रविवार, 20 जनवरी 2019

शिशिर -सुषमा [ गीतिका]

1
मन   नहीं   करता मेरा,
इस  ठंड  में स्न्नान  को।
कह  रहे  कम्बल  रजाई,
छोड़ मत   स्थान   को।।
ओढ़कर अपनी   रजाई,
स्नानगृह   में जा  'शुभम',
मुँह चुपड़ कपड़े बदल ले,
सूखी   धुलाई  श्रेष्ठतम।।

2
द्रुम    लताएँ   श्वेत   सारे,
शीत  आँचल प्रकृति का।
ठिठरता है   गात   मानव ,
रूप बदला  सुकृति का।।
कीर पशुओं की दशा का,
हाल   अति    बेहाल   है।
निर्वसन   वे कँप  रहे  हैं,
डगमगाती    चाल    है।।

3
साँस  लेती   सरित धारा,
स्वच्छ   निर्मल    नीर  है।
वाष्प मुँह से उठ रहा सित,
जो   नहाए       वीर   है।।
तीर पर बैठा   हुआ  क्यों,
गुनगुनाती      है      नदी।
गुनगुना  पानी   नदी का,
'शुभम' निर्मल  है सभी।।

4
श्वेत   चादर  से  ढँके  हैं,
खेत   गेहूँ    मटर     जौ।
आलु गोभी  गाजरों  की,
ज्यों  रसोई    धूम   सौ।।
हरित  पर्णों  में  बनातीं ,
खाद्य  सूरज  की किरन।
चाह मन में 'शुभम' ऊष्मा,
लू - लपट  होती हिरन।।

5
देव   मंदिर   भवन-छज्जे -
पर   लदीं     बेलें   सघन ।
हनुमतकिरीटीअरुण पुष्पी,
करती हुई मन को प्रमन।।
बुलबलें तितली मचलती,
सघन   पुष्पित  गुच्छ पर।
ताज़गी भरती  नयन युग,
शिशिर शुभ सौंदर्य भर।।

💐 शुभमस्तु !
✍🏼रचयिता ©
🍁 डॉ. भगवत स्वरूप ''शुभम"

यूज़ एंड थ्रो बनाम गंदगी बढ़ाओ [ व्यंग्य ]

