सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

सर्वश्रेष्ठ उपहार [सजल]

 356/2026


         


समांत          : आर

पदांत           : अपदांत

मात्राभार       : 24.

मात्रा पतन     : शून्य


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मनुज  योनि इस  सृष्टि में, सर्वश्रेष्ठ उपहार।

कर्मों से हर  जीव के,खुलें  जन्म   के द्वार।।


जैसे  जिसके  कर्म  हैं, वैसी  मिलती देह।

कॉकरोच  कोई  बना, राजनीति  की रार।।


चील  नोंचती  माँस को,बिल  में रहते सर्प,

कोयल  कूके  बाग में,अति विचित्र संसार।।


आया था  हरि भजन को,औटे  किंतु कपास।

योनि न  सुधरी देह की,उर में विषय विकार।।


डाल-डाल  उछला करें, वानर बगिया बीच।

भरें उदर आहार को,छीन  मनुज घर चार।।


नेताजी   की   देह  में, बसते  दनुज पिशाच।

छीन-झपट अर्जित करें,कंचन  कपटी यार।।


'शुभम्'  विलक्षण सृजन का,है विराट अस्तित्व।

टपकाता   क्यों   आदमी, परनारी   पर लार।।


शुभमस्तु,


19.10.2026◆12.15 आ०मा० (रात्रि)

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