बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

कैसे-कैसे रंग:कैसे-कैसे ढंग [ आलेख ]

 096/2026



©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


सम्भवतः विपत्तियाँ मनुष्य को सबक सिखाने के लिए ही आती हैं।यह बतलाती हैं कि आपका कौन अपना है और कौन पराया है।किसी की विपत्ति में किसी का पास खड़ा हो जाना ही धूप में तपते राही को  वटवृक्ष की सघन छाँव जैसा होता है।लेकिन इस आकस्मिक आई मेरे किशोर पुत्र के विछोह ने दुनिया के कैसे -कैसे रंग दिखाए, मैं ही जानता हूँ।ये आगामी होली के रंग नहीं थे,ये रंग थे उनकी भावनाओं के,संभावनाओं के,उपेक्षाओं के,उपहासों के,कुछ अंदर ही अंदर प्रसन्नों के ,कुछ उदासों के।सब कुछ मेरी इन डूबती हुई नजरों ने पढ़ा,देखा और अनुभव किया।मेरे हृदय के कोने में कुछ ने स्थान बनाया तो कुछ हृदय से निकल गए। मेरा मति भ्रम दूर हुआ कि वे मेरे शुभचिंतक थे। जी,नहीं  यहाँ और इस विपत्ति काल में भी उनका स्वार्थ बहुत कुछ कह रहा था। एक परीक्षा हो रही थी।हमारी परीक्षा तो अंतर्यामी परमात्मा ले ही रहे थे,साथ ही इस व्यक्ति और समाज की परीक्षा भी हो रही थी।

इधर मेरे किशोर पुत्र साई दत्त का निष्प्राण शरीर माँ धरती की गोद में विश्रांति पाए हुए था,उधर नर नारियों का हुजूम विविध भाव और भंगिमाओं के साथ मूक दर्शक बना हुआ था।किसी का हृदय वास्तव में मेरे दुःख से दुःखी था,किन्तु कुछ नर- नारी ऐसे  भी थे; जो मात्र एक  पाषाण दर्शक थे। जैसे कोई तमाशा हो,एक नजर तमाशे की ओर अपनी वज्र दृष्टि डाली और  ये गए वह गए। जैसे उन्हें किसी से कोई मतलब ही न हो।जैसे उनके हृदय में मानवीय दिल नहीं कोई पत्थर का टुकड़ा फिट कर दिया गया हो। कुछ लोगों की आँखों में आँसू भले ही न हों,पर उनका हृदय द्रवीभूत था। जिससे जो बना वह सहयोग कर रहा था। आगरा से बच्चे के देह को लाने पर घर के बराबर के प्लाट में मेरे शुभचिंतकों ने पहले से ही दरियाँ आदि बिछाकर और धूप से बचाव के लिए टेंट लगाकर सारी व्यवस्थाएँ कर रखी थीं। यह दृश्य देखकर मेरा हृदय उनकी सद्भावना और दूरदर्शिता से भर-भर आया। गाँव से घर परिवार के लोग तो कुछ घण्टे के बाद आए किन्तु उससे पूर्व सारी व्यवस्थाएं उनके द्वारा कर दी गई थीं।

दुनिया और समाज का एक रंग यह भी देखा गया कि सभी लोग स्वार्थी नहीं होते । कुछ ऐसे भी निस्वार्थ लोग हैं जो दूसरों के दर्द का अनुभव कर पाते हैं और समय आने पर अपनत्व से भर जाते हैं। यही सच्ची ईश भक्ति है, समाज से अनुरक्ति है, और उत्पीड़ित की मुक्ति है।पता नहीं कब उड़ता हुआ तिनका डूबते का सहारा बन जाए और कब भारी भरकम शहतीर भी डुबा देने का काम करे। अपना वही है जो समय पर साथ दे। औपचारिकता तो सभी करते हैं किंतु सच्चे मन और तन से साथ निभाने वाले विरले ही होते हैं।उन सबके प्रति मैं नतमस्तक हूँ,जिन्होंने मुझे अपना समझा और डूबती किश्ती के लिए पतवार बने। आभारी मैं उनका भी हूँ जिन्होंने अपने आचरण और व्यवहार से मुझे वह सबक सिखाया ,जो किसी विश्वविद्यालय की बड़ी से बड़ी डिग्री से भी हासिल नहीं हो सकता। 

मैं सोचता हूँ कि क्या विपत्तियाँ और संकटकाल हमें एक नए जीवन की सीख देने के लिए आते हैं अथवा दुनिया और समाज के नए रंग और ढंगों की पहचान की परख के लिए आते हैं ! आज इस विपत्तिकाल में प्रतीत होता है कि  आदमी कितना बहुरूपिया है और समय ही बलवान है। अपना समय निकल जाने पर आदमी भूल जाता है कि ऐसा समय उसके जीवन में भी आ सकता है और आता ही है।

यह मनुष्य की मनुष्यता की पहचान का अवसर है। जब किसी का सुख स्थाई नहीं तो दुःख भला कैसे स्थाई हो सकता है ? दिन के बाद रात आती है और रात के बाद दिन। जीवन का भी यही क्रम है।मेरा छोटा-सा मन  अपने अंतर्मन को यही समझाता है कि चिंता मत कर। जो आज है वह कल नहीं होगा। आशा और विश्वास का सूरज पुनः उदित होगा।

दुःख और विषाद के इन विविध रंगों ने बहुत कुछ सिखाया है। वक्त की पहचान कराई है। सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता। इस स्थान पर आकर दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है।उस दूध और पानी के वे सभी रंग मेरी इन छोटी -छोटी आँखों ने देख लिए हैं।मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है।हम सब समय की डोर से बँधे हैं। वक्त ही कर्ता है ,वक्त ही ईश्वर है। शेष संसार उनका भोक्ता है। इस अनंत ब्रह्मांड में हमारा स्थान पिपीलिका से भी तुच्छ और नगण्य है।इसी स्थान पर पहुँचकर हमारा अहं मर जाता है। समय सबका सबक प्रदाता है। जीवन के विविध रंगों में यह भी जीवन का एक रंग है,जिसे चीन्हकर हम सभी दंग हैं। सम्भवतः दुनिया का यही एक ढंग है। वक्त की कसौटी पर सब कसे जा रहे हैं,मैं भी आप भी और समग्र संसार का जन-जन भी।खरे स्वर्ण और लोहे की पहचान हो रही है। 

शुभमस्तु ,

24.02.2026◆12.45 प०मा०

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अथिर बुलबुला जीव का [ दोहा ]

 095/2026


  


©शब्दकार

डॉ० भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अथिर बुलबुला जीव का,जाता है जब फूट।

