सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

ऋतुराज पधारे [बाल-कविता ]

सरसों की  फूली फ़ुलवारी।
पीली -पीली  शोभा न्यारी।।

झूम -झूम कर  सरसों नाचे,
बच्चे   खड़े  पोथियाँ  बांचें,
महक रही है क्यारी-क्यारी,
सरसों की फूली फ़ुलवारी।।

गया  शीत  ऋतुराज पधारे,
खुले   सुप्त   ऊर्जा  के द्वारे,
कोयलिया  तू कूक सुना री,
सरसों  की फूली फ़ुलवारी।।

देखो   मधुमक्खी  भी आई,
मधुरस   फूलों  से भर लाई,
पीत पराग  पंख निज भारी,
सरसों की फूली फ़ुलवारी।।

पतझर  हुआ कोपलें आईं,
ज्यों लाली होठों  पर छाई,
पीपल नीम आम मनहारी,
सरसों की फूली फ़ुलवारी।।

जौ  -  गेहूँ   की  बालें  झूमीं,
तितली ने नवकलिका चूमी,
खगकलरव मोहक शुभकारी
सरसों  की फूली फ़ुलवारी।।

बौर महकने लगे आम पर,
भौंरे  गूँजे  चले   काम पर,
पछुआ बहने  लगी बयारी,
सरसों की फूली फ़ुलवारी।।

उठो  चलो   बगिया में खेलें,
फूलों  से   भर   छाई   बेलें,
'शुभम'पीत छटाअति प्यारी,
सरसों की फूली फ़ुलवारी।।

💐 शुभमस्तु !
✍🏼 रचयिता ©
🌹 डॉ. भगवत स्वरूप"शुभम"

रविवार, 10 फ़रवरी 2019

वसंत ही वसंत [छन्द :दोहा]

बौराने       तो    आम थे,
बौराए       हैं        ख़ास।
फूल -   फूल      गुंजारते,
आया     है      मधुमास।।

बौराए         बूढ़े      युवा,
छाने      लगा        वसंत।
लाल  अधर    हँसने लगे,
आने       वाला     कन्त।।

बूढ़े    पीपल   में  खिलीं,
कोंपल    कोमल   लाल।
महके   बौर    रसाल  के,
बदली   है     लय-ताल।।

खिलीं पुष्प की क्यारियाँ,
तितली       झूमे     पास।
मधुमक्खी   मकरंद    पी,
मधु   में    भरे    सुवास।।
       
पीउ -पीउ  की  रट लगा ,
पिक   के   मीठे    बोल।
पिय की याद  सता रही,
विरहिन  में  विष  घोल।।

सरसों    फूली   खेत में ,
छाने      लगी     बहार।
प्रियतम  से करने लगी,
प्रिया  प्रमन    मनुहार।।

गेंदा     फूले     बाग   में,
महके    लाल   गुलाब।
आपस में फुसफुस करें,
बदल-बदल   उर भाव।।

पतझर     होता   पेड़ से,
झरते       पीले      पात।
झोंका  आया  पवन का,
स्वच्छ    धरा     स्नात।।

फाल्गुन  हिन्दू  वर्ष का,
अंतिम   मधुमय   मास।
अंत भला तो सब भला,
नहीं   मान     उपहास।।

अंत  आदि  के  युगल में,
शुभागमन       ऋतुराज।
जड़ - चेतन में प्राण नव,
भरा  हुआ    है   आज।।

कामदेव   के  घर  हुआ ,
पुत्रजन्म    यह     जान।
झूमे  उपवन -वन सभी,
है   ऋतुराज     महान।।

नवपल्लव     का पालना,
वसन        बनाते    फूल।
पवन झुलाता निज करों,
पिक    संगीत   न भूल।।

लोरी   तितली  भ्रमर की,
प्रातः        पंछी  -   राग।
कलरव सरिता का मधुर,
कहता  अब उठ  जाग।।

लाल   कोंपलें   हो रहीं,
हरी -  हरी      हरिताभ।
सघन लताएँ  विटप भी,
सद सुगंध शुभ  आभ।।

नर - नारी  के उर  उठी,
अनचीन्ही     मधु  पीर।
आकर्षण   की  भावना ,
धरो 'शुभम' उर - धीर।।

