सोमवार, 7 सितंबर 2020

हिंदी की बगिया [ गीत ]


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✍️ शब्दकार ©

☘️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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सज्जन सलज सजनियो आओ।

हिंदी   की    बगिया महकाओ।।


हिंदी    है  अभिमान  हमारा।

हिंदी  है   सम्मान    हमारा।।

हिंदी  सीखो  और सिखाओ।

हिंदी  की बगिया महकाओ।।


संस्कार    है   अपना    हिंदी।

चमके ज्यों ललाट पर बिंदी।

हिंदी  का  नित मान बढ़ाओ।

हिंदी  की बगिया महकाओ।।


तुम   हिंदी  से    तुमसे हिंदी ।

रहते  भारत  में   सब  हिंदी।।

कविता,गीत,मल्हार सुनाओ।

हिंदी  की बगिया महकाओ।।


अपनी   माता ,   माता होती ।

जगा रही नित उज्ज्वल मोती।

ज्योति जगत भर में फैलाओ।

हिंदी की  बगिया महकाओ।।


दादा  - दादी   नाना - नानी।

हिंदी में   कह   रहे कहानी।।

माता-पिता,  बंधु -बहनाओ।

हिंदी की  बगिया महकाओ।।


💐 शुभमस्तु !


07.09.2020 ◆3.00 अपराह्न।

अपनी भाषा हिंदी है [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार©

🦚 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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स्वाभिमान  से  जीना सीखें,

अपनी     भाषा    हिंदी   है।

ऊँचा  भाल रखें हम अपना, भारत   माँ    की   बिंदी है।।


माँ ने  बोल  दिए   थे तोतल,

माँ  ने  दी   यह   भाषा   है।

हिंदी   की   घुट्टी  पीते  हम,

जीवन  की   परिभाषा   है।।

हिंदी    ही   संसार   हमारा ,

हिंदी  अपनी    जिंदी     है।

स्वाभिमान से जीना सीखें,

अपनी    भाषा   हिंदी   है।।


होली  हिंदी  भव्य  दिवाली ,

रक्षा    का    बंधन   प्यारा।

हिंदी  सावन  हिंदी  फ़ागुन,

पावस,वसंत मादक न्यारा।।

साड़ी ,कुर्ता , धोती   हिंदी,

जैन, सिक्ख   या सिंधी है।

स्वाभिमान से जीना सीखें,

अपनी   भाषा   हिंदी  है।।


विरहा,कजरी, गीत, मल्हारें,

गाती   नारीं      सावन    में।

होली ,  फ़ाग , कबीरा  गाते,

ढप ,ढोलक  पर फ़ागुन में।।

आल्हा, ढोला   धूम मचाएँ,

निज     हिंदी   बहुछंदी  है।

स्वाभिमान  से जीना सीखें,

अपनी   भाषा   हिंदी   है।।


गौना, ब्याह, भाँवरें , डोली,

संस्कार     पावन     अपने।

गाना,   रोना,  मंत्र हवन के ,

सोते     में     मीठे   सपने।।

सोच-समझकर चलने वाले,

 नहीं   खोखले     रिंदी  हैं।

स्वाभिमान  से जीना सीखें,

अपनी  भाषा   हिंदी    है।।


झाँझी ,   टेसू ,   फूलतरैया,

कार्तिक ,    माघी   मेला है।

संस्कार की सीख बड़ों की,

बचपन   से   ही  खेला  है।।

दोहा, गीत, सवैया लिखते,

'शुभम'  सीखता   हिंदी है।

स्वाभिमान से जीना सीखें,

अपनी  भाषा    हिंदी   है।।


💐 शुभमस्तु !


07.09.2020 ◆1.00अपराह्न।

जीवन उपवन है [ दोहा-ग़ज़ल ]


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✍ शब्दकार©

🏕️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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अपनी नौका आप खे, जाना है  यदि  पार।

गह ले कसकर हाथ में,अपनी शुभ पतवार।।


सागर -जगत अथाह है, सबकी अपनी नाव,

मोड़  हवा  के रुख सभी, बदलेगा तू धार।


नाव  पराई   बैठकर,डूब   गए बहु    लोग,

भँवर -कूप में जो पड़ा, भला करे करतार।


खग -शावक से सीख ले,उगते हैं जब पंख,

छोड़   घोंसला  भागता,अपने पंख  पसार।


अपना दाना आप ही,अर्जित करते   कीर,

बैठ  नीड़ में  मस्त हैं, घाम न मेघ ,  तुषार।


जीवन  जंगल तो नहीं, बढ़े आप  ही  आप,

जीवन उपवन है 'शुभम',बना छाँट घर -द्वार।


जीवन का माली मनुज,गोड़ निरा जलसींच,

पोषक भी देना सदा,बने 'शुभम'  उपहार।।


💐 शुभमस्तु !


