बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

बेकस अदाओं की तेरी दीवानगी [ गीत ]

 094/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बेकस 

अदाओं की तेरी

दीवानगी ने मार डाला।


ओट खिड़की की

बचाकर 

नज़र अपनी

देखती 

आँखें चुराकर

विकल हिरनी

मधुर तेरे

बोल दो

मनुहार बाला।


देखकर

अनदेख बनना

क्या कहें हम

लाल बिंदी

लाल साड़ी

सहज सरगम

बिखरे हुए 

कुंतल 

नहीं सिर पर दुशाला।


इश्क का

इज़हार

चिलमन में लुकाकर

पास होकर भी

नहीं मिलती

उजागर

ढल रही है

युगल दृग से

मधुर हाला।


द्वार पर तेरे

खड़े 

नजदीक आओ

ओट में

दुबकी खड़ी

मत शर्म खाओ

लक्षमणी रेखा

बनी

अटका निवाला।


शुभमस्तु,


17.02.2026◆9.30आ०मा०

                   ◆◆◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...