सोमवार, 31 अगस्त 2026

छिद्र ढूँढ़ता ही रहा [दोहा गीतिका ]

 277/2026


               

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छिद्र    ढूँढ़ता   ही   रहा, सबके   सदा समाज।

ग्रीवा   में   निज   झाँकने,में   लगती है लाज।।


औरों     पर   ही     थोपना, आता गलती खूब,

मानव वह किस काम का,रखे शीश निज ताज।


भूल     गए   कर्तव्य   को,  माँग   रहे अधिकार,

दुर्बल   करते   देश     को,  डूबे     भले जहाज।


पिता-पुत्र    गर्दभ   कथा,  किसे   नहीं   मालूम,

अनुचित-उचित  न  जानते,छिपा  सीख का राज।


मानव   मानव  का   बना, सबसे   प्रिय आहार,

शेष नहीं  भय  शेर  से,जन  ही जन पर गाज।


चूस   रहे   नेता     बड़े,   जनता   है भयभीत,

राजनीति   मैली   हुई,  झपट   रहे    हैं बाज।


'शुभम्'    रक्त  में  भ्रष्टता,  भरी  भयानक   क्रूर,

बेशर्मी    खिल-खिल   करे,दिखलाती   है नाज।


शुभमस्तु,


30.08.2026◆11.45 प०मा०

                 ◆●◆

मानव वह किस काम का [सजल]

 276/2026


       

समांत          : आज

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       : 24.

मात्रा पतन     : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छिद्र    ढूँढ़ता   ही   रहा, सबके   सदा समाज।

ग्रीवा   में   निज   झाँकने,में   लगती है लाज।।


औरों     पर   ही     थोपना, आता गलती खूब।

मानव वह किस काम का,रखे शीश निज ताज।।


भूल     गए   कर्तव्य   को,  माँग   रहे अधिकार।

दुर्बल   करते   देश     को,  डूबे     भले जहाज।।


पिता-पुत्र    गर्दभ   कथा,  किसे   नहीं   मालूम।

अनुचित-उचित  न  जानते,छिपा  सीख का राज।।


मानव   मानव  का   बना, सबसे   प्रिय आहार।

शेष नहीं  भय  शेर  से,जन  ही जन पर गाज।।


चूस   रहे   नेता     बड़े,   जनता   है भयभीत।

राजनीति   मैली   हुई,  झपट   रहे    हैं बाज।।


'शुभम्'    रक्त  में  भ्रष्टता,  भरी  भयानक   क्रूर।

बेशर्मी    खिल-खिल   करे,दिखलाती   है नाज।।


शुभमस्तु,


30.08.2026◆11.45 प०मा०

                 ◆●◆

हम सभी जागें [ अतुकांतिका ]

 275/2026


            

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


संस्कृति पर ही खतरा है

तो संस्कृत बचे कैसे,

दीमक लग गया है जड़ों में

देश खोखला हो रहा है

दिन -रात।


सौगन्ध उठा रखी है जिसने

देश को बरबाद करने की

सभी जानते हैं उसे

कॉकरोचों का सरदार वही।


देश का दुर्भाग्य यही

लोग आँखों पर

पट्टियां बाँधे चल रहे

उसके पीछे-पीछे

अपने हिए की भी मींचे।


कुकुरमुत्ते उग आए हैं

विदेशी यहाँ पेड़ों पर

उन्हें समूचा कुचलना ही है

ऐ भारतीयो ! जाग जाओ

सामर्थ्य वह जटाओ 

कि सपोलों को मिटा पाओ।


आग लगी है चारों ओर

विरोध के लिए

 विरोध करना है,

उनके बाप का 

जाता ही क्या है?

यहीं का खाना है

यहीं पर पलना है

और यही पर मरना है,

पर तिरंगे के नाम पर

बेड़ा यहीं का गर्क करना है।


हम सभी जागें

सपोलें कुचलें,

वे भागें ,

आस्तीन से निकालें 

नहीं अनुरागें,

चौंसठ घड़ी 

इन्हें त्यागें,

तभी देश बचेगा,

पहले देश 

और सब कुछ बाद में।


शुभमस्तु,


28.08.2026 ◆7.00 आ०मा०

             ◆●◆

माटी के चूल्हे की बात [ गीत ]

 274/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बीते हुए

दिनों की यादें

माटी के चूल्हे की बात।


भुला नहीं पाए

हम अब भी

गर्म -गर्म रोटी का स्वाद

कढ़ी

खरी रोटियाँ सिंकी वे

आती है रह-रहकर याद

लकड़ी सुलग रही

दे लपटें

लाल-लाल चिनगी बरसात।


चूल्हे के ढिंग

बैठ पूस में

हाथ-पाँव हम सेंक रहे

चुपड़ी रोटी

स्वाद ले रहे

घोल अपूपी   फेंट   रहे

बोरी बिछा

पालथी मारे

करते भोजन प्रातः- रात।


गोबर के 

उपले जब सुलगें

चट-चट लकड़ी चटके आँच

नहीं एक-दो

मन से खाते

रोटी सात -सात या पाँच

आलू भून 

बनाएँ भुर्ता

सिंकता जाए शीतल गात।


शुभमस्तु,


25.08.2026◆ 5.30 आ०मा०

                 ◆●◆

सोमवार, 24 अगस्त 2026

प्रश्न [ चौपाई ]

 273/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


प्रश्नों     का    सागर    उमड़ाया।

समाधान    क्या  कोई   पाया??

