054/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
कुहू-कुहू कोयल करे,आया है मधुमास।
आम्रकुंज में गूँजते, कंदर्पी अनुप्रास।।
अमराई गुंजारती, नर कोयल के बोल।
सजग करें परिवेश को,मादक मधुरस घोल।।
मादा कोयल मौन है,नर ही करे जगार।
इस भ्रम में रहना नहीं, नर से सुंदर नार।।
सरसों फूली खेत में, भ्रमर उड़ें चहुँ ओर।
कोयल कूके बाग में, नाच रहे वन मोर।।
कोयल मानव मोर में,नर मनमोहक जान।
मेढक भी नर ही फबे,प्रभु का यही विधान।।
कोयल काला रंग का, पर वाणी रसदार।
नहीं रूप पर मोहिए,करना प्रथम विचार।।
समझें कोयल-कपट को,ठगे गए हैं काग।
सेते अंडे छद्म से, लिखा यही दुर्भाग।।
ऋतु वसंत आई नहीं, कोयल धरती मौन।
असमय उचित न बोलना,वचन समझता कौन।।
अशुभ सदा काला नहीं,रंग न जानें लोग।
कोयल की वाणी सुनें, मधुरस भरे प्रयोग।।
प्रथम आचरण जानिए, नहीं देख रँग-रूप।
कोयल ज्यों काली भले,है माधुर्य अनूप।।
कोयल कागा एक-से, भले एक ही रंग।
जब खोलें रसनांग को, सुनते ही सब दंग।।
शुभमस्तु !
29.01.2026◆8.45 आ०मा०
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