055/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
आया है मधुमास, कुहू-कुहू कोयल करे।
कंदर्पी अनुप्रास, आम्रकुंज में गूँजते।।
नर कोयल के बोल, अमराई गुंजारती।
मादक मधुरस घोल,सजग करें परिवेश को।।
नर ही करे जगार, मादा कोयल मौन है।
नर से सुंदर नार,इस भ्रम में रहना नहीं।।
भ्रमर उड़ें चहुँ ओर,सरसों फूली खेत में।
नाच रहे वन मोर, कोयल कूके बाग में।।
नर मनमोहक जान, कोयल मानव मोर में।
प्रभु का यही विधान, मेढक भी नर ही फबे।।
पर वाणी रसदार, कोयल काला रंग का।
करना प्रथम विचार, नहीं रूप पर मोहिए।।
ठगे गए हैं काग, समझें कोयल - कपट को।
लिखा यही दुर्भाग, सेते अंडे छद्म से।।
कोयल धरती मौन, ऋतु वसंत आई नहीं।
वचन समझता कौन,असमय उचित न बोलना।।
रंग न जानें लोग, अशुभ सदा काला नहीं।
मसधुरस भरे प्रयोग,कोयल की वाणी सुनें।।
नहीं देख रँग -रूप,प्रथम आचरण जानिए।
है माधुर्य अनूप,कोयल ज्यों काली भले।।
भले एक ही रंग, कोयल कागा एक-से।
सुनते ही सब दंग,जब खोलें रसनांग को।।
शुभमस्तु ,
29.01.2026◆8.45 आ०मा०
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