057/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
करता नर अभिमान जो,झुकता उसका शीश।
रहता नहीं विवेक भी, करे अन्य से रीश।।
करे अन्य से रीश,किसी का मान न जाने।
कहता वही अहीश, खींचकर लंबी ताने।।
'शुभम्' निरंकुश मूढ़, वनैला पशु ज्यों चरता।
अभिमानी नर क्रूर, नहीं हित कोई करता।।
-2-
मानव जो अभिमान में, हुआ मगन मदहोश।
नहीं मानता अन्य को, भरा हुआ नित जोश।।
भरा हुआ नित जोश, बड़ों को मान न देता।
रिक्त विवेकी कोष, स्वार्थ हित अंडे सेता।।
'शुभम्' कर्म से हीन, बना कर्मों से दानव।
मिली मनुज की देह, कौन कहता है मानव।।
-3-
मानव जो गुणहीन हो,फिर भी हो अभिमान।
सभी जानते हैं उसे, वह अज्ञान वितान।।
वह अज्ञान वितान , हठी अविवेकी होता।
प्रेम दया से हीन, धर्म का सूखा सोता।।
'शुभम्'अशुभ का रूप,शून्य कर्मों का अनुभव।
धर्म पड़ा भव कूप, नाम का है वह मानव।।
-4-
करता जो संगति कभी, अभिमानी के साथ।
डूबे वह अभिमान में, पकड़ आपका हाथ।।
पकड़ आपका हाथ, पतन का कारण होगा।
कभी न देता साथ, बदलता केवल चोगा।।
'शुभम्' सुलगती आग,आप मरता ही मरता।
उस नर का दुर्भाग, साथ उसका जो करता।।
-5-
रहता नहीं विवेक का, जिस नर को संज्ञान।
भरा हुआ उसमें रहे, नित अकूत अभिमान।।
नित अकूत अभिमान, न जाने ममता क्रोधी।
धर्म कर्म या दान, मान का ज्ञान न बोधी।।
'शुभम्' पिता की बात,कभी पल भर भी सहता।
करता वह आघात, नहीं सीमा में रहता।।
शुभमस्तु ,
29.01.2026◆9.30प०मा०
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