मंगलवार, 15 जनवरी 2019

हे अग्निदेव! [अतुकान्तिका]

 हे अग्निदेव!
अनादिकाल से आज तक,
चकमक पत्थरों से 
अरणी तक,
इतिहास से
अभी तक,
तुम देव थे
तुम देव हो,
तुम देव ही रहोगे,
पूज्य आराध्य
प्रत्यक्ष किंवा परोक्ष
 ही रहोगे।

जठर में
सागर में
वन में
अंतर्निहित हो तुम,
पाकशाला में
प्रत्यक्ष साकार हो तुम,
पंचभूतों में
सृष्टि के सृजन में
तुम ही एक महत्तत्व।

अंकुरण बीज का
वनस्पतियों में,
गर्भाधान क्षणों में
पत्नियों -पतियों में,
प्रकृति  मानव -जीवन की
प्रत्येक गतियों में
रार में रतियों में
हे अग्ने! तुम्हीं हो।

भवन में
हवन में
अर्थी की अगन में 
मानुष के मन में,
लगन में,
जन्म में मरण में
सब तुम्हारी सरन में।

भानु के प्रकाश में,
चन्द्र के सुहास में,
तारों के उजास में,
पुष्पों के विकास में,
पादप उल्लास में,
भुजबन्धित पाश में,
तुम्हीं हो अग्ने तुम ही हो!

अधरों का अधरों से स्पर्श,
युगल देह रोमांच हर्ष,
चेतन का चेतन  संघर्ष,
भ्रूण में नवजीवन उत्कर्ष,
हृदय की हर धड़कन,
सृष्टि का प्रति कण कण,
हस्ती पिपीलिका -सा क्षण,
तुम्हारा ही अस्तित्व -संसूचन
हे अग्निदेव!

विडम्बना हमारी
मानव की कैसी ?
न कहीं मन्दिर
न प्रतिमा ही तुम्हारी,
न पूजा 
न आरती ही उतारी!
इसीलिए 
क्रोधावेश में जलाते हो,
आकार भी निराकार भी
सकल सृष्टि चलाते हो
हे अग्निदेव!!

💐शुभमस्तु !
✍🏼रचयिता ©
🌱 डॉ. भगवत स्वरूप '"शुभम"

सोमवार, 14 जनवरी 2019

मोबाइल -चरित [दोहा -चौपाई ]

-चौपाई-
मोबाइल की विकट कहानी।
सुनहु सुजन सुजनी मम बानी।।

हाथ - हाथ  मोबाइल सोहे।
एंड्रॉयड जन-जन को मोहे।।

बालक युवा प्रौढ़ जन बूढ़े।
उठत खाट  मोबाइल  ढूंढ़े।।

छात्रा-छात्र सकल नर नारी।
मोबाइल की छवि पे बारी।।

बैठत उठत मोबाइल के संग।
बदलौ युग बदले सब रंग ढँग।।

चलत फिरत बाइक बस कार।
बिना मोबाइल  सब बेकार।।

बात  बात  बात  में   बाता।
बात करत कोई न अघाता।।

प्रेम  रार   सर्विस   व्यापार।
मोबाइल सबकी  सरकार।।

- दोहा -
दास   मोबाइल   के   हुए,
दुनिया    के     नर -  नार।
सुख-दुःख में उसके बिना,
चले     न    कोई   कार।।1।।

 -चौपाई-
शादी ब्याह जन्म श्मशान।
मोबाइल का पहले ध्यान।।

पर्व दिवाली  होली - रंग।
मोबाइल की प्रबल तरंग।।

आज़ादी का दिन ,गणतंत्र।
मोबाइल का  मारक   मंत्र।।

चौर्य   डकैती   लूटें    बैंक।
मोबाइल   की   ऊँची  रैंक।।

राजनीति   या    भ्रष्टाचार।
मोबाइल से    ही   संचार।।

दान पुण्य अपहरण छिनार।
खुला सदा मोबाइल -द्वार।।

लगा कान  में   लीड  सुरंग।
राह न   देखें   मस्त   तरंग।।

सड़क चलत बातों काध्यान।
अंधी    आँखें   बहरे  कान।।
               
-दोहे-
चित्र  -   कथाएँ    वीडियो,
नाना      रंग          संगीत।
सुरुचि    श्लीलता   से परे,
युवा -  वर्ग  के     मीत।। 2।।

अलग कैमरा   की  नहीं ,
रही  -  ज़रूरत    आज।
फोटो   खींचो   वीडियो,
मोबाइल  हर  काज।। 3।।