   यदि घुमा फिराकर न कहें, तो आदमी एक अति गंदगी प्रिय प्राणी है। उसकी इस गंदगी प्रियता के एक नहीं  अनेक, दूर नहीं पास, अतीत में ही नहीं वर्तमान में, धरती पर ही नहीं सागर और आसमान में हजारों लाखों उदाहरण दिए जा सकते हैं। जैसे-जैसे आदमी आगे बढ़ता गया,ऊँची -ऊँची पढ़ाई पढ़ता गया, वह अपने दोषों को छिपाने में प्रवीण होता गया। इसीलिए उसने स्वच्छता प्रियता का नारा बुलंद किया और कहा गया कि स्वच्छता में ईश्वर का वास होता है। लेकिन क्या स्वच्छता नारे लगाने से आ जाती है ? निश्चय ही नहीं आती। उसके लिए हमें प्रयास करने पड़ते हैं।
   आदमी जन्मतः गंदगी प्रिय था, इसका एक बहुत सशक्त प्रमाण यह है कि उसने अपने द्वारा बनाई गई  वर्ण व्यवस्था में उसकी गंदगी को दूर करने के लिए विधिवत  एक वर्ण का निर्माण ही कर दिया। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि वह कौन सा वर्ण और जाति है जो आदमी की गंदगी की सफ़ाई के लिए अतीत काल से ही आज तक अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करती चली आ रही है। आदमी कितना विचित्र प्राणी है कि गंदगी वह करे, और उस गंदगी को उठाने का काम उसी जैसी देह, हाथ, पैर, मुँह, नाक, कान, आँख वाला इंसान ही करे!अपनी गंदगी अपने आप साफ़ करने में उसका स्तर गिर जाता है, वह छोटा हो जाता है। उसका सामाजिक महत्व कम हो जाता है। इसीलिए सीना तानकर, ललाट को ऊँचा उठाकर वह  अपने को अभिजात्य सिद्ध करने के लिए अपनी तरह के मानव को हेय, पतित औऱ अश्पृश्य बनाकर दुरदुराने में हमेशा आगे रहता है।
   जहाँ आदमी होगा, वहाँ गंदगी होगी ही। यह एक ऐसा अकाट्य सिद्धांत बन चुका है (बनाया नहीं गया, क्योंकि   कुछ सिद्धांत प्राकृतिक रूप   से बनते हैं, उन्हें बनाना नहीं पड़ता।) कि उसे समाप्त करना असंभव-सा है। आज आदमी द्वारा ही धरती, आसमान, सागर, पर्वत, जंगल,  नदियाँ, तालाब, खेत, खलिहान, पार्क, ट्रेन, बस , घर, बाज़ार, सड़कें, गलियाँ, स्कूल, कॉलेज, कचहरी, कार्यालय सभी कुछ प्रदूषित हो रहा है। और यह  प्रदूषण निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। मानव के द्वारा जितना अधिक स्वच्छता का प्रचार किया जा रहा है, उसी अनुपात में गंदगी औऱ अधिक बढ़ती चली जा रही है। चंद्रमा पर गए तो वहाँ गंदगी छोड़ आये। नदियों में नित्य मानव निर्मित कचरा, मल मूत्र, रासायनिक कचरा, यांत्रिकीय कचरा, बढ़ रहा है। और तो और कचरे को और अधिक बढ़ाए जाने का एक नया सूत्र भी ईजाद कर लिया गया है, जिसे हम बुद्धिजीवी लोग  पश्चिम की देन मानकर पल्ला झाड़ लेते हैं। वह नया सूत्र है:USE AND THROW. स्प्ष्ट है कि जितना यूज एंड थ्रो करेंगे, निश्चय ही गंदगी अधिक बढ़ेंगी। उदाहरण के लिए, पहले पंख पेन, कलम, होल्डर, इंक पेन का प्रयोग करते थे। इंक पेन में बार-बार इंक भरते, फिर लिखते। लिखकर फेंक नहीं देते थे। उसे भविष्य में प्रयोग के लिए सहेज-संभाल कर रखते थे। पेन की निब जब तक घिसकर अप्रयोजनीय नहीं हो जाती थी, तब तक उससे लिखा ही जाता रहता था। उसे बहुत ही जल्दी न फेंक देने के कारण पेन और लेखनियों का कचरा नहीं के बराबर होता था। जब से डॉट पेन या जेल पेन की खोज हुई, तब से खरीदो, लिखो औऱ फेंको का सूत्र लागू हो गया। सरकंडे की लेखनी औऱ होल्डर की भी प्रदूषण न फैलाने में यही भूमिका रही है।