होली    का   रँग  हाथ ले,
चंदन     चारु       अबीर।
ढप ढप ढप ढफ को बजा,
गाओ       फाग - कबीर।।

वैर  - भाव  - विद्वेष  सब,
जला    होलिका  - आँच।
गले मिलें      त्यागें   गिले,
बात  सत्य   शुचि  साँच।।

ढफ  ढोलक की धमक से,
उठे       हूल       उर -चंग।
थिरकें तन -मन पाँव भी,
नृत्य   देख   जन     दंग।।

कर   झींगा  खटताल  से,
बजा       रहा      मंजीर।
भींगे   तन -मन   रंग  से,
भंग      भेद  -  जंजीर।।

नाच -गान  की लहर में,
रुके   न   हृदय -  तरंग।
मनमानी    होली  मचा,
गाते        फ़ाग    हुरंग।।

शिशिर गया बदला समा,
विदा      हुमक  -  हेमंत।
मात   शारदा   को नमन-
करता  "शुभम"   वसंत।।

💐 शुभमस्तु!
✍🏼 रचयिता©
🌾 डॉ. भगवत स्वरूप "शुभम"

होली है कीचड़ -उछाल [व्यंग्य - लेख ]

   दूसरों पर कीचड़ उछालना मानव का एक अनिवार्य धर्म है। इस धर्म का निर्वाह और पालन देश में  प्रमुखता से किया जा रहा है। क्या आम क्या खास! क्या अधीनस्थ क्या बॉस! क्या सामान्य क्या हास! क्या अंधकार क्या उजास! सारे हालात सारे प्रयास - बस दूसरों पर कीचड़ उछालने के ही रहते हैं। ये अलग बात है कि हम कभी कुछ नहीं कहते हैं। बस कीचड़ के दाग -धब्बे देखते रहते हैं। सबकी सहते हैं।
   कीचड़ उछालना एक ऐसा प्रयास है कि हम ये कभी नहीं देखते कि हमारे दामन पर कितने दाग-धब्बे भरे हैं।इस कला को हमें अपने वरिष्ठों से सीखना पड़ता है। जब हमारे बड़े-बड़े आदरणी, सम्माननीय, माननीय इस क्षेत्र में शोध-परियोजनाएं चला रहे हों, तो हमारा धर्म है कि उनसे कुछ तो सद्प्रेरणा ले ही ली जाए।
   वैसे दूसरों पर कीचड़ उछालने में जिस आनन्द की अनुभूति आदरणीय "कीचड़-उच्छालक" को होती है, उसे साहित्य के किस रस में समावेशित किया जाए, ये एक विचारणीय बिंदु है। इसके लिए बहुत पहले ही हमारे साहित्यकारों ने नहीं, समाजशास्त्रियों ने जिस सुंदर रस की खोज की है, उसे 'निंदा रस' के नाम से सुशोभित किया जाता है।

अपने दामन पर लगा,
बटन   बड़े    मजबूत।
झाँके दामन और का,
निंदा   रस   अनुभूत।।

कीचड़ नित्य उछालना,
समझदार   का   काम।
हर्रा  लगे  न   फिटकरी,
करो   उन्हें     बदनाम।।

 राजनीति   से   सीखना ,
कीचड़    रोज़   उछाल।
समझ  न आवे  नीतिगत,
या  करतूत     कुचाल ।।

होड़  मची  है  पंक की,
कितना  किसके पास।
जो निर्मल सच्चा हृदय,
राजनीति    बकवास।।

बिन कीचड़ झांको नहीं,
राजनीति   की     ओर।
जो  भाए  परहित  तुम्हें,
जनता     समझे    चोर।।

कीचड़ की  सत सम्पदा ,
होती    है      अनिवार्य।
कीचड़ से मुँह धो चलो,
सभी  सफ़ल  हों कार्य।।

तुम उन   पर छींटा करो,
मन -मन  काली  कीच।
तभी सफ़ल हो पाओगे,
राजनीति   के      बीच।।

मुँह    बाँधे   होती  नहीं ,
राजनीति    की    बात।
मुँह की पिचकारी भरो,
कर लो कीचड़ - घात।।

कीचड़   के    ही बीच से, 
उगता    पंकज       फूल।
तुम्हें  फूल   के   फूल  हैं,
उनको    हैं     तिरशूल।।