दिखे अँधेरा   विश्व   में,जब   घट  जाए टूट।।

बुरे वक्त   में   ही दिखे,  अपनेपन   का भाव।

निजी बिराने रूप का,जैसा भी भी हो चाव।।


वक्त  परीक्षा  ले  रहा, अपनों की पहचान।

इने-गिने   ही लोग   हैं,जिनको अपना मान।।

करते   हैं   भगवान   जो,  सभी कर्म वे नेक।

टर्र -टर्र   मानव   करे,  ज्यों   सरवर  में भेक।।


आना-जाना  जीव  का, धर्म  एक अनिवार। 

बंद  पड़ा जो  गेह था,कब  खुल  जाए द्वार।।

खूब समझ जाना यही,गति जीवन का नाम।

सड़ता   जल  तालाब  में,   वृथा  रहे बेकाम।।


जब तक अपने पास है,तब तक अपना जान।

विदा हुआ जब जीव ये,उसे न अपना   मान।।

मोह   मिटाने   के  लिए,जन्म-मृत्यु  का खेल।

खेल रहे   भगवान   जी,  चला जीव की रेल।।


समय   सबक सबका यहाँ,जान सके तो जान।

विनत भाव  रखना  सदा,जगती  को पहचान।।

जोड़-जोड़   घर को  भरे, तुझे न पल का होश।

जीना  है  तो जीव जड़, जीना  तू   बिन  जोश।।


सात   दशक   पूरे किए,किन्तु न पाया ज्ञान।

मेरा - मेरा   कर   रहा, गया  नहीं अभिमान।।


शुभमस्तु,


23.02.2026◆8.15 आ०मा०

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बेकस अदाओं की तेरी दीवानगी [ गीत ]

 094/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बेकस 

अदाओं की तेरी

दीवानगी ने मार डाला।


ओट खिड़की की

बचाकर 

नज़र अपनी

देखती 

आँखें चुराकर

विकल हिरनी

मधुर तेरे

बोल दो

मनुहार बाला।


देखकर

अनदेख बनना

क्या कहें हम

लाल बिंदी

लाल साड़ी

सहज सरगम

बिखरे हुए 

कुंतल 

नहीं सिर पर दुशाला।


इश्क का

इज़हार

चिलमन में लुकाकर

पास होकर भी

नहीं मिलती

उजागर

ढल रही है

युगल दृग से

मधुर हाला।


द्वार पर तेरे

खड़े 

नजदीक आओ

ओट में

दुबकी खड़ी

मत शर्म खाओ

लक्षमणी रेखा

बनी

अटका निवाला।


शुभमस्तु,


17.02.2026◆9.30आ०मा०

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करते हैं जग का कल्याण [ गीतिका]

 093/2026




©शब्दकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करते   हैं    जग   का      कल्याण।

नीलकंठ    नित     करते     त्राण।।


जगवंदित      जगपूजित       शंभु,

जगत     पुकारे    कहें      पुराण।


गंगाधर            वे         भोलेनाथ,

तरकस  नहीं    हाथ   में     बाण।


शिव  का    नाम  जपें    हर   बार,

रक्षा    करें     जीव    के     प्राण।


हिम   आवृत    मनहर      कैलाश,

फिर भी  शिव को प्रियल मसाण।


धर्मप्राण    जो     मानव      जीव,

अक्षतवीर्य         करें      निर्वाण।


'शुभम्'  जपे   हर   ॐ     शिवाय,

दिखने      में    प्रतीत     पाषाण।


शुभमस्तु,


16.02.2026◆5.45 आ०मा०

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नीलकंठ नित करते त्राण [ सजल ]

 092/2026


  

समांत         :आण

पदांत          : अपदांत

मात्राभार     : 15.

मात्रा पतन   : शून्य


©शब्दकार 

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


करते   हैं    जग   का      कल्याण।

नीलकंठ    नित     करते     त्राण।।


जगवंदित      जगपूजित       शंभु।

जगत     पुकारे    कहें      पुराण।।


गंगाधर            वे         भोलेनाथ।

तरकस  नहीं    हाथ   में     बाण।।


शिव  का    नाम  जपें    हर   बार।

रक्षा    करें     जीव    के     प्राण।।


हिम   आवृत    मनहर      कैलाश।

फिर भी  शिव को प्रियल मसाण।।


धर्मप्राण    जो     मानव      जीव।

अक्षतवीर्य         करें      निर्वाण।।


'शुभम्'  जपे   हर   ॐ     शिवाय।

दिखने      में    प्रतीत     पाषाण।।


शुभमस्तु,


16.02.2026◆5.45 आ०मा०

                    ◆◆◆

शुभम्' कहमुक़री:3

 091/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                       -1-

घर      के   भीतर    आवे     जावे।

कभी   रिझावे     कभी     सतावे।।

करता  कभी- कभी   वह अनबन।

क्या सखि साजन? तेज प्रभंजन।।


                       -2-

कठिन   किया     है   मेरा    जीना।

बहे    देह     से    गरम    पसीना।।

मुझे     भावता      उसका     रूप।

क्या सखि साजन? ना सखि धूप।।


                       -3-

चैन    पड़े    जब    मुझको   छूता।

उसके  बिना   न       मेरा    बूता।।

पड़ा - पड़ा    है     घर     में  सूता।

क्या सखि साजन?ना सखि जूता।


                       -4-

मित्र  मंडली    घर     में     लाता।।

चाय    नाश्ता     भी     बनवाता।।

करता  काम    कभी   वह    लेटा।

क्या सखि साजन?ना सखि बेटा।।


                         -5-

एक    हार   वह     भारी    लाया।

पकड़    मुझे   उसने    पहनाया।।

कहता    कोई      उसे     भतार।

क्या सखि  साजन? रहा   सुनार।।


                     -6-

न    थी  जरूरत     उसको    मेरी।

न  की    दान    में     थोड़ी   देरी।।

एक     दिवस    कर     कन्यादान।

क्या सखि साजन? पिता सुजान।।


                      -7-

घूँघट  में      दुबका   कर    लाया।

घर  पर   जाकर    उसे    उठाया।।

क्या  सावन- का   कोमल     घेवर?