   यह तो मात्र एक छोटी सी लेखनी की बात कही है। यदि प्लास्टिक, पॉलीथिन, स्टील, आदि से निर्मित अन्य वस्तुओं की चर्चा की जाए तो एक महागाथा ही बन जाएगी। गुटका, पान- मसाला,  कुरकुरे, प्लस्टिक की शीशियां, पानी की बोतलें,  शीतल पेय, मदिरा, औषधियाँ, टिफिन बॉक्स, औऱ न जाने कितने हज़ारों उत्पाद हैं, जो यूज एंड थ्रो के नाम पर इंसान ने ही बनाए हैं। ईश्वर ने नहीं। ईश्वर निर्मित चीजों से गंदगी नहीं फैलती।पत्ते, फूल, फल, बीज, लकड़ी, जड़, सभी कुछ अपने अगले  क्रम में जाकर उपयोगी ही सिद्ध होता है। जैसे फूल से फल, फल से बीज, बीज से पुनः नई  सृष्टि -- यही क्रम निरन्तर चलकर अपनी उपादेयता सिद्ध करता है। इसी प्रकार सर्वत्र प्रकृति का यही क्रम है। लेकिन इसके विपरीत मानव स्वयं अपने लिए स्वयं समस्याओं का बीज-वपन कर रहा है।बगीचे, पार्क में जाएगा तो कुरकुरे, टेड़ेमेढे, नमकीन, बिस्कुट के रैपर, पेकिंग फॉइल्स, बिखेर कर चलता बनेगा। स्टेशनों पर तमाम गंदगी सुअर गधे नहीं करते। बल्कि प्रकृति ने तो आदमी की गंदगी की सफ़ाई का एक सजीव चलता-फिरता उपकरण ही वरदान कर दिया है।
   आदमी की यूज एंड थ्रो की प्रवृत्ति केवल भौतिक वस्तुओं तक ही सीमित नहीं रह गईं है। वह आदमी से आदमी तक पहुंच गई है। जैसे दूध पीने के बाद यही गाय को गौमाता कहने वाला दोमुंहा इंसान गाय को दूसरों के खेत चरने के लिए  छोड़ देता है, वैसे ही अपना उल्लू सीधा होने के बाद आदमी भी आदमी से नज़रें चुराने लगता है।दूर कहाँ जायँ शिष्य तक गुरु को देखकर नज़रें फेर कर खड़ा हो जाता है। कहीं नमस्ते न करनी पड़ जाए!  यहाँ तक कि अपनी औलाद भी अपने बूढ़े माँ-बाप को  वृद्ध -आश्रम में मरने के लिए छोड़ आती है। यही तो आज के युग का यूज एंड थ्रो है। नई -नई कुछ ज़्यादा ही पढ़ी लिखी बहुएँ  सास -ससुर को घर की गंदगी और कचरा मानने लगी हैं। मैं ये कोई अतिशयोक्ति नहीं लिख रहा। नवेली आधुनिकाओं की नज़र में बूढ़े  माँ-बाप किसी गंदगी से  ज्यादा अर्थ नहीं रखते। ये सब किसकी देन है। आज आदमी आदमी के लिए कचरा है, तो शेष सांसारिक वस्तुओं से यदि कचरा बढ़ाया जा रहा है, कोई आश्चर्य की बात नहीं। बड़ी -बड़ी बातें करने से स्वच्छता नहीं आती। नारों, बैनरों, पोस्टरों, फ्लेक्स  से  देश  स्वच्छ नहीं हो जाएगा। सबसे पहले अपने मन मस्तिष्कों को स्वच्छ करना होगा।
अपना कूड़ा उसके द्वार,
यही आज का सद -आचार,
यूज़ एंड थ्रो कीसभ्यता नेक, 
काम निकाला बाहर  फेंक, 
मन गंदे तन पर नित क्रीम, 
नए आदमी की ये थीम,
नारा नारा  नारा    नारा,
नारेबाजों   ने  देश   उजाड़ा,
निज सिर श्रेय, बढ़ी छपास,
इस मानव से   कैसी  आस!
फ़ोटोबाजी     में    तल्लीन,
होता  जाता  पशु   से  हीन,
नियम दूसरों के हित बनते,
नियम-नियंता बाहर चलते,
कैसे       होगा    देशोद्धार,
नेता  चाहें   बस    गलहार,
ऊन भेड़ की   छीलें  रोज़,
एक मेज पर सबका भोज,
कीचड़ छिड़क नहाएं कुंभ,
बढ़ी गंदगी   बढ़ती   धुंध।।

