गुरुवार, 11 मई 2023

अपनी -अपनी नियति ● [अतुकान्तिका ]

 194/2023


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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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नदी का किनारा,

फिर भी प्यासा बेचारा,

किनारे पर खड़ा 

तरुवर एक।


नहीं डाली हरी

न रहे पत्ते,

सूख कर रसहीन 

झड़ गए 

कब के।


झाँकता 

भोर वेला में

दिवाकर,

शुष्क शाखाओं की

आँख से,

देखता नियति

तरु की

भरता लंबे श्वास - से।


टूटकर

जल में गिरीं 

हैं डलियाँ कुछ,

क्या करे 

असहाय है

तन औऱ मन हैं

निपट रुक्ष।


होता है जब

समय अपना बुरा,

क्या करे कोई

नियति का खेल

हर एक कोई

देता है दुरदुरा।


नियति जिसकी 

जो होती है 'शुभम्',

बदली नहीं जाती,

झेलना ही पड़ता है

वक्त के थपेड़ों को।


●शुभमस्तु !


09.05.2023◆ 10.15 आ.मा.


सपोले पाले हैं! ● [ गीतिका ]

 193/2023

 


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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बिगड़ा  हुआ  समाज,हृदय के  काले  हैं।

गिरे न क्यों सिर गाज,वाक पर  भाले  हैं।।


गले न  झाँकें  आप,देखते दोष    उधर,

चढ़ा   रहे  तन  ताप,  जीभ में छाले  हैं।


करते  हैं   अपराध,  उन्हें स्वीकार  नहीं,

चलते  पाँव  अबाध, पाप  ने ढाले    हैं।


होता जन- संहार,मजहबी शान   दिखा,

आस्तीन  में   नाग ,  सपोले पाले     हैं।


मानव   का   आहार ,आदमी आज  बना,

छाया  बुद्धि - विकार, ज्ञान पर   ताले  हैं।


फूल न   खिलते  बाग ,  धतूरे के  जंगल,

लगी   देश  में  आग,  मनुज मतवाले  हैं।


'शुभम्' नहीं  विश्वास,घात के बीज  उगे,

कैसे लें  नर श्वास,  प्राण के लाले    हैं।


08.05.2023◆11.45आ.मा .

वाक पर भाले हैं! ● [ सजल ]

 192/2023

 

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●समांत  :  आले

●पदांत: हैं।

●मात्राभार : 22.

मात्रा पतन : शून्य।

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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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बिगड़ा  हुआ  समाज,हृदय के  काले  हैं।

गिरे न क्यों सिर गाज,वाक पर  भाले  हैं।।


गले न  झाँकें  आप,देखते दोष    उधर,

चढ़ा   रहे  तन  ताप,  जीभ में छाले  हैं।


करते  हैं   अपराध,  उन्हें स्वीकार  नहीं,

चलते  पाँव  अबाध, पाप  ने ढाले    हैं।


होता जन- संहार,मजहबी शान   दिखा,

आस्तीन  में   नाग ,  सपोले पाले     हैं।


मानव   का   आहार ,आदमी आज  बना,

छाया  बुद्धि - विकार, ज्ञान पर   ताले  हैं।


फूल न   खिलते  बाग ,  धतूरे के  जंगल,

लगी   देश  में  आग,  मनुज मतवाले  हैं।


'शुभम्' नहीं  विश्वास,घात के बीज  उगे,

कैसे लें  नर श्वास,  प्राण के लाले    हैं।


08.05.2023◆11.45आ.मा .



ऋण से पा लें मुक्ति ● [ दोहा ]

 191/2023


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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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देव,पितृ,गुरु,लोक ऋण, पंचम ऋण है भूत।

लेकर आता विश्व में,समझ नहीं   ये   द्यूत।।

यज्ञ कार्य  से देव ऋण, श्राद्ध कर्म  से  पित्र।

ज्ञानदान गुरु ऋण चुके,दिए लोकऋण मित्र।


शिव-आराधन मुक्ति का,भूत ऋणों से मीत।

पंच ऋणों से मुक्ति पा,जन्म-बंध ले जीत।।

मनसा, वाचा, कर्मणा,दे न दुःख जो जीव।

भूत ऋणों से मुक्ति पा,माने शिव को पीव।।


आजीवन  सेवा करे,जननी- जनक सपूत।

ऋण से  पाता मुक्ति नर,पाए शांति अकूत।

जिस धरती का अन्न खा, पीकर निर्मल नीर।

बने देह,मन,धी सभी, भूल नहीं  ऋण धीर।।


पंच तत्त्व का ऋण सदा,भू जल शून्य समीर।

पावक पंचम तत्त्व है,चुकता कर  धर  धीर।।

अपने देश समाज के,अनगिनती ऋण धार।

भूल रहा नर गेह में,फँसकर जाति-विकार।।


होना  हो  कृतकृत्य तो,मन में करे   विचार।

ऋण से पाकर मुक्ति तू,दुख से करे  निवार।।

'शुभम्'बिना ऋण के कभी,बढ़े न नर दो पाँव

सोच-समझ तू कर्म कर,मिले सुखों की छाँव


●शुभमस्तु !


08.05.2023◆10.15आ.मा.

भटकता हुआ बचपन● [ चौपाई ]

 190/2023


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●शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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आज भटकता  बचपन देखा।

कैसा ये   विधना  का लेखा।।

रखे   पीठ   पर  भारी  बोरी।

जाता बालक  करे  न  चोरी।।


तन पर फ़टे वसन वह  धारे।

कैसे अपना  भाग्य   सँवारे!!

