शनिवार, 31 जनवरी 2026

अभिमान [ कुंडलिया ]

 057/2026


          

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

करता नर अभिमान जो,झुकता उसका शीश।

रहता  नहीं  विवेक  भी, करे  अन्य   से रीश।।

करे  अन्य  से  रीश,किसी  का   मान न जाने।

कहता  वही  अहीश,   खींचकर    लंबी ताने।।

'शुभम्'   निरंकुश मूढ़,  वनैला पशु ज्यों चरता।

अभिमानी नर   क्रूर, नहीं   हित   कोई करता।।


                         -2-

मानव  जो अभिमान में, हुआ मगन मदहोश।

नहीं मानता अन्य को, भरा  हुआ नित जोश।।

भरा हुआ  नित  जोश, बड़ों  को मान न देता।

रिक्त   विवेकी   कोष, स्वार्थ  हित  अंडे सेता।।

'शुभम्'  कर्म   से  हीन, बना  कर्मों  से दानव।

मिली मनुज  की  देह, कौन कहता है मानव।।


                         -3-

मानव जो गुणहीन हो,फिर भी हो अभिमान।

सभी   जानते    हैं   उसे, वह अज्ञान वितान।।

वह    अज्ञान   वितान , हठी अविवेकी होता।

प्रेम  दया   से  हीन,   धर्म    का  सूखा सोता।।

'शुभम्'अशुभ का रूप,शून्य कर्मों का अनुभव।

धर्म   पड़ा  भव  कूप, नाम का  है वह मानव।।


                         -4-

करता  जो संगति  कभी, अभिमानी के साथ।

डूबे  वह  अभिमान    में, पकड़ आपका हाथ।।

पकड़  आपका  हाथ, पतन  का कारण होगा।

कभी   न    देता    साथ, बदलता केवल चोगा।।

'शुभम्'  सुलगती आग,आप  मरता  ही मरता।

उस नर   का   दुर्भाग, साथ उसका जो करता।।


                         -5-

रहता  नहीं    विवेक का,  जिस नर को संज्ञान।

भरा   हुआ उसमें   रहे, नित अकूत अभिमान।।

नित  अकूत  अभिमान, न जाने  ममता क्रोधी।

धर्म  कर्म  या  दान, मान  का  ज्ञान   न बोधी।।

'शुभम्' पिता की बात,कभी पल भर भी सहता।

करता   वह   आघात,   नहीं   सीमा   में रहता।।


शुभमस्तु ,


29.01.2026◆9.30प०मा०

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