रविवार, 6 सितंबर 2020

गौ माँ [ कुण्डलिया ]

 

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✍ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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                      -1-

गौ माँ!गौ माँ!!कर रहे, सुलभ न चारा घास।

मारी-मारी  फिर रहीं,गौ माँ आज निराश।।

गौ माँ आज निराश, सड़क पर भटकें सारी।

गली - गली  में  रोज, नरक झेलें    बेचारी।।

'शुभम' खोखला  नेह, झूठ  वे कहते  हैं माँ।

खाती सभी अखाद्य,आज वे अपनी गौ माँ।


                      -2-

माता  के  सम्मान  से,  वंचित सारी  गाय।

दूध पिया फिर छोड़ दीं,हुई दूध से आय।।

हुई    दूध   से  आय,   पूजते अर्थ   कमाने।

खातीं    छुट्टा  खेत,भेज दीं डंडा   खाने।।

'शुभम' स्वार्थ साक्षात,गीत नर  झूठे गाता।

पिटवाता नित गाय, और कहता गौ माता।।


                      -3-

शाला गौ की नाम की,मिले न चारा   घास।

फोटो हैं अख़बार में,भक्त न जाते   पास।।

भक्त  न जाते पास,सुर्खियों में है    सेवा।

गाय  हुई   कंकाल, चाभते नेता    मेवा।।

'शुभम' गाय के नाम, वसूलें चंदा  लाला।

करते हैं मधुपान ,उजड़ती हैं गौ   शाला।।


                      -4-

रोटी पहली गाय की, नहीं खिलाते लोग।

बासी करके फेंकते,फैलाते बहु    रोग।।

फैलाते बहु रोग, सड़क ,नाला या नाली।

पर न खिलाते गाय,एक रोटी भी काली। 

'शुभम'बजाते गाल,करें वे भाषण   चोटी।

भूखी मरती गाय, नहीं घर पहली   रोटी।।


                      -5-

पीटे  हमने  ढोल  ही,  उच्च बड़े  संस्कार।

बस गालों में जोर है,भारी हृदय - विकार।।

भारी हृदय विकार,गाय को कहते   माता।

चूस थनों  से  दूध, पालता उन्हें   विधाता।।

'शुभम' विवश हैं गाय,व्रणों को  खाते चींटे।

नाम छपा अख़बार, ढोल भाषण  के  पीटे।।


💐 शुभमस्तु !


05.09.2020 ◆11.30 पूर्वाह्न।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

ईश्वर [ अतुकान्तिका]

 

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✍ शब्दकार©

🛕 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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न हवा देखी ,

न समय देखा,

नहीं देखा 

ईश्वर भी किसी ने,

अहसास मात्र

इंद्रियों का

मन का

 हवा और समय

 के  लिए।


जिज्ञासा का विषय 

रहा है,

सदा से ईश्वर,

नहीं अहसास

करतीं इन्द्रियाँ स्थूल,

सूक्ष्म का विषय है

ईश्वर का मूल।


आदमी ने 

आदमी की देह में

ईश्वर बनाया,

पुलिंग और स्त्रीलिंग में,

उसे सजाया मनभाया,

राम, कृष्ण ,ईसा,

शिव ,विष्णु ,हनुमान,

आदमी के 

अनगिनत भगवान,

सरस्वती , लक्ष्मी ,दुर्गा,

अपनी ही तरह सोचा

बनाया भी।


जानता हूँ

नहीं होता है 

कोई लिंग 

ब्रह्म का,

ईश्वर का ,

परमात्मा का,

आत्मा का भी नहीं,

किसी देह में नर 

तो कहीं नारी रही।


अगर है

किसी श्वान का भगवान,

(जहाँ है 

सम्पूर्ण ज्ञान,बल ,धन,

यश ,सौंदर्य और त्याग,)

नहीं होगा 

निश्चय ही 

वह नरदेहवान इंसान,

वह तो होगा 

पूरी तरह 

एक पूँछ और

चार टाँगधारी  श्वान!

