सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

कोई माने या न माने

चिड़ियों को  ये  पता  है,
पड़   रहे  हैं   रोज़  दाने।
सच  बात   तो   यही  है,
कोई माने  या   न  माने।।

बाज    हैं        गिद्ध     हैं ,
चील भी हैं अति सयानी।
सभी    तो    माँस    चाहें ,
कोई  माने   या  न  माने।।

दाने    को    जो     चुगेगा,
वह    जाल    में   फँसेगा।
लालच    बुरी    बला    है,
कोई   माने  या   न माने।।

बैठे       हुए       शिकारी ,
तरकश    में  तीर  लेकर।
मौके  की    टोह   उनको,
कोई   माने   या  न माने।।

गौरेया        फ़ाख्ता     का ,
बेहाल       हो     रहा    है।
उजड़े   हैं     नीड़    उनके ,
कोई   माने    या  न माने।।

लासा    लगा    है    मीठा,
तीरों    की    नोंक   देखो।
चखते   ही   तीर   चुभना,
कोई   माने  या  न   माने।।

बड़ा    जाल   तानने   की,
गड़ रहीं  'शुभम' हैं  खूँटी।
पर    फड़फड़ा    रहे    हैं, 
कोई  माने  या   न  माने।।

💐 शुभमस्तु !
✍🏼 रचयिता ©
☘ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

सवेरा [बाल कविता]

सूरज निकला हुआ सवेरा,
अंधकार   का   टूटा   घेरा।

तारे   डूबे    नील   गगन में,
चंदा मामा   गए   सदन  में,
स्वच्छ हवा का लगता फेरा,
सूरज निकला  हुआ सवेरा।

पेड़ों पर सब चिड़ियाँ बोलीं,
मधु लहरी कलरव ने  घोली,
कुक्कड़कूँ  का  बोल घनेरा,
सूरज निकला  हुआ  सवेरा।

हँसने  लगे   फूल  डाली पर,
कलियाँ चटकीं दे ताली कर,
सद सुगंध  ने   डाला   घेरा,
सूरज  निकला  हुआ सवेरा।

बेलें    झूल   रही   हैं   सारी,
महक रही धनिए की क्यारी,
लहराता   उपवन   है    मेरा,
सूरज निकला हुआ सवेरा।

भेड़  बकरियाँ  गायें  जागीं,
चारा    पानी  सानी   मांगीं,
रेंके   गैया     भैंस     बछेरा,
सूरज निकला हुआ सवेरा।

मुन्ना  जागो   मुन्नी   जागो,
कम्बल और  रजाई त्यागो,
बाहर   कुहरा   श्वेत  घनेरा,
सूरज निकला हुआ सवेरा।

दही  बिलोती  जागीं अम्मा,
तुलसी की करती परिकम्मा,
दादी    खाँसी    नाती   टेरा,
सूरज निकला हुआ  सवेरा।

विद्यालय का घण्टा बजता,
मुन्ना  पेंट   सूट  में   सजता,
बस्ता    भारी   है    बहुतेरा ,
सूरज निकला हुआ सवेरा।

हुआ जागरण प्रातः - वेला,
'शुभम'  चेतना का नवमेला,
आलस निद्रा  हटा  अँधेरा।
सूरज निकला हुआ सवेरा।।

💐 शुभमस्तु !
✍🏼 रचयिता ©
 डॉ.भगवत स्वरूप'शुभम'

रविवार, 3 फ़रवरी 2019

भाव [ गीतिका ]

भाव   में   भगवान   का,
शुभ  वास  होता है यहाँ।
भगवान   भूखे   भाव के,
अन्यथा    पाहन    वहाँ।।
मन के  मंदिर  में  विराजे,
और     मैं     ढूँढूँ    कहाँ!
गंगा  कठौती  में  'शुभम',
साँच का आसन जहाँ!!