कीचड़ नहिं तो फूल क्यों,
फल   न   मिले बिन फूल।
बिन फ़ल  सेवा   देश की,
वही    धूल   की     धूल।।
 
   इसलिए हमें अपने बरिष्ठ जनों से यह ज्ञान और गुर सीख लेने चाहिए कि इस विशेष सम्मान, पद,मान, धन-धान्य और समृद्धि के क्षेत्र में उतरना है, तो सिद्धान्त-सूत्र सीख ही लेने चाहिए। वैसे सपोलों को बिल में रेंगना, डसना और ग्रसना सिखाना नहीं पड़ता। फिर भी जितना अधिक ज्ञान मिल जाए भविष्य में काम आ ही जाता है।
   आपको यह पता ही है कि अब कीचड़ मार होली का महापर्व आने में बहुत अधिक दिन शेष भी नहीं हैं। आज वसंत पंचमी का दिन है। सभी साधक अपनी-अपनी साधना द्वारा अपनी -अपनी पिचकारी में अधिकाधिक किचड़ें उछालने की प्रार्थना में तल्लीन हो गए होंगे। उस महा पर्व होली में कौन कौन रंगे जाएँगे।और कौन दूसरों के चेहरों पर कालिख पोतते हुए कहेंगें 'बुरा न मानो होली है।' होली में तो सब जायज है।फ़ागुन में तो ससुर भी देवर लागे।अब चाहे रँग डालें या कीचड़, चंदन गुलाल या अबीर। अब जिसकी झोली में जो होगा, वही तो डालेगा।

जाकी रही भावना जैसी।
बुरे भाव की ऐसी -तैसी।।

होली  खेलो  पंक-उछाल।
या फिर रोली चंदन डाल।।

स्वच्छकारिता काअभियान।
सबसे बड़े हमीं  अभिमान।।

कुर्सी  मेरी    मैं गुड़ - चींटा।
कीचड़डालो बहुत सुभीता।।

महापर्व   होली  का आया।
क्या होगा मेरा मनभाया!!

बुआ जले या जले भतीजा।
अपना तो हर ओर सुभीता।।

हम तो    होली  ही  खेलेंगे ।
'शुभम' पंक भी हम झेलेंगे।।

💐 शुभमस्तु !
✍🏼 लेखक/रचयिता©
🍀 डॉ. भगवत स्वरूप "शुभम"

शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

समय नहीं है! [व्यंग्य]