06.09.2020◆12.15 अपराह्न।


गिरना-उठना जिंदगी [ दोहा -ग़ज़ल ]


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✍ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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गहरे    सागर  पैठकर,  मिलते  मुक्ताहार ।

जो  तट  बैठा  ऐंठकर , रोता अश्रु हजार।।


स्वांत बूँद  सीपी गिरे,अधर न हों दो बंद,

मोती बनता सीप में,नखत स्वांत उजियार।


रखे हाथ पर हाथ को,बैठा क्यों नर   मूढ़,

बहा  पसीना  देह  का,छाए विरुद -बहार ।


चलता रह निज राह पर, मंजिल आए पास,

थक जाए विश्राम कर,मगर न माने    हार।


नहीं  मलाई  रसभरी,पथरीली हर   राह,

जो जूझे जीवित रहे,वरना जीवन खार।


अपने  पैरों जो खड़ा,होती उसकी जीत,

गैरों  का मुँह जोहता, जाता नदी न पार।


पर्वत  पर  चींटी चढ़ी,ले नर उससे   सीख,

गिरना-उठना जिंदगी,'शुभम' तभी उद्धार।


💐 शुभमस्तु !


06.09.2020 ◆11.45पूर्वाह्।

रिश्ते सारे पेड़ [ दोहा -ग़ज़ल ]

 

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✍ शब्दकार ©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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बरगद की छाया घनी,तनकर खड़ा खजूर।

वट झुकना  ही  जानता, नहीं अहं में चूर।।


पथिक सराहे शजर को,छाया दे  जो खूब,

धूप, ताप  हरता  सभी, करे थकावट   दूर।


रिश्ते  सारे   पेड़  हैं , मिलते जीवन - राह,

कोई   छायादार है ,  कहीं खार  भरपूर।


 कहीं बेर की झाड़ियाँ, उलझातीं पथ रोक,

लहू    निकालें  देह में, बनतीं हैवां  क्रूर।


पत्थर फेंका पेड़ पर,फिर भी देता आम,

नहीं  भेद करता  कभी,दानव हो  या हूर।


अपने भद्र स्वभाव को,साधु न तजते  मीत, 

दूध पिलाओ साँप को,फिर भी विष भरपूर।


मानव  की  ही देह में, दानव करता  वास,

'शुभम' गरेबाँ  झाँक ले,दिख जाएगा  नूर।।


💐 शुभमस्तु !


06.09.2020 ◆10.45पूर्वाह्न।


रविवार, 6 सितंबर 2020

बाल -आकांक्षा [ बालगीत ]

 

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✍ शब्दकार©

🌳 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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चिड़ियों  जैसे  जो  पर  होते।

हम  पेड़ों  पर  जाकर सोते।।


कार  बसों  में क्यों हम जाते!

अम्बर में   उड़ मजे  मनाते।।

चढ़ते  नहीं   अश्व  या  खोते।

चिड़ियों जैसे  जो पर  होते।।


सड़कों पर फिर क्यों हम चलते।

पंखों  से  उड़  खूब  मचलते।।

घुटती  साँस  न हम फिर रोते।

चिड़ियों  जैसे   जो पर  होते।।


उड़कर  हम  पर्वत  पर जाते।

और   कभी   पेड़ों  पर पाते।।

नदियों   में  फिर लगते  गोते।

चिड़ियों जैसे जो पर    होते।।


भर -भर पेट  आम उड़ खाते।

बैठ   घोंसले   मजे    उड़ाते।।

क्यों सिर पर हम बोझा ढोते।

चिड़ियों  जैसे   जो पर होते।।


जल,थल ,नभ में हम उड़ जाते।

जो  मन  आता वह कर पाते।।

क्यों  फ़िर  बीज खेत में बोते?

चिड़ियों  जैसे  जो  पर  होते।।


💐 शुभमस्तु !


05.09.2020◆6.45अपराह्न।

गाली के विष - बाण [ दोहा ]

 

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✍ शब्दकार©

🏵️ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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गाली  गालों  से  चली,उर  पर मारे  चोट।

अपने  को  अच्छा कहे, बाहर देखे  खोट।।


गाली गालों  से निकल,पहुँची उनके  कान।

उर पर पाहन-सा लगा,मार दिया ज्यों तान।


दाता   गाली  दे  रहा, करो नहीं  स्वीकार।

वापस  जब  जाए  वहीं,  देना हो   बेकार।।


गाली  के बदले   अगर, गाली दी तुम तान।

असर हुआ बस जानिए,यही एकपहचान।


गाली के विष-बाण को,सहते धीर महान।

ज्यों पाहन से चोट खा,भंग हुआ संधान।।


गाली पा जो चुप रहे, कहलाता वह संत।

देने  वाला  मूढ़  बन , पड़े तुषार  वसंत।।


कायर   देता  गालियाँ, सहता संत  महान।

मोम सदृश जिनके हृदय,बन जाते पाषान।।


गल, गाली का द्वार है,मानव का मुख  एक।

खग तो गाते गीत ही,मधुमय जिनकी टेक।।


गल, गाली बन जाय जो,समझें हावी क्रोध।

ज्ञान नष्ट नर का हुआ,शेष नहीं   है बोध।।


अगर कसाई कोसता,बकरे को दिन-रात।

बाल न गिरता देह से,क्षणिक न होआघात।।


निकले  बिगड़ी बुद्धि से,गाली का  जंजाल।

'शुभम'होठ सिल लीजिए,उन्नत होगाभाल।


किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...