088/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
गेंदा ने
गुडहल के सँग
गलबाँही कर ली।
फगुनाहट
हर ओर
खेत वन क्यारी- क्यारी
नाचे सरसों झूम
चने की
महिमा न्यारी
कुहू -कुहू के रंग
मृदुल मनचाही कर ली।
महका सित
लाल गुलाब
शलभ मधुकर मंडराए
अरहर मटकाती कमर
नृत्यरत
अँग उमड़ाए
उड़ता
पीत पराग
पवन पछुआही कर ली।
मन को मथे
मनोज
विरहिणी बाट निहारे
चैन नहीं
दिन नेंक
यामिनी नींद बुहारे
आने में है देर
सजन ने
नाही कर ली।
शुभमस्तु,
14.02.2026◆12.15 प०मा०
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