गुरुवार, 8 जून 2023

बचपन की हर बात● [ गीत ]

 246/2023

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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बचपन     की     हर  बात  निराली।

शुभता      की      सौगात सँभाली।।


बचपन     से      ईश्वर    की तुलना।

पानी      में       मिश्री    का  घुलना।

पारदर्शिता              भोली -  भाली।।

बचपन     की    हर    बात  निराली।।


निकट           सत्य   के  बचपन होता।

हँसना   -   रोना        सब   सुख बोता।।

होती          छलनी    एक    न जाली।।

बचपन    की     हर      बात  निराली।।


देखें       प्यार       भरी   आँखों से।

ज्यों    चिड़िया    सेती   पाँखों   से।।

नाचें     -    कूदें         दे- दे   ताली।

बचपन      की    हर    बात निराली।।


बालक       से      गलती    हो जाएँ।

क्षमादान         सौ -  सौ    हम पाएँ।।

बुरा       न    मानें      दें  यदि गाली।

बचपन     की     हर     बात  निराली।


बड़ा        हुआ         चालाकी   आई।

झूठ      छलों       की     फैली   काई।।

जलता      है      ज्यों      जले  पराली।

बचपन      की      हर     बात निराली।।


बचपन          खेले   -      कूदे   खाए।

सद           इच्छा         आनंद  मनाए।।

यौवन          खड़ा        तान दोनाली।

बचपन      की     हर     बात निराली।।


कौन          भूलता      बचपन   प्यारा।

भेद     भ्रमों         से     मिले किनारा।।

रचना        अद्भुत         ईश   बना  ली।

बचपन     की     हर      बात  निराली।।


बचपन       कब   तक  रुकता  भाई।

सात    -   आठ       तक   गई लुनाई।।

वय        किशोर     यौवन   में  ढाली।

बचपन      की     हर     बात  निराली।।


छाई          झूठ -  कपट     की  माया।

आजीवन             घन     घोर मचाया।।

विदा      हुआ      बचपन   का  माली।

बचपन      की      हर     बात निराली।।


बंद      हुए       सुख       के   दरवाजे।

प्रौढ़          आयु      में     बाजे  गाजे।।

छलना       की       चल    उठी  पनाली।

बचपन         की    हर    बात निराली।।


'शुभम्'       सत्य   -    पर्याय बालपन।

यौवन        गरम       मसाला सालन।।

खाता        काम     -    वासना  थाली।

बचपन      की     हर     बात निराली।।


●शुभमस्तु !


08.06.2023◆6.00आ०मा०

बुधवार, 7 जून 2023

अनुभव ● [ दोहा ]

 245/2023

           

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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्' 

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गुड़   खाया  मैंने  रुचिर, जानूँगा  मैं स्वाद।

अनुभव शब्दों में नहीं,कर सकता भर नाद।।

रूप   रंग  आकार  से,मानव की   पहचान।

बिना गहन अनुभव लिए,नहीं हो सके ज्ञान।।


अनुभव करने के लिए,संग बिताओ    काल।

उलझा मनुज चरित्र ये,ज्यों मकड़ी का जाल।।

नीचे  छत   के  एक  ही, घिर दीवारें   चार।

अनुभव पूरा  हो नहीं, यद्यपि सँग नर - नार।।


बचपन यौवन के चढ़ा,मानव बहु   सोपान।

अनुभव  का भंडार है,जर्जर देह   मकान।।

अनुभव मिलता कर्म से,बिना करे सब व्यर्थ।

रखे  हाथ  पर हाथ तू,बैठा क्यों  क्या अर्थ??


चलता है जो राह में, अनुभव मिलें  अनेक।

कभी धूप है  छाँव  भी,खोना नहीं  विवेक।।

देख विफलता अन्य की,ले अनुभव धीमान।

स्वयं  गिरे  सीखे नहीं, उसे मूढ़ मति जान।।


नित अनुभव की आँच में,तपता जो नर मीत।

चमके  कंचन-सा  वही, गुंजित यश के गीत।।

केवल पढ़ने से  नहीं,मिलता अनुभव  श्रेष्ठ।

कर्मक्षेत्र  में कूदकर, बनता है नर   ज्येष्ठ।।


अनुभव सित व्यवदान से, बनता'शुभं'कबीर।

सिल पर रज्जू से बने,गहरी अमिट लकीर।।



●शुभमस्तु !


07.06.2023◆1.00प०मा०

पनारी हूँ मैं पानी की ● [गीतिका ]

 244/2023


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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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पनारी हूँ मैं पानी की पिपासित मैं कहाँ जाऊँ।

गरजते मेघ खाली हैं बुलाने मैं  कहाँ   जाऊँ।।


तड़पती विरहिणी जैसे जमीं प्यासी पड़ी नीचे,

यहाँ कोकिल बुलाती है सवाली मैं कहाँ जाऊँ।


न चलने को कदम मेरे नहीं पर जो  उडूं ऊपर,

पड़ी  ही  मैं रहूँ यों ही बताएँ मैं  कहाँ जाऊँ।


भली लगती वही सरिता बहे कलरव करे भारी,

भरे जो रेत  आँखों में बचाने मैं  कहाँ  जाऊँ।


न देखो रात या दिन भी न फागुन जेठ की गर्मी

बरस जाते यकायक ही नहाने मैं कहाँ जाऊँ।


मुझे क्या धूप छाया से मुझे तो  चाहिए पानी,

समंदर भी न काफी है जताने मैं कहाँ  जाऊँ।


'शुभम्' कैसी पनारी हूँ गए हैं सूख   आँसू भी,

नहीं बहती सलिल धारा रिझाने मैं कहाँ जाऊँ।


● शुभमस्तु !