 क्या सखि साजन?ना सखि जेवर।।


                    -8-

मेरे     बिना     न    रोटी     खाता।

जब   खाए     मुस्काता     जाता।।

नहीं  समझना     मीठी     लपसी।

क्या सखि साजन?वह चिकना घी।


                       -9-

कहते   चार     दिनों    का    मेला।

जिसने  पाया       उसने     खेला।।

चूसें     मधुरस      करते     गुंजन।

क्या सखि साजन?तन का यौवन।।


                       -10-

समय  मिले   मम  मुख  को  चूमे।

मदमस्ती    में  हर    पल     झूमे।।

घर  में रहे   कभी    वह       लेटा।

क्या सखि साजन?   अपना बेटा।।


शुभमस्तु,


15.02.2026◆4.00प०मा०

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शुभम्' कहमुकरी:2

 090/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                    -1-

पतला -पतला     मोटा     लंबा।

बिना बाल का  कहें  न    दुम्बा।।

देख उसे   सब      जाते    काँप।

ए सखि   साजन,  कहते  साँप।।


                   -2-

जंगल  में   नित   मंगल    करता।

पेट   शिकारों    से    ही   भरता।।

कभी  न    खाता      खट्टे     बेर।

ए सखि साजन, वन   का    शेर।।


                    -3-

नहीं    माँगकर     भोजन   करता।

माँगे  बिना   वसन   तन    धरता।।

साहस  हो    तो    बता    हिसाब।

वह  सखि   साजन, पढ़े  किताब।।


                   -4-

ऋतु   अषाढ़ सावन     की   आए।

अंबर में      वह   छा-छा     जाए।।

नदिया तब चलती हैं    कल- कल।

ए सखि साजन, नभ का   बादल।।


                     -5-

हो  जाता    जब     घना    अँधेरा।

चिड़ियाँ  करतीं    नीड़      बसेरा।।

मिट्टी    उसके      बिना     पलीद।

ए सखि साजन,    कहते     नींद।।


                      -6-

दूर   खड़ा   रहता     है     जाड़ा।

पूस माघ  में     बजे      नगाड़ा।।

सभी   चाहते     उसका    संबल।

ए सखि   साजन, भरके    कंबल।।


                      -7-

नित्य  भोर  में    घर   आ   जाता।

सब    कोई    उसको   ललचाता।।

संडे      मंडे       या       शनिवार।

ए सखि   साजन, वह    अखबार।।


                      -8-

गाढ़ा-गाढ़ा         दूध       पिलाए।

सनातनी  की      माँ     कहलाए।।

जननी    नहीं      नहीं     है   धाय।

ए सखि साजन,    सबकी    गाय।।


                     -9-

ब्रह्मकाल     में      हमें     जगाता।

सिर पर मुकुट    धरे     इठलाता।।

गली - गली    में     दौड़े    सरपट।

ए सखि  साजन,कुकड़ूँ  कुक्कुट।।


                       -10-

मुड़गेरी     पर     पड़ा       रुपैया।।

लेता  चोर   न     उसका     भैया।।

उठा  न       लेना     करो     अदेर।

ए सखि साजन,  खग   की   छेर।।


शुभमस्तु,


14.02.2026◆5.00प०मा०

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शुभम्' कहमुक़री:1

 089/2026



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



                      -1-

सिर-आँखों    पर      रहे    सवार।

करता     मुझसे     भारी    प्यार।।

कैसा   है    वह    नया     करिश्मा।

क्या सखि साजन,ना सखि चश्मा।।


                    -2-

मौसम    कुहू -कुहू     का आया।

कलियों पर अलि  दल  मँडराया।।

अमराई   में        मधुरस    घोले।

क्या सखि साजन,कोयल  बोले।।



                    -3-

नेतागण को    अतिशय     प्यारी।

तन- मन    में   भरती  उजियारी।।

भर - भर  देती      ऐसी    तुरसी।

ए सखि साजन, ना सखि कुरसी।।


                     -4-

फैलाता          निज         अंतर्जाल।

नर -नारी       सब     ही      बेहाल।।

भीतर -भीतर      मन    है     घायल।

क्या सखि साजन,हाथ      मुबायल।।


                     -5-

उसको   प्यार     करे  सब  कोई।

नहीं  मिले   तो    किस्मत    रोई।।

समझ नहीं    कुछ      ऐसा-वैसा।

है सखि   साजन,   केवल   पैसा।।


                      -6-

करता  घर  भर   की    रखवाली।

नहीं    अस्त्र     बंदूक    दुनाली।।

समझ सको    तो   लो जी  ताड़।

ना सखि साजन,  युगल किवाड़।।


                    -6-

पूजा   घर     में    करे     निवास।

दिव्य  शक्तियाँ     उसमें    खास।।

उड़ता  नहीं  न     उसके     पंख।

ना सखि साजन,  बजता   शंख।।


                      -7-

पीकर    पानी      जमती     मिट्टी।

लाल सुर्ख   हो   तपकर      भट्टी।।

तन  पर   नहीं    बनी    है    छींट।

क्या सखि   साजन,  सुथरी   ईंट।।


                      -8-

जग    में    एक       न    परमानेंट।

सेंट     लगाए        पहने       पेंट।।

लगा       डाइयाँ       सुथरे     डेंट।

क्या सखि    साजन,   लेडी-जेंट।।


                   -9-

आग  जले    तो    ऊपर    जाए।

अंबर    में     जाकर     मँडराए।।

आँखों    को वह    लेता     चूम।

क्या सखि साजन,ना सखि धूम।।


                     -10-

अद्भुत  उसकी   अजब  कहानी।

टपके    छप्पर     टूटी     छानी।।

उसके  बिना  न     जीता    वीर।

क्या सखि साजन,अनुपम  नीर।।


शुभमस्तु,


14.02.2026◆2.30 प०मा०

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गलबाँही कर ली [ गीत ]

 088/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


 गेंदा ने

गुडहल के सँग

गलबाँही कर ली।


फगुनाहट 

हर ओर

खेत वन क्यारी- क्यारी

नाचे सरसों झूम

चने की 

महिमा न्यारी

कुहू -कुहू के रंग

मृदुल मनचाही कर ली।


महका सित

लाल गुलाब

शलभ मधुकर मंडराए

अरहर  मटकाती कमर

नृत्यरत

अँग उमड़ाए

उड़ता 

पीत पराग

पवन पछुआही कर ली।


मन को मथे

मनोज

विरहिणी बाट निहारे

चैन नहीं

दिन नेंक

यामिनी  नींद  बुहारे

आने में है देर

सजन ने

नाही कर ली।


शुभमस्तु,


14.02.2026◆12.15 प०मा०

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अंतर्जाल की रोड [ अतुकांतिका ]

 087/1026

     

      

       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अंतर्जाल में फँसना ही

ऑनलाइन होना है,

कुछ खरीदो या बेचो

पैसा भेजो या प्राप्त करो

खेल भी खेल लो

बिना सामान के

बिना मैदान के।


मकड़ी की तरह

आदमी ने जाला बनाया

स्वयं ही जा टंगा

कैसे निकले बाहर

अंतर्जाल बुना गया है

अपने ही लिए।


जाल की रंगीनियाँ

कितनी लुभावनी

सम्मोहक

जो एक बार धँसा

वह फंसा ही फंसा

अंतर्जाल का ऐसा है नशा।


लाभ और हानि

चलते साथ -साथ

अपने ही हाथों में है

जाल की नाथ

अति सर्वत्र वर्जित है।


क्या बाल

क्या किशोर युवा प्रौढ़

कोई नहीं किसी से गौड़

विमुख नहीं करता

वृद्धावस्था का मोड़,

सब कुछ छोड़

चलता चला जा रहा

अंतर्जाल की रोड।


शुभमस्तु,


12.02.2026 ◆6.15 प०मा०

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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

गिनती सीख [ बाल कविता]

 086/2026


         

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


एक एकम एक।

हम   बनें  नेक।।


एक   दूनी   दो।

पड़ा  मत  सो।।


दो   दूने    चार।

छोड़ दे खुमार।।


तीन  दूनी  छह।

यों ही  मत  बह।।


चार  दूनी  आठ।

याद  कर  पाठ।।


पाँच  दूनी  दस।

अभी नहीं  बस।।


छह    दूनी    बारह।

सचाई का पथ गह।।


सात    दूनी   चौदह।

अत्याचार मत  सह।।


आठ    दूनी  सोलह।

करेंगे      किलोलह।।


नौ    दूनी   अठारह।

गोपनीय मत  कह।।


दस     दूनी    बीस।

जिएं    सौ   बरीस।।


शुभमस्तु,


10.02.2026◆3.15प०मा०

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कोयल कुहू- कुहू कर बोली [ बाल कविता ]

 085/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कोयल    कुहू- कुहू   कर   बोली।

उठो    बालको     आई      होली।।


फूल    खिले     हैं   क्यारी -क्यारी। 

रंग-बिरंगी          है          तैयारी।।


गेंदा      और     गुलाब     महकते।

जिन  पर तितली  भ्रमर  चहकते।।


जंगल- जंगल     दहकन      कैसी।

आग  लगी हो    वन     में   ऐसी।।


टेसू      लाल-लाल       हैं     फूले।

कीट - पतंगे     डालें           झूले।।


सरर-सरर     बह      रहीं    हवाएँ।

भरी  गलन में       धूप      तपाए।।


'शुभम्'  लगे  वसंत     ऋतु  आई।

चलती  शीतल     सद     पुरवाई।।


शुभमस्तु,


10.02.2026◆6.45आ०मा० 

                  ◆◆◆

जीवन में मजबूरियाँ [ गीत ]

