   कुहू-कुहू     के  बोल,

विरहिन   बाट  निहारती,टिके न उर में धीर।।


क्यारी    में   पाटल   खिले,वन  में टेसू  लाल,

मह-मह-मह  गेंदा करे,  सरसों   सरस अमीर।


सरर-सरर चलती  हवा,गलन  भरी दिन-रात,

अरहर  रह-रह  झूमती, उड़ता  लाल अबीर।


फगुनाहट  घुलने  लगी, जड़-चेतन के   बीच,

डफ-ढोलक की गूँज में,मस्त   हुए  नर वीर।


दिन   होली  के  आ गए,बालक   करें धमाल,

उड़ता रंग   गुलाल   का,महका विरल उशीर।


'शुभम्' गंध  मलयानिली,तन-मन के हर पोर,

काम-बाण   नित  बेधती,जगा  हृदय में पीर।


शुभमस्तु,


09.02.2026◆7.45 आ०मा०

                  ◆◆◆

क्यारी में पाटल खिले [ सजल]

 082/2026


  

समांत          : ईर

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आहट विरल  वसंत  की,रँगे  हुए   निज चीर।

तन -मन वन -वन झूमती,सर सरिता के तीर।।


अमराई    में   गूँजते,   कुहू-कुहू     के  बोल।

विरहिन   बाट  निहारती,टिके न  उर में धीर।।


क्यारी    में   पाटल   खिले,वन  में टेसू  लाल।

मह-मह-मह  गेंदा करे,  सरसों   सरस अमीर।।


सरर-सरर चलती  हवा,गलन  भरी दिन-रात।

अरहर  रह-रह  झूमती, उड़ता  लाल अबीर।।


फगुनाहट  घुलने  लगी, जड़-चेतन के   बीच।

डफ-ढोलक की गूँज में,मस्त   हुए  नर वीर।।


दिन   होली  के  आ गए,बालक   करें धमाल।

उड़ता रंग   गुलाल   का,महका विरल उशीर।।


'शुभम्' गंध  मलयानिली,तन-मन के हर पोर।

काम-बाण   नित  बेधती,जगा  हृदय में पीर।।


शुभमस्तु,


09.02.2026◆7.45 आ०मा०

                  ◆◆◆

कांति कामिनी काय की [ दोहा ]

 081/2026


   

[कांति,चमक,आभा,प्रभा,सुषमा]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                 सब में एक


कांति कामिनी काय की,करती क्रमिक कमाल।

दो  दृग  से  उर  में   धँसे,  भरती   हुई उछाल।।

कांति बिना इस रूप का,जीवन में क्या मोल।

भ्रमर  झूमते  शाख  पर,मधुरस  चखें अडोल।।


चमक बिना   चंदा   नहीं, नहीं चंद्रिका   चारु।

जीव     सभी   हैं  चाहते, चमक बिखेरे आरु।।

तड़ित   कौंधती   मेघ में,लिए चमक का  तेज।

कंपित उर   नर-नारि  के,निज को रखें सहेज।।


यौवन   की आभा   नई,  भरती ओज अपार।

तन-मन  में नव जोश का, करती सघन प्रसार।।

आभा   से  आकृष्ट   हो, आतीं तितली   पास।

महक  रहे   उद्यान   में,अनगिन   सुमन सहास।।


प्रभा   नई   आकाश में,उषः काल की दिव्य।

प्राची   का      शृंगार   कर,    दर्शाती मंतव्य।।

सौर प्रभा   मंडल  नया,भरता दिव्य प्रकाश।

उषा  न  जाती साथ में, दिनकर नहीं निराश।।


सुषमा सज्जित कामिनी,यौवन का नव  रंग।

आकर्षित   नर   को   करे,भरता हृदय उमंग।। 

सुषमा में  उद्यान  की,भ्रमित हुआ मन  मोर।

नाच उठा   प्रमुदित   बड़ा,बिना  मचाए शोर।।


                 एक में सब


कांति चमक आभा प्रभा,सुषमा के सब नाम।

जैसी   भी   हो भावना, करें  सकल निज काम।।


शुभमस्तु,


08.02.2026◆9.45आ०मा०

                    ◆◆◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...