07.06.2023◆12.15प०मा०

सच्चाई ही परिधान है ● [दोहा ]

 243/2023


[सच्चाई, परिधान ,बदनाम, आहत, यात्रा ]

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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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            ● सब में एक ●

सच्चाई से मोड़ मुख,मिले न मन को  धीर।

जिनके  उर निर्मल सदा,बनते भक्त कबीर।।

मिथ्या एक बचाव को,सौ-सौ मिथ्या  बोल।

छिपती सच्चाई नहीं,होती 'शुभम्'अमोल।।


हे नर!अपनी देह धर, बगुले-से  परिधान।

हंस  नहीं   होगा  कभी,झूठी तेरी   शान।।

चटक-मटक परिधान की,देगी तुझे न मान।

मँडराते  भौरें   सदा, करने को मधु - पान।।


बद अच्छा बदनाम से,कर ले मीत विचार।

लगी चरित पर कालिमा,धुले न बार हजार।।

कर्मों  से   ही  नाम  है, कर्मों से   बदनाम।

कर्म सदा शुभ कीजिए,बना देह को धाम।।


कर्म कभी हो भूल से,यदि निकृष्ट  हे  मीत।

पावन मन आहत रहे,गा न सके सद गीत।।

सत्कर्मों   से   मन  सदा,होता निर्मल  मीत।

आहत वह होता नहीं, चले न जो विपरीत।।


जीवन- यात्रा  में मिलें, छोटे  बड़े   पड़ाव।

चरैवेति  के  मंत्र  से,  चले पंथ भर   चाव।।

आते  पथ में मोड़ भी, यात्रा में  हर ओर।

जीवन सीधा पथ नहीं, मिलते कागा मोर।।

            

             ● एक में सब ●

सच्चाई     परिधान है, 

                        करे न नर बदनाम।

आहत मन करती नहीं,

                    यात्रा - पथ अविराम।।


●शुभमस्तु !


07.06.2023◆5.00आ०मा०


रो रहे हैं ठूँठ! ● [ गीत ]

 242/2023

     

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●शब्दकार©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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पाँव में अपने

कुल्हाड़ी मारकर

कब तक बचोगे?


पाखियों के नीड़

उजड़े कट गए तरु।

रो रहे हैं ठूँठ

धरती हो गई मरु।।


आत्महंता बन

जीना न तुमको 

क्या कुछ रचोगे?


क्यों उठेंगे घन

पावस में धरा।

चीखते चिल्ला रहे

हाय ! मैं तो मरा।।


पौध रोपोगे

नहीं, मूढ़ मानव

आतप तचोगे?


छाँव में बैठे

पखेरू भैंस गायें।

आसरा उनका

छिना, वे तड़पड़ायें।।


उतर जाएँगे

तुम्हारे आवरण

बहुरंग चोले।


●शुभमस्तु !


06.06.2023◆11.45आ०मा०

सुराही ● [बाल गीतिका]

 241/2023

         

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●शब्दकार ©

● डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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लाल रंग   की सुघर सुराही।

मिट्टी से   ये   बनी  सुराही।।


शीतल जल दे प्यास बुझाती,

अपनापन दे   नित्य  सुराही।


गर्मी  में   सब   इसे    चाहते,

सौंधी दे   सद   गंध   सुराही।


कुम्भकार का श्रम रँग लाया,

तब घर   लाई   नीर  सुराही।


माटी कूट -  पीस  कर छानी,

बनी  चाक पर  गोल सुराही।


गर्दन   सुघर   पेट   है  फूला,

पकी  अवा में  लाल सुराही।


देशी फ्रिज है 'शुभम्'तुम्हारा,

किसे न भाती सजल सुराही।


●शुभमस्तु !


06.06.2023◆11.आ०मा०

सोमवार, 5 जून 2023

कसें कसौटी सत्य की!● [ दोहा गीतिका]

 240/2023

 

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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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कसें   कसौटी सत्य की,हीरा हो या काँच।

भ्रम  में तेरे नेत्र हैं ,पता  करें यह   साँच।।


जीव योनि-यात्रा  करे, चल चौरासी लाख,

तपता है वह नर्क में,जल रौरव की आँच।


बचपन बीता खेल  में,यौवन में  रत काम,

वृद्ध देह  असमर्थ  है,भरता वृथा कुलाँच।


पोथी  गीता  वेद की, घर में सजीं   अनेक,

जीवन यों ही बीतता,सका न पल को बाँच।


यात्रा  से  पहले  नहीं,परखी राह  -  कुराह,

कैसा  तव  गंतव्य है,नहीं सका नर  जाँच।


दुर्जन  की  पहचान  है,चले सदा  बदराह,

जो  चलता  सन्मार्ग में,वही लगाते  टाँच।


'शुभम्'शोध अपना करें, अंतर्मन  हे  मीत!

श्रेष्ठ सुजन मिलते कहाँ, मिलें चार या पाँच।


●शुभमस्तु!


04.06.2023◆6.00आ०मा०

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...