 084/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आ जाती हैं

कैसी- कैसी

जीवन में मजबूरियाँ।


पास न

माता-पिता बहन भी

गोद धरा की सो जाना

लगा

ईंट पत्थर का तकिया

नव सपनों में खो जाना

बने  विषम

हालात रही क्यों

निज पालक से दूरियाँ।


जीवन में

क्या -क्या होना है

कौन जानता भावी को

वक्त दिखाए

दिन ये कैसे

ताला बंद न चाबी को

इस वीरान

धरा पर कोई 

उसे सुनाए लोरियाँ।


मैले वस्त्र

देह पर धारे

फटी चप्पलें पैरों में

आ जाती है

देख दशा ये

दया हृदय में गैरों में

नहीं मुलायम 

गद्दे बिस्तर

नहीं फटी भी बोरियाँ।


शुभमस्तु,


10.02.2026◆ 6.00आ०मा०

                  ◆◆◆

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

आहट विरल वसंत की [ दोहा गीतिका ]

 083/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आहट विरल  वसंत  की,रँगे  हुए   निज चीर।

तन -मन वन -वन झूमती,सर सरिता के तीर।।


अमराई    में   गूँजते,   कुहू-कुहू     के  बोल,

विरहिन   बाट  निहारती,टिके न उर में धीर।।


क्यारी    में   पाटल   खिले,वन  में टेसू  लाल,

मह-मह-मह  गेंदा करे,  सरसों   सरस अमीर।


सरर-सरर चलती  हवा,गलन  भरी दिन-रात,

अरहर  रह-रह  झूमती, उड़ता  लाल अबीर।


फगुनाहट  घुलने  लगी, जड़-चेतन के   बीच,

डफ-ढोलक की गूँज में,मस्त   हुए  नर वीर।


दिन   होली  के  आ गए,बालक   करें धमाल,

उड़ता रंग   गुलाल   का,महका विरल उशीर।


'शुभम्' गंध  मलयानिली,तन-मन के हर पोर,

काम-बाण   नित  बेधती,जगा  हृदय में पीर।


शुभमस्तु,


09.02.2026◆7.45 आ०मा०

                  ◆◆◆

क्यारी में पाटल खिले [ सजल]

 082/2026


  

समांत          : ईर

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


आहट विरल  वसंत  की,रँगे  हुए   निज चीर।

तन -मन वन -वन झूमती,सर सरिता के तीर।।


अमराई    में   गूँजते,   कुहू-कुहू     के  बोल।

विरहिन   बाट  निहारती,टिके न  उर में धीर।।


क्यारी    में   पाटल   खिले,वन  में टेसू  लाल।

मह-मह-मह  गेंदा करे,  सरसों   सरस अमीर।।


सरर-सरर चलती  हवा,गलन  भरी दिन-रात।

अरहर  रह-रह  झूमती, उड़ता  लाल अबीर।।


फगुनाहट  घुलने  लगी, जड़-चेतन के   बीच।

डफ-ढोलक की गूँज में,मस्त   हुए  नर वीर।।


दिन   होली  के  आ गए,बालक   करें धमाल।

उड़ता रंग   गुलाल   का,महका विरल उशीर।।


'शुभम्' गंध  मलयानिली,तन-मन के हर पोर।

काम-बाण   नित  बेधती,जगा  हृदय में पीर।।


शुभमस्तु,


09.02.2026◆7.45 आ०मा०

                  ◆◆◆

कांति कामिनी काय की [ दोहा ]

 081/2026


   

[कांति,चमक,आभा,प्रभा,सुषमा]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                 सब में एक


कांति कामिनी काय की,करती क्रमिक कमाल।

दो  दृग  से  उर  में   धँसे,  भरती   हुई उछाल।।

कांति बिना इस रूप का,जीवन में क्या मोल।

भ्रमर  झूमते  शाख  पर,मधुरस  चखें अडोल।।


चमक बिना   चंदा   नहीं, नहीं चंद्रिका   चारु।

जीव     सभी   हैं  चाहते, चमक बिखेरे आरु।।

तड़ित   कौंधती   मेघ में,लिए चमक का  तेज।

कंपित उर   नर-नारि  के,निज को रखें सहेज।।


यौवन   की आभा   नई,  भरती ओज अपार।

तन-मन  में नव जोश का, करती सघन प्रसार।।

आभा   से  आकृष्ट   हो, आतीं तितली   पास।

महक  रहे   उद्यान   में,अनगिन   सुमन सहास।।


प्रभा   नई   आकाश में,उषः काल की दिव्य।

प्राची   का      शृंगार   कर,    दर्शाती मंतव्य।।

सौर प्रभा   मंडल  नया,भरता दिव्य प्रकाश।

उषा  न  जाती साथ में, दिनकर नहीं निराश।।


सुषमा सज्जित कामिनी,यौवन का नव  रंग।

आकर्षित   नर   को   करे,भरता हृदय उमंग।। 

सुषमा में  उद्यान  की,भ्रमित हुआ मन  मोर।

नाच उठा   प्रमुदित   बड़ा,बिना  मचाए शोर।।


                 एक में सब


कांति चमक आभा प्रभा,सुषमा के सब नाम।

जैसी   भी   हो भावना, करें  सकल निज काम।।


शुभमस्तु,


08.02.2026◆9.45आ०मा०

                    ◆◆◆

शनिवार, 7 फ़रवरी 2026

किटकन्ना [ संस्मरण ]

 080/2026


               

©लेखक

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

उस समय मेरी अवस्था लगभग सात वर्ष की थी और वर्ष 1959 का ;जब मैं अपने खेल के  हमजोलियों के साथ पहली-पहली बार प्राथमिक पाठशाला ग्राम धौरऊ  में पढ़ने के लिए ले जाया गया। यों तो सहज ही मेरे मन में पढ़ने-लिखने और पाठशाला में जाने का कोई मन नहीं था;किंतु अनिच्छापूर्वक ही सही मुझे पढ़ने के लिए  जाना ही पड़ गया। यह अलग बात है कि कालांतर में मेरा मन वहाँ लग गया और दैनिक चर्या में साथियों के साथ ढलने लगा।मेरे हाथ में लकड़ी की हत्थेदार एक तख्ती जिसे हम पट्टी कहते थे,पकड़ा दी गई।जिन कोमल हाथों से मैं गेंद बल्ला और कंचा गोली खेलता था,उनमें लकड़ी की यह तख्ती जैसे एक बोझ ही हो गई। पर क्या करता,पढ़ना जो था। मेरे पिताजी अम्मा दादी और बाबा को मुझे पढ़ाना था न ! तो मेरी गाड़ी पढ़ाई की पगडंडी पर चल पड़ी ; अनिच्छा से ही सही ,पर चलने लगी।

पाठशाला जाने का रोज का वही एक ही क्रम था, सुबह उठो ,तैयारी करो ,पट्टी बस्ता सँभालो,दोपहर के खाने को एक कपड़े में पैक करो,बस्ते में रखो, लकड़ी की काली पट्टी को तवे की कालोंच से काला करो, काँच के हरे- हरे मोटे घोंटे से उसे चमकाओ उस पर सीतासरसों के नरम -नरम हरे -हरे पत्ते रगड़ो ,एक हाथ में पट्टी और एक कंधे पर बस्ते का झोला लटकाओ और चल पड़ो।