भाव   के   दो   बेर   जूठे,
बहुत    हैं    श्रीराम   को।
छिलके  केले  के  सुहाते,
पांडवों    के  श्याम  को।।
गोपियों    के    नयन   में,
बस  नेह  का नवनीत  है।
गोपाल   बालक    कृष्ण,
उनका 'शुभम' मनमीत है।।

भाव उर  का छलक पड़ता,
भावित  दृगों  की  कोर से।
पर्वतों   से     नीर     बहता,
संध्या  अहर्निश  भोर से।।
अनवरत  सरिता  उमड़ती,
भाव  भर    सागर   जहाँ।
वेदनामय     अश्रु    बहते,
खारपन     होता     वहाँ।। 

भाव   ही      हथियार    है,
और  भाव ही मरहम यहाँ।
भाव     ही      संसार     है,
उर -भाव ही सरगम यहाँ।।
जो   कुभावों    ने   लगाए,
घाव    वे     भरते     नहीं।
'शुभम'भावों  के सुमन दो,
सूखते      मरते       नहीं ।। 

भाव   के   उर -  भुवन  में, 
काँटे  उगाओ  या    सुमन।
रूक्ष   वन    की   झाड़ियाँ,
या उद्यान   के पौधे प्रमन।।
सत्य के निर्मल सलिल से,
सींचना         सद्धर्म      है।
सद्भाव   की   बेलें    सजा,
तेरा   'शुभम'  सत्कर्म   है।।

💐शुभमस्तु !
✍🏼रचयिता ©
🌾 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

अक्षर है ब्रह्म [अतुकान्तिका]

जिसका नहीं होता है
कभी भी क्षरण,
करता रहता है मानव
जिनका अहर्निश वरण,
वह ' अक्षर  ' है,
इसीसे शब्द वाक्य वार्ता 
स्वर अमर है,
अक्षर है ब्रह्म
जो त्रिकाल सत्य है,
शाश्वत है,
इसीलिए शब्द ब्रह्म है
न इससे 
जो तृण भर भी कम है,
इसमें नहीं  कण भर
भ्रम है।

आज भी गीता की 
अमर वाणी संन्देश,
नारायण श्रीकृष्ण के
नर अर्जुन को उपदेश,
गुंजायमान हैं ब्रह्मांड में,
नहीं सुन पाते हमारे कान
भरे उन्माद में,
खोखली अभिजात्यता
श्रेष्ठता जाति की वंश की
कर्मगत विमूढ़ता अपार,
चौरासी लाख योनियों का 
लहराता सागर
ऊँची लहरें अपरम्पार।
कगारें  तोड़कर  दरिया
नियंत्रण के बाहर,
अहंकार के वशीभूत
अक्षर और शब्द सीमा से
होता है बाहर,
अनीति अनय  का
खुलता द्वार,
शोषण की खिड़की
खुल रही हर बार,
बढ़ रहा 
मानसिक प्रदूषण
जो नहीं है
"शुभम" मानव का भूषण।

💐शुभमस्तु !
✍🏼रचयिता ©
🌱 डॉ. भगवत स्वरूप"शुभम"

बंदर बिल्ली और तराजू [गीत ]

बंदर  बैठा   लिए  तराजू।
रोटी नहीं खा रहा काजू।।

कभी   एक पलड़ा है भारी,
दूजी    पलड़ी   है    बेचारी,
एक गोरी एक बिल्ली कारी,
काली  ठोके साश्रु  कपारी।
मीठी भाषा हाँ जू! हाँ जू!!
बंदर   बैठा   लिए   तराजू।।

गोरी  के  संग   नैन  चलाता,
काली का ध्रुव ध्यान बंटाता,
नज़र   फिरी   गोरी  को हेर,
सिर पर  हाथ   रहा   है फेर।
देता किशमिश  मेवा  काजू।
बंदर  बैठा    लिए    तराजू।।

कहता न्याय  करूँगा पक्का,
लगे न मन को  कोई धक्का ,
नज़र बची  और  डंडी  मारी,
काली    देख   रही   बेचारी।
फड़क रही गोरी  की बाजू।
बंदर   बैठा   लिए    तराजू।।

काले   कोट   पहनने  वाले,
बंदर   के   पापा   के  साले,
जो  चाहो  इनसे  करवाओ,
गोरे  को काला  बुलवाओ।
जो   छापें   वे छोटे भ्रा'जू।
बंदर  बैठा   लिए   तराजू।।

चोर      चोर    मौसेरे  भाई,
जिसने   बोला शामत आई,
न्यायाधीश   न्याय का बंदर,
घुड़की    देता  कर  दे अंदर।
'शुभम'कह रहा ना जू ना जू।
बंदर    बैठा   लिए   तराजू।।

💐शुभम!
✍🏼रचयिता ©
☘ डॉ. भगवत स्वरूप "शुभम"

गुरुवार, 31 जनवरी 2019

बंदर बाँट [गीत]

