शुक्रवार, 12 मई 2023

हम' नाक हैं ● [ व्यंग्य ]

 201/2023

    

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●व्यंग्यकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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      भाइयो ! बहनो!!जीवधारियों में गहनो! 'हम' तुम्हारी नाक हैं। तुम्हारी साँस को चौबीस घण्टे,सातों दिन,बारहों महीने अंदर- बाहर लाने ले जाने वाली डाक हैं।आप कहेंगे कि तुम तो एक हो,फिर 'हम' क्यों  हो? हम इसलिए 'हम' हैं ; क्योंकि दस छिद्रधारी आप जब अपने को 'मैं'नहीं कह के  'हम' सर्वनाम से सम्बोधित कर सकते हैं।तो हम क्यों नहीं! हमारे भीतर भी तो एक नहीं दो -दो छिद्र हैं।

असली बात ये है कि 'हम' आपकी नाक हैं।जैसे एक राजा अपने सिंहासन पर उच्च पदस्थ होकर विराजमान रहता है, क्या हमारी भी स्थिति कुछ वैसी नहीं है ! आपके देह के शीर्ष पर स्थित शीश पर हम भी कुछ कम नहीं हैं।इधर-उधर  हमें न देखती हुई भी दो छोटी-छोटी आँखें, थोड़ा और पीछे दोनों पटियों पर जिन्हें अब कनपटी कहा जाता है; दो ऐंठे - उमेठे से गुफानुमा दो कान हैं।मेरे ठीक अधोभाग में दो परिपुष्ट अधरों के बीच में बत्तीस दाँतों के साथ सामंजस्य करती  हुई एक अस्थिहीन रसना है। मेरे दोनों ओर दो कोमल  - कोमल कपोल मेरी साज सज्जा में चार चाँद लगाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ते।औऱ फिर इन सबके मध्य स्थित 'हम' नाक।

नाक के नाम एक नहीं अनेक मुहावरे  मनुष्य समाज में कहे और सुने जाते  हैं।नाक रखना, नाक बचाना, नाक कटना, नाक ऊँची करना, नाक-भौं चढ़ाना,नाक में दम करना, नाक का बाल होना,नाक रगड़ना, नाक आना, उलटी तरफ से नाक पकड़ना, नाक उड़ा देना, नाक ऊँची रखना,नाक  ऊँची रहना,नाक और कान लेकर भागना,नाक के फेर से बयान करना,नाक के रेंट से बदतर करना,नाक के रास्ते निकालना,नाक कटवाना,नाक में बाँस डालना, नाक काट के नींबू निचोड़ देना, नाक की फुग्गी,नाक घिसना,नाक चढ़ाए रहना, नाकों चने चबाना, नाक चाटना,नाक चोटी करना,नाक छी जाना,नाक घुस जाना,नाक पर मक्खी न बैठने देना, नाक फुलाना आदि।

यदि आप इन नाक नामधारी मुहावरों की तह में जाएँ तो पाएँगे कि हम 'नाक' कुछ यों ही मिया मिट्ठू नहीं बन रहीं।अब अपने ही विषय में कुछ ज्यादा ही खोलकर बताने लगें तो यही कहा जाता है। अब अपने ही विषय में ज्यादा कुछ क्या कहें? और अपनी ही नाक कुछ ज्यादा ही नीची होने लगे तो बिना कहे भी कैसे रहें! मुझे सम्मानित करने के लिए अथवा ये कहें कि अपने को अपने पति के समक्ष अधिक सुंदर दिखने के लिए महिलाएँ मुझे एक औऱ छिद्र से छिद्रित करवाने में  भी नहीं चूकतीं और उसमें सोने की बालियां,लौंग, नथुनिया, बुलाक औऱ न जाने क्या क्या लाद देती हैं।उनकी खुशी ही मेरी खुशी है, इसलिए वेदना से पीड़ित होने के बावजूद हम चुप ही रहती हैं।न कुछ कहती हैं, सब सहती हैं।