स्कूल में पहुँचकर टाट पट्टियों पर अपना स्थान ग्रहण करने के बाद जैसे ही प्रार्थना की घण्टी बजे ,पंक्तियाँ बनाकर एक के पीछे एक हाथ जोड़कर खड़े हो जाओ और  'वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्य मार्ग पर डट जावें।' प्रार्थना को समवेत स्वर से गाओ और अंत में भारत माता की जय  और जय हिंद के नारे लगाकर अपने -अपने स्थान पर बैठ जाओ। इसके बाद मुंशी जी श्री अजंट सिंह जी कक्षा में आते और सभी बच्चों को किटकंनों पर इमला लिखने का आदेश करते। कितकन्ने कभी बड़े बच्चे और कभी स्वयं मुंशी जी बना दिया करते।बस पढ़ाई शुरू। जब लिख लिया जाता ,उसके बाद उसका निरीक्षण मुंशी जी करते और सुंदर लेख वाले बच्चों को शाबाशी देते ,पीठ थपथपाते। इमला के बाद गिनती और पहाड़े याद करने का आदेश होता ,जिसका पालन सभी बच्चे अनुशासित होकर करते। कभी -कभी हमें एक गोलाकार में बैठा दिया जाता ,उस समय एक छात्र कोई पहाड़ा या गिनती बोलता जाता और शेष बच्चे उसे एक स्वर में जोर-जोर से गीत जैसे स्वर में सुनाते। नित्य निरंतर पढ़ने-पढ़ाने का यही क्रम चलता था। लगभग दो बजे भोजनावकाश होता ,सभी बच्चे अपने साथ लाए हुए खाने को खोलते और इधर उधर बैठकर खा लेते। पानी पीकर पुनः अपने स्थान पर जाकर टाटपट्टी पर बैठ जाते।

भोजनावकाश के बाद लगभग डेढ़ घण्टे का समय बचता था। इस समय में कभी पीटी तो कभी गिनती पहाड़ों की पुनरावृत्ति तो कभी अन्य मनोरंजक कार्यक्रम कराए जाते। कभी -कभी अंत्याक्षरी भी कराई जाती। कभी- कभी पीटी में लेजम चलाना सिखाया जाता। इस प्रकार एक डेढ़ घण्टे का समय ज्यों ही पूरा होता ,एक बच्चा चार बजे की घण्टी टन -टन का जैसे ही बजाता ,सभी बच्चे खुश हो जाते और हल्ला गुल्ला करते हुए आजाद पंछी की तरह घर की ओर दौड़ पड़ते।

सप्ताह में शनिवार की सबको प्रतीक्षा रहती थी। उस दिन बालसभा का आयोजन होता था,जिसमें बच्चे गीत आदि से मनोरंजन करते ।उस समय विद्यालय के सभी शिक्षक भी उपस्थित रहते थे। यहाँ यह बता देना भी आवश्यक है कि हमारी प्रारंभिक कक्षाओं में बस्ते का कोई पाँच दस किलो का वजन नहीं होता था। उस समय कच्ची एक और पक्की एक दो प्रारंभिक कक्षाएं होती थीं,जिनको पार करके ही विद्यार्थी कक्षा दो में जाता था। उस समय एक पतली सी हिंदी की पुस्तक ,जिससे अक्षर बोध कराया जाता था और एक पतली सी आठ दस पन्नों की गिनती पहाड़ों की पुस्तक बस।कक्षा दो में जोड़ बाकी(घटाना) सिखाया जाता था। पट्टी छूटने लगती थी और उसका स्थान  पत्थर की स्लेट ले लेती थी। जिस पर एक कड़ी पेंसिल की बत्ती से लिखा जाता था। इसी पर जोड़ घटाने के प्रश्न हल किए जाते थे। तीसरी कक्षा में हिंदी गणित कृषि विज्ञान और कला की नोटबुक मिल जाती थी। पहाड़ा तो सदा ही हमारा साथी रहा ,जो गणित के प्रश्न हल करने में सहायक होता।हमने बीस से अधिक पहाड़े याद नहीं किए, आगे के गणित का काम उन्हीं से चलता रहा।गिनतियाँ सौ तक आती ही थीं ,बस इतने से ही गणित का काम हो जाता था।

पाँचवीं कक्षा उत्तीर्ण करने तक अंग्रेज़ी का कहीं दूर-दूर तक भी पता नहीं था। पहली बार छठी कक्षा से ही अंग्रेज़ी हमारी जानकारी में आई ,फिर तो संस्कृत,इतिहास,भूगोल, विज्ञान, जीव विज्ञान,कला ,कृषि विज्ञान  आदि  बहुत कुछ पढ़ा। किटकंनों की इसी सड़क पर चलकर आज तक की मंजिल तय की है। यद्यपि हम आजकल की नई पीढ़ी की तरह आधुनिक भले ही  न हुए हों , तथापि किसी भी जीवन मूल्य और किसी भी अर्थ में किसी तरह के  हीनताबोध से भी ग्रस्त नहीं हैं।पथरीली जमीन और गर्म रेत की तपन को भी इन पाँवों ने महसूस किया है और  इन हाथों ने हर ठंडे गर्म के ताप को भी झेला है। इस जीवन की यह कठोर सच्चाई है। जो मैंने अपने अतीत के किटकंनों पर चलकर बताई है।

शुभमस्तु ,

07.02.2026◆6.00आ०मा०

                 ◆◆◆

किटकंनों की पगडंडी [ नवगीत ]

 079/2026


    

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


डॉट पैन

तब न थी नोटबुक

किटकंनों की पगडंडी।


एक हाथ में

तख्ती लटकी

कंधे पर बस झोला

नाम मात्र की

तीन किताबें

चंचल था मन डोला

पहुँचे जब 

शाला में अपनी

किटकंनों की पगडंडी।


इमला और

सुलेख रोज का

काम यही जो करना था

समय मिले तो

खिलंदड़ी भी

लिखने से कब डरना था

मुंशी जी

गिनती रटवाते

किटकंनों की पगडंडी।


गा- गाकर

समवेत पहाड़े

बैठ गोल में रटते थे

बीच-बीच में

मुंशी जी भी

प्रश्न सभी से करते थे

जँचवाते

अपनी इमला को

किटकन्नों की पगडंडी।


शुभमस्तु ,


07.02.2026◆4.45 आ०मा०

                 ◆◆◆

किटकन्नों पर चलकर आया [ नवगीत ]

 078/2026


   


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बनी काठ की

श्यामल तख्ती

किटकन्नों पर चलकर आया।


अ आ इ ई

उ ऊ ए ऐ 

ओ औ अं अ: बारह आखर

क च ट त प

पंच वर्ग सब

य र ल   व ह    से   बढ़कर 

बावन की

संख्या कर पूरी

गिनती और पहाड़े लाया।


सूखी खड़िया के

किटकन्ने

चलती सरकंडे की कलमें

खड़िया घोल

दवातों में हम

रहते थे  रोजाना   हल में

एक- एक

अक्षर हम सीखे

अपनी मंजिल का पथ पाया।


जोड़-जोड़

अक्षर मात्राएँ

वाक्य बनाना आया जब से

भाषा ज्ञान 

दिया गुरुवर ने

कविता लिखना आई तब से

कृपा शारदा 

माँ की ऐसी

कविता का शृंगार सजाया।


शुभमस्तु,


07.02.2026◆4.00आ०मा०

                 ◆◆◆

कितने बंधन जीव को [ कुंडलिया ]

 077/2026


      

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                           -1-