   हमारा देश कर्मठ लोगों  का देश है। यहाँ जितने भी काम हो रहे हैं, जब इस देश के निवासियों के पास समय नहीं है। यदि इनके पास समय होता, तो पता नहीं बुलंदियों के झंडे न जाने कितने ऊँचे फहराते। जब आप किसी व्यक्ति से पूँछे कि ये काम क्यों नहीं किया या करते हो? तो उसके पास एक गढ़ा गढ़ाया उत्तर यही होता है कि समय नहीं है। जब यहाँ के आदमी के पास समय नहीं है तब तो देश की जनसंख्या 130 करोड़ के हाई वे को क्रॉस कर चुकी है। यदि समय होता तो न जाने कितने हाई वे बना चुकी होती। पहले यहाँ के रोड दो लेन थे। फिर चार लेन हुए और अब छः-छः लेन के बन रहे हैं। जब तक ये छः लेन पूरे होंगे, तब तक आठ-आठ लेन की आवश्यकता की प्रसव पीड़ा शुरू होने लगेगी। समय ही नहीं है आदमी के पास, फिर बेचारा करे तो क्या करे।समय न होने पर तो ये हाल है, फिर क्या होगा अकल्पनीय है!
   यहाँ सारे काम तब होते हैं, जब आदमी के पास समय नहीं होता। समय से काम करने के अद्भुत परिणाम होते हैं। तो असमय काम करने के परिणाम भी चौंकाने वाले नहीं होंगे तो क्या  होंगे? भई! दाद देनी ही पड़ेगी देश वासियों की महान कर्मठता की। यहाँ आदमी को जो काम आवंटित किया जाता है,वह चाहे ठीक प्रकार से हो या न हो, लेकिन उसी समय में से समय निकालकर (अब मैं ये क्यों कहूँ कि समय की चोरी करके) ऐसे ऐसे कारनामे कर देता है, कि उन कारनामों का हाल देख सुनकर दाँतों तले अँगुली दबाने को बाध्य होना ही पड़ता है! अरे!भइए ये हमारी आवश्यक मजबूरी है कि हम ऐसे कामों की सराहना करें, उन्हें प्रोत्साहित करें। उनके स्वागत में स्वागत समारोह करें, उनके गले में माला, कंधों पर शॉल, और उनके करकमलों में पुष्पगुच्छ भी सुशोभित करें।यहाँ ऐसे ही कामों की सराहना की जाती है कि अपने आवंटित काम को कोने धरकर अन्य काम, कला में पारंगत होने कद झंडे गाड़ दे।औऱ सारा देश वाह! वाह!! कर उठे। जैसे बैंक मैनेजर साहब सुंदर हास्य कविता करने लगें। मास्टर साहब नेतागिरी करने लगें। नेताजी खेती करने लगें। किसान सचिवालय में जाकर नेताजी के चरण-चुम्बन करने और कराने के गुर बताने लगे। कानून के छात्र कचहरी में जाकर भोले भाले लोगों के कच हरण कराने के लिए वकीलों के दरबार में हाजिरी लगाने लगें। कहने का तातपर्य यह है कि अपने निजी को छोड़कर अन्य किसी विद्या? कला? करतूत ? में अपने हाथ मुँह रंग लेने का नाम  विशेषज्ञता है। फिर कैसे न कहा जाए कि समय नहीं है। समय तो तब हो जब हम कोई काम करें। अपना दायित्व समझ कर करें? जब कुर्सी पर कोट टाँगकर अध्यापक महोदय अपनी परचूनी की दुकान पर चले जायँ, या अपने खेत में गाजर खोदने, ट्रेक्टर चलाने, बाजार घूमने चले जायँ तो भला वे बहुमुखी प्रतिभा से सम्पन्न नहीं होंगे तो कौन होगा? ये भी तो तब है जब, उनके पास समय नहीं है। धन्य मेरे देश! धन्य मेरे देश वासियों !! आप जानते ही हैं कि वैसे तो मैं कुछ औऱ भी लिखता पर क्या बताऊँ समय नहीं है।

💐शुभमस्तु !
✍🏼लेखक ©
😛डॉ. भगवत स्वरूप"शुभम"

हम 'जनता ' हूँ [अतुकान्तिका]

 आपने रैली की 
तो आपके साथ,
उन्होंने रैली की 
तो उनके भी साथ,
अपना काम तो भइए
सबका साथ देना है,
सबका साथ 
आप सबका विकास,
क्योंकि -
'हम तो जनता हूँ'।

हम तो आपको भी जनता हूँ,
उनको भी जनता हूँ,
जनना ही तो अपन का काम है,
आपको उनको  सबको
जनते जनते ही
तो अपना नाम जनता है, 
जी हाँ,
'हम जनता हूँ।'

अपने 'जन गण मन ' में
ये जो जन है
बार -बार यही तो कहता है-
जन जन जन 
तू  तो  बस 'जन ता' है
क्योंकि तू जनता है
इसीलिए तू जनता है।

तुम्हारी रैली में गया,
उनकी रैली में गया,
सबकी रैली में गया,
लेकिन मैं तो हूँ ही 
आप के लिए
उनके लिए
सबके लिए
बस जनता। 

कोई पहचान नहीं मेरी ,
सबके के लिए अनजान,
सबके लिए नया,
सबके उपयोग ही नहीं
उपभोग की वस्तु 
'हम जनता हूँ।'

सबका साथ देकर ही
सबका विकास होगा,
आपका होगा
उनका होगा
हमारा हो या न हो,
क्योंकि मैं  मानव कहाँ?
वस्तु ही तो हूँ,
जहाँ  भी लगा दो,
लगा रहना है,
कुछ  भी नहीं कहना है,
मगर कुछ भी नहीं कहना है,
हवा के साथ बहना,
हवा के साथ रहना, 
एक निर्जीवता के 
अहसास के साथ
अंततः वही ढाक के दो पात
क्योंकि
'हम जनता हूँ'।'