कहा जाता है कि हर नर - नारी के नाक - नक्श में उसकी पिछली योनि का भी बहुत बड़ा योगदान रहता है।उसी के अनुसार उसके चेहरे -मोहरे की आकृति बनती है।देखा जाता है कि किसी की नाक तोते जैसी, किसी की बन्दर जैसी होती है।कोई प्लेन,कोई उठी हुई चट्टान जैसी तो कोई नन्हीं छोटी मिर्च की तरह सजी होती है। अब ये सब तो विधाता ही जानें कि वे किसको कैसी नाक का स्वामी बनाते हैं।नाक तो अंततः नाक है।नाक का मुख्य काम तो बस श्वास का आदान प्रदान कर जीवन देना है।यही वह स्थान है ,जहाँ से किसी के प्राणवान होने  अथवा न होने की जाँच भी होती है।अब रही आप सबकी बात कि आप नाक कितना पाक रखते हैं और अहमियत भी प्रदान भी करते हैं।

सुगंध अथवा दुर्गंध का अनुभव कराने वाली नाक को एक अन्य अर्थ में 'स्वर्ग' की संज्ञा से भी अभिहित किया जाता है। 'नाक वास बेसरि  लहौ बसि मुकुतनि के संग।' स्वर्ग  की संज्ञा से सुसज्जित होने के बाद भी यदि आपकी समझ में यदि नाक की शाख सटीक लगी हो तो अपने  वक्तव्य की इतिश्री करने की अनुमति मिले।मानव जीवन स्वर्ग नाक से ही है, यह स्वयंसिद्ध है। जिसकी नाक नहीं ,उसकी समाज में शाख नहीं। जिसकी शाख नहीं,वह आप नहीं।

●शुभमस्तु !


12.05.2023◆ 6.30 प.मा.


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दूरी का औचित्य ● [ कुंडलिया ]

 200/2023


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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                        -1-

दूरी  नित उनसे  रखें, 'सु'-आस्तीन के साँप।

पाल  रखे  जो  पास  में, लेना उनको भाँप।।

लेना  उनको  भाँप,  समय  पर  धोखा  देते।

रहें   काँपते   आप,   शांति  से  अंडे   सेते।।

'शुभम्' मीच के नाग,भंगिमा तन  की   भूरी।

मुखर  उगलते   आग, बनाना इनसे    दूरी।।


                        -2-

दूरी  लाखों  मील  की,फिर भी  देता  ताप।

सविता  अंबर  में  रहे, अपरिसीम है  माप।।

अपरिसीम है माप,ग्रीष्म पावस, कुसुमाकर।

शरद, शिशिर, हेमंत,सभी का सूत्र सुधाधर।।

'शुभम्' मात्र   है  भानु, करे वांछा  सब  पूरी।

पंच  तत्त्व   में  एक,  करोड़ों मीलों    दूरी।।


                        -3-

दूरी   दुर्जन  से  रखें, सदा सुरक्षित   आप।

संत जनों को जानिए,सागर सौम्य  प्रताप।।

सागर सौम्य प्रताप,सुगंधित सुमन समझना

भाव प्रवण संलाप,स्वार्थ से मुक्त परखना।।

'शुभम्' सहायक नित्य,चलाते कभी न छूरी।

संतों का औचित्य, जगत में रखें   न  दूरी।।


                        -4-

दूरी  उर  से  बीच  की,उर में बढ़ी   अपार।

चिंता  अपनी   ही  रहे,  टूट  रहे  दृढ़ तार।।

टूट  रहे दृढ़  तार, पुत्र  भूला पितु   जननी।

बस पैसे से प्यार,लेश अब बात न  बननी।।

'शुभम्'  न  सेवा  -भाव, करे इच्छा जो पूरी।

परजीवी   संतान, बाप  से  सुत  की  दूरी।।


                        -5-

दूरी  का  औचित्य  है, हृदय- हृदय के बीच।

दूरी  जब  घटने  लगी, आए उभय  नगीच।।

आए  उभय नगीच,दिए अवगुण  दिखलाई।

पकड़   खींचते  टाँग, खटाई पड़ी   मिताई।।

'शुभम्' न  आना  पास, मिलेंगे  रिश्ते  धूरी।

अंतराल कुछ ठीक,उचित उर- उर में दूरी।।


●शुभमस्तु !


12.05.2023◆11.30आ.मा.