समस्त देहधारियों के

यदि हैं कोई ईश्वर,

भगवान,

कदापि नहीं होंगे वे

श्रीराम ,कृष्ण ,हनुमान।


जैसा जीव

वैसा ही ईश्वर,

भगवान,

तोते का तोता,

वराह का वराह,

वह क्यों माने

इंसान की चाहत 

या चाह!

तोते का ईश्वर तोता,

यदि कहीं होता ,

तो वराह का वराह ही

ईश्वर होता।


मानवीय आस्था

और मान्यता का

सृजन है ईश्वर,

अपनों से श्रेष्ठ है

सत्यं  शिवं सुंदरम  ईश्वर।।


💐

 शुभमस्तु !


04.09.2020 ◆10.45 पूर्वाह्न।

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

मात-पिता जिसने ठुकराए [ गीत ]

 

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✍ शब्दकार©

🌻 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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मात -पिता जिसने ठुकराए।

नर -तन में वे  सब  चौपाए।।


अपने उदर  कुकर भी भरते।

अपने   बूते   जीते  -  मरते।।

जो  गैरों  को   बाप    बनाए।

नर -तन में  वे सब   चौपाए।।


अपने पर  चिड़ियाँ उड़ती हैं।

नहीं घोंसले   में   मुड़ती  हैं।।

अपने  अंशी    को   भरमाए।

नर -तन  में वे सब   चौपाए।।


सेवा नहीं  ,मान  क्या  जाने?

स्वार्थ ,अर्थ को ही  पहचाने।।

जीते  जी   दुश्मन  बन  जाए।

नर -तन में वे सब   चौपाए।।


पत्नी   ने    नाड़े   से   बाँधा।

 बिना किए का ले ले आधा।।

प्रभु  ऐसी   संतान    न लाए।

नर -तन में वे सब   चौपाए।।


बाप रो   रहा जिसके कारण।

मुश्किल काक्या करे निवारण

कदम-कदम वह पितु पछताए

नर-तन में   वे  सब  चौपाए।।


सब  संतान  नहीं   सुख देतीं।

सोते -  जगते    फेरें     रेती।।

कहने  को  अपना   कहलाए।

नर -तन  में वे  सब  चौपाए।।


पूर्वजन्म   का   बदला  लेतीं।

वे  औलादें   दुःख   ही देतीं।।

भाल लिखी  कैसे मिट पाए?

नर -तन में वे  सब  चौपाए।।


पूर्वजन्म  कृत ऋण  लेने को।

आतीं  कब तृण भर देने को।।

क्यों अपनी  औलाद  बताए?

नर -तन में वे  सब   चौपाए।।


क्योंकर   वे  अपनी  औलादें।

अपना बोझ बाप - सिर लादें।

आजीवन   हम   गए  सताए।

नर -तन में वे  सब   चौपाए।।


💐 शुभमस्तु  !


03.09.2020 ◆3.00अप.

ग़ज़ल


✍ शब्दकार ©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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घुटन  है  हवा     कुछ  खुली चाहिए।

साँच  के  साथ  मीठी   डली चाहिए।।


धूप  से    तमतमा    रहा   है बदन,

छाँव  शजरों  की  ठंडी भली चाहिए।


कोई    शायर   न  बोले   सच बात भी,

जो   महके   नहीं   वो    कली चाहिए।


चाहतें   हैं    जुबाँ     आज  शायर सिलें,

 नचनियां    बड़ी      मनचली चाहिए।


ढोल   बजने     लगे    सब खरीदे हुए ,

मुल्क   को      महज   रँग रली चाहिए।


भेड़  बनने  में  भलाई  है समझे  हैं  वे,

ऐसी  जनता  को काली छली चाहिए।


लगाकर   मुखौटे     वे चले हैं 'शुभम',

भागने  को   महज  इक  गली चाहिए।


💐 शुभमस्तु !