💐शुभमस्तु!
✍🏼लेखक ©
🌾 डॉ. भगवत स्वरूप"शुभम"

शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

आदमी की भूतप्रियता [ व्यंग्य ]

   आदमी एक भूतप्रिय प्राणी है। वह  जितना आगे  है, उतना ही पीछे भी है। वह साँस तो वर्तमान में लेता है, किन्तु जीना चाहता है अतीत में, भूतकाल में। यही कारण है कि वह अपने होने की  स्थाई छाप छोड़ने के लिए कुछ ऐसी गतिविधयां या कहिए हरकतें अथवा कारनामों को अंजाम देने में लगा रहता  है, जिससे उसकी अमिट छाप के चिन्ह वक़्त के वक्ष पर पड़ सकें। आप सभी इस बात से सुपरिचित हैं कि पहले के राजा - महाराजा, बादशाह अपनी स्मृतियों को भावी पीढ़ियों के लिए सँजोने की ख़ातिर किले, बाबड़ियाँ, महल, मीनारें, स्तूप, पिरामिड और न जाने क्या क्या बनवाया करते थे। देश और विदेशों में ऐसी यादगारों के अनेक उदाहरण विश्व -इतिहास की धरोहर के रूप में आज भी देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए जयपुर में  आमेर, जयगढ़ के किले, दिल्ली में  कुतुबमीनार, लाल किला, पुराना किला, संसद भवन, आगरा स्थित ताजमहल, अकबर का किला, सिकंदरा, चीनी का रोज़ा, आराम बाग (वर्तमान रामबाग), मेहताब बाग, फतेहपुर सीकरी, ग्वालियर में राजा मानसिंह का किला, सारे देश में बने हुए प्राचीन मंदिर, अजमेर में पुष्कर और शेख सलीम चिश्ती की दरगाह, रामनगर (आँवला, बरेली के निकट ) में राजा द्रुपद का किला, संगम पर इलाहाबाद स्थित  किला, लखनऊ स्थित अनेक नवाबी शान के प्रतीक स्थल, गया, सारनाथ में बौद्ध कालीन प्रतिमाएँ और अनेक स्मृतियाँ, मिस्र के पिरामिड, स्तूप आदि सभी आदमी के अपने को अतीत में दीर्घकाल तक स्मरण में बनाये गए ऐसे ही स्मारक हैं।
   प्राचीन मानव की तरह आज का आदमी भी किसी अर्थ में कम नहीं है। अब वह राजा, सम्राट या बादशाह तो नहीं है, इसलिए वह अपनी प्रेयसी की स्मृति में ताजमहल तो नहीं बना सकता। न सम्राट अशोक की तरह सदुपदेश अंकित स्तम्भ या लाट भी खड़ी कर सकता है। जैसे आदमी अपने आत्मज /आत्मजा (अपनी आत्मा से जन्मने वाला /वाली अर्थात पुत्र/पुत्री ) की तरह ही कुछ ऐसा छोड़ना चाहता है, जिसे आगे आने वाली पीढ़ियाँ जान समझ सकें कि हमारे पूर्वज इस प्रकार के थे।
   अब आदमी कोई चिड़िया या पशु या आदमी जलचर व्हेल, मछली, मेढक या मगरमच्छ, घड़ियाल तो है नहीं , जो केवल आज में ही जीता हो। जलचर, नभचर या मानव से इतर थलचर हाथी, घोड़ा, गधा, खच्चर, गाय, भैंस तो है नहीं, जो केवल वर्तमान को ही अपना सब कुछ जनता मानता हो। इन सभी को केवल आज ही नहीं, मात्र अभी और वर्तमान क्षण की ही चिंता रहती है। ये सभी कल में (भूतकालीन) नहीं जीते और न हीं आने वाले कल की ही चिंता में अपना खून सुखाते हैं। ये तो  यह आदमी ही है, जो अतीत और भविष्य की फिक्र में अपना वर्तमान भी  बिगाड़ डालता है।