लिखें ऐसा ● [अतुकान्तिका ]

 199/2023

    

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●शब्दकार©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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लिखें ऐसा

बना दे

आपकी एक

पृथक छवि ,

कहने लगें

प्रबुद्ध

होना चाहिए

ऐसा ही कवि।


न स्वयं समझे

न कोई जाने,

शब्दाडंबर के

बिछा दे

ऐसे ताने -बाने,

कि न मिले ओर

न पाए कोई छोर!

कहते रहें

'सरोता': "वंश मोर-

वंश मोर",

ऐसे ही काव्य को

कहते हैं,

कविता घोर।


पाठकों को

बैठना पड़े

खोल कर कोश,

पढ़कर रचना

खो ही बैठें

निज होश,

और कुछ

गूगल बाबा से

प्रार्थना करते दिखें

पुरजोश।


करते रहें

जो वाहवाही,

बस कविता

उन्हीं की 

समझ में आई!

गूँगा जाने 

या उसके घर वाले,

जिसके 

हाथ में हो चाबी

वही खोले ताले।


अत्याधुनिक युग है,

चमत्कार जो 

दिखाना है,

दर्शकों, पाठकों,

 श्रोताओं की दृष्टि में

'महाकवि' कहलाना है,

तो काव्य भी

ऐसा रचाना है,

कि किसी की 

समझ में 

नहीं आना है,

बस ऊधम 

मचाना है।


●शुभमस्तु !


12.05.2023◆6.30आ.मा.

गुरुवार, 11 मई 2023

वरदान ● [ सोरठा ]

 198/2023

              

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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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दिया 'शुभम्' वरदान, कृपावन्त  माँ  शारदा।

पाऊँ कृपा महान,जन्म-जन्म अर्चन  करूँ।।


पाता  है  वरदान, करता जो प्रभु  - साधना।

फिर भी मिलता मान,यद्यपि करे न याचना।।


फल मानव को नेक,बिना कर्म मिलता नहीं।

बिना  साधना  एक, देवों  का वरदान  भी।।


मिलता शुचि वरदान,कर सकार की साधना।

नर परिणाम महान,कब नकार से पा सका।।


सेवा वही सपूत,जनक जननि की जो  करे।

मिलता सुफल अकूत,पाता है वरदान वह।।


परम -पदों का लाभ, गुरु-सेवा  से पा गए।

पीकर अमृत -आभ,पाकर शुभ वरदान वे।।


माँ का ये वरदान,मिला 'शुभम्'को जन्म से।

कविवर श्रेष्ठ महान,बने यशस्वी काव्य का।।


दिए जननि, गुरु, तात,फलीभूत वरदान वे।

मेरा शुभद प्रभात,उनसे ही तन -मन बना।।


कर गुरु माँ की मीत, सच्चे मन से साधना।

मिले सदा ही जीत,मिले पितृ वरदान  भी।।


मिलता  उनको शाप,होता पूत  कपूत जो।

करता है जो पाप,छीन सके वरदान क्या??


पाऊँ मैं वरदान,जन्म-जन्म पितु जननि का।

नित आशीष महान,गुरुवर दें नवज्ञान  का।।


●शुभमस्तु !


11.05.2023◆10.00आ.मा.

                

ज्येष्ठ ● [ दोहा ]

 197/2023

          

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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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ज्येष्ठ   मास  के ताप से,मत घबराना  मीत।

