090/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
पतला -पतला मोटा लंबा।
बिना बाल का कहें न दुम्बा।।
देख उसे सब जाते काँप।
ए सखि साजन, कहते साँप।।
-2-
जंगल में नित मंगल करता।
पेट शिकारों से ही भरता।।
कभी न खाता खट्टे बेर।
ए सखि साजन, वन का शेर।।
-3-
नहीं माँगकर भोजन करता।
माँगे बिना वसन तन धरता।।
साहस हो तो बता हिसाब।
वह सखि साजन, पढ़े किताब।।
-4-
ऋतु अषाढ़ सावन की आए।
अंबर में वह छा-छा जाए।।
नदिया तब चलती हैं कल- कल।
ए सखि साजन, नभ का बादल।।
-5-
हो जाता जब घना अँधेरा।
चिड़ियाँ करतीं नीड़ बसेरा।।
मिट्टी उसके बिना पलीद।
ए सखि साजन, कहते नींद।।
-6-
दूर खड़ा रहता है जाड़ा।
पूस माघ में बजे नगाड़ा।।
सभी चाहते उसका संबल।
ए सखि साजन, भरके कंबल।।
-7-
नित्य भोर में घर आ जाता।
सब कोई उसको ललचाता।।
संडे मंडे या शनिवार।
ए सखि साजन, वह अखबार।।
-8-
गाढ़ा-गाढ़ा दूध पिलाए।
सनातनी की माँ कहलाए।।
जननी नहीं नहीं है धाय।
ए सखि साजन, सबकी गाय।।
-9-
ब्रह्मकाल में हमें जगाता।
सिर पर मुकुट धरे इठलाता।।
गली - गली में दौड़े सरपट।
ए सखि साजन,कुकड़ूँ कुक्कुट।।
-10-
मुड़गेरी पर पड़ा रुपैया।।
लेता चोर न उसका भैया।।
उठा न लेना करो अदेर।
ए सखि साजन, खग की छेर।।
शुभमस्तु,
14.02.2026◆5.00प०मा०
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