बुधवार, 22 फ़रवरी 2023

गोल-गोल रोटी 🦚 [ दोहा ]

 81/2023


[रोटी,गुलाब,मुँडेर,पाती,पलाश]

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✍️ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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       💞 सब में एक 💞

पानी  बरसे  मेघ  से,उगते हैं कण   अन्न।

रोटी बनती  अन्न से,पलता मनुज  प्रपन्न।।

घूम  रहा संसार  ये,निशि-दिन चारों   ओर।

गोल-गोल रोटी वही,जिसका ओर न छोर।।


देता सीख गुलाब का,महमह  करता फूल।

जीवन क्षणिक अमोल है,साथ फूल के शूल।

संगति सुमन गुलाब की,देती  सदा  सुगंध।

सुमन सदृश मानव जिए,करके भव्य  प्रबंध।


छत - मुँडेर पर नाचता,मृदुल मनोहर मोर।

रिझा-रिझा निज मोरनी,बना हुआ चितचोर।

वेला   ब्रह्म - मुहूर्त  की, गाता पंडुक    गान।

कभी विटप की डाल पर,घर- मुँडेर सम्मान।


पाती ने   संवाद  के, बदल लिए   नव  रूप।

मोबाइल  हर  हाथ  में,है  युग- यंत्र  अनूप।।

प्रिया प्रतीक्षा  में खड़ी,लगी पिया   से  डोर।

कब पाती उसको मिले, भरे नेह  प्रति पोर।।


फूले फूल पलाश के,लाल- लाल चहुँ ओर।

तिया अटारी पर खड़ी, देख रही वन -छोर।।

अरुणिम सुमन पलाश के,होली खेलें आज।

चटख रंग की लालिमा,शुभ वसंत का साज।


       💞 एक में सब 💞

रोटी रखी मुँडेर पर,वन में   खिले पलाश।

हँसता फूल गुलाब का,विरहिन पाती आश।


🪴शुभमस्तु !


22.02.2023◆4.45आरोहणम् मार्तण्डस्य।


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