बुधवार, 7 जून 2023

सुराही ● [बाल गीतिका]

 241/2023

         

●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

●शब्दकार ©

● डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

●●●●●●●●●●●●●●●●●●●●

लाल रंग   की सुघर सुराही।

मिट्टी से   ये   बनी  सुराही।।


शीतल जल दे प्यास बुझाती,

अपनापन दे   नित्य  सुराही।


गर्मी  में   सब   इसे    चाहते,

सौंधी दे   सद   गंध   सुराही।


कुम्भकार का श्रम रँग लाया,

तब घर   लाई   नीर  सुराही।


माटी कूट -  पीस  कर छानी,

बनी  चाक पर  गोल सुराही।


गर्दन   सुघर   पेट   है  फूला,

पकी  अवा में  लाल सुराही।


देशी फ्रिज है 'शुभम्'तुम्हारा,

किसे न भाती सजल सुराही।


●शुभमस्तु !


06.06.2023◆11.आ०मा०

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...