शादी   बंधन  प्यार  का,  बँधा  हुआ संसार।

नर-नारी  बँधते सभी, जब  यौवन का ज्वार।।

जब यौवन   का   ज्वार, ढूँढ़ते  उत्तम जोड़ी।

धन भी  लिया  उधार, मिले  बस सुंदर मोड़ी।

'शुभम्'   वंश   की  बेल,  बढ़ाएं  करें मुनादी।

मित्रो  चलो  बरात  ,   हमें   करनी   है शादी।।


                         -2-

बंधन  यह  संसार  का,मिले जदपि अनचाह।

किंतु   निभाना  ही  पड़े, बना  आप ही राह।

बना आप   ही  राह,  सहज  हो या पथरीली।

चलना    है  अनिवार्य, भले वह सूखी गीली।।

'शुभम्' कर्म  कर  मीत, बना बंधन को चंदन।

महके जीवन - गीत,जगत का अनुपम बन्धन।।


                         -3-

आया था  जब  कुक्षि में, जननी  के जब जीव।

बंधन   है   यह   कर्म  का, सुदृढ़   बनी जरीव।।

सुदृढ़  बनी  जरीव, भजन  प्रभु से वह करता।

मुक्त  करो  भगवान, जटिल  बंधन   के हर्ता।।

'शुभम्'  शृंखला   एक, कर्म की लेकर  धाया।

मानव  जीवन  नेक,  जटिल  बंधन   है आया।।


                         -4-

कितने बंधन  जीव  को, सुख-दुख के जो हेत।

कभी  शिखर  पर  जा  चढ़े,मिले  कभी भू-रेत।। 

मिले   कभी   भू -रेत,   नियंत्रण  एक न कोई।

तदपि    नहीं    है  चेत, जदपि   मर्यादा खोई।।

'शुभम्' जगत  जंजाल, हजारों मिलते फितने।

बंधन   अपने   काट,  मिले  जीवन में कितने।।


                         -5-

चाहे      अनचाहे      मिलें,   बंधन    है संसार।

देह  मिली  है  जीव   की,  करना   ही है  पार।।

करना  ही    है  पार,  कलपने    से  क्या होगा।

निज  इच्छा  से जीव,  बदल  क्या  पाए चोगा??

'शुभम्'   न  तजता  प्राण, कभी गाहे- अवगाहे।

निज   बंधन   को   भोग,  भले   चाहे अनचाहे।।


शुभमस्तु,


06.02.2026◆7.30आ०मा०

                     ◆◆◆

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

कान को पकड़ें घुमाकर [ नवगीत ]

 076/2026


      शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


कान को 

पकड़ें 

घुमाकर हाथ अपना।


चाल टेढ़ी

साँप जैसी 

लहर खाती

नृत्य की

हर भंगिमा को

जो लजाती

उचित होती

डगमगाती

बढ़ खुजाकर माथ अपना।


शब्द की

फुटबॉल से

तू खेलता जा

रूपकों को

घूर से ले

ठेलता जा

गीत में 

अपना 

बना कर पाथ अपना।


तू नए के 

नाम पर

खा छील छिलके

फेंक 

अंतरमाल 

सारी फाँक गिन के

बन जा

अमर भगवान

अनोखा नाथ अपना।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆3.15 प०मा०

                  ◆◆◆

जल रहे टायर पुराने [ नवगीत ]

 075/2026

     ©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जल रहे

टायर पुराने

आँच से डरना नहीं है।


कह रहे 

वे चाँद सूरज

और सब तारे अधूरे

मात्र उनमें

रौशनी है

करकटों के अन्य घूरे

बात है

सच्ची खरी तो

साँच से  डरना नहीं है।


नव प्रयोगों

के लिए

वे  सचल शाला स्वयंभू

कोष वे

नव रूपकों के

कान में करते  कभी  कू

अगर हीरा

पास हो तो

काँच से डरना नहीं है।


दंभ इतना

और कोई

पालता मन में नहीं है

अन्य कह दे

गलत है सब

वे कहें सब कुछ सही है

आँधियों के

वे झकोरे

टांच से डरना नहीं है।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 2.15 प०मा०

                  ◆◆●

किटकंनों की सड़क [ नवगीत ]

 074/2026


            


©शब्दकार

डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'


किटकन्ने की

सड़क कच्ची

है मुझे अपनी बनानी।


इधर भी

खिड़की खुली है

उधर दरवाजा खुला

कह रहा तू

आज क्यों फिर

पाँव इतना ही झुला

बन के

ठेकेदार  तुझको

बात ही  अपनी चलानी।


आंचलिकता

रूपकों का

है जखीरा पास मेरे

बन खुदा मेरा

न बंदे

जानता  दुर्भाव  तेरे

एक तू

सूरज नहीं है

धूप की तेरी कहानी।


हंकार की

फुंकार तेरी

सुन रहे हैं कान मेरे

ऑंख भी हैं

बंद तेरी

धी गई है तमस घेरे

गोल चक्कर में

भुलाया

उठ रही ऊपर जवानी।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 1.30 प०मा०

नवगीतों की ठेकेदारी [ नवगीत ]

 073/2026


      


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नवगीतों की

ठेकेदारी 

हथियाए हैं।


नहीं चाहते

लिखे नए

नवगीत और कवि

ठेका ठोके 

वही चाहते

कवि नभ के रवि

उन्हें न लिखने 

के ढंग किसी 

अन्य के भाए हैं!


शायद घुट्टी में

पीकर 

वे माँ की आए

नहीं शिष्य जो

कभी अन्य के

वे कहलाए

नव कवियों के

भाग्य 

इन्होंने खाए हैं।


बस

कमियों की बात

उन्हें आती है कहना

लिखे पुराने को

पढ़ 

कर किटकन्ना 

अपनी ही 

मस्ती में

ठेके पर इतराए।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆1.00 प०मा०

                ◆◆◆

डिजीटल तर्जनी [ अतुकांतिका ]

 072/2026

    

             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


तर्जनी-स्पर्श से

कविता

डिजीटल हो गई,

पर्दा मोबाइल का

उजेरा  कह रहा।


अगर चाहें तो

उतारें छाप लें

एक पुस्तक में

नया अवतार लें

आज सम्भव है सभी

देखा गया।


किस रूप में थे 

भाव 

अंतर में छिपे

अब डिजीटल

 मंच पर

आकर रुके

ऑंख छूती मात्र

यह अनुभव नया।


अंतरण धन का

हुआ  डिजिटल सभी

जो कभी

अभिलेख्य था

पकड़े जमीं

विज्ञान की

चमकार का 

खेला नया।


विज्ञान ने

रुकना नहीं

सीखा कभी

कभी धीरे

कभी सत्वर

चाल बढ़ती ही  गई

बद और अच्छा

जो भी हुआ

झेला गया।


शुभमस्तु ,


05.02.202◆12.30प०मा०

                 ◆◆◆

समय ने सब कुछ गहा [ नवगीत ]

 071/2026

    

       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


समय बदला

समय ने 

सब कुछ गहा।


तर्जनी-स्पर्श से 

कविता

डिजीटल हो गई,

नोटबुक वह

लेखनी

किस ओर जाकर सो गई,

पर्दा 

मोबाइल का

उजेरा  कह रहा।


श्याम अक्षर

शब्द भी

 साकार है,

पटल उजला

काव्य का

 आधार है,

भाव उर का

आज  यों

अविरल बहा।


किस दिशा में

आज हम सब

जा रहे

विज्ञान के

नवरंग

ये जतला रहे

शब्द आखर में

नहीं 

जाता कहा।


शुभमस्तु ,


05.02.2026◆12.15 प०मा०

                  ◆◆◆

मनुहार [ सोरठा ]