रिक्त   एक    स्थान     नहीं    है।

प्रश्नों  की   नित बाढ़   बही   है।।


देख  प्रश्न     त्यौरी    चढ़   जाए।

सहज  समझ   कोई कब  पाए।।

टेढ़ी  खीर    प्रश्न    हल   करना।

जीते जी कुछ जन   का  मरना।।


जीवन  जटिल  प्रश्न हल  कर लें।

यथाशक्य निज  घट को भर लें।।

समाधान   जो    उनका   करता।

रिक्त घड़े   को   जल  से भरता।।


देख   प्रश्न    जो   खुश हो  जाए।

वही सहज   हल   उनका  पाए।।

प्रश्न     देश    के    लिए   बड़े हैं।

हल करने   को   सभी  खड़े  हैं।।


प्रश्नों  का     सटीक    हो   उत्तर।

नहीं  तीस का  लिखना   सत्तर।।

जस का  तस   हो  सीधा  उत्तर।

बारह का   मत   करो   बहत्तर।।


प्रतियोगिता     निरंतर    चलती।

वस्तुनिष्ठ   की  छलना  छलती।।

सहज नहीं विकल्प का   चुनना।

टूटी    खाट   पलों    में  बुनना।।


'शुभम्' प्रश्न    से    मत घबराना।

पाहन     से    लहरें    टकराना।।

आओ    अपने     भीतर    पाएँ।

समाधान    प्रश्नों     के     लाएँ।।


शुभमस्तु,


24.08.2026◆10.30 आ०मा०

                ◆●◆

जाति-भेद अलगाव से [ दोहा गीतिका ]

 272/2026


          



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जाति-भेद   अलगाव   से,खंडित देश महान।

एक राष्ट्र ध्वज  एक  ही,नीला गगन वितान।।


गंगा यमुना  सरस्वती,  कृष्णा    सिंधु अनेक,

सरिताएँ  बहतीं  यहाँ,करें अमिय जल पान।


हिंदी   कन्नड़   तमिल  हैं,इंद्रधनुष   के रंग,

भाषाओं   के  रंग  हैं,  भारत   की पहचान।


साड़ी   या   सलवार   में,कोई   नहीं विभेद,

पेंट  शर्ट   जन   धारते,   धोती   वेश पुरान।


चावल रोटी   दाल   सब, खाते विविधाहार,

हरे शाक रुचि से कहें,दिखलाते निज शान।


सीखें  हम  इतिहास   से,रहे  न जन में फूट,

राष्ट्र एकता   के  लिए,   रहें   संगठित प्रान।


'शुभम्' शत्रु की चाल को,हम तोड़ें   हर हाल,

आँखें खुलें दिमाग की,खुले रखें निज कान।


शुभमस्तु,


24.08.2026 ◆ 6.15आ०मा०

                  ◆●◆

एक राष्ट्र ध्वज एक ही [ सजल ]

 271/2026


        

समांत           : आन

पदांत            :अपदांत

मात्राभार        :24

मात्रा पतन       : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


जाति-भेद   अलगाव   से,खंडित देश महान।

एक राष्ट्र ध्वज  एक  ही,नीला गगन वितान।।


गंगा यमुना  सरस्वती,  कृष्णा    सिंधु अनेक।

सरिताएँ  बहतीं  यहाँ,करें अमिय जल पान।।


हिंदी   कन्नड़   तमिल  हैं,इंद्रधनुष   के रंग।

भाषाओं   के  रंग  हैं,  भारत   की पहचान।।


साड़ी   या   सलवार   में,कोई   नहीं विभेद।

पेंट  शर्ट   जन   धारते,   धोती   वेश पुरान।।


चावल रोटी   दाल   सब, खाते विविधाहार।

हरे शाक रुचि से कहें,दिखलाते निज शान।।


सीखें  हम  इतिहास   से,रहे  न जन में फूट।

राष्ट्र एकता   के  लिए,   रहें   संगठित प्रान।।


'शुभम्' शत्रु की चाल को,हम तोड़ें   हर हाल।

आँखें खुलें दिमाग की,खुले रखें निज कान।।


शुभमस्तु,


24.08.2026 ◆ 6.15आ०मा०

                  ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...