जो  जितना  तपता यहाँ,गाता वर्षा -  गीत।।

अपना  कोई ज्येष्ठ हो,मत करना   अपमान।

नाक नहीं  ऊँची उठे, सत्य तथ्य  ले  जान।।


ज्येष्ठ  सदा  ही  मान्य है,  पूजनीय   संसार।

सम्मानित इनको करें,तज निज हृदय विकार

तपती धरती  ज्येष्ठ में,बढ़ती प्यास  अपार।

सागर  में   लहरें उठें,  पावस का  उपहार।।


ज्येष्ठा एक  नक्षत्र है, उदित पूर्णिमा  - सोम।

ज्येष्ठ मास होता वही, तपता रवि से व्योम।।

ज्येष्ठ देव श्रीविष्णु का,अतिप्रिय है शुभमास

पूजा  हरि   हनुमंत की,करिए गंगा    वास।।


ज्येष्ठ मास शुभ भौम का,बुढ़वा मंगल नाम।

अर्चन  कर  बजरंग का,पूरे कर  लें  काम।।

वरुण सूर्य  दो  देव  की, पूजा  करना मीत।

ज्येष्ठ  मास गंगा नहा, गाएँ हरि  पद  गीत।।


ज्येष्ठ  सदा   आगे  चलें,पीछे सभी  कनिष्ठ।

नायक  प्रभु की  सृष्टि में,होता सदा  वरिष्ठ।।

आदि ज्येष्ठ का रूप है,सदा सृष्टि  में  मीत।

आगे वह पीछे  सभी, होना क्यों   विपरीत!!


●शुभमस्तु !


10.05.2023◆11.30 आ.मा.

जीभ की कहानी ● [बालगीत ]

 196/2023


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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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मौन        जीभ    की  मुखर कहानी।

देख         जलेबी        टपके   पानी।।


सब      कहते      हैं     जीभ  चटोरी।

लाल     रंग        की    लगती भोरी।।

स्वादों     की        है     कथा  पुरानी।

मौन    जीभ      की     मुखर कहानी।।


कभी         माँगती       तीखा  मीठा।

और       कभी     ये     खट्टा   सीठा।।

कड़वी        भी        दातौन  चबानी।

मौन    जीभ     की     मुखर कहानी।।


नमक      बहुत    ही    लगता  प्यारा।

बिना     नमक     सब    स्वाद बिगारा।।

सब्जी  -   दाल        नहीं     है  खानी।

मौन     जीभ     की     मुखर  कहानी।।


देख          मिठाई         ये    ललचाए।

मुँह     में      लार      खूब    भर  लाए।।

स्वाद    लिए   बिन      हटे   न   मानी।

मौन   जीभ      की     मुखर  कहानी।।


कभी           माँगती       रसना    ठंडा।

गर्म     कभी ,      क्या  इसका   फंडा??

'शुभम्'      नियंत्रण      में    ये   लानी।।

मौन    जीभ     की        मुखर  कहानी।


●शुभमस्तु !


10.05.2023◆6.45आ.मा.

जीवन उत्सव कर्म का● [ दोहा ]

 195/2023


[पथिक,मझधार,आभार, उत्सव,छाँव]

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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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          ● सब में एक ●

कौन पथिक जग में नहीं,चलते पथ दिन-रात

लख चौरासी योनि में,कब संध्या कब प्रात।।

थका पथिक तरु छाँव में,चाहे अल्प विराम।

जीव किंतु थकता नहीं,चलना ही बस काम।


लेकर  नौका  कर्म  की,जाना है  उस  पार।

नहीं  पंथ   ऐसा  चले,  डूबे  तू  मझधार।।

रे  केवट  मझधार में,मत दे  धोखा  मीत।

नाव सुरुचि से तू चला,गाता चल मधु गीत।।


जो साथी पथ में मिले, उन सबका आभार।

सुगम पंथ अपना हुआ,जीवन का उपहार।।

तिनके  का आभार भी,नहीं  छोड़ना  मीत।

कहाँ कौन अपना बना,पथ में  हुआ प्रतीत।।


जीवन उत्सव जीव का,पथ कर्मों की नाव।

जर्जर से धोखा मिले, बना रखे शुभ भाव।।

भूल न जाना खेल में,उत्सव   जीवन-गीत।

रुकना मत पथ भूलकर,तभी तुम्हारी जीत।।


कौन नहीं नर चाहता,मिले सघन शुभ छाँव।

कर्म-पंथ  को त्यागकर,लगा न  देना  दाँव।।

मिले छाँव सोना  नहीं,ज्यों सोया  खरगोश।

जीवन  लंबी  दौड़  है,खो  मत देना  होश।।


       ●  एक में सब ●

पथिक! छाँव शीतल मिली,

                         रुकना मत मझधार।

जीवन उत्सव कर्म का,

                        तिनके   का आभार।।


●शुभमस्तु !


09.05.2023◆11.00प.मा.


किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...