058/2026
©व्यंग्यकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
विचारणीय प्रश्न यह है कि उल्लू सदैव टेढ़ा ही क्यों होता है,जिसे सीधा करने की आवश्यकता पड़ जाती है ? इसके उत्तर में इतना कहा जा सकता है कि कुछ चीजें जन्मजात टेढ़ी ही बनाई जाती हैं।जिन्हें आवश्यकतानुसार सीधा करना पड़ जाता है। अब हर उल्लू जलेबी तो नहीं हो सकता ,जिसे ऐसे ही उदरस्थ कर लिया जाए।उल्लू के हाथ पैर पंख अस्थियाँ आदि सभी टेढ़े होते होंगे इसलिए उसे सीधा करना पड़ता है। एक बात यह भी है कि उल्लूओं के बिना आदमी का काम भी नहीं चलता। सभी अक्लमंदों की सरकार कुछ उल्लूओं के आसरे चलती है। यदि दुनिया में उल्लू न हो तो कितनी बड़ी समस्या पैदा हो जाए!उल्लू व्यक्ति ,समाज और देश की अनिवार्य आवश्यकता हैं। ये कुछ प्रतिशत उल्लू ही हैं ,जिनके सिर पीठ और हाथों में हम सबके भविष्य का दारोमदार है। यदि परिवार समाज और देश में सभी अनुल्लू पैदा होने लगें तो कौन किसकी बात मानेगा ! वह तो बेचारा उल्लू ही है कि उसे थोड़ा सा अपनी ओर सीधा कर लो और अपना काम निकाल लो।यह अलग बात है कि काम निकल जाने के बाद उल्लू को दूध की मक्खी की तरह बाहर निकालकर फेंक दो।उल्लू कोई घी की मटकी में गिरी हुई मक्खी तो है नहीं कि घी छानकर या अँगुली की नोंक पर रखकर बाहर फेंक दिया जाए और घी को पुनः इस्तेमाल में ले लिया जाए !
दिन के साथ रात का होना अनिवार्य है। अन्यथा दिन को कोई क्या समझेगा ! इसी प्रकार देश और समाज को चलाने के लिए उल्लुओं की परम आवश्यकता है। प्रयोगकर्ता को उल्लू सीधा करने की कला का विशेषज्ञ होना चाहिए। हर आदमी भी यह काम बखूबी नहीं कर सकता। उसे इसका हुनर जानना और सीखना पड़ता है। 'करत- करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान' के अनुसार जब उल्लूओं से पाला पड़ता है तो हुनर भी आ ही जाता है।
उल्लू देश और समाज के व्यक्तित्व की रीढ़ हैं। ये वही हैं जिन्हें नेताओं ने झंडे- बैनर लगाने ,मंच सजाने,कुर्सियाँ लगाने,नारों को ऊँची से ऊँची आवाज में बुलंद करने,गड्ढे खोदने, टेंट तंबू में बम्बू गाड़ने, रातों रात पेंफलेट चस्पा करने आदि महत कार्यों में लगा दिया जाता है और वे मद्यपान की एक बोतल में ही खुश ही नहीं होते ,उसके टैंक में आकंठ डूब-डूब जाते हैं।एक बार डूबे कि बस ,फिर उन्हें कुछ कहने और बताने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। वे अपना काम अच्छी तरह सँभाल लिए जाते हैं। इतना अवश्य है कि कोई उल्लू बस एक बार सीधा करना पड़ता है,उसे बार बार सीधा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अरे भाई !उल्लू तो बहुत ही संतोषी प्राणी है, बस एक बार उसकी समझ में उसका काम आ जाए ,फिर तो वह जिस समर्पण भाव से कार्य करता है,उतना तो कोई भक्त भी भगवान के साथ समर्पित नहीं होता।
देश के उल्लू समाज के कंधों पर देश का बहुत बड़ा भार है। जब कहीं कोई लड़ाई ,आगजनी,तोड़ फोड़,विद्रोह आदि की बात आती है तो देश के ये उल्लू ही सेना की हरावल बन कर आगे आते हैं। और उल्लूओं की फौज से जा जूझते हैं। और उधर उनका नायक गुप्त निर्देश देता हुआ मूँछों पर ताव देता हुआ श्रेय से बचता या श्रेय को ओढ़ता बिछाता दिखाई देता है। बुद्धिमान या अनुल्लू तभी प्रकाश में आते हैं,जब उनके गलों में भारी भरकम माला पहनाई जाती हो। अन्यथा वे अपना चेहरा छिपाए हुए मुक्तहस्त मुस्कराते रहते हैं। ऐसा कोई युग नहीं रहा,जब देश और समाज में उल्लू पैदा न हुए हों। गेहूँ के साथ भले ही घुन पिस जाता हो ,परंतु उल्लू इतने उल्लू भी नहीं होते कि सहजता से पिस जाएँ।उन्हें अपने मालिकों के लिए कितने बड़े-बड़े काम जो करने हैं। उल्लू ही इस देश का भविष्य हैं। उनका अपना एक सुनियोजित और सुनिश्चित एजेंडा है,जिसके तहत उन्हें सक्रिय रहना है।
उल्लूओं के सम्बंध में एक विशेष और महत्वपूर्ण बात यह भी है किजो 'महान' स्त्री-पुरुष उल्लू पालते हैं, वे भी किसी अन्य के उल्लू हो सकते हैं। भले ही उल्लू होना गौरव की बात न मानी जाती हो ,किन्तु हर उल्लू को अपने उल्लूत्व के गौरव का अभिमान होता है। कोई उल्लू अपने को उल्लू कहलवाना अथवा कहना कदापि पसंद नहीं करता। वह तो बस होता है। यह एक अंडरस्टूड तथ्य है। इन उल्लूओं की आंखें सामान्य उल्लूओं की तरह रात में भी नहीं खुलतीं। वे रात- दिन और बारहों मास बन्द ही रहती हैं। वे इन उल्लूओं के भी बाप के बाप हैं।उल्लू के सम्बंध में यह तथ्य भी ज्ञातव्य है कि उल्लू अपने को छोड़ सबको उल्लू समझता है।वह इसी भ्रम में जीवन बिता देता है कि मैंने सबको खूब उल्लू बनाया।
शुभमस्तु !
30.01.2026◆5.15आ०मा०
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