 070/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



फुला लिए क्यों गाल,मत रूठो प्रिय भामिनी।

करके   एक   सवाल, करता हूँ मनुहार     मैं।।

मिले आपका प्यार,   नहीं   कभी   मैं रूठती।

 करो   नहीं   मनुहार  ,सदा आपको चाहती।।


जिसका  कोई     मीत,    रूठेगा   केवल वही।

हार नहीं   है   जीत,लगती   प्रिय मनुहार तब।।

 तुम्हें     मनाऊँ      कन्त,तुम   रूठो मनुहार से।

 जीवन विमल वसंत,इसी   तरह  मिलता   रहे।।


 हम      दोनों  का   प्यार,होता   है मनुहार में।

 ऐसा  नेह   दुलार,   कभी - कभी मनभावता।।

प्रेम   न    लेश   लगाव,  कभी  हमारा गैर   से।

नहीं   क्रोध  का   ताव,  वहाँ नहीं मनुहार भी।।


प्रिय     लगती  मनुहार,   पत्नी    हो या प्रेयसी।

अपना    नेह     उदार,  सदा  मनाने   में लगे।।

सभी   मनाते     लोग,  संतति   अपनी रूठती।

करें हर्ष   का   योग,  लालच   दे मनुहार  से।।


चलें   उतार-चढ़ाव,धन ऋण से जीवन बना।

कभी   उपेक्षा -ताव, कभी  हुई मनुहार   भी।।

सदा   अपेक्षित   तेल,जीवन  की घुड़दौड़   में।

कर   रूठे से   मेल,   मस्त   रहें   मनुहार   में।।


आ   जाए  यदि गाँठ,   भेद   मिटाती नेह में।

नष्ट   करे   उर   नाँठ,   अमृत-सी मनुहार से।।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 9.30आ०मा०

                 ◆◆◆

प्रिय लगती मनुहार [ दोहा ]

 069/2026


     

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मत रूठो प्रिय भामिनी,फुला लिए क्यों गाल।

करता  हूँ   मनुहार    मैं, करके   एक सवाल।।

नहीं   कभी   मैं रूठती,मिले आपका प्यार।

सदा   आपको   चाहती, करो   नहीं मनुहार।।


रूठेगा    केवल   वही, जिसका   कोई मीत।

लगती  प्रिय    मनुहार तब, हार  नहीं है जीत।।

तुम   रूठो   मनुहार   से,   तुम्हें   मनाऊँ  कन्त।

इसी तरह   खिलता   रहे,  जीवन विमल वसंत।।


होता  है   मनुहार   में, हम      दोनों  का प्यार।

कभी- कभी    मनभावता,   ऐसा  नेह दुलार।।

कभी हमारा   गैर   से,  प्रेम    न  लेश  लगाव।

वहाँ नहीं  मनुहार भी, नहीं क्रोध का   ताव।।


पत्नी  हो    या   प्रेयसी, प्रिय लगती मनुहार।

सदा  मनाने   में  लगे ,  अपना    नेह उदार।।

संतति   अपनी    रूठती,  सभी मनाते   लोग।

लालच   दे   मनुहार   से, करें   हर्ष  का    योग।।


धन ऋण से   जीवन   बना,चलें  उतार चढ़ाव।

कभी हुई   मनुहार    भी, कभी   उपेक्षा-  ताव।

जीवन   की   घुड़दौड़   में, सदा अपेक्षित तेल।

मस्त   रहें   मनुहार    में,  कर   रूठे   से मेल।।


भेद    मिटाती   नेह  में , आ    जाए यदि गाँठ।

अमृत- सी   मनुहार   से, नष्ट    करे   उर नाँठ।।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 10.15 आ०मा०

                 ◆◆◆

बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

आहट मिली बसंत की [ दोहा ]

 068/2026



[फागुन,आहट,अभिसार,बसंत,पतझर]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                सब में एक

रंग भरे मधुमास का,फागुन   ही    शुभ मास।

फूल -फूल  गुंजार  है, मधुकर  का परिहास।।

अंत भला तो   सब भला, फागुन गाए फाग।

वर्ष समापन  हो   रहा,  तोड़    खुमारी जाग।।


कुहू-कुहू   कोकिल  करे,  अमराई   के कुंज।

आहट मिली वसंत की,गुंजित अलिदल पुंज।।

आहट पा निज  कन्त  की, मन में उठी  तरंग।

सन्नारी  कब  सो  सकी,  देख   हुआ प्रिय दंग।।


प्रियतम से अभिसार का, अवसर फागुन मास।

कलियाँ   चटकीं   बाग   में,उड़ती प्रबल सुवास।।

मर्यादा     की   आड़    में,करे  प्रिया अभिसार।

पहने श्यामल   शाटिका,  नयन सजल रतनार।।


यौवन    वयस बसंत है,  राग   रंग   रस   रास।

किसलय विकसित शाख में,जागी सुमन सुवास।।

टेसू      पाटल      रंग     में,   झूम   रहे रतनार।

है  बसंत    मनभावना,   तितली    करे दुलार।।


सदा  न   वेला  फूलते, सदा   न   रहे खुमार।।

पतझर आया  बाग   में,सेमल   सुमन  बहार।

संकेतक   नित   नव्यता,  का   देता मधुमास।

एक  ओर पतझर  हुआ,उधर सुमन की वास।।


                एक में सब

आहट मिली बसंत की,फागुन का मधुमास।

रमणी रत अभिसार में,पतझर भरे उसास।।


शुभमस्तु,


04.02.2026◆7.15 आ०मा०

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नियति यही है [ गीत ]

 067/2026


              


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


इधर अँधेरा

उधर उजाला

नियति यही है।


उगा दिवाकर

जब प्राची में 

मचा जगत में शोर

उषा जगी

कलियाँ मुस्काईं

हुआ सुहाना भोर

नमन प्रणाम

करे जन जीवन

सुगति यही है।


संध्या काल

हुआ तम छाया

खग जाते निज नीड़

घटने लगी

बाजार सड़क पर

नर-नारी की  भीड़

हुआ दिवस-

अवसान शांति से

प्रगति यही है।


उदय हुआ जो

अस्त उसे भी

होना ही यह सत्य

सिंहासन से

पतित हुए नृप

अविचल जीवन तथ्य

पुनः एक 

नव नृप आना है

निरति यही है।


शुभमस्तु ,


03.02.2026◆4.15 आ०मा०

                   ◆◆◆

मनोरथ [ चौपाई ]

 066/2026


           

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शुद्ध  मनोरथ  जिसका    कोई।

उसने     लता    सुंगंधित    बोई।।

हरियाली   उर   में     भर    देती।

हर  नकार को   वह    हर  लेती।।


दूषित   मन  से   काम   न   होता।

सफल मनोरथ  पथ  से  खोता।।

तिलक  छाप का  ढोंग  न  करना।

अभिनय  से सत काज  न सरना।।


करें मनोरथ  मन     से    सच्चा।

बने रहें    ज्यों        भोला    बच्चा।।

छल कपटों  से    करे      विमुखता।

करे पलायन       हृदय - विकलता।।


मन   के   रथ   की   करें     सवारी।

भले-बुरे      विकृत        नर-नारी।।

कैसे    सफल    मनोरथ    होते।

वही   अंत      में     मानुष     रोते।।


अश्व   मनोरथ  के    हों    चंचल।

यत्र    तत्र     करवाते        दंगल।।

भग्न  करे   रथ   रथी   न   बचना।

शेष न रहती   तन    की    रचना।।


नर स्वतंत्र     जो   करे   मनोरथ।

रहे  हाथ में   भावी     का   पथ।।

वल्गा   थाम    नियंत्रित    करना।

नहीं  हवा    में     ऊँचा    उड़ना।।


'शुभम्' मनोरथ  सब  सुखदाता।

यदि    मानव    कर्तव्य   निभाता।।

वहीं  सफलता    करतल    होती।

मिलें  गहन  सागर    में     मोती।।


शुभमस्तु !


