095/2026
©शब्दकार
डॉ० भगवत स्वरूप 'शुभम्'
अथिर बुलबुला जीव का,जाता है जब फूट।
दिखे अँधेरा विश्व में,जब घट जाए टूट।।
बुरे वक्त में ही दिखे, अपनेपन का भाव।
निजी बिराने रूप का,जैसा भी भी हो चाव।।
वक्त परीक्षा ले रहा, अपनों की पहचान।
इने-गिने ही लोग हैं,जिनको अपना मान।।
करते हैं भगवान जो, सभी कर्म वे नेक।
टर्र -टर्र मानव करे, ज्यों सरवर में भेक।।
आना-जाना जीव का, धर्म एक अनिवार।
बंद पड़ा जो गेह था,कब खुल जाए द्वार।।
खूब समझ जाना यही,गति जीवन का नाम।
सड़ता जल तालाब में, वृथा रहे बेकाम।।
जब तक अपने पास है,तब तक अपना जान।
विदा हुआ जब जीव ये,उसे न अपना मान।।
मोह मिटाने के लिए,जन्म-मृत्यु का खेल।
खेल रहे भगवान जी, चला जीव की रेल।।
समय सबक सबका यहाँ,जान सके तो जान।
विनत भाव रखना सदा,जगती को पहचान।।
जोड़-जोड़ घर को भरे, तुझे न पल का होश।
जीना है तो जीव जड़, जीना तू बिन जोश।।
सात दशक पूरे किए,किन्तु न पाया ज्ञान।
मेरा - मेरा कर रहा, गया नहीं अभिमान।।
शुभमस्तु,
23.02.2026◆8.15 आ०मा०
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