बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

अंतर्जाल की रोड [ अतुकांतिका ]

 087/1026

     

      

       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


अंतर्जाल में फँसना ही

ऑनलाइन होना है,

कुछ खरीदो या बेचो

पैसा भेजो या प्राप्त करो

खेल भी खेल लो

बिना सामान के

बिना मैदान के।


मकड़ी की तरह

आदमी ने जाला बनाया

स्वयं ही जा टंगा

कैसे निकले बाहर

अंतर्जाल बुना गया है

अपने ही लिए।


जाल की रंगीनियाँ

कितनी लुभावनी

सम्मोहक

जो एक बार धँसा

वह फंसा ही फंसा

अंतर्जाल का ऐसा है नशा।


लाभ और हानि

चलते साथ -साथ

अपने ही हाथों में है

जाल की नाथ

अति सर्वत्र वर्जित है।


क्या बाल

क्या किशोर युवा प्रौढ़

कोई नहीं किसी से गौड़

विमुख नहीं करता

वृद्धावस्था का मोड़,

सब कुछ छोड़

चलता चला जा रहा

अंतर्जाल की रोड।


शुभमस्तु,


12.02.2026 ◆6.15 प०मा०

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