03.09.2020◆4.00अपराह्न।

जी डी पी का नीचे जाना [ चौपाई ]


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✍ शब्दकार ©जी डी पी का नीचे जाना⬇️

               [ चौपाई ]

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✍ शब्दकार ©

⚓ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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जी डी पी   का   नीचे  जाना।

कोरोना  का  मिला  बहाना।।


भक्त  कहें  सो  साँची  बाता।

साँच  कहे  सो  खाए लाता।।


अपनी  बला   और पर टालें।

कड़ुए फल को मधुर बना लें।


अच्छा - अच्छा    नाम हमारे।

बुरा नतीजा   काम   तुम्हारे।।


मिली  विरासत   में  सौगातें।

हम हैं   ऊँचे   खा  तू  लातें।।


हम से काम  बिगड़ता कोई।

टाल और पर हम खुश होई।।


किसी और पर दोष लगाना।

इतना  हमने  सीखा  जाना।।


चक्षु -  पट्टिका   बाँधी  ऐसी।

भेड़ बन  गए  हैं हम  देशी।।


कान   बचे  हैं   अभी  हमारे।

जिन पर पट्टी   शेष  तुम्हारे।।


अपनी कहो सुनो मत काना।

जन हों या हों सभी जनाना।।


बिगड़े   कोई   काज   हमारा।

कोरोना   पर    डालें   सारा।।


वर्षों  पहले     भारत   आया।

बेड़ा     उसने  गर्क  कराया।।


भारत में  अब  दृश्य हो गया।

जी डी पी का ग्राफ सो गया।।


सरकारों   को  दोष  न  देना।

उनको    देना   अंडे    सेना।।


सबका  मालिक   है कोरोना।

व्यर्थ  करो  मत  रोना-धोना।।


धन की   सेहत  का   पैमाना।

जी डी पी   को हमने जाना।।


'गर्त   डालदो  पाप'    हमारे।

कोरोना  सब   काम  सँवारे।।


गंगाजल  -   से   पावन  सारे।

बैठ  गए   वे   सभी  किनारे।।


गूँगा   कोरोना     क्या   बोले!

जो बोले    सो  कुंडी  खोले।।


तालेबंदी    सबकी    कर  दी।

जी डी पी    गड्ढे  में  भर दी।।


जी डी पी  पर  लगा न ताला।

रोते   नौकर,  चाकर, लाला।।


कोरोना  से    भी  शातिर  हैं।

दोषारोपण   में   माहिर   हैं।।


सारे    दोष  उसी   पर  लादे।

नेता   भूल   गए   सब  वादे।।


कोरोना जो   तू   नहिं  आता।

मानव किस पर गाज गिराता।


तेरी   ताकत   तू    ही   जाने।

हमको   आते   लाख बहाने।।


सौ की  बात  एक  हम जानें।

सुनें  न  तेरी   अपनी   तानें।।


तू   ही  गिरा  रहा  जी डी पी।

सब  ही  बोल  रहे पीं पीं पीं।।


💐 शुभमस्तु !


02.09.2020 ◆5.45अपराह्न।


⚓ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

जी डी पी   का   नीचे  जाना।

कोरोना  का  मिला  बहाना।।


भक्त  कहें  सो  साँची  बाता।

साँच  कहे  सो  खाए लाता।।


अपनी  बला   और पर टालें।

कड़ुए फल को मधुर बना लें।


अच्छा - अच्छा    नाम हमारे।

बुरा नतीजा   काम   तुम्हारे।।


मिली  विरासत   में  सौगातें।

हम हैं   ऊँचे   खा  तू  लातें।।


हम से काम  बिगड़ता कोई।

टाल और पर हम खुश होई।।


किसी और पर दोष लगाना।

इतना  हमने  सीखा  जाना।।


चक्षु -  पट्टिका   बाँधी  ऐसी।

भेड़ बन  गए  हैं हम  देशी।।


कान   बचे  हैं   अभी  हमारे।

जिन पर पट्टी   शेष  तुम्हारे।।


अपनी कहो सुनो मत काना।

जन हों या हों सभी जनाना।।


बिगड़े   कोई   काज   हमारा।

कोरोना   पर    डालें   सारा।।


वर्षों  पहले     भारत   आया।

बेड़ा     उसने  गर्क  कराया।।


भारत में  अब  दृश्य हो गया।

जी डी पी का ग्राफ सो गया।।


सरकारों   को  दोष  न  देना।

उनको    देना   अंडे    सेना।।


सबका  मालिक   है कोरोना।

व्यर्थ  करो  मत  रोना-धोना।।


धन की   सेहत  का   पैमाना।

जी डी पी   को हमने जाना।।


'गर्त   डालदो  पाप'    हमारे।

कोरोना  सब   काम  सँवारे।।


गंगाजल  -   से   पावन  सारे।

बैठ  गए   वे   सभी  किनारे।।


गूँगा   कोरोना     क्या   बोले!

