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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
मात-पिता हैं देव हमारे।
जीवनदाता मात्र सहारे।।
करें सदा इनकी जो पूजा।
सेवा सम है कर्म न दूजा।।
जननी पहली गुरुवर होती।
जनती संतति का वह मोती।।
संतति कर पूजा जननी की।
इच्छित पद पाती करनी की।।
मातु शारदा दुर्गा माँ ही।
वही रमा ब्रह्मा कहलाही।।
करते हैं जो पूजा माँ की।
मिले स्वर्ग की भू पर झाँकी।।
ब्रह्मा विष्णु कृष्ण शिव शंकर।
जनक हमारे दानी अवढर।।
करे पिता की पूजा कोई।
इनके सम तीरथ नहिं होई।।
जिन गुरुओं ने ज्ञान दिया है।
स्वार्थ बिना सत्कर्म किया है।।
गुरु पूजा जो नर कर लेता।
ज्ञान ज्योति उर में भर देता।।
सूरज चाँद देवता मेरे।
देते मिटा सभी अंधेरे।।
करे नित्य इनकी जो पूजा।
काज बड़ा क्या कोई दूजा!!
देवी-देव सभी की सेवा।
इनकी पूजा सरिस न मेवा।।
जो जन दीनबंधु हितकारी।
शांति सुयश की खिलती क्यारी।।
'शुभम्' चलें पूजा कर आएँ ।
मात-पिता पद शीश झुकाएँ।।
निज गुरुवर के पद मत भूलें।
शिखर प्रगति के पाएँ छूलें।।
शुभमस्तु,
18.10.2026◆8.45 प०मा०
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