02.02.2026◆4.00प०मा०

                 ◆◆◆

शुद्ध बनाओ निज अन्तर्घट [ गीतिका ]

 065/2026


    शुद्ध बनाओ निज अन्तर्घट

                

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शुद्ध     बनाओ    निज   अन्तर्घट।

नहीं    उघाड़ो   प्रिय      अन्तर्पट।।


उर  में  वास करे    जो   प्रति पल,

नाम  उसी का ले क्षण- क्षण  रट।


निज सतपथ से  मत विचलित हो,

एक    इंच   भी   तू  न कभी हट।


सब चलते   हैं  अपने  पथ    पर ,

चलता  रह तू  करे  न  खट-खट ।


छलके  नहीं     बूँद    भर   पानी,

सँवर -सँवर कर  ले चल   ये घट।


अभिनय  में   सब   लगे   हुए   हैं,

तू    भी   बना   हुआ  मंचन-नट।


'शुभम्' दृष्टि-पथ  हो न  धुँधलका,

आने मत दे   दृग   पर   ये    लट।


शुभमस्तु ,


02.02.2026◆6.00आ०मा०

                    ◆◆◆

नहीं उघाड़ो प्रिय अन्तर्पट [ सजल ]

 064/2026




समांत          :अट

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 16.

मात्रा पतन    : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


शुद्ध     बनाओ    निज   अन्तर्घट।

नहीं    उघाड़ो   प्रिय      अन्तर्पट।।


उर  में  वास करे    जो   प्रति पल।

नाम  उसी का ले क्षण- क्षण  रट।।


निज सतपथ से  मत विचलित हो।

एक    इंच   भी   तू  न कभी हट।।


सब चलते   हैं  अपने  पथ    पर ।

चलता  रह तू  करे  न  खट-खट ।।


छलके  नहीं     बूँद    भर   पानी।

सँवर -सँवर कर  ले चल   ये घट।।


अभिनय  में   सब   लगे   हुए   हैं।

तू    भी   बना   हुआ  मंचन-नट।।


'शुभम्' दृष्टि-पथ  हो न  धुँधलका।

आने मत दे   दृग   पर   ये    लट।।


शुभमस्तु ,


02.02.2026◆6.00आ०मा०

                    ◆◆◆

चलती उलटे पाँव सियासत [ ग़ज़ल ]

 063/2026


  

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चलती  उलटे    पाँव    सियासत।

समझे  शहर न   गाँव सियासत।।


उसका  अपना  एक    न    कोई,

नहीं  बनाए    ठाँव     सियासत।


सुनती  नहीं  कान   से कुछ   भी,

अपनी कर - कर  काँव सियासत।


गलत  सही  कुछ   भी  कब माने,

मस्त  चांव ही    चांव   सियासत।


मरे    धूप     में    सारी     जनता,

वोटों  की   घन   छाँव   सियासत।


अपना   सीधा     करती      उल्लू,

पर जन को नित खांव  सियासत।


पाशा 'शुभम्'  पड़े  यदि     उलटा ,

लेती  अपना     दाँव     सियासत।


शुभमस्तु ,


01.02.2026◆12.00मध्याह्न

                ◆◆◆

जो दहका वह निखर गया [ ग़ज़ल]

 062/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप शुभम्'


जो  दहका    वह     निखर   गया।

टूट   गया  जो      बिखर    गया।।


चलता       गया      राह     अपनी,

मंजिल  के    वह     शिखर   गया।


मंजता     रहा     रात -दिन      जो,

बर्तन  घर   का      सँवर        गया।


सहने   की      ताक़त     न     रही,

कमजोरी     में       बिफ़र     गया।


गर्म     रेत    को      छुआ      नहीं,

छुआ  तुरत     ही    सिहर     गया।


आया   था     कुछ     करने    को,

किए  बिना    कब    किधर   गया।


'शुभम्'      गए      कितने    आए,

इधर     दिखा था    उधर     गया।


शुभमस्तु ,


01.02.2026◆11.30 आ०मा०

                   ◆◆◆

बीती हुई कहानी है [ ग़ज़ल ]

 061/2026


       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बीती     हुई       कहानी    है।

फिर  भी   याद   जबानी   है।।


अनगिन    बीत     गई     बरसें,

पर  वह      नहीं   पुरानी      है।


छोटी   भी     छोटी      न    लगे,

वह   सब     आज     बतानी  है।


जो  सोचा      था    नहीं    हुआ,

बात      वही     समझानी     है।


काम  निकाला        चले     गए,

कहन    लगे       बचकानी    है।


उठापटक     सब     याद    रही,

मगर   नहीं      उलझानी      है।


है      खुदगर्ज़       जमाना      ये,

बाकी    नहीं        निशानी      है।


शुभमस्तु !


01.02.2026◆10.15 आ०मा०

                    ◆◆◆

सकल मनोरथ शुद्ध हों [ दोहा ]

 060/2026

        


[इच्छा,चाह,अभिलाषा,कामना,

मनोरथ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                सब में एक


भली-बुरी     इच्छा  करे, मानव इच्छा-दास।

तृप्त  नहीं    होता  कभी, चरता इच्छा-घास।।

इच्छा  सदा   अनंत   हैं,इनका  ओर न   छोर।

सदा  नियंत्रित  ही  करें, मचा   रहीं उर शोर।।



चाह रहे   सब कुछ मिले,किए बिना कुछ काम।

ऐसे    नर   बस   चाहते,  कर्महीन   बन नाम।।

चाह वही   मन  में  करें,निज वश की जो बात।

छुएँ   नहीं   आकाश  को, मिले सुनिश्चित घात।।


करना अभिलाषा वही, जो जनहित  की  हेतु।

भार     उठाए     आपका,   वही   बनाएँ सेतु।।

अभिलाषा  पावन  जगा, करें  ईश की  भक्ति।

सद्भावी   उर  से    रहें, जन-जन से अनुरक्ति।।


सकल कामना हीन   जो,जीवन खेह समान।

बिना  किए  फल  चाहते, तानें जीभ-कमान।।

सबके   प्रति   शुभ  कामना,का  देता संदेश।

उगता  सूरज  नित्य  ही,जग  में देश-विदेश।।


सकल   मनोरथ  शुद्ध हों,  तब होता उद्धार।

मन को   पावन   कीजिए,करके जन उपकार।।

कुटिल मनोरथ से कभी,मिले नहीं सुख चैन।

मन में   जिसके   खोट   है,दुखी   रहे दिन-रैन।।


                एक में सब


अभिलाषा  या कामना, इच्छा हो  या चाह।

वही  मनोरथ कीजिए,मिले  जहाँ शुभ   राह।।


शुभमस्तु!


01.02.2026◆5.30 आ०मा०

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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...