सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

ज्ञान बिना जीवन नहीं [ दोहा ]

 354/2026



[ज्ञान,बोध,विद्या,चेतना,अनुभूति]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                सब में एक


ज्ञान बिना जीवन नहीं,अर्थहीन   नर योनि।

जीव-जंतु तरु-बेल की,पृथक महत्ता छोनि।।

पंडित   बाँटें   ज्ञान  को, करें  नहीं व्यवहार।

भीड़  सीख   कब  मानती,दूषित   हैं आचार।।


आत्म बोध जिसको  हुआ,उसे मिला प्रभु नेह।

स्वयंसिद्ध   गुरु  है वही,सफल मनुज की देह।।

बचपन   में   निज  बोध से,सँवर गए आचार।

उच्छ्रंखलता  मिट  गई, उदित   नवल आकार।।


नर विद्या से हीन जो,सुललित कला विहीन।

बिना बोध साहित्य के,अधम जंतु जड़ दीन।।

बिना ज्ञान गुरु भी नहीं, मनुज न विद्या हीन।

घूम रहा है  ढोर-सा,मति  अति  रहे मलीन।।


जब तक  तन में  चेतना, तब तक है अस्तित्व।

रहे   अन्यथा  देह  का, जड़  जगती  में तत्त्व।।

शक्ति चेतना   चहुँमुखी, जीवन  का  आधार।

कभी न उसका ह्रास   हो,मिले जीव का प्यार।।


ईश्वर  की अनुभूति का,हो न मनुज  को  ज्ञान।

नहीं    आत्मा   मानती, तब तक सुफलाधान।।

'शुभम्' काव्य- अनुभूति से,सदा रहे शुचि लीन।

जन-जन के   कल्याण   में,रत  हो नित्य प्रवीन।।


                एक में सब

ज्ञान     बोध नव  चेतना, विद्या का    संचार।

सदा     ईश अनुभूति का,  उर  में हो आधार।।


शुभमस्तु,


18.10.2026◆3.45 प०मा०

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