व्हाट्सएप्प या  फेशबुक ,
मोबाइल       के      मित्र।
चैटिंग   वार्ता    वीडियो ,
भेजो   सुंदर     चित्र।। 4।।

कथा कहानी काव्य का ,
मोबाइल           भांडार।
लिख भेजो कॉपी करो ,
फॉरवर्ड    के   द्वार।। 5।।

बिक्री  औऱ   खरीद भी ,
भेजो   धन   हर     ठौर ।
मनीआर्डर  के दिन गए ,
मोबाइल सिरमौर।।  6।।

टी वी   ट्रांजिस्टर   घड़ी ,
सबकी   डिबिया   एक।
खुला   सिनेमा हाल   है,
जो चाहे सो देख ।। 7।।

- चौपाई -
जोड़ गुणाअरु भाग घटाओ।
भिन्न दशमलव गणित सिखाओ।

गणक सभी गणनाएँ करता।
दिन दिनांक मा' वर्ष निखरता।।

कम्प्यूटर गूगल की खोज।
शब्दकोष   ई मेल समोद।।

प्ले स्टोर एप्प्स का सागर।
मोबाइल सागर की गागर।।

मोबाइल में  बैंक  तुम्हारा।
जहाँ खड़े हो वहीं सहारा।।

करो ट्वीट , कब   आए ट्रेन।
जीपीएस में क्या कुछ है न!!

ललित कलाएँ अरु विज्ञान।
मोबाइल निधि हीरा खान।।

ज्योतिष गणित विश्व इतिहास।
विश्व नहीं, ब्रह्मांड निवास।।

- दोहा-
मोबाइल    वरदान  है,
मोबाइल   अभिशाप।
अकथ ज्ञान भांडार ये,  
'शुभम'शीत अरु ताप।। 9।।

💐शुभमस्तु ! 
✍🏼रचयिता ©
🍑 डॉ. भगवत स्वरूप "शुभम"

रविवार, 13 जनवरी 2019

नीति संग व्यभिचार [ गीतिका ]

कुर्सियाँ   हिलने   लगी   हैं,
झूठ       अत्याचार        से।
काँपती     हैं  टाँग   उनकी,
नीति  संग व्यभिचार   से।।
कोठरी कज्जल की काली,
क्यों      बचाए    कुर्सियाँ।
दीमक  लगे     हैं    टाँग  में,
सारी   मिटा  दें   तुरसियां।।

दिख   रही   पहले   बुराई ,
अब   वही   नित  कर्म  है।
चालबाजी   छल   फ़रेबी ,
रात - दिन   का   धर्म  है।।
गमन  हो  पश्चिम   बताएँ,
पूर्व   को    हम    जा रहे।
ऐसे  सियासत - जाल  में,
फँसकर सुजन तड़पा रहे।।

भेड़   के   रेवड़   सजे   ये,
मत    कहो      ये   रैलियां।
अन्धे   कुएँ  में   गिर   रहीं ,
खनखनाती        थैलियाँ।।
चींटे    चिपकते   जा  रहे,
मधुर  गुड़  की    भेलियाँ।
कीचड़ें    करने   लगी   हैं,
शान्ति   से    अठखेलियाँ।।

धृतराष्ट्र    की  सन्तान  को,
बस   चाहिए    सत्ता  बड़ी ।
अधिकार जन का छीनकर,
हाथ   ले    जादू  -  छड़ी।।
अनय का बहुमत खड़ाकर,
नीति   का   रुख  मोड़कर।
हर मूल्य   पर  सत्ता  मिले,
सद्धर्म  अपना   छोड़कर।।

सत्य     धूलें    फाँकता  है,
पैर     में       छाले      पड़े।
असत   के  मन्दिर   सजे हैं,
आरती     ले   जन    खड़े।।
यान      हेलीकॉप्टरों     में ,
झूठ      तनकर   विचरता ।
अस्तित्वअपना सिद्ध करने,
शुभ सत्य पथ पर बिखरता।

💐 शुभमस्तु !