हमें मिलता क्या है!
मीठे -मीठे भाषण,
विष -वास भरे आश्वासन,
राशन की लाइन का राशन,
नियम कानून से बंधा अनुशासन,
हम तो हूँ उनका खाने का 
मिट्टी का वासन,
हमेशा आम ही रहना
चुसने की नियति को सहना,
 'हम जनता हूँ।'
'हम जन ता हूँ ।।'

💐शुभमस्तु !
✍🏼रचयिता ©
🌾 डॉ. भगवत स्वरूप "शुभम"

बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

बात बात में बात [छन्द:कुण्डलिया ]

चश्मा   आँखों   पर लगा,
ईयर          ईयर  - फोन।
चपल  चाल  धीमी  नहीं,
रसना    धरे    न   मौन।।
रसना    धरे    न     मौन,
न सोचे   बुरा -भला भी।
बोले        ऐसे       बोल ,
न जाने वाक- कला ही।।
विज्ञानी    कर      खोज ,
करो  कुछ नया करिश्मा।
जीभ -  द्वार   लग  जाय ,
'शुभम' आँखों-सा चश्मा।।

बैठी       हों  दो   चार  जब ,
सुमुखि       सहेली      नार।
ज्यों चिड़ियाँ  चहचह करें,
लहराती        द्रुम  -  डार।।
लहराती          द्रुम - डार ,
समझ  में   बात   न  आवे।
बात    बात      में     बात ,
बात    में    बात    बनावे।।
'शुभम'   न   समझा  राज,
खरहा   से    कहे   खरैटी।
बिना        रुके      संवाद,
कर   रही    नारी    बैठी।।

पहिए   गाड़ी   के   युगल,
पति - पत्नी     नर- नारि।
ट्रैक्टर   के     जैसे   न  हों ,
चलते      सोच - विचारि।।
चलते       सोच - विचारि,
हवा   भी   हो   इक जैसी।
थोड़ी   भर   दी   अधिक,
करेगी         ऐसी - तैसी।।
सोच   समझ  शुभ  लेना ,
अपना   पहिया     भइये।
बे - पटरी     घर      चले ,
न   लेना     ऐसे    पहिए।।

नर -    नारी   हैं    एक -से ,
नहीं    सत्य    यह    बात।
अलग  माल  कुछ तो लगा,
अलग -  अलग  है  धात।।
अलग -  अलग   है  धात,
अधूरे       छोड़े     दोनों ।
नारि     हुई         वाचाल ,
घटित  होता      अनहोनों।
परिपूरक     दोनों      रहे,
विषमता   उनमें     भारी।
कमी        एक          की,
दूजे  में  ढूँढ़े    नर -नारी।।

नेह  बिना    दीपक   नहीं,
करता    दिव्य     प्रकाश।
बिना नेह    नर -नारि  के,
मुख  पर   निर्मल  हास।।
मुख  पर   निर्मल    हास,
नेह    भीगी    बाती   से।
दम्पति -सदन     प्रकाश,
सीप   मोती    स्वाती से।।
नहीं  चाँदनी    चाँद बिन ,
तनिक      नहीं      संदेह।
मानव-जीवन तब 'शुभम',
मिले     गंग-जल    नेह।।

💐 शुभमस्तु!
✍🏼 रचयिता ©
🌺 डॉ. भगवत स्वरूप"शुभम"

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2019

सृष्टि के कर्ता हे भगवान ! [गीत]

सृष्टि  के कर्ता  हे भगवान!
भुवन  में तेरी   ऊँची शान।।

तूने   रचे   सकल  नर -नारी,
कोई   गोरा    काला   भारी,
जितने जन  उतने  नव चेहरे,
पोषण रक्षा हित ध्वज फहरे,
सबकीअलगअलग पहचान,
सृष्टि के  कर्ता  हे भगवान!!


भिन्न स्वरों में मुखरित वाणी
बुद्धिमान  जग मानव प्राणी,
जगत चराचर  में  शुभकारी,
नर -नारी की  महिमा न्यारी,
चमत्कारवत   मानव - ज्ञान,
सृष्टि के कर्ता    हे भगवान!!

मन रहस्य  का बड़ा पिटारा ,
जितना  खोजा  अपरम्पारा,
प्रभु  तू अंशी    मानव  अंश,
कृष्ण कभी  तू बनता  कंस,
अद्भुत तेरी  हर  लय   तान,
सृष्टि के कर्ता   हे भगवान!!