जो बोले    सो  कुंडी  खोले।।


तालेबंदी    सबकी    कर  दी।

जी डी पी    गड्ढे  में  भर दी।।


जी डी पी  पर  लगा न ताला।

रोते   नौकर,  चाकर, लाला।।


कोरोना  से    भी  शातिर  हैं।

दोषारोपण   में   माहिर   हैं।।


सारे    दोष  उसी   पर  लादे।

नेता   भूल   गए   सब  वादे।।


कोरोना जो   तू   नहिं  आता।

मानव किस पर गाज गिराता।


तेरी   ताकत   तू    ही   जाने।

हमको   आते   लाख बहाने।।


सौ की  बात  एक  हम जानें।

सुनें  न  तेरी   अपनी   तानें।।


तू   ही  गिरा  रहा  जी डी पी।

सब  ही  बोल  रहे पीं पीं पीं।।


💐 शुभमस्तु !


02.09.2020 ◆5.45अपराह्न।


मंगलवार, 1 सितंबर 2020

इनको कवि विख्यात बनाओ [ गीत ]


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✍ शब्दकार©

🐸 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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अँगुली  पकड़ो  राह  चलाओ।

इनको कवि विख्यात बनाओ।।


दूध    पी   रहे   नौनिहाल   हैं।

आयु अभी बस  साठ साल है।।

'आ' से  कहना  आम सिखाओ।

इनको कवि विख्यात बनाओ।।


अभी   ककहरा  पर  आए  हैं।

ग़ज़ल इश्क  की कह पाए हैं।।

छंद - ज्ञान   इनको  करवाओ।

इनको कवि विख्यात बनाओ।।


तुम्हें   मान   लेंगे  गुरु   अपना।

सीखेंगे    फिर    होंगे  सपना।।

वर्तनियाँ   भी   तो   बतलाओ।

इनको  कवि  विख्यात बनाओ।।


अभी    चरण  धोकर  पी  लेंगे।

सब   कुछ  आप कहें, जी लेंगे।।

काव्य - व्याकरण   इन्हें पढ़ाओ।

इनको कवि विख्यात बनाओ।।


लघु-गुरु  गिनना वर्ण  न आए।

कोई   कितना     भी  समझाए।

पिंगल- ज्ञान 'शुभम'  रटवाओ।

इनको कवि विख्यात बनाओ।।


कवि   बनने  का  चाव बड़ा है।

झंडा    ऊँचा  किए    खड़ा  है।।

अब  तो प्रभु  का  ध्यान लगाओ।

इनको  कवि  विख्यात बनाओ।।


गीत    सुनाकर     मोहें  बाला।

पेट    निकाले    गप्पू   लाला।।

कालिदास-सा 'शुभम' सजाओ।

इनको  कवि विख्यात बनाओ।।


💐 शुभमस्तु !


01.09.2020 ◆2.00अपराह्न।

और जागे जागे ही सवेरा हो गया! [ संसमरण]


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✍ लेखक ©

 👨‍🏭 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 

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             अपने विद्यार्थी-जीवन में परीक्षा देने के बाद मैंने कभी भी परिणाम की प्रतीक्षा नहीं की।परीक्षा हो गई ,बस गंगा नहा लिए। परिणाम जब आएगा ,तब आता रहेगा ।पहले से ही परेशान होने की आवश्यकता ही क्या है! बस इसी भाव को लिए हुए निश्चिंत बना रहता। अपना परीक्षाफल देखने भी कभी नहीं गया।मेरे गाँव के यार -दोस्त ही घर पर आकर समाचार सुनाते कि रिजल्ट निकल गया है। उन दिनों में प्रायः परीक्षाफल मई जून में ही आ जाया करते थे। वह जमाना आज की तरह इंटरनेट या डिजिटल नहीं था। परिणाम अखबारों में ही छपा करते थे।