✍🏼© रचयिता
🌱डॉ.भगवत स्वरूप "शुभम"

शनिवार, 5 जनवरी 2019

गाली पुराण [व्यंग्य]

   काली का कालात्व से सम्बन्ध हो, न हो। खाली का खाल से  सम्बन्ध हो, न हो। परंतु गाली का गाल से गहरा सम्बन्ध अवश्य है। अर्थात जो गाल से निकले वही गाली। आप कहेंगे कि गाल से तो हर बात ही निकलती है, चाहे वह अच्छी हो अथवा बुरी। आपको अच्छी लगे या न लगे , परंतु वह निकलेगी तो गाल से ही न! कहीं  और  से  तो निकलेगी नहीं। भगवान ने अच्छी, बुरी और न अच्छी न बुरी :  इन तीनों प्रकार की बातों का उद्गम स्थल अंततः इस चार अंगुल लंबे चौड़े मुख को ही तो बनाया है। अब यह अलग बात है कि हम उसका उपयोग किस प्रकार करते हैं, सदुपयोग करते हैं या दुरुपयोग करते हैं। बात यदि अच्छी है तो सदुपयोग ही माना जाएगा और यदि अच्छी नहीं है तो उसे दुरुपयोग की संज्ञा से ही अभिहित करने की हमारी विवशता होगी।
   भाषा या वाणी का यह दुरुपयोग भी मेरी दृष्टि में गाली की श्रेणी में गिना जाना चाहिए। कुछ लोगों के मुँह से अनायास ही कुछ ऐसी बातें निकलती रहती हैं, जिन्हें गाली कहना ही उचित है। ऐसी बातों को सुनकर ऐसा लगे कि वहाँ से उठकर चले जाने की प्रबल इच्छा बलवती होने लगे तो यह भी गाली ही है। अथवा यदि सामर्थ्य है तो उसका मुँहतोड़ जवाब ही दे दिया जाए  या और भी अधिक सामर्थ्य है तो उस मुँह को ही न तोड़ दिया जाए, जिसमें से ऐसे अपशब्द निकले, जो किसी के  सुनने योग्य नहीं हैं। ये सभी गालियाँ ही हैं। ऐसे ही कुछ लोग आदमी के नाम पर ही गाली हैं। अब आप ही बतायें कि मैं किसी का नाम क्यों लूँ? मैंने कब कहा कि इस देश के अधिकांश नेता देश के नाम पर गाली हैं । मैं तो नहीं कहता। मैं भला क्यों कहूँ? सारा देश कहता है तो कहे।
कहता रहे। मैं नहीं कहता। अरे भइया ! कहीं कीचड़ में पत्थर मारने से कोई  कीचड़  सफ़ेद हुआ है? बल्कि    कीचड़ को सुधारना तो गधे को गंगा नहलाकर गाय में बदलने जैसा एक निरर्थक प्रयास भर है। न भाई न, मैं ऐसा काम नहीं करता। मैं देश के नेताओं को गाली नहीं देता। उनकी करनी उनके नाम। हमें उससे क्या काम। और हो भी तो क्या कर लोगे ! हम तो नहीं सुधरेंगे, वाली बात है। फिर क्या? कहीं पत्थर पर पत्थर मारने से भी उसका मोम बन पाया है। वह टूट जाएगा, बिखर जाएगा। पर मोम नहीं बनेगा, तो नहीं ही बनेगा। दे लो किंतनी गालियाँ दोगे।
   जो ज़्यादा गाल बजाए, वह भी गाली है अर्थात गाल बजाने वाला। अब गाली तो गाली है। विवाह शादी के अवसर पर महिलाएं  बारातियों, समधी, समधिन को गा गा कर गालियाँ सुनाती थीं। गाने वालियों को गाने में और सुनने वालों को सुनने में रस आता था। कोई भी बुरा नहीं मानता था। जब से उन गालियों में गाया जाने वाला संन्देश सच में साकार रूप धारण करने लगा, तब से गालियाँ गाना बंद ही हो गया। लोग बुरा जो मानने लगे थे, औऱ चोर की दाढ़ी  में तिनका वाली कहावत सर्वसिद्ध होने लगी थी। तब से इन अवसरों की रसभरी गालियों पर विराम लग गया। पूर्ण विराम ही लग गया।
   अब देखिए कि ऐसा भी हमारा एक युग था, जब गालियों में शृंगार रस के झरने बहते थे। आज वहाँ रेगिस्तान है। कितनी दूरदर्शिता थी उस गाली साहित्य में। ऐसा गाली साहित्य जिसे केवल वाङ्गमय रूप में ही रसास्वादित किया जा सकता है। किया जा सकता था। आज की गाली तो गाली के नाम पर गाली है। किसी किसी के मुँह से नारी सूचक अश्लीलता बोधक  शब्द भांडार का मानो शब्दकोश ही प्रस्फुटित होता हुआ दृष्टि गोचर होता है। सुना है हमारे धार्मिक देश में ऐसे भी विभाग हैं, जहाँ आम जनता को गालियों से सम्मानित करने के लिए कायदे से प्रशिक्षण भी दिया जाता है। उसके बाद उन्हें गली , चौराहों पर ऐसे छोड़ दिया जाता है जैसे दूध निचोड़ लेने के बाद लोग गाय माता को आवारा बनाकर दूसरों के खेत चरने के लिए, सड़कों पर स्पीडब्रेकर बनाने के लिए ऐसे छोड़ देते हैं, जैसे कि उनका कभी इनसे वास्ता ही नहीं था। ऐसे गौ भक्त भी देश और गायमाता के नाम पर गाली से कम नहीं हैं।
   ये गाली पुराण कुछ ज़्यादा ही बड़ा होता जा रहा है। और ज़्यादा लिखूँगा तो लोग गालियाँ ही तो देंगे मुझे। लेकिन मैं लूँगा ही नहीं, क्योंकि जब कोई किसी को कुछ दे और वह न ले, तो क्या होगा ! तुम्हारी चीज तुम्हारे पास। ठीक है न! मुझे नहीं लेनी किसी की गाली, इतनी गा ली वही बहुत है।इस पर नहीं  मिलनी है मुझे किसी की ताली।