एक धरा   की   मिट्टी  जाए,
रंग - बिरंगे     पुष्प    उगाए ,
अलग सुगंध अलग आकार,
वृक्ष लताएँ   विविध  प्रकार,
सबका रखते हो प्रभु ध्यान,
सृष्टि के कर्ता   हे भगवान!!

अम्बर में उड़ते खग कितने,
कलरव उनका   जैसे सपने,
निज नीड़ों में शावक पाल,
रहते हैं   पेड़ों   की    डाल,
उनको   करते   दाना  दान,
सृष्टि के कर्ता  हे भगवान!!

गौरेया   कपोत    पिक  मोर,
कलरव करते  हैं  शुक  भोर,
मुर्गा - बांग  कोकिला  गान,
सुना रही   झेंपुल निज तान,
जगत की सुषमा की हैं खान
सृष्टि के कर्ता    हे भगवान!!

गैया   मैया      कहलाती   है,
अमृता-सा पय पिलवाती है,
बकरी  भेड़  भैंस  पशु  सारे,
मानव संगी      सदा   सहारे,
बिल्ली मौसी   घर का श्वान,
सृष्टि के कर्ता   हे भगवान!!

देखो  जंगल  का भी मंगल,
चीता शेर  भालुओं का बल,
हाथी हिरन  स्यार भी रहते,
उछल-कूद बंदर कुछ कहते
तुम्हें रहता  है सबका ध्यान,
सृष्टि के कर्ता  हे भगवान!!

कहीं बोलता  वन में तीतर,
छिपा बटेर झाड़ियों भीतर,
'तु ही''तु ही' एक चिड़िया बोली
खंजन बया नहीं अनबोली,
नीलकंठ की  अपनी शान,
सृष्टि के कर्ता हे भगवान!!

मछली मेढक  या  घड़ियाल,
जलचर का सरि सिंधु धमाल
मगरमच्छ कच्छप  जलजीव,
जल ही जीवन जल संजीव,
सब पर  तेरी   कृपा   महान,
सृष्टि के कर्ता    हे भगवान!!

गंगा यमुना  उच्च हिमाचल,
मर्यादा में   सागर  का जल,
वन उपवन की शोभा प्यारी,
भरी हुई जग  की फुलवारी,
गेहूँ   गन्ना     लहरें     धान,
सृष्टि के कर्ता हे भगवान!!

आम   सेव   अंगूर    ख़जूर,
भरे स्वाद रस   फल भरपूर,
मधुर पपीता    बेल   अनार,
नीबू   कदली    मिर्च अचार,
प्रेम -रंग    में     रंगता  पान,
सृष्टि के कर्ता  हे भगवान!!

भिंडी  गाजर  गोभी  आलू,
लाल टमाटर    मटर रतालू,
पालक मैंथी शलजम मूली,
जिमीकंद जमीन   में भूली,
कटुक करेला पर गुणवान,
सृष्टि  के कर्ता हे भगवान!!

दूध छाछ घृत दधि नवनीत,
खोया मीठा   परम  पुनीत,
रोटी    पूड़ी  पुआ  पराँठा,
गराम पकौड़ी बेसन आटा,
सहस्रों व्यंजन  का संधान,
सृष्टि के कर्ता  हे भगवान!!

मीठा मधु  मधुमक्खी  देती,
मधु रस फूलों का भर देती,
जड़ी बूटियां औषध लातीं,
स्वस्थ संदेसा जग फैलातीं,
प्रकृति में  भरे हुए  वरदान,
सृष्टि के  कर्ता हे भगवान!!

सूत  कपास विविध रंगीन,
मोटी  हल्की   ऊन  महीन,
पेंट शर्ट    साड़ी  या  धोती,
बारह मास  बदन पर होती,
आवरण तन के अनुसंधान,
सृष्टि के कर्ता   हे भगवान!!

तेरी   माया   तू   ही   जाने,
भूले से  नहिं जायँ  भुलाने,
प्रतिपल नए  करें प्रभु खेल,
प्रभु से नहीं किसी का मेल,
'शुभम'लोकत्रय में गुणगान,
सृष्टि के कर्ता  हे भगवान!!

💐 शुभमस्तु!
✍🏼 रचयिता©
☘ डॉ. भगवत स्वरूप"शुभम"

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...