   आइए! कुछ और आगे बढ़ते हैं। आज का युग इसी भूत प्रियता की अगली कड़ी में फोटो प्रिय हो गया है कि मुख्य को भुलाकर बस फ़ोटोबाजी का दीवाना हो गया है। किसी  बारात में जाइए तो देखेंगे कि हर हाथ में एंडरायड मोबाइल का फ्लैश चमचमा रहा है। समय से विवाह होना तो कोई महत्व नहीं रखता, हाँ, स्टेज पर जब  फ़ोटोबाजी का मझमा शुरू हो जाता है तो शादी के लिए समय कम पड़ जाता है। फिर तो बाबा, नाना, नानी, मामा, मामी, भैया, भाभी, चाचा , चाची कोई भी दूल्हा दुल्हन के पीछे आशीर्वाद देने में पीछे नहीं रहना चाहता। पहले मैं, पहले मैं की जैसे होड़ लग जाती है। बारात जब चढ़ती है तो नाचने के फोटो खींचना तो अनिवार्य है,  हाथ में पांच सौ का नोट दिखाकर दस रुपए देने का काम भी खूब होता है। पुरुष  नहीं स्त्रियाँ क्यों पीछे रहें भला नाचने में, क्योंकि वे तो अच्छे  अच्छों को नाच नचाने का गुण हासिल किए रहती हैं। वे भी ताल से ताल मिलाकर प्रियंका चोपड़ा और ऐश्वर्या को भी मात देने का माद्दा लिए मैदाने-नाच में उतर पड़ती हैं। फिर देखिए स्मृतियां कैसे मोबाइल रूपी कैमरे में कैद की जाती हैं।अरे भाई ! जब ताजमहल नहीं बना सकते, किले खड़े नहीं कर सकते, कुतुबमीनार नहीं बनवा सकते, तो फ़ोटो खिंचवाने से भी जायँ?
   आज वर्तमान को भूतजीवी बनाने का साधन ही मोबाइल है! यदि सम्राट अशोक, चन्द्रगुत, राजा अमर सिंह तोमर, के समय में कैमरा मोबाइल थे ही नही, तो बेचारे कैसे फ़ोटो खिंचवाते? यदि होता तो बिना खिंचवाए क्यों रहते? इसलिए अपने को अमर बनाने के लिए किले खड़े करने पड़े, बाबड़ियाँ बनवानी पड़ीं।सम्राट अशोक ने तो बौद्घ उपदेशों से जंगल के पर्वत, चट्टानें, खम्भे और दरवाजे तक यादगार बना दिए। अपने अपने युग की बात है। आज फोटो युग है, तो आदमी फोटिया गया है। जन्म से लेकर श्मशान तक स्मृतियाँ कैद करने के लिए हर हाथ मोबाइल है। विवाह में फेरे मुहूर्त से पड़ें न पड़ें, कोई फर्क नहीं पड़ता, परन्तु हर गतिविधि का फोटो बनाकर वीडियो एलबम जरूर बननी चाहिए। 70 परसेंट में फोटो बाजी, बाक़ी सब में होगी शादी। अब तो श्मशान में भी मुर्दे के साथ फोटो खिंचवाने के सौभाग्य के क्षणों को भी लोग छोड़ना नहीं चाहते! यह प्रत्यक्ष देखी हुई बात है।मुझे इस बात का नहीं पता कि सुहाग कक्ष में भी क्या कुछ फ़ोटोबाजी के शौकीन लोग कैमरामैन को अंदर आने की अनुमति देते हैं। इस भूत प्रिय आदमी के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। मोबाइल तो वहाँ भी हाज़िर रहता ही होगा। पहले फ़ोटो, बाद में कुछ और। एक ड्रामा ही सही। असली का आनन्द भुलाकर फ़ोटोबाजी में डूब जाने का ये कैसा विचित्र दीवानापन है? कैसा विचित्र युग है? वर्तमान जाए भाड़ में ,भूत की तैयारी करो शान से। आदमी की ये भूत प्रियता उसे  कहाँ ले जाएगी। कैमरा ही मालिक है। सब कुछ मोबाइल चालित है। बदल गई  फ़ितरत कैसी कैसी, वर्तमान की कर दी ऐसी तैसी। भूत से बहुत ही प्यार करता है, भूतप्रियता 'शुभम' ने देखी ऐसी।।