 💐शुभमस्तु !
✍🏼लेखक ©
🌱 डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

मेरा देश एक स्वेटर है [अतुकान्तिका]


दो कोमल कलाइयाँ 
जिनमें दो पंचांगुलियाँ
थामे हुए सलाइयाँ
स्वेटर की  बुनाइयाँ,
खुलते हुए गोले रंगीन
बने हुए स्पंजी महीन
डालते हुए फंदे पर फंदे
उलझते सुलझते
कहीं न कहीं
तब जाकर बुना गया
एक स्वेटर,
जो पहले ही चुना गया।
 ×          ×         ×

मेरा देश एक स्वेटर है,
जिसमें सबकी अपनी 
टर -टर है,
वैसे तो ये स्व -टर है
फिर भी अलग-अलग 
टर -टर है।

सलाइयाँ हैं गोले हैं,
रंग हैं  संग हैं,
असंग हैं सत्संग हैं 
कुसंग हैं,
कोई इधर भाले, 
कोई उधर भोले,
कोई बादाम 
कोई छोले,
बोले अनबोले,
फंदे पर फंदों की बुनाहट, 
रंगीन गोलों की सरसराहट,
उकताहट छटपटाहट
उधेड़ना बुनना,
किसी की सुनना
न सुनना
अपनी इच्छा, 
जैसी जिसकी शिक्षा,
शॉल, स्वेटर, दस्ताने, जरसी,
बुनने की अपनी -अपनी मरजी।

मेरा देश एक स्वेटर है।

सलाइयाँ हैं हम सब,
कुछ भी चुनें ,
कुछ भी बुनें, 
स्वतंत्र  जो हैं!
अपनी -अपनी धुन,
जिसे चाहो चुन,
गोलों को उधड़ना ही है,
स्वेटर तो बुनना ही है,
पसंद अपनी-अपनी
सोच अपनी -अपनी

मेरा  देश एक स्वेटर है।

वे कुछ अलग नहीं हैं,
हमने ही सौंपा है उन्हें अधिकार,
वे लफ़्फ़ाजी करें 
या अच्छे -अच्छे कार्य,
उन्हें भी बुनना है
बड़े -बड़े गोलों से,
रंग और डिजाइनों से
हम सबके लिए
स्वेटर शॉल 
जरसी या दस्ताने,
वही जानें,
हर पाँच वर्षों तक
उन्हें बुनते ही रहना है,
और हमें उनके  रंगों से
उन्हें चुनते ही रहना है,

मेरा देश एक स्वेटर है।

💐 शुभमस्तु !
✍🏼 रचयिता ©
डॉ.भगवत स्वरूप "शुभम"

अपने -अपने सच [अतुकान्तिका]

अपने -अपने सच , 
सच में 
सच नहीं हैं,
पर वे कहते हैं-
वे सही हैं,
वे ही सही हैं।

ये सच नहीं
अपनी -अपनी हठ है,
सभी महाज्ञानी 
न कोई कहीं सठ है,
दूसरों की खिड़कियों में
झाँकने का चपल प्रयास,
अपने गरेबाँ झाँकने की
नहीं है आस।