पढ़ने की  वय   बोझा   ढोए।

कैसे  नींद  शांति की  सोए??


कर  एकत्र   बोतलें    खाली।

भर   बोरी  में  पीछे   डाली।।

बेच    बोतलें      पैसा    पाए।

भूख  उदर की  तभी बुझाए।।


भूखे  होंगे   पितुवर   जननी।

इसकी भी तो चिंता  करनी।।

कैसे  अपना   भाग्य   बनाए!

जब बचपन यों ही चुक जाए।


'शुभम्'  न  जीवन  ऐसा  देना।

पड़े  नाव  बचपन   से   खेना।।

जुड़ी   कर्म   से   जीवन- रेखा।

किसने किसकी लिपि को देखा।।


●शुभमस्तु !


08.05.2023◆7.15 आ.मा.


स्वस्तिक शुभम् प्रतीक● [ दोहा ]

 189/2023

  

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 ●शब्दकार©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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स्वस्तिक'शुभं'प्रतीक है,सरल भुजाएँ  चार।

धर्म,मोक्ष,धन,काम का,सदा सकल आधार।

स्वस्तिक  पहली  बार  ये, गुहा देश   यूक्रेन।

पाया था नव खोज में, अवगत  मानव-नैन।।


स्वस्तिक का इतिहास है,द्वादश  वर्ष  हजार।

है  प्रमाण  यूरोप   में, वर्ष  अष्ट   सहसार।।

चार मुक्ति के द्वार हैं, स्वस्तिक के  सारूप्य।

हैं सालोक्य सामीप्य भी,मुड़ी रेख सायुज्य।।


अहंकार,मन,चित्त,धी,अन्तः करण वि-चार।

स्वस्तिक में बसते सदा,जीवन में  साकार।।

प्रेम,समर्पण  साथ  में, हो मन का  विश्वास।

श्रद्धा स्वस्तिक में रहे,प्रसरित करे उजास।।


जैन, बौद्ध,हिन्दू सभी,दें स्वस्तिक को मान।

गणपति का ये चिह्न है,विश्वम्भर का ज्ञान।।

ऊर्जा  सदा  नकार  की,  रहती  इससे   दूर।

स्वस्तिबोध स्वस्तिक करे,कल्याणक ये नूर।


ब्रह्मा,विष्णु,महेश   सँग, गौरी पुत्र  गणेश।

स्वस्तिक में बसते सभी,  देते शुभ  संदेश।।

चार वेद या लोक भी,स्वस्तिक में आसीन।

मध्य  ब्रह्म  का  वास है, देता भाव  नवीन।।


चार  भुजाएँ  एक  सम,नब्बे अंश   प्रमाण।

स्वस्तिक की रहती सदा,करती मानव-त्राण।


●शुभमस्तु !

08.05.2023●7.45 आ.मा.

पहले [ कुंडलिया ]

 188/2023

               

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● शब्दकार ©

● डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'

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                        -1-

पहले  जैसे अब नहीं,उपकारी अब    लोग।

स्वार्थ लीन अधिकांश हैं,चाहत अपना भोग।

चाहत  अपना  भोग,लूट कर भरें   तिजोरी।

करके  लूट  खसोट , भरें  नेता  धन - बोरी।। 

'शुभम्' एक से एक,सभी नहले  पर   दहले।

नैतिकता   का लोप ,नहीं था इतना   पहले।।


                        -2-

पहले मन फिर देह है,साधन तन को  जान।

साध्य सिद्ध मन से सदा,होता नर   अज्ञान।।

होता   नर  अज्ञान, यंत्र  से मंत्र   बड़ा    है।

भीतर तंत्र महान, निम्न से उच्च  खड़ा  है।।

'शुभम्'साध्य का ज्ञान,हृदय में मानव गह ले।

दस अश्वों को हाँक,बाग कस कर में पहले।।


                        -3-

पहले  सजती  गाँव  में,   सतरंगी   चौपाल।

करते थे मन मोद जन,क्रीड़ा कलित धमाल।

क्रीड़ा  कलित  धमाल,गल्प के   दौड़ें  चीते।

नौटंकी  की     धूम,  रात आँखों  में   बीते।।

'शुभम्' धैर्य के धाम ,बात कड़वी भी सह ले।

बड़े  हृदय   के लोग, गाँव  में होते    पहले।।


                        -4-

पहले  आती    गाँव  में,कन्या की    बारात।

गातीं  गाली    नारियाँ,   करें चुटीली  बात।।

करें   चुटीली  बात, गईं  सब अब  वे   बातें।

रहे न वे   अब लोग,नाक पर पड़तीं   लातें।।

'शुभं'हुआ सच आज,कौन सुनकर यों सह ले

गाली   की   सौगात,नहीं जैसी  थी   पहले।।


                        -5-

पहले  उर   में   प्रेम   था,मात्र प्रदर्शन   शेष।

अब  तो कोरा  ढोंग  है, नर रेवड़ की  मेष।।

नर  रेवड़  की मेष,जलन का खेल   पसारा।

मन  में भीषण  द्वेष,जनक संतति से हारा।।

'शुभम्'चूस धन आज,चाहता महल दुमहले।

बंधु - बंधु का  शत्रु,विभीषण था क्या पहले?


●शुभमस्तु !


05.05.2023◆1.00प०मा०

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...