💐शुभमस्तु !
✍🏼 लेखक©
🌱 डॉ.भगवत स्वरूप"शुभम"

गुरुवार, 17 जनवरी 2019

भक्त -चालीसा [छन्द:दोहा] (भाग:4)

मज़हब -  भक्त   महान हैं,
जैसे         पत्थर    लीक।
पट्टी    बाँधे     नयन    पर,
बस मज़हब के नीक ।।31।।

गुबरैला      गोबर     बसे,
बस     इतना       संसार।
गोबर की   ही   महक में ,
उसका जीवन -सार।।32।।

गोबर   के    बिल  में बसे ,
मज़हब -  भक्त    अनेक।
बाहर  झाँका  फिर  घुसे,
यही भक्ति  की  टेक।।33।।

जीभ - लालसा  के लिए,
अंडे       माँस       शराब।
धर्म-ग्रंथ   में    क्या  यही ,
लिखा मज़हबी-आब??34।।

धर्म -  भक्त   होना  सही,
मत        होना     धर्मांध।
अंधे  की   लकड़ी   लिए,
मत    फैला    दुर्गंध।।35।।

जीव    मात्र    रक्षा   करें,
मानवता      का     काम ।
अपना - सा  समझें  उन्हें,
पशु खग वृक्ष ललाम।।36।।

जीव -  आत्मा     में  बसे,
प्रभु   का    सच्चा    रूप।
आत्मा का   सम्मान  कर,
निर्मल स्वच्छ स्वरूप।।37।।

त्याग  वसनवत  देह  को,
आत्मा     बदले      गात।
आत्मा की है जाति क्या,
समझ तत्त्वगत बात।।38।।

मानुष  मछली  तितलियाँ,
पंछी          पादप     बेल ।
जाने कब   किस  रूप में,
खेले आत्मा  खेल।।39।।

 उदर   तेरा   श्मशान   है,
अंडे               मांसाहार।
जिनको तूने   खा   लिया ,
तू  उनका   आहार।।40।।

चौरासी   लख  योनि  में,
भटक   रहा    रे     जीव।
फिर  कैसी   ये    हेकड़ी,
"शुभम"कर्म की नींव!!41।।
     
💐शुभमस्तु !
✍🏼रचयिता ©
💞 डॉ.भगवत स्वरूप"शुभम

भक्त -चालीसा [छन्द:दोहा] (भाग:3)

छपा पोज   अख़बार में,
बैनर      टाँग      प्रचार।
कम्बल   बाँटें     सेठजी,
गठरी  कार उतार।।21।।

सेवक  मच्छर  माखियाँ,
धन -भक्तों   की   सोच।
मान  नहीं शोषण सदा,
स्वार्थ  हेतु उत्कोच।।22।।

जातिभक्त    नेता  खड़ा,
देशभक्ति       से       दूर।
मिट्टी  का    ही   हो  भले,
उसका काम ज़रूर।।23।।

वोट   सभी   को  चाहिए ,
लाभ मात्र    निज जाति ।
ऐसे     नेता     से   भला ,
नेता जाति विजाति।।24।।

जातिभक्त   नेता   सभी,
मेढक  -   टर्र      समान।
पड़े     कूप     टर्रा    रहे,
कुगति देश की हान।।25।।

फैशन की अति भक्ति का,
लम्बा     फटा        पुरान।
फ़टी  जींस   में    झाँकता,
फैशन -भक्त महान।।26।।

तन   ढँकने    के  आवरण ,
नहीं    रहे     अब     वस्त्र।
ध्यानाकर्षण      के    बने,
मारक मोहन अस्त्र।।27।।

किसी भिखारी   से लिए,
माँग   भीख    में    वस्त्र।
युवा  - युवतियाँ  गर्व  से,
दिखलाते परमास्त्र।।28।।

गिरी  गिरी   अब ये गिरी,
नारी         हाई      हील।
ज्यों  सूजे  की  नोंक पर,
उड़े धरा पर चील।।29।।

ऊँचा   दिखने   के  लिए ,
अच्छा      है      उपचार।
ऊँची सैंडिल    पहन लो,
पढ़'-लिखना बेकार।।30।।