मनमानी के नियम बनाए।
घोंटू पेट ओर झुक जाए।।

चित   भी मेरी पट भी मेरी,
आधी   में  भी   आधी मेरी,
चतुर  वही जो  मूर्ख बनाए,
उसका भी हिस्सा खा जाए।
बंदर बाँट   यही    कहलाए।
मनमानी के  नियम बनाए।।

प्रजातंत्र की अज़ब कहानी,
जनता का धन    नेता दानी,
जनता के   सेवक  कहलाएं,
चूसें आम   गुठलियाँ  ढायें।
कुर्सी पा   नेता   तन  जाए।
मनमानी के नियम बनाए।।

जिसकी सत्ता उस कर हत्था
विरोधियों  का   काटे   पत्ता,
साम दाम  भेदों   का   फंडा,
बस न चले तो बजता डंडा।
अपनी करनी   सही  बताए।
मनमानी  के नियम बनाए।।

झूठ  आँकड़े     मीठी  बातें,
छुरियाँ छिपा  पीठ  में घातें,
कीचड़ जाये कीचड़ छिड़कें
कड़वे सच सुन तनते भड़कें।
अंधे   नयन   कान   बहराये।
मनमानी के  नियम  बनाए।।

सेवक कहकर बनते स्वामी,
वसन  गेरुआ  अंदर  कामी ,
नागनाथ कोई -साँपनाथ है,
छोरी छुरियाँ सदा साथ हैं।
मुँह से राम -  राम ही  गाए।
मनमानी के नियम बनाए।।

आठ लाख का भी गरीब है,
आज नाप की   ये जरीब है,
अच्छे - अच्छे   नाप दिए हैं,
घी में शक्कर घोल पिए हैं ।
काजू पिस्ता ही   मनभाये।
मनमानी के नियम बनाए।।

नेता नगरी में   चित  लागा ,
शिक्षा धर्म देश  से    भागा,
पूँछ घटे जो   ये पढ़   जाएँ,
नेताओं को नियम सिखायें।
नारों   से    ही   देश चलाएं।
मनमानी के नियम बनाए।।

नेताओं के   नीचे  अफसर,
उन्हें चाहिए केवल अवसर,
कितने दूध धुले अधिकारी,
नेता अधिकारी  पर  भारी।
चिकने घड़े नीर ढल जाए।
मनमानी के नियम बनाए।।

भेड़चाल अब   टूट   रही है,
बहकावे से   छूट  - रही   है,
अच्छा बुरा भला सब जानें,
नेता की गति  को   पहचानें।
"शुभम"  हटेंगे  -काले साए।
मनमानी के नियम  बनाए।।

💐 शुभमस्तु !
✍🏼रचयिता ©
🌱 डॉ. भगवत स्वरूप "शुभम"

उठो किसानो! [ कृषक उद्बोधन गीत]

उठो किसानो!उठो किसानो
अपने को तुम भी पहचानो।।

जग के पालनहार तुम्हीं हो,
अन्नदान के द्वार  तुम्हीं हो।
दुग्ध शाकफल के तुम दाता,
तुम बिन मानव ग्रास न पाता।

निज जीवन आहुति को जानो,
उठो किसानो उठो किसानो।

कोई न  समझा हृदय वेदना,
स्वेद   बहाया    नहीं  चेतना,
नेताओं     के    झूठे     वादे,
मीठी    बातें     कपट  इरादे,
अपने  अन्तरतम  को छानो।
उठो किसानो उठो किसानो!

सस्ता बेचो  मंहगा   लाओ ,
मान और  सम्मान  लुटाओ,
बनिया भाव लगाता उसका,
अन्न धान फल सब्जी सबका
मालिक का कर्तव्य तो जानो।
उठो किसानो उठो किसानो।।

कब तक तुम संतोष धरोगे,
घर - घरनी को  रुष्ट करोगे,
बच्चे कब  तक  कष्ट सहेंगे,
फटे  वसन  वे   पहन रहेंगे,
उनके प्रति दायित्व तो जानो
उठो किसानो उठो किसानो।

धैर्य क्षमा की प्रतिमा तुम हो,
ज़्यादा को बतलाते कम हो,
अच्छा माल  कटौती करता,
बनिया क्या मालिक से डरता?
सीमा 'शुभम'आप पहचानो।।
उठो किसानो उठो किसानो।।

💐शुभमस्तु!
✍🏼रचयिता ©
🌾 डॉ. भगवत स्वरूप"शुभम"

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...