                मेरे जीवन में एक रात ऐसी भी आई , जब मैं सारी रात नहीं सो सका। चाहे इसे अति प्रसन्नता कहिए या भविष्य के प्रति चिंता का तीव्र भाव। पर सारी रात आँखों आँखों में ही निकल गई औऱ सवेरा हो गया। यह बात वर्ष 1967 की है, उस समय मैंने जूनियर हाई स्कूल (कक्षा 8) की परीक्षा उत्तीर्ण की थी।जहाँ तक मुझे ध्यान है मई या जून 1967 का महीना था।परीक्षाफल के लिए मेरे गाँव के सभी साथी उत्सुक भाव से प्रतीक्षा कर रहे थे औऱ मैं घोड़े बेचकर चैन की नींद में सो रहा था। समय यही दोपहर 1.00 बजे के बाद का रहा होगा। तभी मेरे दो -तीन साथी मेरे घर पर आए और उन्होंने मुझे जगाया और  खुशखबरी दी कि 'भगवत स्वरूप अपना रिजल्ट निकल गया है औऱ तेरी फर्स्ट डिवीजन आई  है।' मेरे पूछने पर उन्होंने अपने -अपने रिजल्ट भी बताए।पर यह सब कुछ सुनकर मुझे कुछ भी विशेष नहीं लगा।सब कुछ सामान्य ही लगा। वे लोग मेरे पास अखबार का वह पृष्ठ भी लेकर आए ,जिससे मैं उनकी बात का विश्वास कर सकूँ। 


              उस समय जूनियर हाई स्कूल की परीक्षा जनपद स्तर की होती थी। पूरे आगरा जनपद में मात्र 121 बच्चे उत्तीर्ण हुए थे , जिनमें मेरा ग्यारहवां स्थान था।देख ,सुनकर बहुत अच्छा लगा।उस समय मैं जूनियर हाई स्कूल उजरई (आगरा) का छात्र था। गर्मियों के दिन थे। गाँव में प्रायः जल्दी ही खाना बन जाता था । जल्दी ही खाकर सोने की तैयारी शुरू हो जाती थी। मच्छरों का नामो निशान नहीं था । इसलिए हम सभी खुली छतों पर , आँगन में या कहीं भी खुली जगह पर सो जाया करते थे। मैं अपने घर की छत पर सोने के लिए चला गया। अन्य दिनों में लेटते ही नींद आ जाया करती थी। पर यह क्या , आज तो नींद आँखों से कोसों दूर चली गई थी। इधर फर्स्ट डिवीजन में उत्तीर्ण होने की खुशी ,दूसरी ओर अगली कक्षा में प्रवेश लेने की चिंता।आर्ट साइड ,साइंस साइड के नाम भर सुन रखे थे। पर ज्ञान कुछ भी नहीं था।'किस कालेज में पढ़ना है ? कौन सी साइड लेनी है? कौन -कौन विषय लेने होंगे ? साइकिल चलाना भी नहीं आता, हाई स्कूल में कालेज कैसे जाऊँगा? 'इसी प्रकार की न जाने कितनी उधेड़ बुन सारी रात चलती रहीं।पर कहीं कोई निर्णय नहीं हो सका औऱ सोचते-सोचते सवेरा हो गया। नींद पता नहीं कहाँ चली गई थी।

                 जब होश आया तो यही भाव लेकर उठ बैठा कि अरे!सवेरा भी हो गया? फ़िर जीवन में ऐसी रात कभी नहीं आई ,जब मारे खुशी और भविष्य के प्रति चैतन्य भाव के कारण रात भर नहीं सो सका होऊं। वह दिन मेरी आज तक कि प्रसन्नता का पहला दिन था, अंतिम तो नहीं कहा जा सकता।क्योंकि रात भर नहीं सोने देने वाला वह एक ही दिन था । जो जीवन की एक अमर यादगार बनकर मेरे जेहन में बार -बार दस्तक देता है। बार -बार हर्ष विभोर कर जाता है। 

 💐 शभमस्तु !


 01.09.2020◆11.55पूर्वाह्न। 


 🏕️🌳🏕️🌳🏕️🌳🏕️🌳🏕️

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...