💐शुभमस्तु !
✍🏼रचयिता ©
🍀 डॉ. भगवत स्वरूप "शुभम"

भक्त -चालीसा [छन्द:दोहा] (भाग:2)

चमचा या चमची कहो,
या  नेता     का  भक्त।
नयन मूँद   पीछे   चले,
सदा रहे अनुरक्त।।11।।

पत्नी जी   के  भक्त हैं , 
दस  सौ  नहीं   हज़ार।
थोड़े -थोड़े  आप हम,
मिले नहीं आहार ।।12।।

पत्नी  की  भगती  करो ,
जो   चाहो    सुख -चैन।
रात-दिवस भुगता  करो,
उधर लगे जो नैन।।13।।

एक हाथ   बटुआ  लसे ,
दूजे    कर      मोबा'ल।
पीठ सुसज्जित पोटली,
ये पति जी हाल ।।14।।

पीहर का  कूकर  मिले,
करना   उसका   मान।।
होगी पत्नी खुश बहुत,
बढ़े आपकी शान।।15।।

गृहलक्ष्मी की भक्ति का,
सदा   सुखद  परिणाम।
नाचो अँगुली    पर सदा,
गोपनीय यह काम।।16।।

नर   आधा   पत्नी बिना ,
पत्नी     आधा      अंग।
अर्धांगिनि   कहते   उसे,
रात-दिवस का संग ।।17।।

धन  वैभव   के भक्त जो,
मानवता        से       दूर।
कनक -चौंध की अंधता ,
नयनों    में    भरपूर।।18।।

दया  धर्म  करुणा रहित,
धन    के     अंधे   भक्त।
स्वर्ण प्रदर्शन की ललक,
दानवता  अनुरक्त ।।19।।

ढोंग धर्म   का  मन बसा,
तन  पर    टीका   माल ।
कथा -भागवत भी करें,
पर धन्धे का जाल।।20।।

💐शुभमस्तु  !
✍🏼रचयिता ©
☘ डॉ.भगवत स्वरूप "शुभम"

भक्त -चालीसा [छन्द:दोहा] (भाग:1)

भक्तों    का    संसार   है,
भक्तों     की      भरमार।
भक्त -भीड़ नित बढ़ रही,
सजे सकल दरबार ।।1।।

कंचन   कामिनि   भोगते,
बाबाजी        दिन - रात।
भक्त   सुहागा    दे    रहे ,
ग्रीष्म शीत बरसात ।।2।।

खुली  आँख  से   देखते,
अन्ध -भक्ति    अनुराग।
परदे  में क्या -  क्या घटे, 
रँग  होली का फ़ाग।।3।।

वेष  कलंकित  हो गया,
बाबाओं      के      हेत।
करनी  बाहर   आ  गई,
वसन   गेरुआ  सेत।।4।।

बहती   गंगा   में निपुण,
भक्त    धो    रहे   हाथ।
रेशम   के    परदे   सजे,
आगे - पीछे  स्वार्थ।।5।।

रामनाम  पट पर लिखा ,
उर   में     कंचन   काम ।
माया   से    दूरी    रखो ,
नित उपदेश ललाम।।6।।

नेताजी  के  भक्त   गण,
जैसे       लम्बी      पूँछ।
जितनी  लम्बी  पूँछ हो,
उसकी   उतनी   पूछ।।7।।

हाथ  लिए   माला खड़ी,
भक्त     भक्तिनी   भीड़।
किशमिश काजू साथ में
महक  रहा है नीड़।।8।।

बैनर   झण्डे     टोपियाँ ,
फ्लैक्स सुसज्जित मंच।
नारे    भक्त   लगा    रहे,
मैल  न मन  में रंच।।9।।

नेता   कच्चा   कान का ,
पर   पटु  भक्त   सुजान।
जो भर  दे  साँची   वही,
बात कान में तान।।10।।

💐शुभमस्तु !
✍🏼रचयिता ©
🌱 डॉ. भगवत स्वरूप "शुभम"

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...