शनिवार, 24 जनवरी 2026

जीवन है अनमोल [ कुंडलिया ]

 047/2026


        


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

मानव  तन अनमोल  है,रखना  इसका ध्यान।

पुष्ट  रखें हर   अंग  को,चंद्रहास   ज्यों म्यान।।

चंद्रहास   ज्यों    म्यान,देह   के  अंग सँजोएँ।

ऑंख नाक  मुख दंत,नित्य सद जल से धोएँ।।

'शुभम्'  करें मत पान,सुरा का बनकर दानव।

तन   जीवन   की  खान,सहेजे ही  हर मानव।।


                         -2-

मानव जीवन  धन्य  है,मिला  तुम्हें नर गात।

सदा समझ अनमोल ये, तुच्छ नहीं ये बात।।

तुच्छ नहीं  ये बात, इतर  पशु खग से न्यारा।

नहीं कीट या भेक, नहीं  सरिता की   धारा।।

'शुभम्' लगा  ले बाँध,नहीं  रहना बन दानव।

प्रतिपल    इसे  सँवार, बने  रहना है मानव।।


                         -3-

अपना  चरित   सँवारिये,चरित बड़ा  अनमोल।

बद  करनी   इस  देह   की,देती  है  विष घोल।।

देती    है  विष    घोल,  दाग  जीवन  में लगता।

मिले  जहाँ  भी  पोल,  वहाँ सद्गुण कब उगता।।

'शुभम्' चरित ही सत्य, न  समझें इसको सपना।

समझ  मूढ़ नर तथ्य,कनक -सा जीवन अपना।।


                         -4-

मानव  जीवन   के लिए,ज्ञान   बड़ा अनमोल।

सभी  बड़ों  से   लीजिए,मिले जहाँ अनतोल।।

मिले   जहाँ  अनतोल,  विश्व शिक्षालय सारा।

पंच  तत्त्व  खग   वृक्ष,सभी   ने   ज्ञान सँवारा।

'शुभम्'  बने  सत पात्र,  नहीं करना कोरा रव।

मौन गगन   के  सूर्य,  चाँद   से  सीखे मानव।।


                         -5-

पानी    व्यर्थ  न   कीजिए, पानी  है अनमोल।

कम से कम  में काम   ले,बहा   नहीं अनतोल।।

बहा नहीं  अनतोल,  एक  दिन  प्यासा मरना।

नहीं   रहे  कुछ  हाथ,पड़े जब तुझे बिफरना।।

'शुभम्'   न   उगना  अन्न,  मरेगी   तेरी नानी।

बूँद - बूँद  अनमोल,अमिय  यह निर्मल पानी।।


शुभमस्तु !


23.01.2026◆9.15 आ०मा०

                    ◆◆◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...