वे चलते रहते हैं दिन रात
पर पहुँचते कहीं नहीं,
बस कीचड़ -उछाल 
प्रतियोगिता हो रही,
कौन किसके दामन को
कर सकता है  गंदा,
पर दूध से धोया 
नहीं है कोई बंदा।

कीचड़ उछालते-उछालते 
बीत जाते हैं पाँच वर्ष,
अच्छे दिन आने की
आशाएँ तुषारावृत,
सपने भी होते जा रहे
मृत ,
देखते - उलझते हुए  
आँकड़ों के वृत्त।

इतनी भी नासमझ
नहीं है ये जनता,
पलट देती है
एक ही झटके में तख्ता,
आत्म निरीक्षण आज नहीं
कल करेंगे,
जब सुनामी के कहर में
सपने  ढहेंगे।

अपनी अंतरात्मा की 
मौन आवाज,
जतला रही 
भविष्य का अंतर्नाद,
किस खुमारी में 
सोए हुए हैं,
बीज वही तो उगेंगे
जो तुमने बोए हुए हैं,
ये मत समझ लेना 
कि लोग सोए हुए हैं।

काश आम आदमी
पिसते हुए मध्यम वर्ग
कौन दे पाया है स्वर्ग,
इनकी धुकधुकी पर
अगर ध्यान हो जाए,
तो इस देश का
जनता जनार्दन का 
हर कल्याण हो जाए,
किन्तु यदि हो गया 
देश का "शुभम" कल्याण,
तो कौन पूछेगा सियासत को
और चिल्लाएगा-
त्राहि माम्!
त्राहि माम्!!
त्राहि माम्!!!

💐 शुभमस्तु  !
✍🏼रचयिता ©
🌱 डॉ. भगवत स्वरूप "शुभम"

बुधवार, 2 जनवरी 2019

गीता वेद किसे बतलाऊँ ! [ गीत ]

कैसे   गाऊँ   गान   एकता, 
खण्ड - खण्ड  होता इंसान।
गीता - वेद  किसे बतलाऊँ,
बिखर रहा है सकल जहान।।

कुंठाओं   से    ग्रस्त  आदमी,
कहता कुछ करता कुछ और।
नारे   पर    नारे    बजते   हैं,
शब्द मात्र  लेकिन   है  शोर।।
बहरों  के   आगे    कैसे   मैं,
गीतों    में    डालूँगा    जान।

गीता - वेद  किसे बतलाऊँ ,
बिखर रहा है सकल जहान।।

जाति  धर्म   में  टूट  रहा  है,
मात्र   एकता   का   नारा है।
निर्धन  औ'असहाय आदमी,
हालातों   से  नित  हारा है।।
ज्यों  भैंसों  के  आगे  कोई,
बीन बजाकर   हरता प्रान।

गीता -वेद  किसे  बतलाऊँ ,
बिखर रहा है सकल जहान।।

गले में मालाएँ  हैं फूलों की,
'फूल' बनाना  उनका काम।
चाहे  जितने भी डलवा लो,
'फूलों 'में दिन सुबहो-शाम।।
पोषक पालक उत्पादक वे,
फूलों से  ही   उनकी शान।

गीता -वेद  किसे  बतलाऊँ,
बिखर रहा है सकल जहान।।

'धन यौवन से मोह न करना,'
बाबाओं    का   है    उपदेश।
नवल   यौवना  आगे   पीछे,
धन  से  महक  रहा  है वेश।।
साँस   चलाओ  ऊपर  नीचे,
नेत्र   बंदकर  पकड़ो   कान।

गीता -वेद  किसे  बतलाऊँ,
बिखर रहा है सकल जहान।।

शिक्षक का  सम्मान  नहीं है,
गुप्त -ज्ञान का खुला बाज़ार।
शिक्षा  धंधा  बनी  आज तो,
लाख  करोड़ों  का  व्यापार।।
पढ़ -लिखकर वे तेल लगावें,
शिक्षित   नारी   कूटे    धान।

गीता-वेद  किसे    बतलाऊँ,
बिखर रहा है सकल जहान।।

'तुम क्या जानो'कहती संतति,
मात- पिता  का  ये  सम्मान?
परिजीवी शोषक  चूषक बन, 
अकर्मण्यता   का   गुणगान।।
किससे  कहें  वेदना मन की, '
शुभम' देखता जग को छान।।

गीता  वेद   किसे   बतलाऊँ,
बिखर रहा है सकल जहान।।

शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
☘ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...